शरीर को विषाणु मुक्त बनाता है 'जुकाम’

शरीर को विषाणु मुक्त बनाता है 'जुकाम’

डॉ. नागेन्द्र कुमार नीरज

  जुकाम ऐसा रोग है, जिसकी आज तक दवा तक नहीं खोजी जा सकी। यही नहीं औषधियों के प्रयोग से इस रोग का अधिक जटिल होना अलग रहस्य है। विशेषज्ञों का मानना है कि जुकाम को रोग मानना ही भूल है। यह तो शरीर-सफाई तथा विजातीय टॉक्सिक आर्गेनिज्म के प्रभाव को निष्क्रिय करने की अद्वितीय नैसर्गिक यांत्रिकता है। डॉ. नागेन्द्र नीरज इसी अवधारणा से 'जुकामका विश्लेषण करते हैं।
जुकाम के समय छींक की सामान्य गति प्राय: 100 मील प्रति घण्टा होती है, ताकि नाक में उपस्थित विजातीय विषाणु एवं टॉक्सिक पदार्थ तेजी से निकल कर बाहर जा सकें। कुछ लोगों में यह गति 174 मील प्रति घंटा तक देखी गयी है, मिस्टर रेगिनाल्ड कॉलमैन की छींक अब तक की सबसे अधिक शक्तिशाली 174 मील प्रति घंटा मापी गयी है। चिकित्सक इन्हें एक खास दुर्लभ एवं दुसाध्य प्रकार के साइनस रोग से ग्रस्त मानते हैं। रेगिनाल्ड कॉलमैन के नाक में कई दिनों तक विजातीय मलवा इकट्ठा रहता था, जिसके दबाव एवं उत्तेजना से उन्हें शक्तिशाली छींक आती थी। जब वे छींकते थे तो आसपास के लोगों को महसूस होता था कि कोई अंधड़ तूफान या भूचाल-सा आ गया है। इस रहस्यमय तूफानी छींक की गुत्थी वैज्ञानिक अभी तक नहीं सुलझा सके हैं।
जुकाम यह सूचना देता है कि व्यक्तिकी सुरक्षा-व्यवस्था (इम्यून पॉवर) काफी कमजोर हो गई है और शरीर के अन्दर टॉक्सिक ऑर्गेनिज्म अर्थात् दुश्मन अपना अड्डा जमाने में संलग्र हो गए हैं। आपने देखा होगा कि जब भी आप बीमार होते हैं, तो जिह्वा का स्वाद मारा जाता है और आप उसे उत्तेजित करने के लिए मसालेयुक्तचटपटे आहार शुरू कर देते हैं, नमक की मात्रा बढ़ा देते हैं, गुस्सा, चिड़चिड़ापन तथा कामासक्तिबढ़ जाती है, रात्रि का जागरण बढ़ जाता है, विश्राम नहीं मिल पाता। बेमेल भोजन, वातानुकूलित कमरे, व्यायाम तथा श्रम का अभाव, प्रदूषित हवा में साँस लेना- यही तो चाहिए दुश्मनों को आक्रमण करने के लिए।
62 घंटे का जीवनकाल:
वर्जीनिया विश्वविद्यालय के डॉ. जैक एम. ग्वाल्टनी जूनियर और ओवन हैडली विभिन्न समुदायों पर किए गए अपने शोध कार्यों से इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जुकाम का वायरस पीड़ित व्यक्तिके हाथ द्वारा संक्रमित होता है, न कि चुम्बन, छींक या खाँसी द्वारा। पीड़ित व्यक्तिकहीं हाथ रखे, फिर उस जगह स्वस्थ व्यक्तिहाथ रखे तो वह जुकाम से पीड़ित हो सकता है, क्योंकि जुकाम के वायरस निर्जीव वस्तु पर भी 60 घंटे तक जीवित रहते हैं।
अमेरिका के एक सर्वेक्षण के अनुसार जुकाम के कारण प्रतिवर्ष पाँच करोड़ श्रम-घण्टे बेकार जाते हैं। इससे मुक्तिके लिए डिस्पोजेबल रुमाल तैयार किया गया है। यह टिशू-रुमाल-क्लिनेंक्श की तरह तीन तह का होता है, लेकिन इसकी बीच वाली तह में वायरस अवरोधी सिड्रिक, मेलिक ऐसिड व सोडियम लोरिल सल्फेट नामक तीन रसायन हैं। ये मिनटों में जुकाम के हजारों वायरस को खत्म कर देते हैं।
उम्र बढ़ने के साथ-साथ जुकाम होने की दर कम हो जाती है। मिशिगन विश्वविद्यालय के डॉ. आर्नल्ड मोंटो 11 वर्ष तक 1000 लोगों पर शोध कार्य कर इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि 60 वर्ष की उम्र तक जुकाम होने की संभावना मात्र 0.5 प्रतिशत तक ही रहती है, जबकि जवान तथा बच्चे जुकाम से बार-बार पीड़ित होते हैं, कारण कि बच्चों में रोगों को बाहर करने की तीव्रता ज्यादा है। 20-30 वर्ष के लोग जुकाम-पीड़ित बच्चों के साथ रहने के कारण ज्यादा जुकाम पीड़ित होते हैं।
जो कुछ भी हो, जुकाम की स्थिति में दवा लेकर नैसर्गिक विष-निष्कासन की प्रक्रिया में प्रतिरोध डालना मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं है।
क्यों न लें औषधियाँ:
चिकित्सकजीवन-विरोधी (एण्टीबॉयोटिक्स) औषधियाँ देता है, और ये औषधियाँ दुश्मन-जीवाणुओं के साथ प्रतिरक्षात्मक जीवाणुओं को भी समाप्त करने में लग जाती हैं। शरीर की प्रतिरक्षात्मक व्यवस्था को दवा के पूर्व सिर्फ दुश्मनों से लड़ना पड़ रहा था, दवा लेने पर दूसरा दुश्मन औषधि के रूप में पैदा हो जाता है। शरीर में पहले ही जहर भरा हुआ था। अब औषधियों के जहर, दुश्मनों एवं मित्र कीटाणुओं के मृतअंश के कारण भयंकर मलबा, कूड़ा-कचरा शरीर में जमा हो जाता है, शरीर के सारे संस्थान अधिक विषाक्तहो जाते हैं, शरीर से दुर्गंध आने लगती है। ऐसी स्थिति में यदि रोगी को केवल दवा के सहारे रखा गया और प्राकृतिक चिकित्सा नहीं मिली, तो वह असाध्य दमा, एम्फिजिमा, टी.बी., कैंसर से ग्रस्त हो सकता है। इसलिए जुकाम रूपी खतरे का सायरन बजते ही सचेत हो जाएँ। पर यह अवश्य ध्यान रखें कि जुकाम के रूप में शरीर-शुद्धि के लिए मेहमान आया है। उसे पूर्ण सहयोग कर अपनी प्रतिरक्षात्मक पंक्तिसबल करने में लगें।
औषधि वैज्ञानियों ने जुकाम से लड़ने  के लिए कितनी ही जीवन-विरोधी औषधियाँ, इन्जेक्शन तथा टीके आदि ईजाद किए हैं, लेकिन अभी तक जुकाम पर विजय प्राप्त नहीं हो सकी है। कारण एक को मारने को शस्त्र तैयार होता है, तो दुश्मन दूसरी फौज खड़ी कर लेता है, जिस पर पहले वाला शस्त्र प्रभावी नहीं हो पाता। बताते हैं वर्तमान में जुकाम पैदा करने वाले पृथक्-पृथक् गुण-धर्म वाले विषाणुओं की फौजों की संख्या 200 तक पहुँच चुकी है। इसमें सबसे सशक्तएवं प्रबल 'रानो वायरसफौज की टुकड़ी है। इसकी 113 प्रजातियाँ हैं। 60-70 प्रतिशत जुकाम का कारण 'रानो-वायरसदुश्मन टुकड़ी ही है।
उपचार विधि:
उपचार की दृष्टि से जुकाम के लिए कोई भी अंग्रेजी दवा न लें। पूर्ण विश्राम करें। शरीर के साथ पाचन-संस्थान को भी विश्राम दें। इस दृष्टि से 2-3 दिन नींबू-पानी-शहद प्रत्येक ढ़ाई घंटे के अंतराल पर लेते रहें। पानी का खूब प्रयोग करें। पानी का तापमान शरीर के तापमान के बराबर हो। यदि नींबू+पानी+शहद पर रहना मुश्किल हो तो वैसी स्थिति में नीबू के फल, संतरे, मौसम्मी, चकोतरे से फलाहार करें। नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. लाइनसपालिंग ने जुकाम की सर्वोत्तम औषधि विटामिन-सी माना है।
फलाहार मात्र से ही जुकाम चला जाता है। इसके अतिरिक्त चोकरदार मोटे आटे की रोटी, उबली सब्जी तथा सलाद सुबह के भोजन में तथा सायंकालीन भोजन में सिर्फ फलाहार लें। सूप भी 3-4 बार ले सकते हैं। फलों में सेव, नाशपत्ती, पपीता, खीरा, ककड़ी, तरबूज आदि मौसमानुसार जो भी सब्जी तथा फल मिले, लें। उपचार में पेट की पट्टी आधा घंटा, 20 मिनट गरम-ठण्डा सेक, एनिमा के बाद 20 मिनट गरम पाद स्नान लेने से तीव्र जुकाम में शीघ्र लाभ मिलता है। यह क्रम ५ दिन तक लगातार करें।
उपवास में शरीर को विश्राम मिलता है तथा पाचन, अवशोषण, सात्मीकरण की सारी शक्तिशरीर से जहर निकालने में लग जाती है। फिर 4-5 दिन में ही जुकाम चला जाता है।
अन्य उपाय:
15 दिन तक प्रात:काल कुंजर, जलनेति तथा सूत्रनेति, घृतनेति भी करें। रात्रि को सोते समय (50 ग्राम सरसों का तेल, 1 ग्राम कपूर, आधा नींबू का रस मिलाकर दोनों नाकों में 10-10 बूँद डालकर तेलनेति करें। रात्रि को सोते समय हथेलियों एवं पादतली पर 15-20 मिनट तक सरसों का तेल मसल कर सोयें।) तेलनेति के पहले व बाद में चेहरे का वाष्प स्नान लें। भगोने में नीम तथा नीलगिरी के पत्ते डालकर उबालें। भगोने को स्टूल पर रखकर ऊपर से कम्बल तथा तौलिए से ढँक कर चेहरे, गले, सिर को वाष्प दें। कान में सरसों का तेल डालें तथा नाभि पर भी लगाएँ। तीव्र जुकाम की स्थिति में भी 2-3 बार मुँह में ठण्डा पानी भर कर ठण्डे पानी से 10-15 बार चेहरे पर छींटे मारें। यह उपचार शीघ्र प्रभावी होता है। पतंजलि योगपीठ द्वारा निर्मित औषधियों का प्रयोग शरीर का परिष्करण करके रोग दूर भगाता है।
तीन दिन तक जुकाम नहीं जाए और बुखार भी रहने लगे, तो यह स्थिति इनफ्लुऐंजा या फ्लू बुखार की हो सकती है। 4-5 दिन तक बुखार न उतरे, या जुकाम या बुखार ठीक हो जाने के बाद फिर हो जाय, वह स्थिति न्यूमोनिया और सायनस की है। इस स्थिति में भी रोगी को उपर्युक्त उपचार देने के साथ-साथ चिकित्सक से परामर्श करें।।

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