श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...
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योगी का त्रैतवाद
हम सब आत्माएं स्वभाव से ही योगी है। योगेष्वर भगवान श्री कृष्ण ने गीता के आठवें अध्याय के तीसरे श्लोक में स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते कहकर अध्यात्म को ही हमारा मूल स्वभाव, मूल प्रकृति, अपनी निजता या अपना मूल स्वरूप कहा है। अतः हम सब ईष्वर की दिव्य सन्तानों या ऋषि-ऋषिकाओं की महान सन्तानों वंषजों ऋषि पुत्र-ऋषि पुत्रियों या ईश्वर के बेटा-बेटियों का यह सर्वोपरि लक्ष्य होना चाहिए कि हम जीवन में सबसे प्रथम योगी बनें। तस्मात् योग भव- अर्जुन। प्रत्येक योगी भाई-बहन को योग के कुछ मूलभूत सिद्धान्तों का यथार्थ बोध उनका अभ्यास व आचरण अवष्य करना चाहिए। योग, अध्यात्म व जीवन के इन मूलभूत सत्य सिद्धान्तों को हम सूत्र रूप में तीन सिद्धान्तों के रूप में सभी योगी आत्माओं के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि योग संदेश के सभी पाठकों को हमारी इस सेवा से साधना के पथ व जीवन पथ में अवश्य ही सहायता मिलेगी।
1- संम्पूर्ण अस्तित्व का मूल आधार कर्त्ता, नियन्ता व संहती भगवान् परमात्मा, जिन तत्वों से इस पूरे अस्तित्व की रचना करता है वह प्रकृति तथा जिसके लिए ये सारी रचना है वह हम सब आत्माएं हैं। इन तीन तत्वों का यथार्थ बोध ही त्रैतवाद है।
2- संम्पूर्ण दृष्ट - अदृष्ट अस्तित्व में एक ब्रह्मतत्व समान रूप से नित्य व्यापक है। वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर - अमर, नित्य अविनाषी, सर्वोपरिसत्ता है। यह योग का एकत्व है, परस्परता में पूरकता, कृतज्ञता सेवा एवं सुरक्षा आदि यह सहअस्तित्व है तथा सब जीव व जगत के साथ दिव्य प्रेम व करूणा यही विश्वबन्धुत्व है। एकत्व, सहअस्तित्व एवं विश्वबन्धुत्व ये योग की मूल विचारधारा या सिद्धान्त हैं।
3- सत्य, प्रेम, करूणा, शुद्ध ज्ञान, शुद्ध कर्म एवं शुद्ध उपासना] ज्ञान योग, कर्मयोग एवं भक्तियोग, ईडा, पिडंग्ला एवं सुषुम्णा, अभीप्सा, त्याग एवं समर्पण ये योग की त्रिवेणी हैं।
4- तपः स्वाध्याय ईश्वर प्राणिधानानि क्रियायोगः। योग दर्शन में साधन पाद के प्रथम सूत्र में महर्षि पतंजलि ने तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर प्राणिधान को योग के प्रमुख तीन साधन व क्रिया योग कहा है।
5- अज्ञान, अक्षग्ड़ां एवं अकर्मण्यता ये योग के तीन सबसे बडे़ बाधक तत्व या अवरोध है। भगवान तो हम सबको सदा सर्वत्र सब समय सर्वदा प्राप्त हैं जब ये तीन बाधांए हट जाती हैं तो ज्ञान, श्रद्धा एवं दिव्य कर्म, पुरुषार्थ व परमार्थ के द्वारा हम भगवान की अनुभूति कर लेते हैं।
6- योगव्रती स्वदेशी व्रत व योव्रती बनकर हमें जीवन व जगत से रोग, दरिद्रता व पाप को मिटाकर स्वास्थ्य, समृद्धि व दिव्ययता से युक्त एक महान् परम वैभवशाली भारत बनाना है।
7- प्रार्थना, श्रद्धा, भक्ति, समर्पण, पुरुषार्थ, कर्म, सेवा, तप व पुरुषार्थ चतुष्टय एवं परमार्थ निष्काम भाव से एक-एक पल भगवान के लिए जीना ये योग के तीन सोपान, सीढ़ियां या साधन हैं।
8- व्रत, दीक्षा एवं श्रद्धा से सत्य एवं पारमार्थिक परम सत्य की अनुभूति की प्रक्रिया है।
व्रतेन दीक्षामाप्तेति दीक्षया-आजनेति दक्षिणाम्।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते।।


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01 Mar 2025 17:58:05
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