स्वभाव के सृजन में विचार का महत्त्व

स्वभाव के सृजन में विचार का महत्त्व

    कोई व्यक्ति हमारी उम्र या आयु पूछे तो हम 20-30-40 या 50 वर्ष बता देते हैं। लेकिन इस स्थूल शरीर के अन्दर एक सूक्ष्म शरीर भी है उसकी आयु कोई पूछे तो हम सबकी उस शरीर की आयु लगभग 200 करोड़ वर्ष है, क्योंकि सृष्टि के आदि में परमात्मा ने एक सूक्ष्म शरीर (मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार) हमें बनाकर दे दिया वही आज पर्यन्त चला आ रहा है और वही आगे के जन्मों में और सभी योनियों में चलता रहेगा। इस शरीर के अतिरिक्त जो हमारा निजी स्वरूप या आत्म स्वरूप है वह तो अनादिकाल से वही है, आज भी वही है और अनन्तकाल तक वही रहेगा। तब प्रश्न उठता है कि यह जीवन क्या है और क्यों है? श्रद्धेय स्वामी जी महाराज कहते हैं जीवन दो अनादि और अनन्त छोरों के बीच का एक अल्पकाल खण्ड है और वह सूक्ष्म शरीर के सदुपयोग के लिए या कृतकृत्यता के लिए या उसके चरम उद्देश्य को पाने के लिए प्रभु की अहैतुकी कृपा से प्रदान किया गया एक उत्कृष्ट उपहार है। उसी को सरल शब्दों में कहें तो जीवन स्वभाव परिवर्तन का एक सुअवसर है या फिर अपने निजी स्वरूप या स्वभाव में जीने का अभ्यास करने के लिए एक अवसर है।
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्ग: कर्मसंज्ञित:।। (गीता-8/3)
वास्तव में हमारा सबका मूल स्वभाव तो अध्यात्म ही है। लेकिन वर्तमान में हमारा जो भी स्वभाव है वह कई घटकों से मिलकर बना है, उसमें हमारी श्रद्धा, निष्ठा, उत्साह, पुरुषार्थ, प्रारब्ध, संकल्प, भक्ति, धर्म, ज्ञान, कर्म, उपासना और विचार इन सबका एक सामूहिक रूप हमारा स्वभाव है। प्रत्येक तत्व का अपना महत्व है लेकिन इन सबकी अभिव्यक्ति यदि एक जगह देखना चाहें तो वह बन जाता है हमारा कर्म। मन, वाणी, और शरीर से जैसा हम कर्म करते हैं अभ्यासों का वह समूह हमारा स्वभाव बन जाता है। श्रद्धेय स्वामी जी महाराज जीवन की परिभाषा बताते हुए कहते हैं कि ''जीवन कर्म और कर्म का फल है।’’ लेकिन उस कर्म के भी मूल में यदि हम जायें कि हमनें वैसा ही कर्म क्यों किया? तो उसका कारण है हमारा विचार।
इसलिए स्वभाव में यदि परिवर्तन लाना है, तो सर्वप्रथम विचार को पकड़ना होगा, यह विचार भी एक बीज का काम करता है जिसके अनन्त फल होते हैं। एक फल में कितने बीज हैं यह तो फिर भी गिन सकते हैं, लेकिन एक बीज में कितने फल लगेंगे यह कहना बहुत मुश्किल है। वह बीज चाहे अच्छाई का हो या बुराई का। आपने बीज बोया- योग का, सेवा का, गुरुभक्ति का, राष्ट्रभक्ति का, प्रेम का, विश्वास का, इस एक विचार रूपी बीज के कितने सात्विक फल जीवन में मिलेंगे आप कल्पना भी नहीं कर सकते। उसी प्रकार यदि आपने बीज बोया- आलस्य, प्रमाद, भ्रष्टाचार, स्वार्थ, घृणा, नफरत, द्वेष, निन्दा या बुराई का तो वही फल हमारे समक्ष प्रस्तुत हो जायेंगे। जैसे-मेरे संगठन के साथी सब नालायक हैं- सब मुझसे द्वेष करते हैं, मेरा उचित सम्मान नहीं करते, मेरा आदेश भी नहीं मानते यदि यह विचार आपने बीज रूप में अपने चित्त में बोया तो उसके बुरे फल तो अपने आप मिलने लग जायेंगे। प्रश्न उठता है कि ये फल हमें कहाँ से मिलते हैं? इनका मूल स्रोत क्या है? तो इनका उत्तर है कि अच्छे या बुरे इन सब फलों का मूल स्रोत है वो शाश्वत, प्रकृति, कुदरत या भगवान् के ऋत नियम, शाश्वत नियम, सत्य उसे जो भी नाम दें, पर देने वाला वही है, दूसरे तो केवल माध्यम बन जाते हैं। जैसे हमें पानी की प्राप्ति नल से होती है, लेकिन नल उस पानी का मूल स्रोत नहीं है। पानी का मूल स्रोत है, उस बिल्डिंग में बनी पानी की टंकी और उस टंकी का मूल स्रोत है, कुंआ और उस कुएं का भी मूल स्रोत है ईश्वर। इसलिए हम अपने दु:ख या सुख का कारण अपने पारिवारिक जनों को, मित्रों को, बोस को, आस-पास वालों को या गुरु को मान लेते हैं, लेकिन वास्तव में वे तो नल की भांति एक माध्यम बने हैं। वास्तव में यह फल हमारे अच्छे या बुरे विचार का या धरणा का ही फल है। हमने विचार का जैसा बीज बोया, कुदरत ने वैसे ही अनेक फल हमारे समक्ष प्रस्तुत कर दिये। आम का बीज बोया तो आम के फल, नींबू का बीज बोया तो नींबू फल, नीम का बीज बोया तो नीम के फल। यह शाश्वत नियम पूरी सृष्टि में काम कर रहा है जैसा बीज-वैसे अनन्त फल। माली या किसान तो केवल निमित्त बन जाते हैं। इस सृष्टि में प्रेम, आनन्द, शान्ति, समृद्धि-सुख आदि सब कुछ इतना भरपूर और अनन्त है कि उससे लेते-लेते आपका जीवन पूरा हो जायेगा। लेकिन देते-देते उसका स्रोत कभी खाली नहीं होगा। इसी को वेद में कहा-
''ऊँ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।  पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
(बृहदारण्यक-5/1/1)
जो जमीन का टुकड़ा आपके पास है और फल दे रहा है सृष्टि के आदि से वह टुकड़ा न जाने कितने लोगों को फल दे चुका है और आगे भी देता ही रहेगा। स्वामी जी महाराज कहते हैं कि जैसा हमारा विचार है वैसा ही होता है हमारा संसार।
आप सभी भाई-बहन श्रद्धेय स्वामी जी महाराज से प्राणर्पण मन, प्राण आत्मा से बेहद प्रेम व विश्वास करते हैं, श्रद्धा रखते हैं इसका मुख्य कारण यह है कि स्वामी जी महराज का हृदय आपके प्रति अनन्त प्रेम, करुणा, वात्सल्य और अनुग्रह से भरा हुआ है। अत: जैसा बीज वैसा फल।
जब हम यह जान चुके हैं कि अपने सकारात्मक या नकारात्मक विचार के माध्यम से वैसे ही वाणी, व्यवहार, आचरण व कर्म के द्वारा अपने भाग्य विधाता हम स्वयं हैं। जीवन की प्रत्येक उपलब्धि के कारक हम स्वयं हैं, तो अपने विचार को, बुद्धि को या मन को और अधिक निर्मल, पवित्र, सात्विक या विशारद बनाने के लिए हम क्या उपाय कर सकते हैं? यह विचारणीय है। योग दर्शन के अनुसार-''अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोध:’’ क्योंकि अभ्यास और वैराग्य के द्वारा नकारात्मक विचारों को या क्लिष्ट वृत्तियों को रोका जा सकता है। यह अभ्यास है-चित्त की प्रशान्तवाहिता और वैराग्य है-अनासक्ति। इन दोनों साधनों का प्रतिदिन पूर्ण श्रद्धा व पुरुषार्थ से अधिक से अधिक अभ्यास करना श्रेष्ठ परिणाम के लिए अवश्यक है। योगदर्शन में ही अन्यत्र कहा गया- ''निर्विचार वैशारद्येऽध्यात्मप्रसाद:’’ अर्थात् जब निर्विचार समाधि से चित्त की निर्मलता पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है, तब योगी को अध्यात्म प्रसाद की प्राप्ति होती है।
इसे सरल भाषा में इस प्रकार समझ सकते हैं कि जिस भूमि को ज्यादा उपजाऊ बनाना होता है तो एक सीजन उसे खाली छोड़ दिया जाता है, उसमें कोई बीज नहीं बोया जाता है। जब शरीर को ज्यादा शक्ति सम्पन्न बनाना होता है, तो उपवास किया जाता है, जिसमें भोजन या तो खाया नहीं जाता या फिर फल-जूस आदि सात्विक आहार लिया जाता है, उसी प्रकार मन और बुद्धि को यदि अधिक सबल और शुद्ध, निर्मल बनाना है तो प्रतिदिन विचार का उपवास करना चाहिये। या तो प्रशान्त चित्त होकर विचार बिल्कुल बन्द करके अपने स्वरूप में स्थित होने का अभ्यास करें या फिर केवल उच्चविचार, पारमार्थिक विचार, समष्टि को सुख देने वाले, अपने पूर्वजों के प्रतिनिधि बनने वाले विचार ही उठायें।
जब थाली में खाना सामने आता है तो हम कितना गौर करते हैं कि यह खाने से मोटापा बढ़ जायेगा, बी.पी., शुगर, कॉलेस्ट्रॉल बढ़ जायेगा, लहसुन, प्याज खाने से बदबू आयेगी इत्यादि। हम अपने घर में, ऑफिस में, स्कूल में, दुकान में, संगठन में या योग कक्षाओं में इतने जागरूक रहते हैं कि उन व्यक्तियों को आने की अनुमति नहीं देते, जो किसी भी प्रकार से हमारे लिए हानिकारक हैं, परन्तु अपने अन्दर आने वाले हानिकारक विचारों के प्रति इतने असावधन रहते हैं कि नकारात्मक विचार आकर हमारा सर्वस्व ध्वस्त कर देते हैं। अत: सुबह से शाम तक टी.वी. से अखबार से, मित्रों से, परिवार से, समाज से, कार्यकर्त्ताओं से जो भी विचार, शिकायतें, एक-दूसरे की निन्दा, चुगली, बुराई, अच्छाई प्रशंसा आदि हमारे सामने आते हैं उनमें से अपने लिए हितकारी को ही हमें ग्रहण करना चाहिये, बाकि को चुपचाप अपने अन्दर ही अन्दर तीन-बार 'परोऽपेहि मनस्पाप: किमशस्तानि शंससि ऐसे कहकर हटा देना चाहिये।
जब स्वामी जी महाराज कहते हैं कि उच्च चेतना से युक्त या दिव्य चेतना से युक्त रहें तो इसका अभिप्राय मुझे तो यही समझ में आया कि सकारात्मक, पारमार्थिक, सेवा व समष्टि के लिए सुखदायी विचारों से युक्त रहना। प्रारम्भ में तो लोग आपको नकारात्मक विचार व व्यवहार देंगे मगर जब उन्हें पता चलेगा कि आप उन्हें ग्रहण नहीं करना चाहते हैं, तब आपको इसे देना भी बन्द कर देंगे। ठीक जिस प्रकार लोगों को पता है कि आप लहसुन, प्याज, मिर्ची, मसाले, शराब, मांस, कोल्डड्रिंक्स आदि नहीं लेते तो वे आपको परोसते भी नहीं है। हम भी अपने विचार दूसरों को देते हैं, इसलिए यह हमारी भी जिम्मेदारी है कि नकारात्मक विचार न दें और न लें। आप देख पायेंगे हमारे सकारात्मक विचार संगठन के माध्यम से जगत में एक क्रान्ति ला सकते हैं और उसी के एक जीवन्त तत्वपरक उदाहरण श्रद्धेय स्वामी जी महाराज व पूज्य आचार्य श्री हैं।
अत: हम जिस तरह की चीजें (फल) अपने जीवन में आकर्षित करना चाहते हैं, उसी तरह के विचारों का इस्तेमाल करना सीखें। नकारात्मक विचार रखने वाले अपना नरक, अपना दु:ख और अपना रोग साथ में लेकर घूमते हैं। ऐसे लोग हर व्यक्ति में न सिर्फ गलतियाँ ही देखते हैं, बल्कि गलतियों को मैग्निफाइंग ग्लास से देखते हैं। ऐसे लोगों से मिलकर व्यक्ति सोचता है कहाँ फँस गए, इनसे कैसे जल्दी पीछा छूटे? इसके विपरीत सकारात्मक सोचने वाले अपना स्वर्ग, अपना सुख, शान्ति, खुशी और अपना स्वास्थ्य साथ में लेकर घूमते हैं ऐसे लोग हर व्यक्ति में कोई न कोई खूबी ढूंढ ही लेते हैं। सबको अपनी आशावादी सोच से अपनी तरफ आकर्षित कर लेते हैं। उनके पास बैठकर लगता है कि बैठे ही रहें, क्योंकि वहाँ से अप्रत्यक्ष रूप में सकारात्मक शक्ति व प्रेरणा मिल रही होती है। हर व्यक्ति चाहता है कि उसके घर-परिवार, ऑफिस या आस-पास सकारात्मक सोच वाले, प्रेम करने वाले, प्रेरणा देने वाले, क्षमा करने वाले आाशावादी लोग ही रहें। जब हम अपने लिए ऐसा चाहते हैं तो निश्चित रूप से दूसरे भी हमसे वैसा ही चाहते हैं। अत: हम चुन-चुन कर अच्छे विचारों के, उच्च विचारों के, सकारात्मक विचारों के व प्रेरणादायी विचारों के बीज अपने चित्त में बोकर आनन्द फल के भागी बने तथा अपने स्वभाव को अपने पूर्वजों जैसा निर्मल, साहसी, शान्त, परोपकारी व सेवाभावी बनावें।

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