आलोक पर्व दीपावली और महर्षि दयानन्द

आलोक पर्व दीपावली और महर्षि दयानन्द

महामहोपाध्याय डॉ0 महावीर 

प्रति-कुलपति, पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार

   दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या को आती है। अन्य दिनों की तरह इस दिन भी अनेक ऐसी घटनाएं घटीं, कि यह दिवस और भी अधिक स्मरणीय हो गया। जोधपुर में हुए षडयन्त्र के कारण महर्षि दयानन्द ने दीपमाला वाले दिन ही अजमेर में 1883 में अपने प्राणों का त्याग किया था। हम महर्षि दयानन्द के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए इस दिन को ऋषि निर्वाण/बलिदान दिवस के रूप में भी आयोजित करते हैं। महर्षि के विचारों का परिशीलन करने से स्पष्ट होता है, कि उन्होंने दीपमाला के सम्बन्ध में कुछ विशेष संकेत नहीं किया, पर दीपमाला पर होने वाले क्रियाकलाप की ओर अवश्य ही ध्यान आकर्षित किया है।
इस पर्व से पर्याप्त दिन पूर्व ही सफाई, सफेदी, रंग-रोगन शुरू हो जाते हैं। क्योंकि इससे पूर्व वर्षा ऋतु होती है, जिसके कारण सीलन तथा तज्जन्य अनेक दोष जाते है। वैसे भी किसी वस्तु का प्रयोग करते-करते उसमें विकार जाता है। इस गन्दगी को हटा कर स्वच्छ लिपे-पुते भवनों पर रात को दीपों की पंक्ति सजाई जाती है। फिर कुछ लक्ष्मी पूजन करते हैं, हां, स्वच्छ प्रकाश युक्त घरों में लक्ष्मी का टिकाव माना जाता है। पूजन और प्रकाश से पूर्व स्वच्छता अत्यावश्यक है, अत: पवित्रता इस पर्व का प्राथमिक चरण है।
महर्षि दयानन्द ने अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में जीवन के विविध पक्षों पर जहां प्रकाश डाला है, वहां जीवन के प्रत्येक पहलू की पवित्रता पर सब से अधिक बल दिया है। इस दृष्टि से सत्यार्थ प्रकाश का दशम समुल्लास विशेष पठनीय है। जिसमें आचार-अनाचार, भक्ष्य-अभक्ष्य अर्थात् व्यवहार में क्या करने योग्य है और क्या नहीं? तथा स्वास्थ्यादि की दृष्टि से क्या खाने योग्य है क्या नहीं? आइए, इस दृष्टि से ऋषि वाणी पर विशेष दृष्टिपात करते हैं।
‘‘नित्य स्नान, वस्त्र, अन्न, पान, स्थान शुद्ध रखें, क्योंकि इनके शुद्ध होने में चित्त की शुद्धि और आरोग्यता प्राप्त होकर पुरुषार्थ बढ़ता है।’’ समु- 10, पृष्ठ-224
‘‘हां, जहां भोजन करे, उस स्थान को धोने, लेपन करने, झाड़ू लगाने, कूड़ा कर्कट दूर करने में प्रयत्न अवश्य करना चाहिए।’’ पृष्ठ- 227
‘‘मिट्टी और गोबर से जिस स्थान का लेपन करते हैं वह देखने में अति सुन्दर होता है।’’ पृ- 232
‘‘गोमय चिकना होने से शीघ्र नहीं उखड़ता कपड़ा बिगड़ता मलीन होता है जैसा मिट्टी से मैल चढ़ता है वैसा सूखे गोबर से नहीं होता।’’ पृ- 232
पृष्ठ सं-- स्वामी वेदानन्द वदेतीर्थ द्वारा स्थूलाक्षर में प्रकाशित सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार ग्राह्य है।
‘‘और जहां रसोई बनती है वहां भोजनादि करने से घी, मिष्ट और उच्छिष्ट भी गिरता है, उससे मक्खी, कीड़ी आदि बहुत से जीव मलिन स्थान के रहने से आते हैं। जो उसमें झाड़ू लेपन आदि से शुद्धि प्रतिदिन की जाये तो जानो पाखाने के समान वह स्थान हो जाता है। इसलिये प्रतिदिन गोबर मिट्टी झाड़ू से सर्वथा शुद्ध रखना और जो पक्का मकान हो तो जल से धोकर शुद्ध रखना चाहिये।’’ पृ- 232
‘‘बछड़े के पिये पश्चात जल से उसकी मां के स्तन धोकर शुद्ध पात्र में दोहना चाहिये।’’ पृ- 232
इन वाक्यों में बाहर की सफाई की प्रक्रिया का व्यापक संकेत है। अब खान-पान की दृष्टि से देखिये-
‘‘भक्ष्याभक्ष्य दो प्रकार का होता है- एक धर्मशास्त्रोक्त, दूसरा वैद्यकशास्त्रोक्त जैसे धर्म शास्त्रोक्त में-
मलीन विष्ठा मूत्रदि के संसर्ग से उत्पन्न हुए शाक फल मूल आदि खाना।
जैसे अनेक प्रकार के मद्य, गांजा, भांग, अफीम आदि- जो बुद्धि का नाश करने वाले पदार्थ हैं, उनका सेवन कभी करें। और जितने अन्न सड़े, बिगड़े, दुर्गन्धादि से दूषित, अच्छे प्रकार बने हुए मद्य मासांहारी के परमाणुओं ही से पूरित हैं, उनके हाथ का खावे।’’ पृ- 10, 229
‘‘जितना हिंसा और चोरी विश्वासघात छल कपट आदि से पदार्थों को प्राप्त होकर भोग करना है वह अभक्ष्य और अहिंसा धर्मादि कर्मों से प्राप्त हो कर भोजनादि करना भक्ष्य है। जिन पदार्थों से स्वास्थ्य, रोगनाश, बुद्धिबल पराक्रमवृद्धि और आयुवृद्धि होवे उन तण्डुलादि गोधूम, फल, मूल, कन्द, दूध, घी, मिष्ट आदि पदार्थों का सेवन तथा योग्य पाक मेल करके यथोचित समय पर मिताहार भोजन करना सब भक्ष्य कहाता है। जितने पदार्थ अपनी प्रकृति से विरुद्ध विकार करने वाले हैं, उनका सर्वथात्याग करना और जो जो जिसके लिये विदित हैं उन उन पदार्थों का ग्रहण करना यह भी भक्ष्य है।’’ पृ- 230
‘‘ किसी को अपना जूठा पदार्थ दे और किसी के भोजन के बीच आप खावे, अधिक भोजन करे और भोजन किये पश्चात् हाथ मुख धोये बिना कहीं इधर उधर जाये।’’ पृ- 231
‘‘मनुष्यमात्र को उचित है कि किसी का उच्छिष्ट अर्थात् जूठा खाय।’’ पृ- 231
इस प्रकार महर्षि ने जहां बाहर के व्यवहार से सम्बन्ध रखने वाली सफाई का व्यापक रूप में संकेत किया है, वहां सामाजिक, व्यावहारिक दृष्टि से भी इस सब का विश्लेषण किया है। जैसे दीपमाला पर किए जाने वाला प्रकाश स्थूल और वस्तु को स्पष्ट करके कार्य करना सरल बना देता है। वैसे ही महर्षि ने व्यवहार की पवित्रता की प्रक्रिया को स्पष्ट, सुनिश्चित, तर्कयुक्त, शास्त्र प्रमाण सहित प्रस्तुत किया है।
उदाहरण के लिये अपने वर्ण वाले से रोटी-बेटी के सम्बन्ध की बातों में पहले पवित्रता की दृष्टि से भी व्यवहार था, पर वर्णों की व्यवस्था जन्म के आधार पर मान लेने से यह सारा क्रियाकलाप लकीर पीटने जैसा ही हो गया। तभी छुआछूत की बात घृणा, दूरी के रूप में उभर आई। जिससे सामाजिक दृष्टि से बहुत प्रकार के दुष्परिणाम सामने आये।
महर्षि ने सफाई का सामान्य संकेत ही नहीं किया, अपितु सामाजिक प्रभाव को भी सदा सामने रखा। इस दृष्टि से आइए प्रथम जूंठन से ही इस के विचार-विमर्श को लेते हैं:-
‘‘(पूर्व0) जो उच्छिष्टमात्र का निषेध है तो मक्खियों का उच्छिष्ट शहद, बछड़े का उच्छिष्ट दूध और एक ग्रास खाने के पश्चात् अपना भी उच्छिष्ट होता है, पुन: उनको भी खाना चाहिये। (उत्तर0) शहद कथनमात्र ही उच्छिष्ट होता है, परन्तु वह बहुत सी औषधियों का सार होने से ग्राह्य है। बछड़ा अपनी मां का बाहर का दूध पीता है, भीतर के दूध को नहीं पी सकता, इसलिये उच्छिष्ट नहीं। परन्तु बछड़े के पिये पश्चात् जल से उसकी मां के स्तन धोकर शुद्ध पात्र में दोहना चाहिये। और अपना उच्छिष्ट अपने को विकार कारक नहीं होता। देखो! स्वभाव से यह बात सिद्ध है कि किसी का उच्छिष्ट कोई खावे जैसे अपने मुख, नाक, कान, आंख, उपस्थ और गुह्येन्द्रियों के मलमूत्रदि के स्पर्श में घृणा नहीं होती वैसे किसी दूसरे के मल मूत्र के स्पर्श में होती है।’’ पृ- 231
‘‘(पूर्व0) एक साथ खाने में कुछ दोष है या नहीं? (उत्तर0) दोष है, क्योंकि एक के साथ दूसरे का स्वभाव और प्रकृति नहीं मिलती है। जैसे कुष्ठी आदि के साथ खाने से अच्छे मनुष्य का भी रुधिर बिगड़ जाता है, वैसे दूसरे के साथ खाने में भी कुछ बिगाड़ ही होता है सुधार नहीं।’’ पृ- 231
भोजन स्थान और निर्माण सम्बन्धी पवित्रता के सम्बन्ध में महर्षि लिखते हैं- ‘‘(पूर्व0) चौके में बैठ के भोजन करना अच्छा या बाहर बैठ के? (उत्तर0) जहां पर अच्छा रमणीय सुन्दर स्थान दीखे वहां भोजन करना चाहिये। परन्तु आवश्यक युद्धादिकों में तो घोड़े आदि यानों पर बैठ के या खड़े खड़े भी खाना पीना अत्यन्त उचित है। (पूर्व0) क्या अपने ही हाथ का खाना और दूसरे के हाथ का नहीं? (उत्तर0) जो आर्यों में शुद्ध रीति से बनावे तो बराबर सब आर्यों के साथ खाने में कुछ भी हानि नहीं, क्योंकि जो ब्राह्मणादि वर्णस्थ स्त्री पुरुष रसोई बनाने और चौका देने, बर्तन भांडे मांजने आदि बखेड़े में पड़े रहें तो विद्यादि शुभ गुणों की वृद्धि कभी नहीं हो सके। देखो! युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भूगोल के राजा ऋषि महर्षि आये थे एक ही पाकशाला से भोजन किया करते थे।’’ पृ- 232
इस सामान्य व्यवस्था को जब चौके की धारणा से रूढि़वादी बना दिया गया और इसके साथ फिर धर्मभ्रष्टता का भय भी जोड़ दिया गया। इससे जो परिणाम सामने आए उनको ध्यान में रखकर महर्षि ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा- ‘‘भोजन छादन में बखेड़ा डालते हैं, कि वे दूसरे देश में जा सकें। हां इतना अवश्यक चाहिये कि मद्य मांस का ग्रहण कदापि भूल कर भी करें। क्या सब बुद्धिमानों ने यह निश्चय नहीं किया कि जो राज पुरुषों में युद्ध समय में भी चौका लगाकर रसोई बना के खाना अवश्य पराजय का हेतु है? किन्तु क्षत्रिय लोगों का युद्ध में एक हाथ से रोटी खाते, जल पीते जाना और दूसरे हाथ से शत्रुओं को घोड़े हाथी रथ पर चढ़ या पैदल हो के मारते जाना, अपना विजय करना ही आचार और पराजित होना अनाचार है।’’
चौके की रूढि़वादिता वाली, इसी मूढता से इन लोगों ने चौका लगाते लगाते विरोध करते कराते सब स्वातन्त्र्य, आनन्द, धन, राज्य, विद्या और पुरुषार्थ पर चौका लगाकर हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं और इच्छा करते हैं कि कुछ पदार्थ मिले तो पकाकर खावें। परन्तु वैसा होने पर जानो सब आर्यावर्त देश भर में चौका लगा के सर्वथा नष्ट कर दिया है। हां, जहां भोजन करें उस स्थान को धोने, लेपन करने, झाड़ू लगाने, कूड़ा कर्कट दूर करने में प्रयत्न अवश्य करना चाहिये-’’ समु-10, पृ-227
इस प्रकार बाहर की सफाई की प्रक्रिया का जहां महर्षि ने व्यापक संकेत किया है तथा उस का फल और कसौटी भी बताई है, वहां आन्तरिक पवित्रता की भी विस्तृत चर्चा की है। इस दृष्टि से ये पंक्तियां विशेष पठनीय हैं। जैसे कि ‘‘जो सत्यभाषणादि कर्मों का आचरण करना वही वेद और स्मृति में कहा हुआ आचार है।’’
माता, पिता, आचार्य और अतिथि की सेवा करना देव पूजा कहाती है। जिस जिस कर्म से जगत् का उपकार हो वह वह कर्म करना और हानि कारक छोड़ देना ही मनुष्य का मुख्य कर्तव्य कर्म है। कभी नास्तिक, लम्पट, विश्वासघाती, मिथ्यावादी, स्वार्थी, कपटी छली आदि दुष्ट मनुष्यों का संग करे, आप्त जो सत्यवादी धर्मात्मा परोपकार प्रिय जन हैं उनका सदा संग करने का नाम श्रेष्ठाचार है। (पूर्व0) आर्यावर्त देशवासियों का आर्यावर्त देश से भिन्न-भिन्न देशों में जाने से आचार नष्ट हो जाता है, वा नहीं? (उत्तर0) यह बात मिथ्या है, क्योंकि जो बाहर भीतर की पवित्रता करनी, सत्यभाषणादि आचरण करना है वह जहां कहीं करेगा आचार और धर्मभ्रष्ट कभी होगा और जो आर्यावर्त में रह कर भी दुष्टाचार करेगा वही अधर्म और आचारभ्रष्ट कहावेगा।’’ पृ- 10,225
‘‘सज्जन लोगों को राग, द्वेष, अन्याय, मिथ्याभाषण आदि दोषों को छोड़ निर्वैर, प्रीति, परोपकार सज्जनताआदि का धारण करना उत्तम आचार है। और यह समझ लें कि धर्म हमारे आत्मा और कर्तव्य के साथ है, जब हम अच्छे काम करते हैं तो हम को देश देशान्तर और द्वीप द्वीपान्तर में जाने में कुछ भी दोष नहीं लग सकता है। दोष तो पाप के काम करने में लगते हैं। हां, इतना अवश्य चाहिये कि वेदोक्त धर्म का निश्चय और पाखण्डमत का खण्डन करना अवश्य सीख लें, जिससे कोई हम को झूठा निश्चय करा सके।’’ 10,227
इन उद्धरणों से स्वत: स्पष्ट हो जाता है, कि महर्षि दयानन्द ने जहां दीपमाला से सम्बद्ध पवित्रता की प्रक्रिया का संकेत किया है, वहां प्रकाश की तरह जीवन से जुड़ी बातों का एक स्पष्ट, सुनिश्चित रूप दर्शाया है।
यही आलोक पर्व का सन्देश है कि हम बाह्य, अभ्यन्तर पवित्रता से अपने जीवन को आलोकित करें।

Related Posts