श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...
On
चक्रव्यूह
मिथ्या आकर्षणों से मुक्त होकर यदि हम सामान्य विवेक से भी काम लें तो जीवन में आहार-व्यवहार, विचार, खान-पान से लेकर जीवन के हर एक सन्दर्भ में हम सही विकल्प का चुनाव करके एक स्वस्थ, सुखी, सफल, शान्तिमय व आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। यदि जीवन में कोई समर्थ गुरू मिल जाए तो ये सब बहुत आसान हो जाता है।
जीवन में हर एक कदम पर एक गहरा चक्रव्यूह है। शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित्त, विचार व संस्कारों के स्तर पर वैयक्तिक रूप से तथा पारिवारिक, व्यवसायिक, सामाजिक, राजनैतिक व वैश्विक स्तर पर भी एक बहुत बड़ा चक्रव्यूह है। यह अच्छा भी और बुरा भी। यदि हम एकाग्रचित्त होकर प्रसन्नता व पवित्रता के साथ चेतना के सभी स्तरों पर पूर्ण पुरुषार्थ करें और सभी सन्दर्भों में विवेकपूर्ण आचरण करें, तो इन समस्त चक्रव्यूहों को हम भेदकर अपने अन्तिम लक्ष्य सभी अज्ञान या अविवेक पूर्ण कामनाओं से मुक्त होकर जीवन में पूर्णता की अनुभूति कर सकते हैं। यदि हम जागरूक ना हों तो पदे-पदे हमें संकटों, संघर्षों व दु:खों का सामना करना पड़ेगा। शरीर में रोग हो जाए तो हर रोग का अलग डॉक्टर अलग-अलग दवा और उनका दुष्प्रभाव, साथ ही रोगों के कारण दूसरे रोगों के चक्रव्यूह में पड़कर बहुत प्रकार से दु:ख पाते हैं। इसी प्रकार इन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित्त, विचार व संस्कारों का भी एक बहुत बड़ा चक्रव्यूह है। यदि हम विवेकशील व जागरूक होकर आगे नहीं बढ़े, तो अवसाद, तनाव व अशान्ति का कभी भी न खत्म होने वाला चक्रव्यूह प्रारम्भ हो जाता है। जबकि विवेक व वैराग्य पूर्वक जितेन्द्रिय होकर अपने अन्त:करण या चित्त को शुद्ध करके हम इसी जीवन को जीवनमुक्तहोकर जी सकते हैं।
इसी प्रकार सम्बन्धों की ठीक-ठीक समझ, संसार के नियम, कानून व संविधान तथा भगवान् के विधान को यदि ठीक-ठीक समझकर हम प्रतिपल होश में रहें, तो घनघोर संकटों के बीच भी जीवन में संतुलन रखते हुए अपनी मंजिल को हम पा ही लेते हैं।
अत: विवेकशील मनुष्य को जागरूक व सहज होकर अपने स्वधर्म का पूरी पवित्रता से आचरण करना चाहिए।
विकल्प:
कोई कहता है जीवन एक संग्राम है। कोई कहता है जीवन एक अनसुलझी पहेली है, तो कोई जीवन को संकल्प व विकल्पों के बीच सत्य की राह पर आत्म प्रेरणा को आधार बना कर बढ़़ता हुआ अपना अभ्युदय व नि:श्रेयस सिद्ध कर लेता है। दुनिया के इस बाजार में अच्छे व बुरे दोनों ही चीख-चीख कर हमें अपनी ओर रिझाते व बुलाते हैं, चुनाव हमें करना है। शुभाशुभ या पापपुण्य के बीच हम कई बार इसलिए निर्णय नहीं कर पाते, क्योंकि बाहर के बाजार के शोर के बीच आत्मा की पुकार मंद पड़ जाती है। खाने-पीने, पढ़ने-लिखने, देखने-सुनने, पहनने, न पहनने, उठने-बैठने, सोने-जागने से लेकर जीवन के हर पहलू के बारे में अक्सर हम भ्रमित हो जाते हैं। खुशियाँ, सफलता व सुख के झूठे सपने दिखाकर लोग हमें बहका देते हैं और जीवन में हम सही विकल्प का चुनाव या निर्णय नहीं कर पाते और अन्तत: अन्त हीन दु:ख का सफर शुरू हो जाता है।
मिथ्या आकर्षणों से मुक्त होकर यदि हम सामान्य विवेक से भी काम लें तो जीवन में आहार-व्यवहार, विचार, खान-पान से लेकर जीवन के हर एक सन्दर्भ में हम सही विकल्प का चुनाव करके एक स्वस्थ, सुखी, सफल, शान्तिमय व आनन्दमय जीवन जी सकते हैं। यदि जीवन में कोई समर्थ गुरू मिल जाए तो ये सब बहुत आसान हो जाता है।
जीवन का शाश्वत सत्य:
यह सत्य है कि हम शाश्वत के प्रतिनिधि हैं, हम भगवान् की या ऋषि-ऋषिकाओं, वीर-वीराङ्गनाओं की सन्तानें हैं। हम ऋषियों की दिव्य ज्ञान परम्परा व आध्यात्मिक परम्परा के उत्तराधिकारी या प्रतिनिधि हैं, परन्तु अज्ञान व अहंकार के कारण हम अपने मूल स्वरूप, मूल प्रकृति, या मूल स्वभाव से विमुख होकर बार-बार ठोकर खाते हैं और पछताते हैं। भगवान्, माता-पिता या समर्थ गुरुसत्ता के विशेष अनुग्रह और स्वयं के अत्यन्त पुरुषार्थ से ही हम अन्तर्मुखी स्थितप्रज्ञ होकर परम सत्य या शाश्वत सत्य की ओर आगे बढ़ पाते हैं। भगवान् हम सब जीवों को अपनी दिव्य प्रेरणाओं, दिव्य ज्ञान, दिव्य संवेदनाओं एवं दिव्य सामर्थ्य से सदायुक्त रखें, जिससे हम इसी जन्म में जीवन के शाश्वत सत्य को प्राप्त हो सकें।
लेखक
Related Posts
Latest News
01 Mar 2025 17:58:05
With divine inspiration, I want to draw your attention towards 11 important facts. I am sure that you will


