योग की गौरवशाली परम्परा एवं इतिहास
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योग स्वचेतना, स्वशक्ति, स्वबल अर्थात् आत्मबल इत्यादि को पूर्णत: जाग्रत् करने का विशुद्ध विज्ञान हैै। उसकी प्रसुप्त शक्ति जाग्रत् होती है, तब वह अपरिमित शक्तियों का स्वामी बन जाता है। योग मूलत: पूर्णतया सत्यबोध कराने वाली अध्यात्म-विद्या है। योग विद्या ही अपराविद्या व पराविद्या का मूल है। योग ही हमारे अभ्युदय व नि:श्रेयस् का आधार है।
योग एक गूढ़, अत्यन्त उपयोगी एवं व्यावहारिक विषय है। यह रूपान्तरण का विज्ञान (Science of Transformation) है। योग मात्र ऋषि-मुनियों और विचारशील-विवेकवान् लोगों के लिये ही नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति-किसान, मजदूर, व्यापारी, नौकरीपेशा गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यासी से लेकर विद्यार्थी आदि सभी के लिये ऋषियों की उत्कृष्ट देन है।
महर्षि पतंजलि के अनुसार चित्त अर्थात् अन्त:करण की समस्त वृत्तियों के निरोध से उत्पन्न अवस्था ही योग है। मनुष्य अपने सम्पूर्ण बाह्य व्यवहार की सिद्धि हेतु पंच ज्ञानेन्द्रियों व पंच कर्मेन्द्रियों को बाह्यकरण रूप में उपयोग करता है तथा आन्तरिक व्यवहार व आचरण की सिद्धि के लिए मन, बुद्धि और अहंकार को साधन रूप में ग्रहण करता है। ये साधन अन्त:करण कहलाते हैं। योगदर्शन में चित्त पद के द्वारा चारों करण अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार एकसाथ गृहीत किये गये हैं, यथा-चित्तमन्त:करणसामान्यम्। इस चित्त में विभिन्न प्रकार के चित्र बनते रहते हैं। ये चित्र सांसारिक विषयों से सम्बद्ध होते हैं, इन्हीं को चित्त की वृत्तियाँ कहते हैं। ये वृत्तियाँ जीवात्मा ही अपनी इच्छा से बनाती हैं और स्वयं ही अपनी इच्छा और प्रयत्न से रोक भी लेता है। बाह्य व आन्तरिक करणों के द्वारा जब वह बाह्य तथा आभ्यन्तर दोनों प्रकार के विचारों को रोक देता है, तब जो अवस्था उत्पन्न होती है, वह योग है। योग की अवस्था में आत्मा अपने शुद्धतम ज्ञानमय, आनन्दमय, पूर्ण सुख व शान्तिमय मूल स्वरूप में रहता है। यही हम सब आत्माओं की मूल प्रकृति, मूल स्वभाव या मूल स्वरूप है। इसी निज स्वरूप को हमें योगाभ्यास अर्थात् कर्मयोग, ज्ञानयोग व भक्तियोग से प्राप्त करना है। शुद्ध कर्म, शुद्ध ज्ञान व शुद्ध उपासना से हमें योग की सह-स्थिति प्राप्त होगी। इसी के लिए साधना व निष्काम सेवा मुख्य साधन हैं।
योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार समत्व ही योग है। अशान्त व अनवस्थित मन जब सुव्यवस्थित होकर शान्त, एकरस, सन्तुलित व समस्थिति को प्राप्त होता है, तो उसे योग कहते हैं। सामान्यत: मन अनुकूल व प्रतिकूल दोनों अवस्थाओं में सन्तुलन को खोकर व्यग्र, अस्त-व्यस्त रहता है। जब मन की अशान्ति के कारण का निवारण हो जाता है, तब उसी प्रतिक्रिया रहित तटस्थावस्था व स्थितप्रज्ञता को गीता योग कहती है। गीता में योग की एक और परिभाषा मिलती है-'तं विद्याद् दु:खसंयोगवियोगं योगसिमज्ञतम्। अर्थात् दु:ख के संयोग का वियोग होना ही योग है। 'योग: कर्मसु कौशलम्' विवेक पूर्वक अपने स्वधर्म, शरीरधर्म, जीवनधर्म, परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्व के प्रति अपने कर्त्तव्य कर्म को अपना धर्म मानकर करना यही स्वधर्म योग है। यही राष्ट्रधर्म व विश्वधर्म रूपी योग मानव मात्र के लिए एकमात्र कल्याण का मार्ग है।
मैत्रयण्युपनिषद्, कठोपनिषद्, कैवल्योपनिषद, गर्भोपनिषद, योगशिखोपनिषद् में अपने और प्राण की एकता करने, स्वरजरूपी महाशक्ति कुण्डलिनी को स्वरेतरूपी आत्मतत्त्व के साथ संयुक्तकरने, सूर्य अर्थात् पिघौला और चन्द्र अर्थात् इड़ा स्वर का संयोग करने तथा परमात्मा में जीवात्मा का मिलन या लय होन की प्रक्रिया को योग से अभिहित किया गया है।
बौद्धयोग-साहित्य में योग के स्थान पर ध्यान और समाधि शब्दों के प्रयोग मिलते हैं। बौद्धयोग परम्परा में, ध्यान की प्रक्रिया को समाधि कहा जाता है। अत: बौद्धयोग में योग का अर्थ समाधि है। योगसूत्र की व्याख्या या भाष्य में महर्षि व्यास भी योग को समाधि ही कहते हैं-'योग: समाधि:’।
महर्षि चरक, गौतमीय तन्त्र, हठप्रदीपिका, श्रीगुरुग्रन्थसाहिब, जैनाचार्यों से लेकर आधुनिक युग के महान् योगी महर्षि अरविन्द तक में निम्न चेतना से ऊपर उठकर सदा उच्च चेतना अर्थात् भागवत् चेतना या दिव्य चेतना से युक्त होकर दिव्य जीवन जीने के मूल तत्व में योग के संकल्प मिलते हैं।
'वर्तमान समय में विश्वविख्यात योगर्षि स्वामी रामदेव योग को समाधि से जोड़ते हैं और योग की पूर्ण व्यावहारिक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि योग आत्मदर्शन, आत्म- साक्षात्कार या आत्मबोध की आध्यात्मिक पद्धति है; योग जीवन-दर्शन है; योग जीवन-प्रबन्धन है; योग आत्मानुशासन है। योग मात्र शारीरिक व्यायाम नहीं, अपितु सम्पूर्ण जीवनशैली है। योग चित्त को निर्मल व निर्बीज करने की आध्यात्मिक विधा है। योग एक सम्पूर्ण चिकित्सा-विज्ञान है। योग जीवन का विज्ञान है। योग व्यक्ति समाज, राष्ट्र व विश्व की सम्पूर्ण समस्याओं का समाधान है। योग एवं कर्मयोग अर्थात् साधना एवं निष्काम सेवा ही योग के मुख्य साधन हैं। प्रतिपल ब्रह्म के एकत्व या ब्रह्मभाव में रहते हुए भगवान् की अन्त:प्रेरणा के अनुसार कर्म करना, आचरण करना या जीवन जीना ही योगमय जीवन है।‘
योग की प्राचीन परम्परायें:
योग की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है, अत्यन्त समृद्ध प्राचीन भारतीय वांगमय के अध्ययन-अनुसन्धान से 'हिरण्यगर्भ’ ही योग के आदि प्रवक्ता बताये गये हैं, अन्य कोई नहीं। ऋग्वेद ने अद्वितीय हिरण्यगर्भ को सूर्यादि तेजस्वी पदार्थों का गर्भ-उत्पत्तिस्थान, उत्पादक कहा है। हिरण्यगर्भ को सम्पूर्ण प्राणियों का स्वामी गुरुओं का भी गुरु और पुरातन कहा है। महाभारत में भी योग के आदि प्रवक्ता के रूप में हिरण्यगर्भ को ही स्वीकारा गया है। यह योगिजन का नित्य पूज्य, विभु व समष्टि-बुद्धि है। इसी को योगिजन महान् तथा विरिमच और अज (अजन्मा) भी कहते हैं।
'अद्भुत रामायण’ में हिरण्यगर्भ जगत् की अन्तरात्मा व श्रीमद्भागवतपुराण में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को योगोपदेश देते हुए कहते हैं कि यही योगकौशल का मूल स्रोत है, योग का प्रारम्भ परमात्मा हिरण्यगर्भ के द्वारा ही हुआ है। अत: योग का आदि व प्रथम गुरु ईश्वर भी वही है।
अखिल विश्व के प्राचीनतम साहित्य वेद में योग की अनेक संकल्पनाओं का स्पष्ट उल्लेख विभिन्न स्थानों पर मिलता है। यजुर्वेद में शरीरस्थ पाँच वायुओं की तेज वृद्धि के लिए प्रार्थना की गई है। अनेक वैदिक ऋचाएँ प्रत्यक्षतया अथवा प्रकारान्तर से योग के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित करती हैं। यजुर्वेद के ११वें अध्याय के 1 से 5 तक के मन्त्र योग की उत्कृष्टता दर्शाते हैं। अथर्ववेद में कहा गया है कि विवेकशील व्यक्ति शरीर के सभी स्थानों से प्राण एकत्रित करके दिव्य लोक को प्राप्त करते हैं। वेदों में मुक्ति-प्राप्ति के एकल साधन 'योग’ की चर्चा विस्तृत रूप में हुई है। वेदों की उत्पत्ति सृष्टि की उत्पत्ति के साथ-साथ हुई है। वर्तमान सृष्टि की आयु 1 अरब, 17 करोड़, 29 लाख, 49 हजार 116 वर्ष (विक्रम संवत् 2071 ईस्वी संवत् 2015 में) हो चुकी है। अत: कतिपय विद्वान् योग-उत्पत्ति का काल भी इतना ही मानते हैं।
अहिर्बुध्न्य-संहिता तथा अन्यान्य पुरातन ग्रन्थों से यह सिद्ध हो गया है कि शाश्वत योग की अक्षुण्ण परम्परा की शुरुआत भी हिरण्यगर्भ से ही हुई है। हिरण्यगर्भ से अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा चार ऋषियों ने समाधि की उच्च-स्तरीय भूमियों में वेदमन्त्रों का साक्षात्कार किया।
योग के आधुनिक युग के पुरोधा महर्षि दयानन्द ने स्वीकारा है कि धर्मात्मा, योगी, महर्षि लोग जब-जब, जिस-जिस के अर्थ को जानने की इच्छा करके ध्यानावस्थित हो परमेश्वर के ध्यान में, उसके स्वरूप में समाधिस्थ हुए, तब-तब परमात्मा ने अभीष्ट मन्त्रों के अर्थ को अनावृत्त किया और वही लोग उन मन्त्रों के ऋषि कहलाये। इस प्रकार योग की परम्परा 'ऋषि-परम्परा’ से आगे बढ़ी। इसके अलावा 'शिष्य-परम्परा से भी भगवान् हिरण्यगर्भ प्रकाशित योग की अक्षुण्ण परम्परा आगे बढ़ती रही।
योग की शिष्य-परम्परा:
योग की शिष्य-परम्परा का प्रारम्भिक महत्त्वपूर्ण संकेत मुण्डकोपनिषद् में मिलता है। उसमें कहा है कि देवों में मुख्य देव सर्वप्रथम ब्रह्मा हुये, जो सारे जगत् का कर्त्ता और सब लोकों का रक्षक है। उन्होंने सब विद्याओं में प्रतिष्ठित प्रधान ब्रह्मविद्या अर्थात् योगविद्या अपने ज्येष्ठपुत्र अथर्वन् को कही। अथर्वन् ने अंगिरस् को बताई, अंगिरस् ने भारद्वाज सत्यवाह को बताई। भारद्वाज सत्यवाह से यह एक-दूसरे के बाद परम्परा से चली आ रही है। पवित्रन्त:करण वाले सनक, सनातन, सनन्दन, कपिल, आसुरि, वोढु व पंचशिख आदि विद्वान् सर्वकर्मसंन्यास रूप ब्रह्मयोग अथवा ज्ञानयोग के अनुयायी हुए। यही ब्रह्मयोग कालान्तर में सांख्ययोग, ज्ञानयोग, राजयोग एवं अध्यात्मयोग आदि नामों से प्रसिद्ध हुआ।
योग की कर्मयोग परम्परा:
हिरण्यगर्भ प्रवर्तित योग की दूसरी शाखा कर्मयोग की परम्परा में किञ्चित् व्युत्थित चित्त से युक्त, संसार के कार्यों को करते हुए मोक्ष की ओर अग्रसरित होने वाले विवस्वान्, मनु, इक्ष्वाकु व अन्य राजर्षि हुए। इस शाखा का मूल तात्पर्य यह है कि जो सर्वकर्मसंन्यासी नहीं बन सकता, वह कर्मों का ईश्वर में अर्पण करते हुए कार्य फलों की आसक्ति से रहित व समाहितचित्त होकर परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है। इस शाखा का उल्लेख छान्दोग्योपनिषद् में मिलता है। इसी शाखा का उल्लेख गीता में भी मिलता है।
योगेश्वरश्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं-हे अर्जुन! मैंने (आत्मस्वरूप) किसी नई निष्ठा को अपनाने को नहीं कहा है। तुझे अपना विश्वसनीय मित्र समझ यह लुप्तप्राय सनातन-योग का उत्तम रहस्य बताया है। जब बड़े-बड़े विद्वान्, राजा-महाराजा, ऋषि-महर्षि लोग महाभारत-युद्ध में मारे गये और बहुत से मर गये, तब विद्या और वेदोक्त धर्म का प्रचार नष्ट हो चला। दुर्भाग्यवश महाभारत काल के पश्चात् यह सनातन-योग की परम्परा पुन: यथावत् नहीं रह पायी।
योग में सम्प्रदायवाद व संस्कृति:
वेदोक्तधर्म का प्रचार-प्रसार नष्टप्राय होने से समाज में क्रमश: अलग-अलग मत, पन्थ व सम्प्रदायों की स्थापना होने लगी, जिसे लोग 'धर्म’ समझ बैठे। उसके लिए जीना वे अपना स्वधर्म समझने लगे और अर्थ का अनर्थ करते हुए इस बात को खूब फैलाया कि 'स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:’। यही कारण है कि योग की पावनी परम्परा सम्पूर्ण समाज में अच्छी तरह से फैल नहीं पायी। यद्यपि सभी सम्प्रदायों ने 'योग-संस्कृति’ को सर्वोच्च स्वीकार करके किसी न किसी रूप में इसे आत्मसात् किया, तथापि साम्प्रदायिक आग्रहों की वजह से तथा वेदोक्तधर्म को भलीभाँति न समझ पाने के कारण वे साम्प्रदायिकता के बन्धन नहीं तोड़ पाये। फिर भी सभी सम्प्रदायों के अन्दर विद्यमान उच्च मूल्य एवं मान्यताएँ, तन व अन्त:करण को स्वच्छ रखते हुए जन्म-जन्मान्तरों के बन्धन से छूटने की समग्र अवधारणा तथा साधना की वैज्ञानिक पद्धतियाँ और कुछ न होकर 'योग’ ही है। बाद में महर्षि पतंजलि ने वेद, उपनिषद्, सांख्य आदि वैदिक ग्रन्थों में यत्र-तत्र बिखरी हुई योगविषयक सामग्रियों में से कुछ शब्दश: तथा कुछ किञ्चित् शाब्दिक परिवर्तनों के साथ एक जगह एकत्रित करते हुए क्रमिक तथा सुव्यवस्थित रूप में ग्रन्थबद्ध करने का महान् कार्य किया। तत्पश्चात् पातंजलयोग की गौरवशाली परम्परा समाज में आगे बढ़ती हुई आज हम तक पहुँची है।
विभिन्न सम्प्रदायों में योग परम्परा:
धर्म शाश्वत है, धर्म को धारण करने हेतु अपनायी जाने वाली शाश्वत साधना पद्धति योग है। योग से स्व (चेतना) का निरन्तर विकास (उत्कर्ष) होता है, इसमें किसी बाह्य आलम्बन की जरूरत नहीं पड़ती और यदि पड़ती भी है तो उसका किसी अन्य के साथ कोई मतभेद नहीं होता। योग के मूलतत्त्वों में कोई अन्तर नहीं होता। उसकी विविध सम्प्रदाय अपने-अपने तरीके से व्याख्या करते हैं।
इस प्रकार विभिन्न सम्प्रदायों ने योग की अपने अनुरूप व्याख्या की है; परन्तु मूल स्रोत सभी का एक ही है। योग का लक्ष्य कल्याण है। योग शाश्वत है; लेकिन सम्प्रदाय में शाब्दिक भिन्नता है।
सम्प्रदाय में यौगिक सिद्धान्त, साधना-प्रविधि के साथ-साथ धार्मिक क्रियाकलाप, संस्कार, व्रत, उपवास, त्यौहार व रीति-रिवाज आदि को अपनाया जाता है, जबकि योग में सभी सम्प्रदायों के शाश्वत सिद्धान्त व साधनात्मक पक्ष पर ही ध्यान दिया जाता है न कि रीति-रिवाज आदि पर।
योग का तात्पर्य है-शाश्वत प्रायोगिक प्रविधियों अर्थात् व्यावहारिक विज्ञान। जो सम्यक् दृष्टि अर्थात् दर्शन पर आधारित है। योग साधन और साध्य दोनों ही है, इसमें सार्वभौमिक, सार्वकालिक एवं सार्वजनीन हित समाहित होता है।
वह प्रक्रिया जिसके अभ्यास से व्यक्ति अपने परम लक्ष्य मोक्ष की दिशा में निरन्तर अग्रसर हो; जिसके माध्यम से व्यक्ति की चेतना का ऊर्ध्वारोहण व रूपान्तरण होता हो, जिसे साधने के लिए किसी बाह्य आलम्बनों की आवश्यकता न पड़ती हो, वही योग है। उस प्रक्रिया अर्थात् योग को उस मत, पन्थ, सम्प्रदायादि के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है, यथा-जैनयोग, बौद्धयोग व शैवयोग आदि उसी के स्वरूप हैं।
बौद्ध सम्प्रदाय के अन्दर प्रचलित योग की परम्परा को 'बौद्धयोग-परम्परा’ तथा जैन सम्प्रदाय के अन्दर प्रचलित योग की परम्परा को 'जैनयोग-परम्परा’ कहा जाता है। उपर्युक्त तीनों परम्पराओं की साधना पद्धतियों में शारीरिक क्रियाओं की अपेक्षा मानसिक क्रियाओं को अधिक महत्त्व दिया गया है।
बाइबल एवं कुरान में योगतत्व:
इसी प्रकार बाइबल के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग 'शैलोपदेश’ में कहा गया है कि 'धन्य हैं वे जो धर्म के भूखे और प्यासे हैं एवं जिनके हृदय शुद्ध है, क्योंकि वे तृप्त किए जायेंगे एवं परमेश्वर (गॉड) को देखेंगे।’ इससे यह सिद्ध होता है कि ईसाई सम्प्रदाय में भी योग के मूलभूत तत्त्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।
इस्लाम धर्म की मूलोक्ति है-'अल्लाह एक है, उस एक अल्लाह के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है, तथा मुहम्मद उसी अल्लाह का पैगम्बर (सन्देशवाहक/उपदेशक) है।’ 'अल्लाह वह जीवन्त नित्य सत्ता है, जो जगत् व्यवस्था को सम्भाले हुए हैं, वास्तव में उसके सिवा कोई अन्य सत्ता नहीं है।’ स्पष्टत: इस्लाम का अल्लाह और योग का ईश्वर एक ही प्रतीत होता है। मुसलमानों के पवित्र ग्रन्थ कुरान के अनुसार 'अल्लाह ने ईमान वालों पर यह बहुत बड़ा अहसान किया है, जबकि उनके बीच उन्हीं में से एक 'रसूल’ (अल्लाह या ईश्वर का सन्देशवाहक) उठाया, जो उन्हें उसकी 'आयते सुनाता है। उनकी आत्मा को शुद्ध और विकसित होने का अवसर प्रदान करता है और उन्हें किताब और हिकमत अर्थात् तत्त्वदर्शिता (तत्त्वज्ञान) की शिक्षा देता है, जबकि इससे पहले वे खुली गुमराही में पड़े हुए थे। इस्लाम धर्म के इन मूल तत्त्वों की साम्यता योग तत्त्वों से स्पष्ट ही दृष्टिगोचर होती है। क्योंकि ईमान अर्थात् अस्तेय और शुद्धता यानी शौच एवं हिकमत अर्थात् तत्त्वज्ञान तो योग के प्राण तत्त्व है।
संतों की अपनी योग परम्परा:
भारतवर्ष में समय-समय पर ऐसे महान् व्यक्तित्व भी उत्पन्न हुए हैं, जिन्होंने अपने को किसी भी सम्प्रदाय के साथ जोड़े बगैर ही समाज में अपने सार्वभौमिक व वैज्ञानिक सत्य सिद्धान्तों, मान्यताओं व विचारों को फैलाया। वे समाज में सन्त के रूप में प्रसिद्ध हैं। ऐसे सन्त-समुदाय के अन्दर प्रचलित योग की परम्परा 'सन्तयोग-परम्परा” कहलाती है। इस परम्परा में बहुत सारे सन्त हुए हैं, जिनमें से कुछ लोग शारीरिक क्रियाओं को गौण मानते हैं, तो कुछ लोग इसे दृढ़ता के साथ प्रमुख मानते हैं और कुछ लोग दोनों का समन्वय स्वीकार करते हैं। इनके अलावा शारीरिक क्रियाओं को विशेष महत्ता देकर की जानेवाली योग-साधना की परम्परा भी विकसित हुई है, उनमें से 'हठयोग-परम्परा तथा 'नाथयोग-परम्परा’: का प्रभाव समाज में अधिक देखने को मिलता है। इन प्रमुख योग-परम्पराओं के अतिरिक्त और भी कई प्रकार की योग-परम्पराएँ विकसित होकर पूरी दुनिया के अन्दर फैल रही हैं। जब इस धराधाम में महर्षि दयानन्द का आविर्भाव होता है, तब उन्होंने उस खण्डित ऋषियों की योग-साधना की परम्परा को पुन: मूलाधार से जोड़ने का युगान्तकारी कार्य किया और योग के आधुनिक युग का सूत्रपात किया।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो आज उसी परम्परा में शिक्षित-दीक्षित योगर्षि स्वामी रामदेव जी महाराज ने अपने कठोर तप व पुरुषार्थ से उस योग की परम पावनी परम्परा को देश व दुनियाँ के करोड़ों पुण्यात्माओं तक पहुँचाने का अभूतपूर्व कार्य ही नहीं किया, अपितु वे विश्व के अन्तिम व्यक्ति तक योग को पहुँचाने के लिए प्राणार्पण से कृतसंकल्पित हैं। हमारा अहोभाग्य है कि हमारा जन्म वर्तमान में हुआ, जहाँ चहुँ ओर योग की गंगा कलकल ध्वनि के साथ प्रवाहित हो रही है।
योगमार्ग के सरलीकरण के लिए विभिन्न योगियों ने अपने अनुभव के आधार पर अनेक उपाय सुझाये हैं। उन्होंने पृथक् आचार-मीमांसा की स्थापना की है। सरलीकरण की इसी प्रवृत्ति ने अनेक योग-विधाओं को जन्म दिया। योग-विधाओं के पालन करने और कराने के लिए योगियों ने अपने पृथक्-पृथक् मठ और सम्प्रदाय स्थापित किये हैं। पुरातन शाश्वत योग को अपनाने वाले अनेक सम्प्रदाय आधुनिक समाज में विद्यमान हैं। इनमें से कुछ सम्प्रदाय प्राचीन हैं तथा कुछ मध्यकाल से चले आ रहे हैं। प्राचीन भारत में योग को अपनाने वाले अनेक सम्प्रदायों में से शैव सम्प्रदाय, नाथ सम्प्रदाय, वैष्णव सम्प्रदाय, शाक्त सम्प्रदाय, संन्यासी सम्प्रदाय, कापालिक सम्प्रदाय व अघोर सम्प्रदाय आदि प्रसिद्ध रहे हैं। इन सब में योग की परम्परा अनवरत रूप में चली आ रही है। इसी अक्षुण्ण योग परम्परा के अन्तर्गत विकसित हुई राजयोग, कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग, मन्त्रयोग, लययोग, अष्टांगयोग, हठयोग, समत्वयोग व ध्यानयोग आदि अनेकानेक योग की पद्धतियाँ, जो मोक्ष या कैवल्य प्राप्ति के लिए साधक को अपने-अपने ढंग से सहायता करती हैं।
ऋषि-संस्कृति में योग:
भारतवर्षीय ऋषि-संस्कृति में बहुत-सी ऐसी परम्पराएँ सृष्टि के प्रारम्भ से ही विद्यमान रही हैं, जो मनुष्य की चेतना को उच्चतम बिन्दु की ओर प्रवाहित करते हुए उसे कल्याण के शिखर पर प्रतिष्ठित करती हैं। उन्हीं परम्पराओं में से सर्वोच्च योग-परम्परा का हमेशा से महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है।
इतना ही नहीं, 'योग-परम्परा’ वैदिक सनातन ऋषि-परम्परा, हिन्दू-परम्परा, बौद्ध-परम्परा, जैन-परम्परा, सिद्ध-परम्परा, सन्त-परम्परादि समस्त धर्म, दर्शन, सभ्यता व संस्कृति आधारित परम्पराओं में प्राण रूप में हमेशा से समाहित रही है। योग-साधना को कमोवेश दुनियाँ की सभी परम्पराओं ने अपनाया है। अत: इसका महत्त्व सार्वकालिक व सार्वभौमिक रहा है।
प्राचीन भारतवर्षीय ऋषि-परम्परा में 'योग’ शब्द में जीवात्मा या परमात्मा का संयोग, प्राण और अपान का संयोग, चन्द्र और सूर्य का मिलन, शिव और शक्ति का सामरस्य, चित्तवृत्ति निरोध अथवा अन्य किसी भी प्रकार से उसका लक्षण किया जाए, मूल में विशेष भेद नहीं है। इस प्रकार योग का तात्पर्य है-ससीम को असीम के साथ, क्षुद्र को महान् के साथ, नर को नारायण के साथ, कामना को दिव्य भावना के साथ, स्वार्थ को परमार्थ के साथ जोड़ देना। योगाभ्यास का समूचा पुरुषार्थ साधक को उसी अवस्था के योग्य बनाने के लिए ही निर्मित किया गया है। योग को अपनाकर न जाने कितनों का जीवन धन्य हुआ है एवं वे जीवन के शिखर पर जा पहुँचे हैं। वस्तुत: समस्त धर्म, दर्शन, सभ्यता व संस्कृति जिन सूत्रों पर अपनी यात्रा पूरी करते आये हैं, वे सब योग पर ही आश्रित हैं।
पुरातत्वीय अवशेषों में योग:
सिन्धुकालीन पुरावशेषों में योग से सम्बद्ध कई साक्ष्य मिले हैं। मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मोहर में सींग युक्त त्रिमुखी पुरुष को एक सिंहासन पर योगमुद्रा (पद्मासन) में बैठे दिखाया गया है। मणिबन्ध से भुजा तक उसके दोनों हाथ कंकणों (चूड़ियों) से अलंकृत हैं। उसके दाहिनी तरफ एक हाथी एवं एक बाघ और बायीं तरफ एक गैंडा तथा एक भैंसा खड़े हुए दिखलाये गये हैं। सिंहासन के नीचे दो हिरण खड़े दिखलाये गये हैं। मार्शल महोदय ने इसे ऐतिहासिक योग के प्रथम ज्ञाता शिव का आदिरूप स्वीकार किया है। उस मूर्ति के ऊपर सात अक्षरों का एक अभिलेख है, जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। मोहनजोदड़ो से ही प्राप्त मिट्टी की एक अन्य मोहर पर योगासीन मुद्रा में एक मानवाकृति अंकित है, जिसके अगल-बगल में पुरुष हाथ जोड़े खड़े हैं। इन पुरुषों के पीछे सर्प के फन दिखलाये गये हैं।’ मोहरों पर यौगिक लक्षणों से युक्त चित्रों के अलावा मोहनजोदड़ों से सिलखड़ी की बनी हुई 15 सेन्टीमीटर लम्बी एक पाषाण प्रतिमा भी प्राप्त हुई है, जिसमें यौगिक लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं। इस मूर्ति में प्रदर्शित पुरुष के नेत्र अर्द्धोन्मिलित हैं। नासाग्र दृष्टि के आधार पर इसे योगी की मूर्ति कहा गया है।’ जिससे प्रतीत होता है कि उस समय एकाग्रता (धारणा) के अभ्यास के लिए नासाग्र दृष्टि (अगोचरीमुद्रा) का अभ्यास किया जाता होगा। प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् 'जॉन मार्शल अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि मोहनजोदड़ो में जिस नरदेवता की मूर्ति मिली है, वह त्रिमुखी है, वह देवता पीठासन पर योगमुद्रा में बैठा हुआ है। उसके दोनों पैर इस प्रकार मुड़े हुए हैं कि एड़ी से एड़ी मिल रही है, अंगूठे नीचे की ओर मुड़े हुए हैं एवं हाथ घुटने के ऊपर आगे की ओर फैले हुए हैं। इस तथ्य पर विचार करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सिन्धुकालीन सभ्यता में यौगिक विचारधारा का प्रचलन किसी न किसी रूप में अवश्य रहा होगा। इन्हीं बातों के आधार पर कुछ विद्वानों की मान्यता है कि योग सिन्धुकालीन सभ्यता की देन है। उनकी ऐसी मान्यता इसीलिए बनी थी कि वे सिन्धु-सभ्यता को वेद के पूर्व की सभ्यता मानते थे; लेकिन आधुनिक शोध-अनुसन्धानों से यह स्पष्ट हो गया है कि सिन्धु-सभ्यता वैदिक-सभ्यता के पश्चात् विकसित हुई वेदमूलक सभ्यता है।
सिन्धु-सभ्यता से उपलब्ध पुरातात्त्विक प्रमाणों में योग के क्रियापक्ष का निरूपण मुख्यत: आसन व मुद्राओं के माध्यम से हुआ है। योग-साधना हेतु योगशास्त्रों में वर्णित योगांगों का अभिन्न हिस्सा है-आसन व मुद्रा। साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि सिन्धु सभ्यता में अष्टांग योग व हठयोग आदि योग की विभिन्न पद्धतियाँ प्रचलन में थी।
आधुनिक भारत में योग काल:
योग के इतिहास का आधुनिक काल ही नहीं, भारतीय इतिहास के आधुनिक काल की भी शुरुआत 1857 से ही मानी गयी है। महर्षि दयानन्द सरस्वती के उदय के पश्चात् योग का आधुनिक काल प्रारम्भ हो जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से यह काल प्रारम्भ होकर वर्तमान में भी चल रहा है। आधुनिक काल के योग के आचार्य के रूप में स्वामी दयानन्द सरस्वती (सन् 1824-1883 ई.) का उल्लेख सर्वप्रथम करना उचित होगा। स्वामी दयानन्द जी ने अपने मुख्य ग्रन्थों, यथा-सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय व संस्कार-विधि आदि के माध्यम से योग के सिद्धान्त व साधना से सम्बद्ध भ्रान्त-धारणाओं का खण्डन करते हुए योग के वास्तविक पुरातन आर्ष स्वरूप का निदर्शन कराया। उनके शिष्य स्वामी लक्ष्मणानन्द ने 'ध्यानयोग-प्रकाश’ में उनकी शिक्षा को प्रस्तुत किया है। सन् 1875 से महर्षि दयानन्द द्वारा स्थापित आर्य समाज अपनी हजारों संस्थाओं के माध्यम से देश-विदेश में निरन्तर वैदिक ऋषि-परम्परा पर आधारित योग की शिक्षा दे रहा है। महर्षि दयानन्द के सिद्धान्तों से प्रेरित होकर स्वामी श्रद्धानन्द के द्वारा स्थापित गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय सन् 1902 ई. से ही अनवरत समाज में योग-शिक्षा व वैदिक-शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार कर रहा है। इसी तरह से देश-विदेश में अनेक गुरुकुलों के द्वारा वैदिक-पद्धति पर योग की शिक्षा-दीक्षा दी जा रही है। इन गुरुकुलों से सैकड़ों योग्य योगाचार्य एवं आचार्य निकल चुके हैं, जो समाज में योग की अलख जगा रहे हैं। वर्तमान में विश्व प्रसिद्ध योगर्षि स्वामी रामदेवजी इसी गुरुकुल-परम्परा से ही प्रशिक्षित हैं।
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