व्यक्तित्व विकारग्रस्त होने पर दिव्य परमात्मा भी भयकारक दिखता है
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गीता परमात्मा की वाणी है। संसार परमात्मा की अनुशासन व्यवस्था। जब तक लोक मानस, समाज, राष्ट्र परमात्मा के अनुशासन में जीता है, गीता भी प्रवाहित रहती है। अनुशासन टूटते ही प्रवाह अवरुद्ध होता है। तब 'गीता’ चीत्कार करती है, गीता की उस चीत्कार को जो सुन समझ और अनुभव कर लेता है, वही युग सृजेता, युग पुरुष, क्रांति पुरुष, महामानव, योगेश्वर आदि के रूप में प्रतिष्ठित होता है। घोर अंधकार के युग में परमात्मा की उस अविरल शाश्वत वाणी को आत्मसात करने में समर्थ भी वही होता है, जो परम अनुशासित, नियोजन एवं सृजन में जिसकी गति हो। महाभारत काल में योगेश्वर कृष्ण, स्वतंत्रता आन्दोलन काल में लोकमान्य तिलक, गांधी आदि इसी स्तर के युगदूत थे, जिन्होंने गीता की प्रेरणा को युगीन पृष्ठभूमि में आत्मसात किया और नवनिर्माण हुआ। इसीलिए श्रीमद्भगवद्गीता सदा से युग ग्रंथ रहा है। पतंजलि के योगसूत्र की तरह ही चिर शाश्वत 'युगीन धर्म निर्वाह की प्रेरणा’ इसकी प्रतिबद्धता। गीता की उसी आवाज को आज युगऋषि परम पूज्य स्वामी रामदेवजी महाराज आत्मसात करके युगधर्म निर्वाह कर रहे हैं, जो प्रस्तुत हैं:- ...सम्पादक
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्ï। पश्यामि त्वां
दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्ï।। १९।।
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वा:। दृष्ट्वाद्भुतं
रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितम्ï महात्मन्ï।। २०।।
अर्जुन एक दिव्य योगी के स्वरूप को देखकर अपनी भांति-भांति की प्रतिक्रियायें देता है। वह कहता है, हे योगेश्वर आपका यह स्वरूप जिसका न आदि है, न मध्य और न अन्त, जिसके अनेक बाहु हैं, सूर्य और चन्द्र जिसके नेत्र हैं, प्रज्ज्वलित अग्नि जिसका मुख है, ऐसे अनन्त शक्तिमान् तुम और अपने तेज से समस्त जगत् को जो तपा रहा है, ऐसे तुम्हारे रूप को मैं देख रहा हूँ।
क्योंकि आकाश और पृथ्वी के बीच का यह अन्तर और सभी दिशाएं केवल तुम्हीं ने व्याप्त की हुई हैं। हे महात्मन्ï! तुम्हारे इस अद्ïभुत और विशाल उग्ररूप को देखकर ये तीनों लोक डर से व्यथित हो रहे हैं।
अमी हि त्वां सुरसङ् घा विशन्ति केचिद्भीता: प्राञ्जलयो गृणन्ति।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ् घा: स्तुवन्ति
त्वां स्तुतिभि: पुष्कलाभि:।। २१।।
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।
गन्धर्वयक्षासुरसि।।सङ् घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे।। २२।।
यह देखो! देवसमूह तुम्हारे भीतर प्रवेश कर रहे हैं और कुछ देवता भय से हाथ जोड़े प्रार्थना कर रहे हैं। स्वस्ति-स्वस्ति कहकर महर्षि और सिद्धों का समुदाय अनेक प्रकार के स्तोत्रों से तुम्हारी स्तुति कर रहा है।
रुद्र और आदित्य, वसु और सब साध्यगण (मुनिगणों का एक वर्ग), दोनों अश्विनीकुमार, मरुद्ïगण, पितर, गंधर्व, यक्ष, असुर एवं सिद्धों के समूह सब तुम्हारी ओर विस्मित होकर देख रहे हैं।
(श्रद्धा से पितरों अर्थात्ï वयोवृद्धों को जो अन्न दिया जाता है वह तभी तक उनके लिये स्वास्थ्यप्रद होता है जब तक कि गरमागरम मिले, इसलिए पितरों को ऊष्मपा कहते हैं। आदित्य वैदिक देवता हैं)।
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम्ï।
बहूदरं बहुदंष्टïकरालं दृष्ट्ïवा लोका: प्रव्यथितास्तथाहम्ï।। २३।।
नभ:स्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।
दृष्ट्ïवा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।। २४।।
हे महाबाहो! अनेकों मुखों व आँखों वाले अनेक भुजाओं, जंघाओं और अनेक पैरों वाले अनेक उदरों वाले और अनेक दाढ़ों के कारण विकराल दिखाई देने वाले तुम्हारे इस महान्ï रूप को देखकर सब लोग व्यथित हो गये हैं और मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।
आकाश को छूने वाले प्रकाशमान्, अनेक रंगों से युक्त, जबड़े फैलाये हुए और चमकीले व विशाल नेत्रों वाले तुम्हारे स्वरूप को देखकर हे विष्णो! प्रव्यथित अन्तरात्मा वाला मैं न तो धीरज धारण कर पा रहा हूँ और न शान्ति अर्थात् मैं अपने आपको सहज नहीं रख पा रहा।
दंष्टराकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्ïवैव कालानलसन्निभानि।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास।। २५।।
विशाल दाढ़ों से विकराल और कालाग्नि के समान तुम्हारे इन भयंकर मुखों को देखकर मुझे दिशायें नहीं सूझतीं। चैन नहीं प्राप्त कर पा रहा हूँ। हे जगन्निवास! देवताओं के भी देवता, अब प्रसन्न हो जाओ।
उस दिव्य परमात्मा के दर्शन मात्र से अर्जुन के विकार व्यथित हो भागने लगे, तो विकार ग्रस्त अर्जुन भी भयभीत हो उठा, तभी योगेश्वर ने उसे सम्हाला। इससे जीवन में पवित्रता, दिव्यता की महत्ता स्वत: सिद्ध होती है। अन्यथा व्यक्तित्व विकार ग्रस्त रहने पर दिव्य परमात्मा भी भयकारक लगता है।
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01 Mar 2025 17:58:05
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