गुरु की महिमा कोई न जाने
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डॉ. साध्वी देवप्रिया, प्रोफेसर एवं
विभागाध्यक्षा- दर्शन विभाग, पतंजलि विश्वविद्यालय
प्रतिवर्ष आषाढ़ माह की पूर्णिमा को हम गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं लेकिन कभी सदियों के बाद ऐसा संयोग बनता है कि असली शिष्य और किसी समर्थ गुरु का मिलन होता है, जिससे वे दो आत्माएं ही नहीं अपितु यह समस्त धरा धन्य हो जाती है और तब सच्ची गुरु पूर्णिमा मन जाती है। यह गुरु-शिष्य का मिलन बड़ी अद्भुत घटना है, बड़ी महान् है और सम्बन्धों की शृंखला में सर्वोच्च सम्बन्ध है क्योंकि इस सम्बन्ध में पवित्रता, ज्ञान, अहंकार शून्यता, विवेक, नि:स्वार्थता, सेवा व समर्पण की पराकाष्ठा होती है।
आदिकाल से अद्यपर्यन्त ये घटनाएं घटित होती ही आयी हैं-गुरु वशिष्ठ व राम, घोर ऋषि व कृष्ण, श्रीकृष्ण व अर्जुन, समर्थ गुरु रामदास व छत्रपति शिवाजी, चाणक्य व चन्द्रगुप्त, रामकृष्ण परमहंस व विवेकानन्द, गुरु विरजानन्द व ऋषि दयानन्द आदि नाम इस पावनी परम्परा के गौरव हैं। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि पहले गुरु का अस्तित्व होता है या शिष्य का? यह ऐसी ही जिज्ञासा है जैसे कि पहले माँ का अस्तित्व है या बच्चे का? स्थूल दृष्टि से देखें तो झट से उत्तर आता है कि गुरु और माँ का अस्तित्व पहले है लेकिन गम्भीरता से विचार करें तो दोनों का अस्तित्व साथ-साथ विकसित होता है इसीलिए वेदमन्त्र में कहा-'सह वीर्यं करवावहै’ क्योंकि जब तक बच्चा गर्भ में न आये तब तक कोई महिला माँ नहीं बनती। जैसे ही शिशु गर्भ में आता है, वह माँ बनना शुरु हो जाती है और जैसे ही बच्चे का जन्म होता है वह माँ बन जाती है अर्थात् मातृत्व प्रकट हो जाता है, माँ के स्तनों में दूध उतर आता है। उसी प्रकार शिष्यत्व का जन्म होते ही गुरुत्व प्रकट हो जाता है। शिष्यत्व से अभिप्राय है-श्रद्धा, सत्य, अभिप्सा, पवित्रता, विवेक, वैराग्य, आत्म निग्रह, निष्काम सेवा, तत्त्व चिन्तन, समर्पण और अध्यवसाय अर्थात् सत्य को पाने का दृढ़ निश्चय, उपरोक्त ये १० गुण जब हममें आ जाते हैं तो शिष्यत्व अभिव्यक्त हो जाता है और तभी गुरुत्व भी प्रकट होता है, उससे पहले नहीं। तभी गुरु हमारा रूपान्तरण करना शुरु कर देते हैं। किन्तु यह शिष्यत्व का जन्म होना बहुत बड़ी घटना है और इसकी समाप्ति भक्त बनने में होती है।
भक्त का अभिप्राय है- प्रतिरूप होना, उसी के जैसा हो जाना या वही हो जाना। गीता में आधी गीता तक अर्जुन में शिष्यत्व का जन्म नहीं हुआ यद्यपि द्वितीय अध्याय में उसने कहा कि 'शिष्यस्ते अहं शाधि मां त्वां प्रपन्न’ परन्तु यह कहकर भी अर्जुन उलटा कृष्ण को ही उपदेश देते रहे जैसे कि वह कृष्ण से ज्यादा समझदार है। हम भी शिष्य तो बनना चाहते हैं लेकिन अपनी समझदारी का अहङ्कार भी कुछ कम नहीं है। रूपान्तरण तो चाहते हैं किन्तु चाहते हैं अपने तरीके से, जो हमें अनुकूल पड़े, जो हमें प्रिय लगे। हमारा मन अपनी ही प्रकार की योजना बनाता रहता है और शिष्यत्व के जन्म की पहचान यह है कि हमारा मन चुप हो जाये, शान्त हो जाये तथा गुरु के हर फैसले पर हमें विश्वास होने लगे।
हम सब उस विराट् ब्रह्माण्ड में व्याप्त उस एक ही महान् शक्ति के एक छोटे से कण हैं, लेकिन उससे भिन्न नहीं हैं, उसकी इच्छा ही हमारी इच्छा है, और उस शाश्वत के ही प्रतिनिधि, मूत्र्तरूप होते हैं गुरु, इसलिए गुरु की इच्छा ही शिष्य की, अन्तेवासी की इच्छा होती है।जब कोई पत्ता अपने आपको वृक्ष से पृथक् (ष्ठद्बह्यष्शठ्ठठ्ठद्गष्ह्ल) करता है तो पीला पड़ जाता है, मुरझाने लगता है, यही हाल हमारा भी है। जब हमारा अहङ्कार अपने को गुरु भिन्न कर लेता है तो तमाम तरहे के कष्ट, पीड़ाएं, उदासीनताएं व अवसाद (ष्ठद्गश्चह्म्द्गह्यह्यद्बशठ्ठ) हमें घेर लेते हैं। |


