भारत की वैश्विक भूमिका में हमारा उत्तरदायित्व
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भारत को परम वैभवशाली बनाने हेतु एक दिव्य एवं भव्य भारत के निर्माण की प्रक्रिया में हम 125 करोड़ भारतीयों को एक बड़ी भूमिका निभानी होगी, क्योंकि भारत में यदि चुनौतियाँ, संकट एवं समस्याएं हैं, तो यहाँ समाधान एवं सम्भावनाएं भी अपरिमित हैं। ईश्वर प्रदत्त नैसर्गिक ऐश्वर्य एवं संसाधनों से लेकर अपरिमित मानव संसाधन भारत के पास हैं।
सृष्टि के आदिकाल से लेकर 18वीं शताब्दी तक जब भारत विश्व की महाशक्ति रहा है, तो अब भी उसकी पुनरावृत्ति होनी है। बस इस कार्य में हमें अपनी भूमिका प्रामाणिकता के साथ निभानी है। भारत वैश्विक स्तर पर सभी क्षेत्रों में नेतृत्व, निर्देश एवं एक प्रगतिशील आदर्श राष्ट्र की भूमिका का निर्वहन करे इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं को हम यहाँ संक्षेप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
हमें पूर्ण विश्वास है कि आप सभी योग संदेश के पाठक इन सत्यों को प्रामाणिकता के साथ राष्ट्र में स्थापित करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायेंगे-
हमारा उत्तरदायित्व
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देश में सफलता, समृद्धि एवं विकास का विरोध नहीं होना चाहिए। सक्सेस, बिजनेस, प्रॉस्पेरिटी एवं डवलपमेन्ट को सभी देशवासियों को आदर एवं गौरव देना चाहिए। एंटी सक्सेस थॉट्स, आइडियोलॉजी एवं मूवमेन्ट को देश में बन्द करना चाहिए।
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सुशासन एवं आत्मानुशासन दोनों ही राष्ट्र के लिए जरूरी हैं। लॉ को बे्रक करना तथा यूनिवर्सल लॉ को नहीं मानने से ही राष्ट्र में बहुत प्रकार के दु:ख एवं विसंगतियां जन्म लेती हैं।
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सभी क्षेत्रों में एक समग्र, न्यायपूर्ण, स्थाई एवं विकेन्द्रित विकास की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
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जो भी वैज्ञानिक, सार्वभौमिक, पंथ निरपेक्ष एवं सर्वहितकारी सोच, विचार, सिद्धान्त एवं कार्य हो उसको अपनाना चाहिए तथा इसके विपरीत अवैज्ञानिक एवं साम्प्रदायिक आदि दोषों से मुक्त रहना चाहिए।
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सबको एक घंटा योग एवं 8 से 16 घंटा कर्मयोग करने का संकल्प लेकर एक श्रेष्ठ जीवन जीना चाहिए।
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सद्ज्ञान, सद्भाव एवं सद्कर्मों से युक्त सभी को दिव्य जीवन जीने के लिए पूर्ण पुरुषार्थ एवं परमार्थ करना चाहिए।
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स्वयं के प्रति अपने सत्य सिद्धांतों, सत्यधर्म एवं अपनी सात्विक जीवन पद्धति के प्रति पूर्ण दृढ़ता एवं समष्टि में सब मनुष्यों एवं सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति उदारता का भाव रखना चाहिए।
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विकल्प रहित संकल्प एवं अखंड प्रचण्ड पुरुषार्थ के साथ अपने सात्विक ध्येय को प्राप्त करना चाहिए।
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मजहबी गौरव के स्थान पर स्वयं को भारतीय, ईश्वर की सन्तान एवं ऋषि-ऋषिकाओं की सन्तान होने का गौरव एवं तद्नुरूप आचरण करना चाहिए।
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हम सभी मनुष्य धरती पर भगवान् की सर्वश्रेष्ठ रचना हैं और हम सबका इस सम्पूर्ण सृष्टि या अस्तित्व के प्रति सबसे अधिक उत्तरदायित्व है। इस भाव संकल्प के साथ हमें एक श्रेष्ठतम व्यवहार स्वयं एवं समष्टि के साथ करना चाहिए।
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