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मधुमेह, वजन घटाने की दवाओं से पेट में लकवे का जोखिम
सावधान : सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली ओजेम्पिक और वेगोवी दवाओं का मिला दुष्प्रभाव
मधुमेह और वजन घटाने वाली दवाओं की वजह से मरीज को पेट में लकवा भी हो सकता है। यह जानकारी एक चिकित्सा अध्ययन में सामने आई है, जिसमें ओजेम्पिक और वेगोवी जैसी लोकप्रिय मधुमेह और वजन घटाने वाली दवाओं के साइड इफेक्ट पर चर्चा की है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, इन दवाओं से पेट में लकवे के जोखिम को बढ़ावा मिल सकता है, जिसे गैस्ट्रोपैरेसिस भी कहा जाता है। इस स्थिति में पेट की मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं और भोजन की पाचन प्रक्रिया बाधित होने लगती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, वजन कम करने वाली वेगोवी दवा को अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) से मंजूरी प्राप्त है, जबकि ओजेम्पिक पहले से अनुमोदित दवा है। इसका इस्तेमाल टाइप 2 मधुमेह रोगियों में रक्त शर्करा के स्तर को प्रबंधित करने के लिए किया जाता है। हालांकि, ओजेम्पिक को कभी-कभी वजन घटाने के लिए निर्धारित किया जाता है। ये दोनों ही प्रोटीन सेमाग्लूटाइड युक्त इंजेक्शन हैं, जो हार्मोन ग्लूकागन-जैसे पेप्टाइड-1 (जीएलपी-1) के समान हैं। ये दवाएं मतली, उल्टी और दस्त जैसे गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल (जीआई) दुष्प्रभाव पैदा करने के लिए जानी जाती हैं। इस अध्ययन में पेट से संबंधित दुष्प्रभाव पक्षाघात (गैस्ट्रोपैरेसिस) के अलावा इलियस और तीव्र अग्नाशयशोथ का भी पता चला है। कैनसस विश्वविद्यालय के इस अध्ययन को अमेरिका में आयोजित एक सम्मेलन के दौरान प्रस्तुत किया गया।
1.85 लाख मरीजों पर अध्ययन में खुलासा
अध्ययन में एक दिसंबर, 2021 से 30 नवंबर, 2022 के बीच 1.85 लाख मरीजों को शामिल किया और उनमें दवाओं के प्रभावों का विश्लेषण किया गया। इस दौरान करीब आधा फीसदी मरीजों में गैस्ट्रोपैरेसिस देखा गया, जिसके आधार पर शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इन दवाओं के साइड इफेक्ट में से गैस्ट्रोपैरेसिस है, जिसका जोखिम करीब 66 फीसदी तक है। अध्ययन के लेखकों ने यह भी पाया कि जीएलपी-1 एनालॉग-निर्धारित रोगियों में से 0.04 फीसदी ने दवा-प्रेरित अग्नाशयशोथ विकसित किया और अनुमान लगाया कि इस स्थिति का अनुभव करने का जोखिम 350 फीसदी से अधिक बढ़ गया है।
18 फीसदी मरीज प्रभावित
शोधकर्ताओं के मुताबिक, नौ प्रतिशत रोगियों में मतली और उल्टी की काफी अधिक घटना देखी गई, जबकि उनमें से 7.5 फीसदी में गैस्ट्रो-इसोफेजियल रिफ्लक्स रोग (जीईआरडी) के मामले भी मिले। शोधकर्ताओं का कहना है कि दवाओं की वजह से करीब 18 फीसदी मरीजों में कम से कम एक लक्षण मिला है जो गैस्ट्रोपैरेसिस का संकेत देता है।
साभार : अमर उजाला
https://www.amarujala.com/india-news/most-commondiabetes-
and-weight-loose-drugs-pose-risk-of-stomachparalysis-2024-05-28
सोचने-समझने की क्षमता में भी आ रही गिरावट
आइसक्रीम, चिप्स और बर्गर के ज्यादा सेवन से स्ट्रोक का खतरा
शोध के अनुसार, दुनिया में करीब 14 फीसदी वयस्क और 12 फीसदी बच्चे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स की लत के शिकार हैं। इन खाद्य पदार्थों को लेकर लोगों में जो लगाव है वह करीब-करीब शराब और तंबाकू जितना ही बढ़ चुका है।
फ्राइज, चिप्स, बर्गर, कैंडी, सॉफ्ट ड्रिंक और आइसक्रीम जैसे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स यानी बेहद ज्यादा प्रोसेस किए जाने वाले खाद्य पदार्थ लोगों को शारीरिक और दिमागी तौर पर बीमार बना रहे हैं। एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि ऐसे खाद्य पदार्थों के ज्यादा सेवन से सोचने-समझने, पढऩे, सीखने और याद रखने की क्षमता में गिरावट के साथ स्ट्रोक के खतरे बढ़ रहे हैं।
मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल के शोधकर्ताओं के अध्ययन के नतीजे जर्नल न्यूरोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं। यह अध्ययन अमेरिका में 45 वर्ष या उससे अधिक आयु के 30,239 लोगों पर किया गया है। इन पर करीब ग्यारह वर्षों तक नजर रखी गई। शोधकर्ताओं ने इस बात की जांच की है कि उनका कितना भोजन बेहद ज्यादा प्रोसेस किया हुआ था। अध्ययन की शुरुआत में इन सभी लोगों में स्ट्रोक या सोचने-समझने तथा सीखने की क्षमता में गिरावट का कोई इतिहास नहीं था। अध्ययन के अंत तक 768 लोगों में संज्ञानात्मक हानि यानी सोचने समझने की क्षमता में गिरावट देखी गई जबकि 1,108 में स्ट्रोक की समस्या सामने आई।
8 फीसदी बढ़ी स्ट्रोक की समस्या
शोध के अनुसार, दुनिया में करीब 14 फीसदी वयस्क और 12 फीसदी बच्चे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स की लत के शिकार हैं। इन खाद्य पदार्थों को लेकर लोगों में जो लगाव है वह करीब-करीब शराब और तंबाकू जितना ही बढ़ चुका है।
बहुत ज्यादा प्रोसेस किए खाद्य पदार्थों के सेवन में 10 फीसदी के इजाफे से याददाश्त से जुड़ी समस्याओं का खतरा 16 फीसदी तक बढ़ गया। दूसरी ओर बिना प्रोसेस किए भोजन के सेवन से जोखिम 12 फीसदी तक घट गया। इसी तरह इसका सेवन करने से स्ट्रोक का खतरा आठ फीसदी तक बढ़ गया, जबकि कम करने से स्ट्रोक का जोखिम नौ फीसदी तक घट गया।
लोगों को ध्यान देना चाहिए कि वे क्या खा रहे हैं
मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल के प्रोफेसर डॉ. डब्ल्यू टेलर किम्बर्ली का कहना है कि हर व्यक्ति को न केवल इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि वह क्या खा रहा है, बल्कि इस पर भी विचार करना चाहिए कि वह कैसे बनता है। इन खाद्य पदार्थों का सीमित सेवन दिमाग को स्वस्थ रखने में मददगार साबित हो सकता है।
ज्यादा नमक के सेवन से हर साल 30 लाख मौतें
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े भी दर्शाते हैं कि हर साल जरूरत से ज्यादा नमक (सोडियम) का सेवन करने से दुनिया में 30 लाख से ज्यादा लोगों की जान जा रही है। इसके साथ ही इसकी वजह से रक्तचाप और हृदय सम्बन्धी रोगों का खतरा भी बढ़ रहा है।
क्या होते हैं अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स
जब प्राकृतिक तरीके से प्राप्त खाद्य उत्पादों को कई लेवल पर प्रोसेस किया जाता है जिससे वह कई दिनों तक खाने योग्य बने रहें या फिर जब डीप फ्राई करके उनकी कुदरती संरचना को बदल दिया जाता है तो ऐसे खाद्य उत्पादों को अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स कहते हैं। इनमें आमतौर पर चीनी, वसा, नमक ज्यादा और प्रोटीन तथा फाइबर कम होते हैं।
साभार : अमर उजाला
https://www.amarujala.com/lifestyle/fitness/due-to-excessiveconsumption-
of-ice-cream-chips-and-burgers-there-is-a-risk-ofstroke-2024-05-31
सावधान : ज्यादा मीठा खाने से किडनी में पथरी भी हो सकती है
कोल्ड ड्रिंक्स, आइसक्रीम, केक के ज्यादा शौकीन हैं तो सावधान हो जाइए। ज्यादा चीनी वाली चीजें खाने से डायबिटीज का ही खतरा नहीं है, बल्कि इससे किडनी की पथरी होने की आशंका 40% तक बढ़ जाती है। शोध पत्रिका फ्रंटियर्स में छपी रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी और एशियाई मूल के लोगों में ज्यादा चीनी वाली चीजें खाने से किडनी में पथरी होने की आशंका दूसरी जगहों के लोगों से ज्यादा होती है। इस शोध के प्रमुख डॉक्टर शान ईन बताते हैं कि यह पहली बार है, जब मीठे की वजह से किडनी की पथरी का पता चला है। सीमित मात्रा में मीठा खाने से किडनी की पथरी होने से रोक सकते हैं।
शोधार्थियों ने पाया कि जो लोग अपनी ऊर्जा का २५% शुगर से हासिल करते हैं, उन्हें किडनी की पथरी होने की आशंका ८८% ज्यादा होती है, जबकि जिन्हें ऊर्जा का सिर्फ ५% चीनी से लिया है, उनमें इसकी आशंका बहुत कम थी।
गरीबों को किडनी की पथरी की आशंका अमीरों से ज्यादा है
डॉक्टर शान ईन के अनुसार, गरीबों को किडनी की पथरी होने की आशंका अमीरों से ज्यादा होती है। इसकी वजह उनका खाना है। गरीबों का खाना अनियमित होता है और उसमें मीठे की मात्रा ज्यादा होती है। दरअसल उनकी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा मीठी चीजों से आता है। इससे उनमें किडनी की आशंका बढ़ जाती है।
साभार : दैनिक भास्कर
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