चक्रव्यूह

सोमा नायर, पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार

पिछले लगभग दो दशकों से, जब से, पतंजलि के रूप में स्वामी रामदेव जी और आचार्य बालकृष्ण जी योग और आयुर्वेद का वर्चस्व पुन: स्थापित करने में लगे हैं तब से कुछ लोग इस का केवल एक ही पक्ष देखने लगे हैं कि जैसे वे आयुर्वेद और योग को केवल इसलिए बढ़ावा देना चाहते हैं ताकि अन्य चिकित्सा पद्धतियों को नीचा दिखा सकें या जैसे उन्होंने सीधे से कोई मोर्चा एलोपैथी के विरुद्ध खोल दिया गया है। अपनी संस्कृति,अपने आयुर्वेद, अपनी जीवन शैली, अपने श्रेष्ठ स्वास्थ्य विज्ञान और अपनी श्रेष्ठ रोगों से मुक्त करने वाले जड़ी बूटी विज्ञान को पुनस्र्थापित करना किसी के विरुद्ध कैसे हो गया? और अगर किसी हानिकारक दवाओं के बारे में, धोखाधड़ी के बारे में आम लोगों को अवगत कराया जाये तो वह किसी के विरुद्ध कैसे हो गया? कोरोनाकाल में और विशेषकर पिछले कुछ महीनों में स्वामीजी के बयान बहुत सुर्खियों में रहे। लोग सत्य पहचानते भी हैं, जानते भी हैं, मानते भी हैं, अनुभव भी करते हैं, बस उससे आँख चुराना चाहते हैं। योग और आयुर्वेद द्वारा जीवन को बिना हानिकारक दवाइयों के इस्तेमाल से स्वस्थ रखा जा सकता है। अगर इस सत्य को पूज्य स्वामी रामदेव जी या पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी सीधे शब्दों में कह दें तो उस पर बवंडर भी खड़े हो जाते हैं। एलोपैथी की लगभग प्रत्येक दवाई के साइड इफेक्ट हैं, यह किसी और को कहने की आवश्यकता नहीं है, यह तो उन दवाईयों के हर पैकेट पर लिखा ही रहता है और आजतक एलोपैथी की कोई ऐसी भी दवाई कदाचित् ही बनी होगी जो ये दावा करे कि इतने महीने या इतने साल उसे खाने पर अमुक रोग जैसे high BP या high cholesterol या हृदय रोग या diabetes या कोई भी अन्य रोग बिलकुल जड़ से ठीक हो सकता है और तब आप इस दवा को छोड़ सकते हैं। अपितु यही कहा जाता है कि अब तो ये दवाई लग गयी और अब ये जीवन भर खानी पड़ेगी। आप बीमारी छोड़ सकते हैं दवा? फिर इलाज क्या है? जीवन भर वो दवाइयां खानी हैं जो एक के बाद एक अन्य दवा को निमंत्रण देती हैं। आज कोई-कोई व्यक्ति तो 10-12 गोलियां तक रोज खाते हैं। बाजार में सन्डे से लेकर अगले सन्डे तक के नाम के साथ पैकेट बना कर लोगों को दिए जाते हैं। ये हम किस दिशा में जा रहे हैं? और दु: तो यह है कि सारी मानवता ही लगभग एक ही दिशा में चल पड़ी है।
यह बिलकुल सत्य है कि एलोपैथी आज के समय की सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली इलाज पद्धति है।
इसकी उपयोगिता से इंकार नहीं किया जा सकता। रोग की कुछ एक स्थितियों में तो यह एकमात्र विकल्प भी है और जान भी बचाता है परन्तु इस बात से भी इंकार नही किया जा सकता कि जब कोई भी विधा या व्यक्ति अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है तो उस के दुष्परिणाम होते हैं। आज एलोपैथी के डाक्टरों, दवाई बनाने वाली कम्पनियों और उसे बेचने वाले सौदागरों ने अंधाधुंध पैसा कमाने को ही अपना लक्ष्य बना लिया लगता है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि प्राइवेट प्रेक्टिस करने वाले डाक्टर दिनों दिन अमीर होते जा रहे हैं। उनके लाइफ स्टाइल में अन्य लोगों के मुकाबले बहुत अंतर हो गया है। सामान्यत: डाक्टरों को अपनी आमदनी का अंदाजा है तभी वे अपने बच्चों को केवल इसी पेशे में डालना चाहते हैं। अधिक से अधिक पैसा कमाने की अंधाधुंध दौड़ में उन्हें भी डालना चाहते हैं। उसके मूल में मानव कल्याण की भावना तो कहीं दिखाई नहीं देती। ड्रग कम्पनियाँ एक के बाद एक और खुलती जा रही हैं। दवाईयां एक के बाद एक और बनती जा रही हैं। लेबोरेट्री में नये-नये टेस्ट और नई-नई तकनीक रोज रही है। एक के बाद एक नया रोग उत्पन्न हो रहा है-
एलोपैथीनाम 1810 में Samuel Hahnemann (1755-1843) ने दिया था। वे होमियोपैथी के डाक्टर थे और वे इसे होमियोपैथी से अलग करना चाहते थे। यह ग्रीक शब्द Allo- अर्थात Opposite और Pathos –अर्थात To Suffer से बना है। एलोपैथी का प्रारम्भ भी प्रकृतिदत पेड़-पौधों से ही दवा निकालने से हुआ था जैसे मोर्फिन दवा को ओपियम से निकाला गया था और एस्पिरीन को Willow bark से निकाला गया। परन्तु धीरे-धीरे यह दवा की मानव प्रकृति और प्रकृति दोनों से दूर होती गई।
एलोपैथी ने रोगी पर ध्यान दे कर रोग पर ही ध्यान केन्द्रित कर दिया परहेज को इलाज से बिल्कुल ही निकाल दिया गया। परहेज इलाज की पहली सीढ़ी है। लेकिन एलोपैथी के किसी भी डाक्टर के पास चले जाएँ, परहेज की बात ही नहीं करते। अगर भोजन के पचने की बात करें तो अपाच्य की स्थिति में सबसे पहले क्या होना चाहिए, यानि व्रत करना चाहिए, ताजे  फल और सब्जियां लेने चाहिए, मिर्च मसालों से परहेज करनी चाहिए परन्तु यह सब छोडक़र ज़ोर दिया गया कि गोली खा ली जाये। कितने ही रोग केवल अपना जीने का तरीका सुधारने से ही ठीक हो सकते हैं। इस बात पर लोगों को शिक्षित करने की अपेक्षा बिना लाइफ स्टाइल में परिवर्तन किये, केवल दवा खाने पर ही ज़ोर दिया गया। फॉलो-अप के नाम पर एक के बाद एक दवाई देने का प्रचलन हो गया। क्या सचमुच डाक्टर लोग नहीं जानते कि अधिकतर बिमारियों में शरीर को अंदरूनी सफाई, उचित भोजन और उचित  व्यायाम की आवश्यकता होती है?
लोगों को गोली दवाई खाना सरल लगा। पेट में गड़बड़ी होने पर उपवास करना, खिचड़ी, दलिया खाना, टहलना आदि सब झंझट हट गये। मजे से भोजन भी खाओ और गोली भी। पहले का मल अंदर सड़ता रहे परवाह नहीं।
सिरदर्द है? कोई भी कारण हो- अपच से हो, अनिद्रा से हो, चिंता से हो, थकान से हो या धूप से हो, सभी तरह के सर दर्द के लिए एक ही गोली? सभी तरह के सर दर्द के लिए एक सी गोली कैसे हो सकती है?
 
ये केवल कुछ उदाहरण हैं-
  • ये देखा ही नहीं जाता कि मेरे पेट में दर्द अधिक खाने से हो सकता है और आपके पेट में खाने से।
  • मेरा सिरदर्द ठण्ड लगने से हो सकता है, आपका गर्मी लगने से।
  • मेरी कमर में दर्द कप्यूटर पर अधिक देर काम करने से हो सकता है, आपका भारी सामान उठाने से- तो आपका और मेरा इलाज एक ही तरह कैसे हो सकता है।
  • बच्चों को खांसी जुकाम हो तो ठंडे पेय बंद करने, गार्गल करने या कोई भी अन्य सलाह देने की अपेक्षा आज सीधे बस खांसी का सिरप पिलाओ।
  • शरीर में जरा सा भी कुछ होने पर बस गोली अंदर।
 हम अपने पांव पर कुल्हाड़ी नहीं बड़े-बड़े कुल्हाड़े चलाने लगे। अस्पताल ज्यादा खुले तो हम प्रसन्न हुए, ये नहीं सोचा कि वृद्धि रोगियों में हुई, रोगी बढ़े हैं तभी तो डाक्टर, मेडिकल स्टोर, अस्पतालों का अम्बार लग गया है। इसके साथ एक सुरक्षित गेम भी खेला गया जिस से किसी को दवाई देने में असत्य का बोझ भी मन पर रहे। हर दवाई के साथ उसके साइड इफ़ेक्ट भी लिखे जाने लगे और इस से तो यह बात भी पक्की कर दी गई कि हमारे साथ कोई धोका नहीं हो रहा। हमें ज्ञात है कि हम जो दवाई खा रहे हैं उसके दुष्परिणाम हो सकते हैं। यानि पेन किलर खायेंगे तो लीवर या किडनी पर बुरा असर हो सकता है।
स्पेशियलाईजेशन का तो हाल पूछो- कान, नाक, आंख, किडनी, हार्ट- आदमी के जितने अंग नहीं उतने स्पेशिलिस्ट किसी भी विषय को ध्यानपूर्वक और विस्तार में जानना अच्छी बात है परतु मनुष्य के शरीर को मात्र मशीन मानकर, उस के अंग-अंग को पुर्जे ही मान लेना तो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। मनुष्य के शरीर में प्राण हैं और उस प्राण के बना सभी पुर्जे व्यर्थ हैं। प्राण के बिना उनका इलाज हो ही नहीं सकता।
आज एलोपैथी के अतिप्रयोग, अनावश्यक प्रयोग और अनुचित प्रयोग पर केवल भारत ही नहीं पूरे संसार में आवाज उठ रही  है और यह उनको अच्छा नहीं लग रहा है। भारत में इस बात को अगर निडर होकर स्वामी रामदेव जी उठाते हैं तो उस पर हंगामा होना आवश्यक है। मैं अपने आगामी कुछ लेखों में एलोपैथी के कुप्रयोग पर एलोपैथी के ही डाक्टरों द्वारा उठाये गये प्रश्न और उन के द्वारा बोले गये सत्य पर बात करूंगी।
मेरा अभिप्राय किसी विशेष डाक्टर या किसी अस्पताल के प्रति नहीं है अपितु जो एक जाल हम अपने चारों तरफ इलाज के नाम से बुन रहे हैं उस पर सवाल है। अगर किसी के पास उत्तर हो तो अवश्य दें और हमें हमारे प्रश्नों की त्रुटियों से अवगत करायें।
चलिए आज बात करते हैं कि किस तरह भय दिखा कर और मनुष्य की भावनाओं से खेल कर अस्पताल डाक्टर और दवाई कम्पनियां अपना उल्लू सीधा करते है। इसमें दो ही लक्ष्य प्रमुख रहते हैं कि धन मिले और धन मिलता रहे। यानि मरीज कभी भी टेस्ट और दवाई के चक्कर से बाहर आये। बीमारी का रिश्ता कायम रहे जो भी दवाई लगे वह जीवन भर खानी पड़े ताकि दवा कम्पनियाँ फलती फूलती रहें।
डॉ. JOHN C NORDT एक जाने माने ओर्थपेडीक स्पाइन सर्जन है जो पिछले चालीस वर्षों से स्पाइन की सर्जरी कर रहे हैं। उन्होंने अपना जीवन स्पाइन की specialisation में लगा दिया है उनका क्लिनिक Maimi फ्लोरिडा में है और वे रीढ़ की हड्डी से सम्बन्धित होने वाले सभी रोगों का इलाज करते है। उन्होंने यू-ट्यूब पर एक बड़ा खुलासा किया। उनका कहना है कि आजकल के डाक्टरों के पास विशेषकर surgeons के पास लाइसेंस है रोगियों को नुकसान पहुँचाने का।
वे कहते हैं कि कमर दर्द जीवन में कभी कभी सभी को हो सकता है परन्तु कमर दर्द के रोगी डाक्टरों के पास आते ही, डाक्टर साधारण रोग को भी जाँच के नाम पर बहुत ही सीरियस
condition बता देते हैं। वे टेस्ट पर टेस्ट लिखने लगते हैं। रोगी के मस्तिष्क में रोग की भयंकरता की हजारों तरंगे छोड़ दी जाती है।
धड़ल्ले से रोगियों को MRI करने की सलाह दी जाती है। ऐसा लगने लगता है जैसे यह कमर दर्द साधारण तो बिलकुल हो ही नहीं सकता।
वे कहते है MRI एक बहुत एडवांस और कारगर technique है। वह जीवन बचा सकती है परन्तु उस का इस्तेमाल गलत हो रहा है। बहुत से केस में इस की कोई आवश्यकता ही नहीं होती।
उनका कहना है कि डाक्टर और डाक्टरी से जुड़ा सिस्टम बहुत ही खराब हो गया है। अगर राह चलते स्वस्थ व्यक्ति की जिसको कोई कमर दर्द नहीं है की भी MRI की जाये तो उसमें भी कुछ कुछ अब्नोर्मलिटी मिल जाएगी। परन्तु अधिक से अधिक टेस्ट लिखकर डाक्टर अस्पताल के प्रति अपना उत्तरदायित्व पूरा करता है। रोगी को लगता है कि डाक्टर कितना अच्छा है, कितना ख्याल रख रहा है। बहुत कम लोग जानते हैं कि अस्पताल और सिस्टम डॉक्टर्स को उकसाता है कि जिन रोगियों को साधारण जाँच द्वारा भी परीक्षण किया जा सकता है उनके ज्यादा से ज्यादा टेस्ट करो। डॉक्टर जॉन सी. कहते हैं कि उन्होंने अनेकों ऐसे केस देखे हैं जिनमें ऑपरेशन की कोई जरूरत नहीं थी, परन्तु डाक्टर रिपोर्ट सामने रख कर ऐसे बात करते हैं कि रोगी डर जाता है। बड़ी चालाकी से बताया जाता है कि अगर आपरेशन करवाया तो आप बिलकुल बिस्तर पर जा सकते हैं, मर्जी आपकी है। मरीज की कोई मर्जी नहीं होती उसे मानसिक रूप से पहले ही अपरोक्ष तरीके से इतना डरा दिया जाता है कि उसे आपरेशन करवा लेने में  ही भलाई दिखती है। वह यह भी नहीं देखता कि बिस्तर पर तो वह सर्जरी के बाद भी लग सकता है। भय और एंग्जायटी बहुत  बड़ा रोल प्ले करते हैं। अगर किसी को कहा जाये कि आपकी तो नर्व पिंच कर रही है, अगर ज्यादा पिंच कर गयी तो आप को पैरालिसिस भी हो सकता है। आपने ऑपरेशन करवाया तो कुछ भी हो सकता है। आपको ऑपरेशन करवाने के कितने ही डर दिखा दिए जाते हैं।
कुछ केस में आपरेशन जरूरी हो सकता है परन्तु उन्होंने अनेक ऐसे ऑपरेशन देखे हैं जिनकी बिलकुल जरुरत नहीं थी। फार्म पहले ही भरा लिया जाता है कि अगर कोई गड़बड़ हो गयी तो अस्पताल और डाक्टर की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।
सर्जरी के बाद शुरू होता है ड्रग्स का सिलसिला- गोलियां, इंजेक्शन, फिर से टेस्ट, गोलियां और इंजेक्शन। मासिक या वार्षिक फोलो-अप।
डाक्टर जॉन कहते हैं कि ये बात सबको मालूम है परन्तु डाक्टर इसलिए नहीं बताते कि उनकी नौकरी चली जाएगी। सभी सर्जन सच जानते हैं परन्तु इस सिस्टम के विरुद्ध आवाज नहीं उठाते। चोर-चोर मौसेरे भाई मिले हुए हैं। डाक्टर को ऑपरेशन से मोटी रकम मिलती है और अस्पताल को उससे भी दस गुणा फायदा होता है। लोग बड़े विश्वास से डाक्टर के पास जाते हैं। यह एक बहुत बड़ा रैकेट है। Insurance कम्पनियाँ और मेडिकल कम्पनियाँ अस्पतालों को कण्ट्रोल करती हैं। डाक्टर जहाँ नौकरी करते हैं वहाँ के प्रशासन को खुश करने के लिए और अपनी नौकरी बचाए रखने के लिए ऐसे बहुत से केसेस में सर्जरी की सलाह दे देते हैं जिसमें इसकी कोई आवश्यकता ही नहीं होती।
ऑपरेशन में लोग जान तक गँवा देते हैं या पैरालिसिस भी हो जाता है। फिर भी रोगी इसी विश्वास के साथ डाक्टर के पास जाता है कि वह उस का भला ही कर रहा है।
वे कहते हैं कि सच बोलने की हिम्मत कोई नहीं कर पाता। सबको अपना लाभ दिखाई देता है
Silence is protecting these surgeons. वे आगे कहते हैं कि MRI में केवल इमेज बनती है और उसी को देख कर ऑपरेशन कर दिया जाता है।
उसमें कोई क्लिनिकल फाइंडिंग नहीं होती। किसी को भी अंदाज नहीं है कि इसके अंदर की बात क्या है। डॉक्टर की इनकम ऑपरेशन पर निर्भर है। अस्पताल और pharmaceuticals को revenue मिलता है। ऊपर से देखने पर लगता है बेचारे डाक्टर को क्या मिलेगा? हमारी सर्जरी से उसको क्या फायदा मिलेगा? हम से क्या ले रहा है? insurance का cover  मिलता है डाक्टर सिस्टम के खिलाफ बोलते ही नहीं। ये हर सर्जन जानता है कि बहुत ही कम केसेस में सर्जरी की जरूरत होती है।
वे कहते हैं जब MRI नहीं हुआ करती थी तब वे अपने क्लिनिक पर रोगी की चाल-ढाल देखते थे। उसके उठने-बैठने का तरीका देखते थे और उस आधार पर रोगियों को सलाह भी देते थे। आजकल कुछ भी नहीं, बस ब्लड टेस्ट और टेस्ट। वे कहते हैं कि उनके कुछ मरीज, जिन्हें वे अच्छी तरह से जानते थे और जिन्हें सर्जरी की कोई जरूरत नहीं थी कुछ डाक्टरों द्वारा उनकी सर्जरी भी की गयी और कुछ तो मर भी गये।
डॉ. जॉन कहते हैं ये किस तरह के डाक्टर हैं जिनको ये भी नहीं पता कि कमर की flexibility बढ़ाने के लिए उन्हें रोगी को exercise बतानी चाहिए, अगर वे उतना भी नहीं जानते तो फिर किस बात के डाक्टर हैं।
 
Back की मोबिलिटी बनाये रखने की technique सिखाई जाये, रोगी को ये बताया जाये कि वह ऑपरेशन से कैसे बच सकते हैं। वे तो उल्टा करते हैं, उन्हें तो अपना पैसा कमाना है।
US की Sweeny Law Firm जो सर्जरी और मेडिकल के insurance सम्बन्धित मामले तय करती है का कहना है कि डाक्टर भला करने की अपेक्षा बुरा अधिक करते हैं। 7.5 मिलियन अनावश्यक ऑपरेशन प्रतिवर्ष किये जाते हैं और अस्पताल में बिना बात एडमिट रखे जाने वाले मरीजों के आंकड़े सालाना 8.9 मिलियन हैं।
Journal of Clinical and Diagnostic Research में Moti Lal Chandu Tayade, Shashank D, Dalvi in "Fundamental Ethical Issues in unnecessary surgical procedures" (pubmd) में कहते हैं पूरे विश्व में किये जाने वाले आपरेशन में 30% से 70%तक आपरेशन अनावश्यक होते हैं।
 

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