श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...
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दिव्यात्माओं का आह्वान
हम सब मूलत: ईश्वर की दिव्य सन्तानें व ऋषि-ऋषिकाओं के वंशज व उन्हीं के बेटे-बेटियाँ हैं। हमारा यह जन्म व जीवन अपने इसी मूल स्वधर्म में जीने के लिए हुआ है। अत: भागवत धर्म व ऋषिधर्म में जीना अर्थात् हमारा ज्ञान व जीवन वाणी, व्यवहार, आचरण, स्वभाव, कर्म, प्रवृत्ति, पुरुषार्थ, तप व सेवा ऋषियों व वेद के पूर्णत: अनुकूल ही होना चाहिए।
अपने-अपने कुलवंश की रक्षा के लिए, अपने-अपने खानदान व माता-पिता की प्रसन्नता व उनको गौरव दिलाने के लिए तो अधिकांश लोग जी ही रहे हैं। आखिर भगवान् के लिए अपने मूलवंश-ब्रह्मवंश, अपने मूल माता-पिता परमात्मा व ऋषियों की प्रसन्नता, भगवान् व ऋषियों को गौरव दिलाने के लिए उनका प्रतिनिधि कौन बनेगा?
सत्ता, सम्पत्ति, सम्मान व वैषयिक सुख के लिए, आंग्ल भाषा (अंग्रेजी भाषा) में बोलें तो पॉवर, प्रोस्परेटी, प्राइज व प्लेजर (Power, Prosperity, Prize and Pleasure) के लिए तो करोड़ों लोग जी रहे हैं। क्षणिक सुख के प्रलोभन से ऊपर उठकर ज्ञान, सुख, समृद्धि, शक्ति व शान्ति के मूल स्रोत जहाँ भूमा है, पूर्ण आनन्द है ऐसे उस भगवान् के लिए जो पूरा जीवन अर्पित करना चाहते हैं, जिनको यह सत्य समझ में आ गया है कि मेरा ये जीवन भगवान् के लिए है, ये जीवन ऋषियों के लिए है,
ऐसी दिव्यात्माओं, पुण्यात्मा युवक-युवतियों को हम आमन्त्रित करते हैं। वे सब पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार में आएं और स्वयं को भगवान् व ऋषि-ऋषिकाओं का प्रतिनिधि व प्रतिरूप बनाएं। रामनवमी को हम ऐसे भाई-बहनों की प्राथमिक परीक्षा लेकर, उनकी ऋषियों की ज्ञान परम्परा अर्थात् गुरुकुलीय परम्परा में शिक्षा-दीक्षा प्रारम्भ करेंगे। महर्षि गौतम, कणाद, जैमिनी, पाणिनि, पतंजलि की तरह व महर्षि दयानन्द आदि प्राचीन व अर्वाचीन ऋषियों की तरह जो स्वयं को तैयार करना चाहते हैं, ऐसे लगभग एक हजार भाई-बहनों को हम इस बार और आगामी कुछ वर्षों में लगभग 10 हजार प्रतिभावान् विद्यार्थियों, युवक व युवतियों को गुरुकुलीय परम्परा में व्याकरण, गीता, दर्शन, उपनिषद आदि वेद-वेदाङ्गों की शिक्षा-दीक्षा देकर ऋषि-ऋषिकाओं के रूप में तैयार करेंगे।
मैं दुनियाँ का सबसे बड़ा काम, दिव्य-व्यक्तित्व युक्त नेतृत्व तैयार करने को मानता हूँ और एक-एक व्यक्ति जब पूर्ण जागृत व पूर्ण समर्थ बनकर पूर्ण निष्ठा व पूर्ण विवेक के साथ पूर्ण पुरुषार्थ व अखण्ड पुरुषार्थ करता है, तो विश्व रूपान्तरित हो जाता है।
ऐसे ही अपने पूर्वजों ने किया है और आज जो भी सात्विक परिवर्तन घटित हो रहा है, उसके मूल में अलौकिक प्रतिभा युक्त व्यक्ति ही तो हैं।
छोटे-छोटे उद्देश्यों के लिए जीवन जीना ये जीवन का, भगवान् की दी हुई दिव्य-शक्तियों का व ईश्वर प्रदत्त दिव्य ज्ञान व अपरिमित सामर्थ्य का तिरस्कार है। मुझे पूरा विश्वास है कि श्रेष्ठ कुलीन कुलों की श्रेष्ठ दिव्य सन्तानें इस कार्य हेतु हमें अवश्य मिलेंगी और इस पूरे विश्व को हम फिर से ऋषियों व वेद के मार्ग पर चलायेंगे, यही है भारत को विश्व का जगद्गुरु या विश्वगुरु बनाने का मार्ग। यही है वेद का सन्देश-
इन्द्रं वर्धन्तोऽप्तुर: कृणवन्तो विश्वमार्यम्। अपघ्नन्तो अराव्ण:।। (ऋग्वेद)
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01 Mar 2025 17:58:05
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