आयुर्वेद की प्राथमिक पाठशाला ' पाकगृह '

आयुर्वेद की प्राथमिक पाठशाला ' पाकगृह '

वंदना बरनवाल 

महिला पतंजलि योग समिति - .प्र.(मध्य)

   घर का मतलब सिर्फ ईंट-गारे या सीमेंट-कंक्रीट से बना एक ढांचा नहीं होता है बल्कि इसकी चारदीवारी हमें सुरक्षित होने का अहसास कराती है। सर्दी, गर्मी, बरसात हर तरह के मौसम की मार से बचाने के साथ ही दिन भर की थकान उतारने के लिए और परिवार के संग समय व्यतीत करने के लिए सर्वोत्तम स्थान यदि कोई है तो वह घर ही तो है। और जब इसी घर के भीतर के एक और घर यानि रसोईघर की बात हो तो आप स्वयं ही उसकी उपयोगिता का अंदाजा लगा सकते हैं। चाहे मेहमानों के स्वागत में पाक कला के प्रदर्शन की बात हो या फिर बीमारियों से बचाव की बात हो, दोनों ही परिस्थितियों में रसोईघर की भूमिका बढ़ जाती है क्योंकि भारत की रसोई स्वाद और स्वास्थ्य दोनों के रस से सराबोर होती है। इसीलिए हमारे ग्रंथों में इसे औषधालय की संज्ञा भी दी गई है। कोरोना से मुकाबला करने के लिए जब कोई प्रभावी उपाय नहीं था और अंग्रेजी चिकित्सा व्यवस्था भी घुटने टेक चुकी थी उस समय भारतीय रसोईघर ने अपने औषधीय गुणों और चिकित्सकीय क्षमता का अद्भुत प्रदर्शन किया। खासतौर पर ऐसे घरों को इसका ज्यादा लाभ मिला जिस घर में दादी-नानी के नुस्खे आज भी आजमाए जाते हैं। ऐसे घरों के लोग यदि संक्रमित हुए भी तो उन्हें बाहर किसी मेडिकल स्टोर तक जाने की भी जरुरत नहीं पड़ी बल्कि घर की अनुभवी दादी-नानी ने घर की रसोई के रसायनों का उपयोग करके सब कुछ संभाल लिया। इसलिए आप रसोईघर को सिर्फ पाकशाला ही नहीं बल्कि उससे कहीं ज्यादा आयुर्वेद की प्राथमिक पाठशाला के तौर पर देखिये क्योंकि अनेकों बीमारियों का इलाज बड़ी सहजता से यहाँ उपलब्ध रहता है।

 प्रयोगशाला

कोरोना की तीसरी लहर के संशयों के बीच त्यौहारों का समय चुका है और इस मौसम में फलाहार और व्रत करने वाले लोग अक्सर खानपान में असंतुलन से अपनी सेहत बिगाड़ बैठते हैं। भारत में प्रत्येक धर्म और चिकित्सा परंपरा व्रत रखने को मान्यता देते हैं और उपवास का फायदा तो चिकित्सा और आध्यात्मिकता दोनों में ही मिलता है। पर कुछ लोग उपवास के नाम पर मीठे और चिकने व्यंजनों का इस्तेमाल बढ़ा देते हैं तो कुछ लोग शरीर के लिए आवश्यक तत्वों की पूर्ति भी नहीं कर पाते। जबकि नियम से उपवास करने पर शरीर अंदर से तो साफ़  होता ही है साथ ही इससे मन और शरीर को एक नवीन ऊर्जा भी मिलती है। जब हम उपवास करते हैं तो शरीर की पाचन प्रणाली भोजन पचाने के कार्य से प्राकृतिक रूप से मुक्त होकर पाचन तंत्र में जमा अतिरिक्त मल को बाहर करने में जुट जाती है। इससे हमारे शरीर की आंतरिक शुद्धि तो होती ही है साथ ही जीवनी शक्ति भी बढ़ती है। यह जीवनी शक्ति रोगों से लडऩे की शक्ति देती है। इसीलिए प्राकृतिक चिकित्सा में उपवास का बहुत महत्व बताया गया है। आज की पीढ़ी जानकारी के अभाव में व्रत और उपवास को समानार्थी शब्द की तरह इस्तेमाल करने लगी है जबकि असल में उपवास तो व्रत का एक हिस्सा भर है। वैसे उपवास का मुख्य उद्देश्य शरीर की शुद्धि है पर यदि ध्यान नहीं दिया जाये तो फलाहारी भोजन के नाम पर ज्यादा मीठा और चिकनाई वाले व्यंजन के इस्तेमाल से कोलेस्ट्राल और मधुमेह के रोगियों के लिए खतरा बढ़ सकता है। कुछ लोग उपवास के दौरान भी उपवास की अंग्रेजी यानि फास्ट में फूड जोडक़र फास्ट फूड से भी रिश्ता कायम करने लगते हैं और इसके लिए विशेष तौर पर रेस्तराओं में तमाम तरह के फलाहारी कटलेट, कचौरी और मिठाइयों के साथ ही फलाहारी पिज्जा और बर्गर भी परोसे जाने लगे हैं जो कि उपवास के सिद्धांत के विपरीत है। इसलिए अपने शरीर को ऐसी प्रयोगशाला बनने से बचाइए। 

 स्वादशाला

वर्तमान में बाजार की देखा देखी घरों में भी खानपान की व्यवस्था देख रही गृहिणियों पर अनावश्यक दबाव बना हुआ है। खानपान के बाजार ने स्वाद पर अनगिनत प्रयोगों के जरिये चटोरों की भीड़ खड़ी कर दी है जिसके कारण घर की रसोई से भी अलग ही उम्मीद पाली जा रही है। परिणामस्वरूप भोजनशाला स्वाद की प्रयोगशाला के रूप में स्थापित होती जा रही है और रसोईघर बाजारवाद का प्रतिनिधित्व करने वाले होटल बनते जा रहे हैं जो कि कदापि उचित नहीं है। क्योंकि हमारे द्वारा ग्रहण किया जाने वाला भोजन सिर्फ स्वाद या सिर्फ शरीर की पौष्टिकता के लिए ही नहीं होता बल्कि यह हमारी सोच को भी स्वास्थ्य देता है। इसीलिए तो कहते हैं जैसा खाए अन्न वैसा होवे मन, जैसा खाए अन्न वैसा होवे तन। पर अभी बहुत कुछ बदल रहा है, पहले होटल वाले अपने प्रचार में लिखते थे हमारे यहाँ घर जैसा स्वाद मिलेगा। यानि घर के खाने का महत्व हुआ करता था पर आज सब कुछ उल्टा पुल्टा हो रहा है। अब वो कहते हैं घर बैठे ही पायें होटल के खाने का स्वाद और उनकी देखा-देखी हम भी बड़े शान के साथ कहने लग गए हैं कि आज हमारे यहाँ होटल के स्वाद वाला खाना बना है। हालाँकि मेडिकल साइंस ने भी तले-भुने तथा मिर्च-मसाले वाले खाने, फास्ट फूड, प्रिजर्व फूड, रात्रि भोजन, मांसाहार आदि के दुष्परिणामों को स्वीकार किया हुआ है और आये दिन जानकर इस प्रकार के खाने को लेकर चिंता व्यक्त किया करते हैं फिर भी इनका इस्तेमाल दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है। ऐसे में रसोईघर और इसकी सर्वेसर्वा प्रबंधिका और निर्देशिका यानि गृहिणी की चुनौतियाँ बढ़ी हुई हैं क्योंकि उसको सबका ध्यान रखना होता है। अर्थात् खाने में ऐसा स्वाद आये कि घर के सभी सदस्यों के स्वाद के पैमाने पर खरा उतरे, उसकी पौष्टिकता और साथ ही उसकी सात्विकता दोनों ही बनी रहे। 

 नियमशाला 

आपको याद होगा और आज भी बहुत से घरों में स्थानीय भाषा में रसोईघर के लिए चौका शब्द का ही इस्तेमाल किया जाता है। चौके के लिए बहुत सारे नियम बने हुए थे जैसे कि खाना बनाने वाले को बगैर नहाए हुए खाना नहीं पकाना है, चप्पल पहनकर चौके में प्रवेश नहीं किया जा सकता वगैरह वगैरह। भारतीय रसोई के विज्ञान को समझने के लिये आइये प्रवेश करते हैं इसी चौके में जिसकी सबसे प्रमुख किरदार के साथ उसकी प्रबंधिका और निर्देशिका सब कुछ होती है गृहिणी। गृहिणी कहने को तो बड़ा ही छोटा सा शब्द है पर इसका अर्थ बहुत ही ख़ास है - सारा घर जिसका ऋणी, वही है गृहिणी। आज भी मुझे घर की वो रसोई याद है जिसको हम किच-किच वाला किचन नहीं बल्कि चौका कहते थे। माँ जब खाना बनाती थी और जैसे ही उनके हाथ चौकी बेलन पर घूमना शुरू करते थे हम भाई बहन भी उसके आस पास मंडराने लगते थे। चौके की लगाम माँ के हाथ में थी और उसकी घड़ी सूरज के हाथ में। उधर सूरज की पहली किरण रसोई में दस्तक देती थी और इधर स्नान-ध्यान एवं पूजा-पाठ कर माँ मोर्चे पर तैनात हो जाती थीं। शाम का भोजन भी सूरज की अंतिम किरण के साथ ही साथ जल्दी तैयार कर दिया जाता था। अब तो इस बात को आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार करने लगा है कि देर रात्रि में भोजन ग्रहण करना अहितकर है। भोजन के समय के साथ ही रसोईघर को चौका क्यों कहा जाता था यह बात भी बहुत बाद में समझ आई जब पता चला कि चौके में माँ ने हमेशा चार नियमोंकब, कितना, कैसे और क्याका खुद भी पालन किया और सबको इसका पालन करने के राजी भी किया। उस समय क्या पता था कि इन सबके पीछे उनकी मंशा हित भुक, मित भुक, ऋत भुक के पालन की थी।

 पाकशाला

शुरू से हमारे घर में दो तरह का खाना बनाए जाने की परंपरा थी। एक वो जो दिन के समय बनता था और उसे हम लोग कच्चा खाना कहते थे और दूसरा वो जो रात में बनता था और उसे पक्का खाना कहा जाता था। बचपन में बिलकुल भी समझ नहीं आता था कि कच्चे और पक्के खाने में अंतर क्या है क्योंकि खाना तो पकने के बाद ही खाया जाता था। बाद में समझ आया कि कच्चे और पक्के खाने में क्या और क्यों भेद किया जाता था। दरअसल दिन के समय के खाने के मेनू में चावल, दाल, रोटी, सब्जी, दही, पापड़, सलाद सब कुछ होता था जिसको कच्चा खाना कहा जाता था। यानि मेनू में प्रोटीन, कार्बोहाईड्रेट, वसा तथा रेशे का ध्यान रखा जाता था। दाल में प्रोटीन होता है जो कि सेहत के लिए अनिवार्य है पर चूँकि इसको पचाने में समय लगता है इसलिए इसको दिन के खाने शामिल किया जाता था। जबकि रात के खाने में विटामिन और खनिज से भरपूर सब्जी का चलन था जो रात्रि सोने के दौरान आसानी से पच जाती थी।

 यज्ञशाला

अक्सर सोचती हूँ कि माँ कभी महर्षि चरक या आयुर्वेद वगैरह की कोई बात तो करती नहीं थीं फिर भी इतना सारा ज्ञान आखिर किस प्रकार उन तक पहुँचा होगा। खैर इतने नियमों के साथ-साथ माँ की उस रसोई में खाने के साथ उनका प्यार भी पकता था और उस प्यार का स्वाद आज तक किसी और रसोई में नहीं मिल सका। माँ की रसोई की एक ख़ास बात और थी कि जो कुछ भी पकता था, भगवान् का भोग भी उसी का लगता था। चूँकि उसी भोजन से भगवान् को भी भोग लगाना रहता था शायद इसी बहाने ही सही भोजन में डाली जाने वाली सामग्री की शुद्धता के साथ ही उसके पकाने के ढंग और भाव सब कुछ श्रद्धा और प्यार से भरा हुआ होता था। कुछ वैसा ही जैसा आज हम सब प्रसाद बनाते समय रखते हैं। और हाँ, एक बात तो मैं भूल ही गई कि नियम से पहली रोटी गाय के लिए अवश्य निकाली जाती थी। कुल मिलकर रसोईघर की स्वच्छता और पवित्रता बेमिसाल हुआ करती थी और चूल्हा इस प्रकार जलाया जाता था मानो वह एक छोटा सा यज्ञकुंड हो। आधुनिकता और व्यस्तता के झूठे दावों के साथ एक यज्ञशाला को तो हम भूल ही रहे क्योंकि हवन कुंड सिर्फ  पूजा-पाठ या कथा वाले दिन ही निकलता था जबकि रसोईघर में भी यज्ञशाला हो सकती है इस ओर कभी ध्यान ही नहीं गया। अत: ऋणी हैं हम सब कि परम पूज्य स्वामी जी महाराज एवं श्रद्धेय आचार्य श्री के मार्गदर्शन में पतंजलि योगपीठ और पूज्य स्वामी यज्ञदेव जी ने यज्ञ की ज्योति को पुन: जलाया और आज नए सिरे से यज्ञ के सिर्फ  आध्यात्मिक बल्कि चिकित्सकीय और वैज्ञानिक लाभ को लोग जानने के लिए उत्सुक हैं।   

 रसायनशाला

आज भले ही ज्ञान के अभाव में रसोईघर में अपनाये जाने वाले नियम हमें गुजरे जमाने की दकियानूसी बातें लगती हों और आधुनिकता के नाम पर हमने इनसे किनारा कर लिया हो पर चौके की वैज्ञानिकता और विशेषता ने सदियों से भारतीय परिवारों को सुखद और स्वस्थ जीवन प्रदान करती आई है। रसोईघर के रसायन विज्ञान की इस खूबी को हम समझें या समझें पर दुनिया इसको बखूबी पहचान रही है। क्योंकि एक तरफ यह पूरे परिवार को बांधकर रखती है तो दूसरी तरफ  स्वयं में एक समर्थ औषधालय भी है। रसायन शब्द का का शाब्दिक विन्यास ही रस एवं आयन है अर्थात् जिसका शाब्दिक अर्थ रसों यानि द्रवों का अध्ययन है। आज के दौर में भले ही लोगों में इस रस के पागलपन को भुनाने के लिए भले ही पिज्जा, बर्गर, चाउमीन, मोमो आदि $फास्ट फूड का क्रेज बढ़ रहा हो परन्तु भारतीय पकवानों के स्वाद और औषधीय गुणों के मिश्रित गुणों को टक्कर देने वाला व्यंजन आज भी दूर-दूर तक कोई भी नहीं। इसीलिए जिस तरह आज योग, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा जैसी भारतीय विधाओं की धूम पूरे विश्व में मची हुई है और उनके विशेषज्ञों की जबरदस्त मांग उठी है, उसी तरह से भारतीय व्यंजनों के विशेषज्ञों की मांग भी खूब है। पूरे विश्व में कहीं भी चले जाइये आपको गुजराती, पंजाबी, राजस्थानी और दक्षिण भारतीय व्यंजनों के शौक़ीन जरुर मिलेंगे क्योंकि ये सिर्फ  स्वादिष्ट ही नहीं हैं बल्कि इनमें पौष्टिकता और सात्विकता का भी मेल है।

 पाठशाला 

तेजी से बढ़ते हुए बाजार के दृष्टिगत अनेकों कॉलेज और विश्वविद्यालयों में होटल मैनेजमेंट जैसे कई तरह के डिप्लोमा और डिग्री के कोर्स भी शुरू किये जा चुके हैं। इस दौड़ में भले ही कितनी जानी मानी संस्थाएं शामिल हों पर खाना पकाने से लेकर खिलाने तक स्वाद और स्वास्थ्य की जो खूबी घर की रसोईघर से निकलती है उसका कोई सानी नहीं। और जब घर के रसोईघर की बात आये तो उसका प्रबंधन देख रही भारतीय गृहिणी जिनको शास्त्रों में अन्नपूर्णा भी कहा गया है, किसी भी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं। क्योंकि यहाँ वे ना सिर्फ एक बेहतरीन प्रबंधक या बेहतरीन बावर्ची ही नहीं होतीं बल्कि वे एक बेहतरीन चिकित्सक की भूमिका भी निभा रहो होती हैं। सदियों से भारतीय रसोईघर में ज्ञान और कौशल की जो परंपरा चली रही है उसके सामने बड़े-बड़े विश्वविद्यालय की डिग्री और बड़े-बड़े अनुसंधान केंद्र में बांटे जाने वाले ज्ञान सब फीके हैं। इसे जब चाहे कोई भी आजमा सकता है। कोरोना की पहली और दूसरी लहर से निपटने के दौरान भी इसी ज्ञान के पिटारे का इस्तेमाल कर घर की इन वैद्याओं ने एक सौ पैंतीस करोड़ की विशाल जनसँख्या वाले देश को हारने से बचा लिया.

 आयुर्वेदशाला

भारत में पाक कला के साथ ही छोटी-मोटी बिमारियों को साधने के अचूक नुस्खे सदियों से चले रहे हैं। ज्ञान की यह धारा दादी-नानी के नुस्खों के तौर पर पीढ़ी दर पीढ़ी स्वयं चलती चली आई और इसके लिए किसी भी गृहिणी को अलग से किसी पाठशाला जाने की जरुरत नहीं पड़ी। संयुक्त परिवार के समय इन नुस्खों के प्रयोग खूब हुआ करते थे पर एकल परिवारों में इनका चलन थोडा कम हो गया है। रसोई के छोटे-छोटे जार में रखे जिस जीरा, हींग, धनिया, मेथी, लौंग, इलायची, तेजपत्ता, दालचीनी, अजवाइन आदि को हम मसाला कहते हैं और उनका इस्तेमाल खाने में स्वाद लाने के लिए करते हैं दरअसल शास्त्रों में वे स्वाद के लिए नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिए जाने जाते हैं। चरक संहिता, वेद पुराण कहीं भी आपको मसाला शब्द लिखा हुआ ही नहीं मिलेगा बल्कि हम आप जिसे मसाला कहने लग गए हैं उसके लिए औषधि शब्द का इस्तेमाल मिलेगा। मसाला और ज़ायका जैसे शब्द तो हमारे हैं ही नहीं, ये शब्द फारसी से अरबी में आये और फिर अरबी से भारत में गए। प्राचीन काल से ही भारतीय खाना पकाने में इन औषधियों की अहम भूमिका रही है जिसका विस्तृत वर्णन सुश्रुत संहिता में मिलता है। इस प्रकार सबसे प्राचीन भारतीय व्यंजन ग्रंथ सुश्रुत संहिता कही जाएगी जो कि दूसरी और चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के बीच लिखी गई थी। अनेकों अध्ययन और शोधों में हमेशा यही पाया है कि भारतीय भोजन में इस्तेमाल किये जाने वाले मसाले हमारे शरीर से सोडियम, कैलोरी और फैट इंटेक को अपने आप कम करते हैं बशर्ते कि उनकी मात्रा और इस्तेमाल दोनों में विवेकपूर्ण नजरिया अपनाया गया हो।

 जहरशाला

ऐसा नहीं कि हमारी रसोई में केवल औषधियां ही हैं, अपनी नासमझी के कारण हमने अपनी रसोई में कुछ जहर भी शामिल किया हुआ है जिसमें सबसे पहला नाम है चीनी का। इसके साथ ही नमक, मैदा, पॉलिश किये हुए चावल और साथ में रिफाइंड आयल का उपयोग सेहत के लिए खुली चुनौती है। इसलिए यदि संभव हो तो पूरी तरह या आंशिक रूप से ही सही, रसोई में इनके इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध लगा दें अन्यथा स्वास्थ्य संबंधी समस्या पीछा नहीं छोड़ेगी। आज से 30-40 साल पहले घरों में जौ, बाजरा, मक्के और चने की रोटियां खाने का प्रचलन था पर अब तो गेहूं के महीन पिसे आटे की रोटियों का चलन ही ज्यादा है फलस्वरूप मधुमेह के रोगियों की संख्या भी बढ़ रही है। इसलिए गेहूं के आटे के इस्तेमाल में कमी लायें, बेहतर तो होगा कि आश्रम द्वारा निर्मित आरोग्य आटे का सेवन किया जाये। पहले के लोग कहते भी थे किचोकरखाने से सदा बढ़ती तन की शक्ति, गेहूं मोटा पीसिये दिल में बढेविरक्ति इसी प्रकार मैदा भी शरीर का बहुत बड़ा दुश्मन है जो कि आंतों में चिपक जाता है और पाचन तंत्र को बिगाड़ देता है। इसलिए इसके इस्तेमाल को ना कहने में ही समझदारी है। इसके साथ ही कोशिश करके अपने खाने में बिना पालिश वाला चावल शामिल कीजिये क्योंकि एक अध्ययन के अनुसार पॉलिशड चावल के सेवन से अर्थराइटिस के मरीजों की संख्या बढ़ रही है और अंत में बात रिफाइंड आयल की। ध्यान रहे हार्ट-अटैक का एक बड़ा कारण रिफाइंड आयल है। इसलिए खाद्य तेल की कंपनियों के झूठे प्रचार से बचिए और सरसों के तेल एवं गाय के घी का सेवन शुरू कर दीजिये। अलसी, तिल, नारियल, घी और सरसों का तेल, यही खाओ नहीं तो समझो हार्ट तुम्हारा पक्का फेल।

 बर्तनशाला

खाना खाने, बनाने सबकी बात तो हो गई पर खाना पकाया किस बर्तन में जाये इसकी बात किये बगैर आयुर्वेद की प्राथमिक पाठशाला का ज्ञान अधूरा रह जायेगा। हर धातु का अपना एक अलग गुण होता है। पहले के लोग सोने, चांदी, कांसा, तांबा और पीतल के बर्तनों का ही उपयोग करते थे, पर मंहगाई के इस दौर ने बहुत कुछ बदल दिया है। सोना चांदी ना सही कांसा, तांबा, पीतल, लोहा या मिटटी ही सही पर अल्युमिनियम, प्लास्टिक और नॉन-स्टिक के प्रयोग को यथासंभव ना ही कर दीजिये। अनुसंधान बताते हैं कि कांसे के बर्तन में खाना बनाने से केवल 3 प्रतिशत ही पोषक तत्व नष्ट होते हैं, तो वहीं तांबे के बर्तन में रखा पानी पीने से लीवर संबंधी समस्या दूर होती है। इसी प्रकार पीतल के बर्तन में भोजन पकाने और खाने से कृत्रिम रोग, कफ  और वायुदोष की बीमारी नहीं होती जबकि लोहे के बर्तन में बने भोजन खाने से शरीर की शक्ति और खून की मात्रा बढ़ती है। स्टील के बर्तन ना लाभ देते हैं और ना ही नुकसान पहुंचाते हैं यानि इसको सुरक्षित श्रेणी में आप रख सकती हैं, पर अल्युमिनियम असुरक्षित है, इसके प्रयोग से स्मरण शक्ति और किडनी दोनों प्रभावित होते हैं। पहले लोग कहते भी थेअल्युमिनियम के पात्र का करता है जो उपयोग, आमंत्रित करता सदा वह अड़तालीस रोग दुर्भाग्यवश आज ज्यादातर घरों में प्रेशर कूकर समेत बहुत से बर्तन अल्युमिनियम के ही हैं। वैसे सर्वश्रेष्ठ विकल्प तो मिटटी के बर्तन ही हैं जिसके प्रयोग की अनुशंसा आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही करते हैं। मिट्टी के बर्तन में भोजन बनाने से पूरे 100 प्रतिशत पोषक तत्व मिलते हैं।
हम अपने रसोईघर को प्रयोगशाला, स्वादशाला, नियमशाला, पाकशाला, यज्ञशाला, रसायनशाला, पाठशाला, आयुर्वेदशाला, जहरशाला या बर्तनशाला कुछ भी कह लें पर ध्यान रहे कि रसोईघर में जो कुछ भी पकता है वही परिवार के सभी सदस्यों के शरीर में प्रवेश करता है जिससे पूरे परिवार का तन और मन दोनों का निर्माण होता है इसलिए हमारी रसोई हमारे लिए ज्ञानशाला, संस्कारशाला और उससे भी बढक़र परिवार निर्माणशाला भी है।
 
 

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