पतंजलि कृषक समृद्धि कार्यक्रम
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रवि आदित्य, भुवनेश्वर राय एवं पवन कुमार,
पतंजलि ऑर्गेनिक रिसर्च इंस्टीट्यूट
भारत हजारों वर्षों से दुनिया में सबसे अधिक कृषि उत्पादन और समृद्ध किसानों का देश रहा है। भारत में परंपरागत कृषि पद्धति वैदिक काल से चली आ रही है। परंतु वर्तमान समय में दुर्भाग्य से हमारी वैज्ञानिकता पूर्ण रासायन आधारित खेती को हरित क्रांति का नाम देकर जो दिव्य स्वप्न हमें दिखाया गया उससे पेट भरने के साधन तो प्राप्त हुए, किन्तु भोजन स्वास्थवर्धक न होकर अनेक रोगों का कारण बन गया। सत्य यही है की आज देश के लाखों लोग विभिन्न प्रकार की जानलेवा बीमारियों से ग्रसित हैं जिसका मुख्य कारण रसायन आधारीत खेती है। महंगे रसायन के कारण जहां किसान की स्थिति दयनीय होती चली गई। इसकी वजह से जलवायु, मिट्टी व पशुओं का चारा, भू-जल भी प्रदूषित व जहरीला होता जा रहा है। जिसके कारण कैंसर जैसे रोगों से पीडि़तों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। इसी स्थिति को देखते हुए परम पूज्य स्वामी रामदेव जी तथा परम श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी के मार्गदर्शन में पतंजलि कृषक समृद्धि कार्यक्रम के माध्यम से धरती माँ को जहरमुक्त करने तथा जैविक कृषि को भारत में पुनर्स्थापित करने का संकल्प लिया है। जिससे परंपरागत खाद्यान को उपजाने की परंपरा जागृत हो सके तथा किसानों को परंपरागत कृषि में प्रशिक्षित करके उनकी उपज तथा आय दोनों में वृद्धि हो तथा शुद्ध, सात्विक और पोष्टिक आहार का सेवन करके देशवासी स्वस्थ और निरोगी बन सके। इसी कार्यक्रम के तहत झारखंड में 2435 किसानों ने और बिहार में 2355 किसानों ने जैविक खेती का प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूर्ण किया।

जैविक खेती और उससे किसानों के जीवन स्तर में आए बदलाव
जैविक खेती (Organic farming) कृषि की वह विधि है जो संश्लेषित उर्वरकों एवं संश्लेषित कीटनाशकों के न्यूनतम प्रयोग पर आधारित है तथा भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने के लिये फसल चक्र, हरी खाद, कम्पोस्ट आदि का प्रयोग करती है। सन् 1990 के बाद से विश्व में जैविक उत्पादों का बाजार काफी बढ़ा है। जैविक खेती से किसानों के जीवन स्तर में काफी सुधार देखने को मिला है। इसके उदाहरणरूप किसान प्रशिक्षक आशीष कुमार को देखा जा सकता है। श्री आशीष कुमार ने अपनी मेहनत और कर्मनिष्ठा से एक ऐसी दुनिया बनाई है जो पूर्णता जैविक खेती पर निर्भर है। ये मनियाडीह, गांडेय, जिला-गिरिडीह, झारखंड के रहने वाले युवा किसान है। ये युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत के रूप में जाने जाते हैं। इन्होंने अपने 10 एकड़ की जमीन पर पूर्णता जैविक खेती का एक मॉडल तैयार किया है। इसमें ये जैविक खेती से विभिन्न प्रकार की सब्जियां उगाते हैं और गिरिडीह तथा आसपास के शहरों की मंडियों में इन्हें उपलब्ध करवाते हैं। जैविक सब्जियों का अन्य रासायनिक सब्जियों की तुलना में अत्यधिक माँग है, खाने में स्वादिष्ट और सभी पोषक तत्वों से परिपूर्ण होते हैं।

श्री आशीष कुमार जैविक खेती का प्रशिक्षण लेने के बाद घर पर ही जैविक खाद तैयार कर रहे हैं। इनका प्रयोग वे अपने खेतों में सब्जियाँ उगाने में करते हैं। इन्होंने सिंचाई की उत्तम व्यवस्था की हैं। इससे पानी की काफी बचत होती है, साथ ही साथ सिंचाई के लागत में भी कमी आती है। आशीष कुमार बताते हैं वे साल में लगभग 3.50 से 4 लाख तक की लागत अपने फार्म में लगाते हैं और मुनाफे के तौर पर लगभग 7 से 8 लाख तक कमाई कर लेते हैं। यही फार्म इनके पूरे घर परिवार के भरण-पोषण और जीविकोपार्जन का मुख्य जरिया है।

इसी प्रकार सेखा, हजारीबाग के किसान प्रशिक्षक उमेश कुमार मेहता भी जैविक खेती को अपने क्षेत्र मे बढ़ावा दे रहे हैं। उमेश जी ने जैविक खेती में 272 किसानों को प्रशिक्षण दिया है। वे जैविक खेती में युवाओं को जागरूक करने में अहम योगदान दे रहें है। आधुनिक समय में निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या, पर्यावरण प्रदूषण, भूमि की उर्वरा शक्ति का संरक्षण एवं मानव स्वास्थ्य के लिए जैविक खेती की राह अत्यन्त लाभदायक है। मानव जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए नितान्त आवश्यक है कि प्राकृतिक संसाधन प्रदूषित न हों, शुद्ध वातावरण रहे एवं पौष्टिक आहार मिलता रहे। इसके लिये हमें जैविक खेती की कृषि पद्धतियों को अपनाना होगा जो कि हमारे नैसर्गिक संसाधनों एवं मानवीय पर्यावरण को प्रदूषित किये बगैर समस्त जनमानस को खाद्य सामग्री उपलब्ध करा सकेगी तथा हमें खुशहाल जीने की राह दिखा सकेगी।


बिहार में आर्गेनिक ग्रोवर में 2355 किसानों ने सफलतापूर्वक अपने प्रशिक्षण को पूर्ण किया। इसकी शुरुआत पटना स्थित भारत स्वाभिमान ट्रस्ट और कृषि विज्ञान केंद्र, माधोपुर से हुई, जहाँ प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण शुरू हुआ। उसमें उत्तीर्ण किसानों ने अपने अपने क्षेत्रों में मॉडल स्वरूप फार्म लैब की रचना की और उसमें जैविक कृषि की शुरुआत करने के साथ ही अपने क्षेत्र के किसानों को जैविक कृषि का प्रशिक्षण दिया। किसानों ने जैव उर्वरकों से की जाने वाली कृषि और उनसे विकसित हुए फसलों की रूपरेखा और विविधताओं को आत्मसात किया। हमारे किसानों के लिए ये एक अनुठा प्रयोग था, जहाँ वे अपनी पौराणिक पद्धति को मूर्त रूप होते देख रहे थे।

इसकी अगली कड़ी में हमारे कई किसान प्रशिक्षकों ने सराहनीय प्रयोग करते हुए अपनी कृषि प्रयोगशाला में उन्नत जैविक फसलों का उत्पादन किया। इनमें भोजपुर जिले के किसान प्रशिक्षक बिंदेश्वर तिवारी ने जैविक मेथी का सफल उत्पादन किया। और दूसरी ओर वैशाली जिले के किसान प्रशिक्षक अखिलेश कुमार और देवपाल कुमार ने जैविक प्याज, जैविक सब्जियां और सरसों का सर्वाधिक सफलतम और उत्प्रेरक मिसाल लोगों के सामने रखा। आज अखिलेश कुमार और बिंदेश्वर तिवारी ने व्यापारिक विक्रय विकल्प का सहारा लेकर अपने जैव उत्पाद को निकटतम मंडियों और बाजार तक उपलब्ध कराया। आज ये सभी समूह जैविक खेती करने और फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी बनाने की ओर अग्रसर हैं।
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