भारत वर्ष में दशहरा विजयदशमी पर्व

भारत वर्ष में दशहरा विजयदशमी पर्व

स्वामी परमार्थदेव 

सहायक कुलानुशासक

-पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार

 

दशहरा पर्व जिसे विजयदशमी पर्व के नाम से भी जाना जाता है, विजयदशमी आश्विन सदी दशमी को मनाया जाता है, विजयदशमी को भारतीय पर्वों में महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इस पर्व को भारत में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में जहाँ-जहाँ भी भारतीय लोग रहते हैं, वहां भी इस पर्व को धूम-धाम से मनाते हैं। इस पर्व का बहुत ही बड़ा महत्व है। भारत की संस्कृति और विरासत, दिव्यता भव्यता से परिपूर्ण है, जो संसार में विविध पर्व त्यौहारों को लेकर अद्भुत अद्वितीय अकल्पनीय है। वस्तुत: पर्व का अर्थ भी यही है कि जो हमको अपूर्णता से पूर्णता की ओर ले जाये।
दशहरा/ विजयदशमी या ‘‘आयुध पूजा’’हिंदुओं का प्रमुख पर्व है, इसमें शक्ति के उपासकगण अपने अस्त्रों-शस्त्रों का पूजन करते हैं, यह पर्व भारतीय संस्कृति के गौरव-गाथा, वीरता, शौर्य का उपासक है, व्यक्ति और समाज में अच्छाई, सच्चाई, धर्म की प्रतिष्ठा के प्रति उत्साह, वीरता, धीरता, गंभीरता का आधान हो इसलिए दशहरे के उत्सव का आयोजन किया जाता है।

 दशहरा/ विजयदशमी से जुड़ी हुई प्रचलित ऐतिहासिक मान्यताएँ

दशहरा उत्सव की उत्पत्ति के विषय में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। भारतीय संस्कृति सदा ही वीरता और शौर्य की उपासक रही है। प्रत्येक जन-मन में वीरता का प्रादुर्भाव हो इसीलिए दशहरे का उत्सव मनाया जाता है। यदि कभी युद्ध अनिवार्य ही हो तो शत्रु के आक्रमण की प्रतिक्षा कर उसका प्रतिकार करना ही कुशल राजनीति है।
कुछ विद्वानों का ऐसा भी मत है कि भगवान् राम के समय से यह दिन विजय प्रस्थान का प्रतीक निश्चित है। भगवान् राम ने रावण से युद्ध हेतु इसी दिन प्रस्थान किया था। इसी शुभ मुहूर्त में मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने विजय यात्रा की थी कुछ समय में ही लंका पति रावण का वध कर असंख्य प्राणियों को उसके अत्याचारों से मुक्त किया था।
पुरुषोत्तम भगवान् श्री रामचन्द्र जी आर्य संस्कृति के आदर्श हैं उनके विषय में श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण् में कहा गया है-
धर्मज्ञ: सत्यसंधश्च प्रजानां हिते रत:
यशस्वी ज्ञानसम्पन्न: शुचिर्वश्य: समाधिमान्।। (वा.रा.)
प्रजापतिसम: श्रीमान् धाता रिपुनिषूदन:
रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता।। (वा.रा.)
दूसरी ओर प्रबल मान्यता यह भी है कि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर पुरुषोत्तम भगवान् श्री रामचन्द्र जी ने रावण का वध किया था। आसुरी शक्ति का दमन करके दैवीय शक्तियों की प्रतिष्ठा बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व है, इसी के साथ माँ दुर्गा के द्वारा महिषासुर का संहार हुआ था ऐसा भी माना जाता है
भारतवर्ष में शक्ति की देवी और दुर्गुणों का नाश करने वाली माँ दुर्गा तथा पुरुषों में उत्तम पुरुषोत्तम धीर-वीर-गंभीर भगवान् श्री रामचन्द्र जी का अत्यंत महत्व है क्योंकि दोनों ही शक्ति के प्रतीक माने जाते हैं।
अत्याचारी रावण और महिषासुर का अंत करके बुराई पर अच्छाई की जीत का ध्वज लहराया गया था भक्तजन इन दिनों माँ दुर्गा तथा भगवान् श्री रामचन्द्र जी की पूजा अर्चना करते हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि यह रण यात्रा का द्योतक है क्योंकि दशहरे के समय पर वर्षा समाप्त हो जाती है, नदियों की बाढ़ थम जाती है, धान आदि सुरक्षित करके रखने वाले हो जाते हैं। 
दशहरा जो विजय पर्व के रूप में मनाया जाता है यह उत्सव शक्ति और शक्ति का समन्वय प्रकट करने वाला उत्सव है नवरात्रि के 9 दिन जगत जननी जगदंबा की उपासना करके शक्तिशाली बना हुआ साधक संसार संग्राम में विजय प्राप्ति के लिए तत्पर रहता है इस दृष्टि से दशहरे अर्थात् विजय के लिए प्रस्थान का उत्सव माना जाता है।
ऐसा माना जाता है कि शत्रु पर विजय पाने के लिए इसी समय प्रस्थान करना चाहिए इस दिन श्रवण नक्षत्र का योग और भी अधिक शुभ माना गया है
इस पर्व को भगवती के विजया नाम पर भी विजयादशमी कहते हैं क्योंकि भगवान् रामचंद्र 14 वर्ष का वनवास भोग कर तथा रावण का वध कर अयोध्या पहुंचे थे
पाण्डव वनवास दुर्योधन ने पाण्डवों को जुंए में पराजित कर 12 वर्ष के वनवास के साथ 13वें वर्ष में अज्ञातवास की शर्त दी थी। 13वें वर्ष में  यदि पता लग जाता तो उन्हें पुन: 12 वर्ष का अज्ञातवास हो जाता। इसी अज्ञातवास में अर्जुन ने अपना धनुष एक शमी वृक्ष पर रखा था तथा स्वयं वृहन्नला के वेश में राजा विराट के यहां नौकरी कर ली थी जब गोरक्षा के लिये विराट् के पुत्र धृष्टद्युम्न ने अर्जुन को अपने साथ लिया तब अर्जुन ने शमी वृक्ष से अपने शस्त्र उठाकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी।
हिन्दू धर्म के संस्थापक मराठा साम्राज्य रत्न छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी इसी दिन औरगंजेब के साथ युद्ध करके हिन्दू धर्म की रक्षा की थी। भारतीय इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण हैं जब हिन्दू राजा इस दिन विजय प्रस्थान करते थे।
ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय विजय नामक मुहूर्त होता है, यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है इसलिए भी इसे विजयदशमी कहते हैं।
आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यां तारकोदये।
कालो विजयो ज्ञेय: सर्वकार्यार्थसिद्धये।।
भारतवर्ष कृषिप्रधान तथा ऋषिप्रधान देश है। इसलिए कुछ लोग इस पर्व को कृषि उत्सव के रूप में भी मानते हैं। जब किसान अपने खेत में सुनहरी फसल उगाकर अनाज रूपी सम्पत्ति घर लाता है तो उसके हर्षोल्लास का कोई ठिकाना नहीं रहता। इस पर्व के पावन अवसर पर वह उस भगवान् के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिये भक्ति भाव से ओत-प्रोत होकर पूजन करता है।
दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है, अन्य दो हैं चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा। इसी दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं, इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण के लिये प्रस्थान करते थे। दशहरे का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी जैसे अवगुणों को छोडऩे की प्रेरणा हमें देता है।
आसुरी प्रवृत्ति को छोड़ दें
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमु्द्भव:
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।। (गीता 37.3)
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोध: पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभि जातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्।। (गीता 16.4)
 

वर्तमान समय में दशहरा/ विजयदशमी मनाने के विविध स्वरूप

भारतवर्ष के विभिन्न प्रान्तों में इस पर्व को मनाने के भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं
पंजाब में दशहरे के पावन अवसर पर नवरात्रि के 9 दिनों का उपवास रखकर मनाते हैं। इस समय अतिथियों का स्वागत पारम्परिक मिष्ठानों उपहारों से किया जाता है, बडे-बड़े कार्यक्रम होते हैं। तथा मेले लगते हैं और रावण दहन के आयोजन भी होते हैं।
बंगाल, उड़ीसा और असम में यह पर्व दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। यह बंगालियों, ओडिय़ा, आसाम के लोगों का सबसे महत्त्वपूर्ण त्यौहार है। यह पूरे बंगाल में 5 दिनों के लिये मनाया जाता है। उड़ीसा और असम में यह त्यौहार 4 दिनों तक चलता है। दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन तथा प्रसाद वितरण होता है। पुरुष वर्ग एक दूसरे से प्रेम पूर्वक गले मिलते हैं। महिलाएं देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं और इसके साथ वें आपस में सिंदूर लगाती हैं इससे खेलती हैं, इस दिन नीलकण्ठ पक्षी को देखना बहुत शुभ माना जाता है।
उत्तरप्रदेश उत्तराखण्ड के अलग-अलग स्थानों में देवी के शक्ति पीठों पर 9 दिनों तक भक्तों के द्वारा मेले भण्डारों का आयोजन किया जाता है, जिसमें शाकुम्भरी देवी, मनसा देवी, चण्डी देवी विंध्याचल आदि शक्ति पीठ प्रसिद्ध हैं। विजयदशमी के अवसर पर अलग-अलग स्थानों पर बड़े मेलों रामलीला का आयोजन तथा रावण के विशालकाय पुतले का दहन होता है।
तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश एवं कर्नाटक में दशहरा 9 दिनों तक चलता है जिसमें 3 देवियां (लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा) की पूजा करते हैं। पहले तीन दिन लक्ष्मी-धन और समृद्धि की देवी का पूजन होता है अगले दिन सरस्वती-विद्या और कला की देवी का पूजन होता है और अन्तिम 3 दिन दुर्गा-शक्ति की देवी का पूजन होता है। कर्नाटक में मैसूर का दशहरा भी पूरे भारत में प्रसिद्ध है। मैसूर में पूरे नगर की सुन्दर सजावट करते हैं और हाथियों का शृंगार कर पूरे नगर में भव्य शोभा यात्रा निकालते हैं। इन प्रदेशों में रावण का दहन नहीं होता है।
हिमाचल प्रदेश में कूल्लू का दशहरा भी प्रसिद्ध है अन्य स्थानों की भाँति यहाँ भी 10 दिनों तक भव्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। पुरुष, महिलाएं बच्चे सुन्दर वस्त्रों को धारण कर अपने-अपने परम्परागत वाद्ययत्रों के साथ बाहर निकलते हैं। पहाड़ी लोग अपने ग्रामीण देवता की भव्य शोभायात्रा निकालते हैं।
महाराष्ट्र में इस अवसर कोसिंलगणके नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में मनाते हैं। सांयकाल के समय ग्रामवासी सुन्दर वस्त्र धारण कर गांव की सीमा पार कर शमी के वृक्ष के पतों के रूप में स्वर्ण लेकर अपने ग्राम में वापस आते हैं फिर उस स्वर्ण का परस्पर आदान-प्रदान किया जाता है
दिल्ली देश की राजधानी है जो राजनैतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक आर्थिक रूप से केन्द्र बिन्दु रही है। अत: इस पर्व के पावन अवसर पर यहाँ ऐतिहासिक रामलीला मैदान में रामलीला का आयोजन रावण और मेघनाद कुम्भकर्ण के विशालकाय पुतलों का दहन होता है  
वर्तमान समय में दशहरा पर्व को मनाने के लिये जगह-जगह पर बड़े-बड़े मेलों का आयोजन किया जाता है। यहां लोग अपने परिवार, मित्रों के साथ आते है और खुले आसमान के नीचे मेले का पूरा आनंद लेते हैं। मेले में तरह-तरह की वस्तुओं तथा व्यजनों की भरमार रहती है। इस समय कलाकारों के द्वारा रामलीला का मंचन और रावण के विशाल पुतले का दहन होता है। परस्परता, समरसता, प्रेम और सौहार्द की स्थापना के लिये लोग एक दूसरे के घरों में जा-जा करके मिष्ठान् उपहार देते हैं।

अनुकरणीय तथ्य

क्योंकि हम सब जानते हैं कि दशहरा/विजयादशमी का पर्व असत्य के ऊपर सत्य की, अधर्म पर धर्म की, बुराई पर अच्छाई की, असुरत्व पर देवत्व की विजय का पर्व है। इसीलिये हम सब को असत्य, अधर्म, अज्ञान, अविद्या, अन्धकार, अहंकार अन्याय, अभाव, आदि से ऊपर उठकर दिव्यता के भाव में रहकर इन दुर्गुणों का पराभव करना चाहिये। देश धर्म संस्कृति और संस्कारों की रक्षा के लिये सदा कटिबद्ध रहना चाहिये तथा वेदानुकूल शास्त्रानुकूल, आत्मानुकूल योगमय, यज्ञमय, शान्तिमय, आनन्दमय जीवन जीना तथा दूसरों के लिये भी ऐसी प्रेरणा करना चाहिये।
दशहरा विजय दशमी के इस पावन अवसर पर हम संकल्प लें कि अपनी इस भारत भूमि को इस पावनी धरती को अधर्म से अत्याचार से बचाना है, पर्यावरण प्रदूषण से बचना और बचाना है, इस धरती को स्वर्ग बनाना है, ऐसा पावन संकल्प हम सब का होना चाहिए।
ओम् शान्ति: शान्ति: शान्ति:!
 

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