आधुनिक युग के चलन में विलुप्त होती, औषधीय गुणों से युक्त भारतीय रसोई
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रुपेश शर्मा
योग संदेश विभाग
अन्न को प्राण भी कहा गया है, वास्तव में जीवन को धारण करने की शक्ति अन्न में है। हमें बुद्धि, मेधा, तुष्टि, शान्ति, स्वास्थ्य, सेहत, प्राण देने वाला अन्न हैं, बल पुष्टि, उत्साह, साहस जो भी कुछ मिलता है, वह सभी गुण अन्न में ही है। |
भारतीय नारी की आधी से ज्यादा उम्र उसकी रसोई में गुजर जाती है जहां पर वह संयुक्त परिवार के सभी सदस्यों के खाने-पीने का ख्याल रखती है। इन माताओं-बहनों के हाथों में ही छुपा होता है परिवार को स्वस्थ रखने का अनमोल ज्ञान।
भारतीय परिवारों में नारी का स्वरूप ‘देवी’के समान माना गया है। माँ अन्नपूर्णा ने घर की महिलाओं को परिवार के सभी सदस्यों का पोषण का वरदान प्रदान किया है। यह बहुत पुरानी सुक्ति है कि जहाँ नारी को पूजा जाता है, वहां देवता रमण करते हैं कई शास्त्रों में सौभाग्यवती स्त्री का वर्णन देखने को मिलता है।
जो स्त्री मीठे वचनों को बोलती हो। जिसकी आवाज में मधुरता हो और जो नारी हर किसी से स्नेहयुक्त वाणी से बोलती हो, जो अति सेवा भाव रखने वाली क्षमाशील, दानशील, बुद्धिमती, दयावती और कर्तव्यों का पालन पूर्ण निष्ठा से करने वाली हो, ऐसी नारी धरती पर साक्षात् लक्ष्मी के समान होती है। ऐसी स्त्रियों पर भगवान् धनवन्तरी का आशीर्वाद सदैव बना रहता है। ऐसी नारी घर की रसोई में किसी से भी भेद-भाव किये बगैर समान रूप से सभी का भोजन पकाती है, साथ ही उस भोजन को स्नेह युक्त होकर परोसती भी है।
चरक में एक प्रकरण ऐसा भी आता है जहाँ वे कहते है कि सम्पूर्ण दुनिया जो दौड़ती दिखती है यह दौड़ अन्न के लिए है। इसलिए अन्न को प्राण भी कहा गया है, वास्तव में जीवन को धारण करने की शक्ति अन्न में है। हमें बुद्धि, मेधा, तुष्टि, शान्ति, स्वास्थ्य, सेहत, प्राण देने वाला अन्न है, हमें बल, पुष्टि, उत्साह, साहस जो भी कुछ मिलता है, वह सभी गुण अन्न में ही हैं। पर उस अन्न को आज हमने रोगों की उत्पत्ति का कारक बना डाला है। वास्तव में जो अन्न कभी जीवन देने वाला होता था, वह आज जीवन लेने वाला बन गया है। आज वर्ल्ड रिसर्च की रिपोर्ट बताती है कि जितने लोगों की मृत्यु भूख से होती है, वह संख्या कम है पर जो अधिक खाकर रोगी होने लगे हैं उन लोगों की संख्या काफी अधिक है।
घर की रसोई माताओं के हाथ में होती है। यदि मातायें यह दायित्व लें कि हमारे द्वारा चयनित पदार्थ, चयनित भोजन करके परिवार का कोई सदस्य बीमार नहीं होगा तो हिन्दुस्तान को निरोग राष्ट्र बनने से कोई रोक नहीं सकता, भले ही आज की रिपोर्ट कहती है कि भारत दुनियां का सबसे बड़ा रोगों का देश है। पर यदि देश की माताओं-बहिनें अपना दायित्व सही से निभायें, तो भारत के लिए यह तमाम् घोषणायें असफल हो जायेंगी।
क्योंकि भारतीय रसोई विश्व की सबसे बेहतरीन रसोईयों में से एक है, इसमें उपयोग किये जाने वाले सभी खाद्य पदार्थ और मसाले अद्भुत औषधियों से युक्त हैं। यह मसाले आयुर्वेद के कई रोगों में प्रयुक्त होते चले आ रहे हैं। - जैसे काली मिर्च, तेजपत्ता, इलायची, अदरक, लहसुन, दालचीनी आदि इनमें से कई मसालों का औषधीय महत्व हमारे बुजुर्गों और पूर्वजों को पता था और उन्होंने इस ज्ञान को पीढ़ी दर पीढ़ी अपने बच्चों को रसोई घर में खाना बनाते हुये सिखाया, पर आजकल हम इन द्रव्यों के महान गुणों और उपयोगों को भूलते जा रहे हैं और आज पीढ़ी को यह ज्ञान न के बराबर दे पा रहे हैं।
घर की रसोई हमेशा से आयुर्वेद से युक्त रही है। प्राचीनकाल से लेकर आज तक हमेशा से हमारी रसोई आयुर्वेद की प्रयोगशाला रही है। आयुर्वेद हमारे जीवन शैली, दिनचर्या और ऋतु-चर्या में सदियों से पिरो दिया गया था। उससे भी अधिक वह हमारी पारम्परिक रसोई में सदैव विद्यमान रहता है। थोड़ा सा ध्यान से समझा जाये, तो यह ज्ञात होता है कि हमारी रसोई आयुर्वेद की पारम्परिक प्रयोगशालाएँ थीं और वर्तमान मे भी कहीं न कहीं तो है। हर घर में किया गया कार्य केवल हमारे स्वास्थ्य के लिए निहित है। हमें कभी पता नहीं चला कि किस कुशलता से हमारे आयुर्वेद के पुरोधाओं ने इन सूत्रों की वैज्ञानिकता को रसोई घर में समाहित किया है यह उपलब्धि आयुर्वेद से भी कहीं अधिक गहरी है। एक-एक पकवान किसी भी ऋतु का, किसी भी समय का सबमे आयुर्वेद के सूत्रों का पालन किया जाता है। घर की रसोई आयुर्वेद के सूत्रों पर आधारित होती थी।
घर की माता-बहनों के कामों पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि यदि कोई माता अपनी रसोई में खाना बना रही है तो उसे यह सोचना चाहिए कि मैं खाना नहीं, एक प्रसाद तैयार कर रही हूँ, औषधियों को बना रही हूँ और जो व्यक्ति इस भोजन को, इस प्रसाद या इस औषधि का सेवन करेगा, उसकी शारीरिक एवं मानसिक स्थिति वही होगी, जैसी मैं चाहती हूँ।
मैं चाहती हूँ कि घर में कोई रोगी न हो, तो कोई रोगी नहीं रहेगा। पुराने जमाने में हमारी दादी-नानी की चित्त की स्थिति योग दर्शन जैसी किताबों के अध्ययन के बगैर ही इसी प्रकार होती थी। पहले के लोग संयुक्त परिवार में रहते थे तथा कुटुम्ब के सभी बच्चों को भोजन बनाने वाली माता सबको समान मानती थी। भले ही उन्होंने गीता को नहीं पढ़ा, योग सूत्रों को नहीं पढ़ा, लेकिन वे उसी समता से जीती थी और परिवार के सभी सदस्यों के स्वास्थ्य का ख्याल इनके ही हाथों में रहता था।
मगर पिछले 20 से 40 वर्षों में भारतीय रसोईयों में बहुत बदलाव आ गये हैं जिन कारणों से भारतीयों में रोगों की संख्या में भी इजाफा देखने को मिलता है। आधुनिकता की मूर्खतापूर्ण नकल के कारण हमनें आयुर्वेद के सूत्रों से दूरी बना ली है। जिन प्रयोगशालाओं में स्वास्थ्य के प्रयोग सदियों से चल रहे थे किस तरह हमनें अवैज्ञानिकता को प्रवेश करा दिया है। आधुनिकता के अतिक्रमण से भारतीय रसोई धराशायी हो गयी है। आज हमारी मातायें-बहनें भोजन बनाने के सिद्घान्तों से अपरिचत तो है ही, साथ ही जिन माताओं, बहनों को इन सिद्घान्तों का ज्ञान है, उन्होनें भी इन सिद्घान्तों से दूरी बना ली है जिसका परिणाम यह हुआ कि आज विभिन्न रोगों की संख्या बढ़ गयी है। साथ ही इन रोगों से पीडि़त लोगों की संख्या अस्पतालों में बढऩे लगी है। आज अस्पतालों में पीडि़तो की संख्या बढऩे के पीछे हमारे खान-पान के सन्तुलन का बिगडऩा काफी मायने रखता है।
आज की आधुनिकता की चमक में भारतीय रसोई भी अछूती नहीं रही है।
वाग्भट्ट ने खाना पकाने के चार सिद्धान्त बताये हैं-
भोजन पकाने का पहला सिद्धान्त
जिसके अनुसार जिस भोजन को सूर्य का प्रकाश और पवन का स्पर्श न मिले, वह भोजन नहीं रह जाता वह विष के समान होता है जो धीरे-धीरे हमें ही खा जाता है। सूर्य का प्रकाश और पवन का स्पर्श अन्न को दिव्य शक्ति बनाने में सहायक होता है और इन दोनों की अनुपस्थिति शरीर के प्रति लाभप्रद नहीं मानी गयी है। इसी प्रकार वह जल भी कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए जो जल सूर्य के प्रकाश व पवन के स्पर्श से अछूता हो, ऐसा जल भी दूषित माना जाता है। यही कारण रहा है कि जैन मतावलाम्बी धरती के अन्दर होने वाले उत्पादो को नहीं खाते। आज भी जैन समाज में सूर्यास्त के पश्चात् भोजन पकाने, उस भोजन को खाने व उसका संग्रहण करने को निषेध माना गया है। इसके पीछे इनका तर्क यही है कि धूप के संपर्क में आने से भोजन में पाये जाने वाले हानिकारक जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। उसी प्रकार पवन के स्पर्श से संभव है कि उसमें ऑक्सीजन और उसके पोषक तत्वों को समाहित कर लिया जाता है और उस भोजन को स्वास्थ्यप्रद बना दिया जाता है।
भोजन पकाने का दूसरा सिद्धान्त
भोजन पकाने के दूसरे सिद्धान्त के अनुसार सबसे पहले यह समझने की आवश्यकता है कि जिस अन्न को खेत में पकने में जितना अधिक समय लगता है, उस अन्न को घर की रसोई में पकाने में उतना ही अधिक समय लगाना चाहिए। इस पूरी प्रक्रिया में गति का सिद्धान्त कार्य करता दिखता है। कहने का आशय केवल इतना है कि किसी भी अन्न में निहित पूर्ण पोषकता निकालने के लिए उसे उसी अनुपात में पकाना चाहिए। खेत में 3 माह में पके अन्न को रसोईघर में कम पकाना पड़ेगा, जबकि 9 माह में पके अन्न को उससे कहीं अधिक पकाना पड़ेगा। माटी से पोषक तत्त्वों का एकत्रीकरण और भोजन के लिए उसका विघटन, ये दोनों एक दूसरे की विपरीत प्रक्रियायें हैं। न हम उसे पल्लवित करने को तीव्र कर सकते हैं और न ही उसे पोषक तत्त्वों में विघटित करने के लिए शीघ्रता कर सकते हैं। यदि हम ऐसा करते हैं तो हमें खाद्य अर्थात् अन्न की प्राप्ति तो अवश्य होगी, पर उसमें प्राप्त होने वाले जो पोषक तत्त्व हैं वह हमें नहीं मिल पायेंगे।
भोजन को पकाने का तीसरा सिद्धान्त
रसोई घर में जब माता-बहनें भोजन को पकाती हैं, उस भोजन को परिवार के सदस्यों को 48 मिनट के अन्दर खा लेना चाहिए। जैसे-जैसे पके हुए भोजन को देर होती जाती है, उस भोजन की पोष्टिकता भी कम होती जाती है। 24 घंटे के बाद भोजन बासी होने लगता है। वह भोजन ज्यादा देर होने के कारण पशुओं को खिलाने के योग्य भी नहीं रह जाता है। हमारी माता-बहनों को यह भी देखना अत्यन्त आवश्यक है कि भोजन को बार-बार गरम करने की प्रक्रिया में भोजन के पोषक तत्त्व अपना मौलिक गुण खो बैठते हैं, और ऐसे भोजन में विकृति उत्पन्न हो जाती है। हमारे पूर्वज जिस किसी प्रकार के अन्न को कूटते या पीसते थे, उसका भी अपना एक नियम होता था। अन्न को पीसने के बाद 15 दिन के अन्दर ही पीसे हुए अन्न का उपयोग कर लिया जाता था और यह नियम कहता भी है। यदि 15 दिन के उपरान्त इस पीसे हुए अन्न का उपयोग किया जाता था, तो उनमें भी पोषकता का क्षय होने लगता था। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो यह बात बड़ी स्वाभाविक लगती है। एक बार पकने या पीसने से किसी भी अन्न के पोषक तत्त्व अपने सर्वाधिक स्वीकार्य रूप में आ जाते हैं। इस समय वातावरण में व्याप्त न जाने कितने जीवाणुओं के लिए यह सुविधाजनक होता होगा कि वे उस पर धावा बोल दें। जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, इन पके अन्न का मौलिक गुण इन जीवाणुओं के द्वारा परिवर्तित और दूषित होता चला जाता है। आज के परिपेक्ष में यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि हम इन वैज्ञानिक सिद्धान्तों का प्राय: हर दिन उल्लंघन करते हैं और अपने पूर्वजों के बनायें आदर्शों व नियमों को नज़रअंदाज कर काल के ग्रास में फसते चले जा रहे हैं।
भोजन को पकाने का चौथा सिद्धान्त
भोजन बनाने के चौथे सिद्धान्त के अनुसार हम अन्न को तेज गति पर पीसते हैं या किसी भी प्रकार के अन्न, दाल, सरसों इत्यादि की पीसने में अधिक गति का उपयोग करते हैं, तो उससे उत्पन्न आटा या तेल शरीर में वात रोग उत्पन्न करता है। आज भारत एक वात प्रधान देश है, यहाँ पर 70% रोग वातजनित, 20% पित्तजनित और 10% कफजनित होते हैं। कहने का अर्थ यह है कि हम अपने जीवन में या रसोई घर में जो भी प्रक्रियायें अपनायें, वे गतिमान व अधिक सूक्ष्म न हों। आप यदि ध्यान दें तो पता चलता है कि धीरे पीसे आटे में और बिजली की चक्की से पीसे आटे में यही गुण झलकते हैं। धीरे पीसे आटे की रोटी अधिक समय तक मुलायम रहती है, जबकि बिजली की चक्की से पीसे आटे की रोटी बहुत ही जल्दी कठोर हो जाती है। इसी प्रकार मैदा जितना सूक्ष्म अन्न शरीर में वात को बढ़ाता है। वहीं सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया रिफायन्ड तेल और चीनी के साथ भी होती है और यह स्वाभाविक है कि ये दोनों कड़वे तेल और गुड़ की अपेक्षा बहुत अधिक वात को बढ़ाते हैं। हमारी आधुनिक जीवनशैली ने पिछले 20-30 वर्षों में इन चार सिद्धान्तों की जिस तरह से धज्जियां उड़ाई हैं और जिस तरह से हमारी रसोई आयुर्वेद की प्रयोगशाला से रोगों की प्रयोगशाला बन गई है, यह आने वाली पीढ़ीयों के लिए चिन्ता का विषय है।
आज आधुनिकता के इस युग में हम अपने प्राचीन बर्तनों से भी दूर होते चले गये। इन बर्तनों में भोजन का स्वाद तो छुपा ही था, साथ ही साथ हमारे स्वास्थ्य का भी ख्याल उनमें सुरक्षित था। वर्तमान समय में जिस प्रेशर कुकर को हमने अपने घर में जगह दी हुई है वह रोग का सबसे बड़ा कारक है। आज की दौड़-भाग की जिन्दगी में जल्दी के चक्कर में प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है। प्रेशर कुकर ऊपर बताये गये शुरु के दोनों सिद्धान्तों का उल्लंघन करता है। जब हम प्रेशर कुकर में भोजन को पकाते हैं, तो वह भोजन न तो सूर्य के प्रकाश के समीप आता है और न ही किसी भी प्रकार की कोई पवन (हवा) इस भोजन को स्पर्श कर पाती है। साथ ही साथ अपने प्रेशर से वह दाल को तोडक़र उसे उबाल देता है, दाल को उसके पोषक तत्त्वों में विघटित नहीं करता है। जिस प्रकार खेतों में दाल को पकने में लगभग 9 माह के आस-पास लगते हैं, तो हमारा दूसरा सिद्धान्त यह कहता है कि उसे अग्नि पर भी देर तक पकाना चाहिए, धीमी-धीमी आँच और देर तक पकने पर दाल अपने पोषक तत्त्वों के कारण ज्यादा स्वादिष्ट हो जाती हैं। जो भी व्यक्ति अपने गांव की जमीन से जुड़े होते हैं उन्हे स्मरण रहता है कि प्रेशर कुकर के आने से पहले हर घर में माटी की हाण्डी में भोजन-दाल इत्यादि को पकाया जाता था। चूल्हे की धीमी आँच पर देर तक पकने के कारण इस दाल में अद्भूत स्वादिष्टता का स्वाद आ जाता था। आज प्रेशर कुकर में पकी दाल में पोषक तत्त्वों की मात्रा 18% तक पाई जाती है, जबकि माटी की हाण्डी में पकाई दाल की पोषकता नष्ट ही नहीं होती। आज भी जगन्नाथ पुरी में माटी की हाण्डी में प्रसाद को बनाया जाता है। माटी की सौंधी महक और भोजन की पोषकता शरीर में एकरूपता लाती है। साथ ही साथ प्रेशर कुकर में प्रयुक्त एल्युमिनियम का उपयोग स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यन्त संदिग्ध और हानिकारक होता है। आज सैकड़ों बीमारियां हमारे गलत खानपान के कारण हमें परेशान कर रही हैं। इन परेशानियों के जिम्मेदार और कोई नहीं हम स्वयं हैं। इसलिए पूज्य स्वामी जी महाराज हर मंच के माध्यम से कहते हैं कि हमें पुन: अपनी संस्कृति की ओर मुडऩा होगा, तभी यह राष्ट्र स्वस्थ रह सकता है।
अब आगे बात करते हैं फ्रिज और ओवेन की। यह दोनों उपकरण भोजन पकाने के पहले व तीसरे सिद्धान्त का उल्लंघन करते हैं। भोजन को संरक्षित करने के नाम पर बार-बार उसे ठण्डा व गरम किया जाता है, जिससे भोजन की पोष्टिकता पूर्ण रुप से निकल जाती है और जो भोजन बचता है वह अवशिष्ट के रूप में हम खाते हैं। इस भोजन से न केवल हम अपने पाचन तंत्र को नुकसान पहुँचाने पर तुले हैं अपितु बिजली की अथाह बरबादी और क्लोरोफ्लोरो कार्बन के उत्सर्जन से पर्यावरण को भी क्षति पहुँचा रहे हैं। फ्रिज के ठण्डे पानी ने देश की अधिकांश जनसंख्या को कब्ज का रोगी बना दिया है। पेट से शुरु होने वाली यह मामूली सी बीमारियां कब अपना विकराल रूप धारण कर लेती हैं, यह मनुष्य को पता ही नहीं चलता। आज भी हम थोड़ा सा भी अपने को अनुशासित कर लें तो इन हानिकारक रोगों से बचा जा सकता है। हमें पुन: घड़े का उपयोग करना चाहिए। हमें उसके शीतल जल का उपयोग कर अपनी प्यास को बुझाना चाहिए। साथ ही हमें उतना ही भोजन बनाना चाहिए, जितना की हम खा सकें। अधिक भोजन पकाने से उसको संरक्षित करने की परेशानी होती है और यदि आप भोजन को संरक्षित भी कर लेते हैं, तो उस भोजन को खाने से आप कई रोगों को आमंत्रित कर लेते हैं। हमारे शास्त्रों में भी लिखा है बासी भोजन रोग का कारक होता है। उसके बाद भी हम यह गलती करते हैं। आज के आधुनिकता के युग में गरम रोटी का सुख और उसका स्वाद लोग भूल सा गये हैं। सुबह अपने रोजगार पर चलने पर अपना टिफिन पैक कर लेते हैं। वह रोटी-सब्जी, दाल, चावल दोपहर के 1 बजे के आस-पास तक आकर अपना पोषक तत्त्व छोड़ देते हैं और पेट भरने के लिए वही अपोषक खाने को हम खाने लगते हैं। जो खाना हमें रोगमुक्त रखता है, वही हमें रोगयुक्त बना देता है। आज सुबह के नाश्ते में डबलरोटी खाने का भी बड़ा फैशन है और शाम को पावभाजी खाने का लोगों में विशेष चाव रहता है, जबकि यह पाव एवं डबलरोटी अन्न को सड़ाकर बासी आटे से बनाई जाती है फिर भी आधुनिक समाज इस खाने की ओर आकर्षित हो जाता है, जबकि सड़ा हुआ भोजन खाना हमारी कभी भी परम्परा नहीं रही है।
हर घर में पाई जाने वाली मिक्सी ने हमारे चौथे नियम को तोड़ दिया। गति के सिद्धान्त की प्रकृति में उपेक्षा नहीं की जा सकती है। पुराने समय में घर में पाये जाने वाले सिल-बट्टे आदि पर सब कुछ धीरे-धीरे पिसा जाया करता था और इस पिसाई में अन्न आवश्यकता से अधिक सूक्ष्म भी नहीं होता था। मिक्सी आदि में अन्न न केवल गति से पिसता है अपितु अति सूक्ष्म भी पिसा जाता है। इस प्रकार यह दोनों ही प्रकार से यह वातकारक होता है। इसी प्रकार पैकेट का आटा और डिब्बा बंद भोजन तीसरे और चौथे सिद्धान्त का उल्लंखन करते हैं।
आज अधिकतर घरों में पैकेट वाले आटे का प्रचलन खूब चल रहा है। इस आटे में घर वाली बात नहीं होती है। इसकी रोटी खाने से परिवार अपना पेट तो भरता है पर इस आटे की बनी रोटी को खाने से कभी संतुष्टि नहीं मिल सकती, साथ ही अनेकों बीमारी का न्यौता अलग से दे दिया जाता है। पुराने समय में हर घर में हाथ से चलने वाली चक्की को उपयोग में लाया जाता था। घर की महिलायें सुबह उठकर दिनभर की आवश्कता अनुसार आटे को पीसती थी और यही राज होता था, खुद को व घर के प्रत्येक सदस्यों को स्वस्थ रखने का भी।
हमारी रसोईघर में चलती परिपाटियाँ आयुर्वेद के सूत्रों का अमृत निचोड़ हुआ करती थी। हर छोटी बड़ी प्रक्रिया में सरलता को सहेजा जाना था। चक्की, सिल-बट्टा आदि यंत्रों से न केवल हमारे स्वाद और स्वास्थ्य की रक्षा होती थी, वरन घर में रहने वाली महिलाओं का भी समुचित व्यायाम हो जाता था। आज के आधुनिक यंत्रों ने स्वाद, स्वास्थ्य और श्रम के सुन्दर संतुलन को नष्ट कर दिया है। हमें भी मशीन की तरह बनाकर रख दिया है। आज के समय में मानव समुदाय न तो पौष्टिक खा पा रहा है और न ही स्वादिष्ट ही खा पा रहा है, जिस कारण आज अधिकांश मानव सभ्यता कई बीमारी की चपेट में फंस रही है।
पूज्य स्वामी जी महाराज आह्वान करते हैं कि हमें विकार उत्पन्न करने वाले परिवर्तनों को रसोई से जल्द विदा कर देना चाहिए और रसोईघर को पुन: आयुर्वेद की प्रयोगशाला के रूप में सुस्थापित करने की दिशा में कार्य करना चाहिए।
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