शास्त्रों में उक्त यज्ञों के लाभ

शास्त्रों में उक्त यज्ञों के लाभ

स्वामी यज्ञदेव 

पतंजलि संन्यास आश्रम, हरिद्वार

विभिन्न प्रकार के हविद्र्र्रव्यों से विभिन्न विधानों और विभिन्न प्रक्रियाओं मन्त्रों के साथ हवन करने से उनके परिणाम अलग-अलग प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाले होते हैं। जिस प्रकार विभिन्न रोगों की अलग-अलग औषधियाँ, परिचर्या एवं उपचार-विधियाँ अलग-अलग होती हैं, उसी प्रकार अनेक प्रयोजनों के लिये यज्ञों के विनियोग भी भिन्न-भिन्न हैं। प्राचीनकाल में याज्ञिक लोग उन सब विधानों की विस्तृत प्रक्रियाओं को भली प्रकार जानते थे और उनसे समुचित लाभ प्राप्त करते थे। खेद है, कि आज वह वैदिक यज्ञ-विद्या लुप्तप्राय हो रही है। यज्ञों के रहस्यमय विधानों के ज्ञाता अब नगण्य से दिखाई पड़ते हैं। उन विधानों के संकेत मात्र ही यत्र-तत्र उपलब्ध होते हैं, जिनका निर्देश नीचे किया जा रहा है।
भारतीय प्राचीन विज्ञान में रुचि रखने वालों का कर्तव्य है, कि इन रहस्यमय विधानों के शोध के लिए शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक रिति से अनुसंधान करें और पूर्वजों के उस रत्न-भण्डार को जन-समाज के कल्याणार्थ सांगोपांग विधि-व्यवस्था के साथ उपस्थित करें।
यज्ञ के विषय में परम पूज्य श्रद्धेय योगऋषि स्वामी जी महाराज एवं परम श्रद्धेय आयुर्वेद शिरोमणि आचार्यश्री जी महाराज के मार्गदर्शन निर्देशन में आज पतंजलि योगपीठ विशेष रूप से कार्य किया है, और कर रहा है जो आने वाले समय में विश्व के लिए बहुत ही बड़ी देन होगी।
 
काम्य यज्ञों के सम्बन्ध में नीचे कुछ विधि विधानों के शास्त्र प्रमाण के साथ संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे प्राचीनकाल की अनमोल सिद्ध विद्या को हम जान सकेंगे और यज्ञ के प्रति अपनी श्रद्धा, विश्वास और समर्पण निश्चित रूप से बढ़ेगा साथ ही वर्तमान जीवन में विधानात्मक यज्ञ का प्रयोग कर अनेकानेक सिद्धियां, लाभ समस्याओं के समाधान प्राप्त कर पाएंगे।
होमं तिलघृतै: कुर्यात्अहं नाम्ना तु मन्त्रवित्।
अर्क: पलाश खदिरौह्यपामार्गोथ पिप्पल:।।
उदुम्बर शमी दूर्वा कुशाश्च समिध: क्रमात्।
एकैकस्यात्वष्ट शतमष्टाविंशतिरेव धा।।
होतव्या मधु सर्पिभ्यां दध्ना वा पायसेन वा।
सप्तमे त्वम संप्राप्ते नक्तं सूर्य सुतस्यतु।।
यज्ञेन कृत मात्रेण सर्वे शाव्यत्युपद्रवा:
-भवि.पु..प्र. 4. 114 श्लोक 32-40
अर्थ:- अर्क, पलाश, खदिर, अपामार्ग पीपल, उदुम्बर, शमी (छोंकर), दूव, कुशा इन कुशाओं को क्रम से, मन्त्र को जानने वाला, तिल, घी के द्वारा ग्रहों के नाम से हवन करें। एक-एक ग्रह को एक सौ आठ बार अथवा _ाईस बार शहद, घी, दही अथवा खीर से हवन करे। इस प्रकार सातवें दिन रात्रि को सूर्य-पुत्र शनिश्चर का हवन करे। इस प्रकार करने मात्र से सब उपद्रव शान्त हो जाते हैं।
जब ऋषियों ने सूत जी से पूछा, कि हमें अघोर रूप शिवजी की पूजा, प्रतिष्ठा बताइये, तब सूत जी बोले, कि अघोर रूप शिव की पूजा, विधि-विधान से करनी चाहिये, बिना विधि विधान के नहीं।
तथाग्नि पूजां वै कुर्याद्यथा पूजा तथैव च।
सहस्त्रं वा तदर्थं वा शतमष्टोत्तरं तु वा।।
तिलैर्होम: प्रकत्र्तव्यो दधिमध्वाज्य संयुते:
घृतसक्तुमधूनां सर्व दु: प्रमार्जनम्।।
व्याधीनां नाशनं चैव तिल होमस्तु मूतिद:
सहस्त्रण महा भूति: शतेन व्याधि नाशनम्।।
-लिंग पु.. 49 श्लोक 3-5
अर्थ:- जिस प्रकार अघोर रूप शिवजी की पूजा कही है, उसी प्रकार अग्नि की पूजा करनी चाहिए। जैसी पूजा होगी, वैसा ही फल होगा। एक हजार अथवा उससे आधा पाँच सौ अथवा एक सौ आठ बार घी, शहद, दही से मिश्रित तिलों का हवन करना चाहिये।
घृतसक्तुमधु से किया हुआ हवन सब दु:खों को दूर करता है और व्याधियों का नाश करता है। तिलों का हवन वैभव को देता है। एक हजार आहुति देने से अत्यन्त धन-वैभव बढ़ता है। सौ आहुतियों से व्याधि का नाश होता है।
सहस्त्रेण ज्वरो याति क्षीरेण जुहोतियम्।
त्रिकालं मासमेकं तु सहस्त्रं जुहुयात्पय:।।
मासेन सिद्धयते तस्य महा सौभाग्यमुत्तमम्।
सिद्धते चाब्द होमेन क्षौद्राज्यदधि संयुतम्।।
यवक्षीराज्य होमेन जाति तण्डुलकेन वा।
प्रीयते भगवानीशो हाघोर: परमेश्वर:।।
दाप्ना प्रष्टिर्नृपाणां क्षीर होमेन शान्तिकम्।
षण्मासन्तु घृतं हुत्वा सर्व व्याधि विनाशनम्।।
राजयक्ष्मा तिलैहोंमान्नश्यते वत्सरेण तु।
यव होमेन चायुष्य घृतेन जयस्तदा।।
सर्व कुष्ठ क्षयार्थं मधुनाक्तैश्च तण्डुलै:
जुहुयादयुतं नित्यं षण्मासान्नियत: सदा।।
-लिंग पु.. 49 श्लोक 8-13
अर्थ:- एक हजार खीर की आहुतियों से ज्वर नष्ट हो जाता है। एक महीने तक तीनों कालों में खीर क़ी सहस्र आहुतियों से हवन करना चाहिए। एक महीने में सिद्धि हो जाती है और उत्तम सौभाग्य की वृद्धि होती है।
क्षौद्र, घी, दही का हवन एक वर्ष करने से सिद्धि प्राप्त होती है।
यव, खीर, घी अथवा चावलों के हवन से भगवान् शंकर प्रसन्न होते हैं।
दही का हवन करने से राजाओं की पुष्टि होती है।
खीर का हवन शान्ति का देने वाला होता है। : महीने तक घी का हवन करने से सब प्रकार की व्याधियों का नाश हो जाता है।
तिलों का एक वर्ष हवन करने से राजयक्ष्मा का नाश हो जाता है। जौ के हवन से आयु की वृद्धि होती है और घी के हवन करने से जय की प्राप्ति होती है।
सब प्रकार के कष्टों को दूर करने के लिए शहद से मिश्रित चावलों का हवन करना चाहिए। नियमपूर्वक : महीने तक हजार आहुतियों से नित्य प्रतिदिन हवन करें।
ऋषिगणों के ब्रह्म, दैव एवं अग्निहोत्र के सम्बन्ध में पूछने पर सूत जी कहते हैं-
सोमवारे लक्ष्म्यादीन्सम्पदथ यजेद्बुध:
आज्यान्नेन तथा विप्रां सपत्नी कांश्च भोजयेत् 29
काल्यादीन्भौमवारेतु यजेत् रोग प्रशान्तये।
माष मुद्गाढक़ान्नेन ब्राह्मणांञ्चैव भोजयेत् 30
सौम्यवारे तथा विष्णुं दध्यन्नेन यजेद्बुध:
पुत्र मित्र कलत्रादि पुष्टिर्भवति सर्वदा 31
आयुष्यकामो गुरुवारो देवानां पुष्टिसिद्धये।
उपवीतेन वस्त्रेण क्षीराज्येन यजेद् बुध: 32
भोगार्थ भृगुवारेतु यजेद्देवान्समाहित:
षड्रसोपेतमन्नं दद्यात् ब्राह्मण तृप्तये 33
स्त्रीणां तृप्तये तद्वद्देयं वस्त्राादिकं शुभम्।
अपमृत्यु हरे मन्दे रुद्रादीश्च यजेद् बुध: 34
तिल होमेनदानेन तिलान्नेन भोजयेत्।
इत्थंयजच्च विवुधानारोग्यादि फलं लभेत् 35
अर्थ:- जो लक्ष्मी और सम्पत्ति की कामना करते हैं, उन्हें सोमवार के दिन घृतान्न का हवन करके विप्र-पत्नी को खिलाना चाहिए ।।29।।
रोग की शान्ति के लिए तथा कालादि दोष निग्रह के लिए चार सेर माष (उड़द) एवं मूंग से हवन करना चाहिए तथा ब्राह्मण को खिलाना चाहिए ।।30।।
सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र को दधि अन्न से विष्णु भगवान् को आहुति देने से पुत्र, मित्र, स्त्री आदि की परिपुष्टि होती है ।।31।।
आयु वृद्धि की कामना वाले इसकी पुष्टि और सिद्धि के लिए गुरुवार को उपवीत, वस्त्र एवं दूध तथा घृत द्वारा देवों को आहुति प्रदान करते हैं ।।32।।
भोग की प्रवृद्धि के लिए शुक्रवार को शान्त चित्त से देवों के लिए आहुति देनी चाहिए तथा ब्राह्मणों को षड्रस पूरित भोजन कराके तृप्त करना चाहिए ।।33।।
अपमृत्यु से बचने के लिए स्त्रियों को वस्त्रादि से प्रसन्न करके रुद्रयज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए ।।34।।
तिल का हवन और तिल का दान करने तथा तिल का ही भोजन करने से आरोग्य सहित कई प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं ।।35।।
होमात्तिलघृताद्यैश्च धर्म कामार्थ मोक्षद:
पूजामन्त्रान्पठेद्यस्तु मुक्त भोगोदिवं व्रजेत।।
                          -आग्न. पु.. 21 श्लो. 27
अर्थ:- तिल घृतादि का हवन, धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष देने वाला है। अपनी पूजा के मन्त्रों का पठन यानि कि जप करने वाले इस विश्व के भोग पदार्थों का उपभोग कर दिव्य लोकों को जाते हैं।
कदम्ब कलिका होमाद्यक्षिणी सिध्यति ध्रुवम्।
बन्धूक किंशुकादीनि वश्याकर्षीय होमयेत्।।
विल्वं राज्याय लक्ष्म्यर्थं पाटलाञ्चम्पकानपि।
द्मानि चक्रवर्तित्वे भक्ष्य भोज्यानि सम्पदे।।
दूर्वा व्याधिविनाशाय सर्वसत्व वशी कृते:
प्रियंगु पाटली पुष्पं चूतपत्रं ज्वरान्तकम्।।
मृत्युञ्जयो मृत्यु जितस्याद् वृद्धि स्यात्तिलहो पत:
रुद्रशान्ति: सर्वशान्त्या अथ प्रस्तुत मुच्यते।।
-आग्ने. पु.. 81 श्लोक 49-52
अर्थ:- कदम्ब की कलियों के हवन करने से निश्चय पूर्वक यक्षिणी सिद्ध होती है। किसी को वश में करने के लिये बन्धूक किंशुकादि का हवन करना चाहिए।
राज्य-प्राप्ति के लिए विल्व-फलों का हवन करना चाहिए। लक्ष्मी-प्राप्ति के लिये पाटल और चम्पक का हवन करना चाहिए। भक्ष्यभोज्य, सम्पत्ति, और चक्रवर्ती राज्य के लिए कमलों का हवन करना चाहिए। व्याधि नाश के लिये दूब का, सब जीवों को वश में करने के लिये पाटल पुष्पों का, ज्वर दूर करने के लिए आम के पत्तों का, अकाल मृत्यु से बचने के लिए मृत्युञ्जय मन्त्र से हवन, वृद्धि के लिए तिलों का हवन करना चाहिए। रुद्र की शान्ति करने से सबकी शान्ति हो जाती है।
सर्वदाहोम जप्याद्यै: पाठाद्यैश्च रणेजय:
अष्टा विंशभुजाध्येया असिखेटकवत्करौ।।
-आग्ने. पु. अध्याय 134
अर्थ:- हमेशा हवन, जप और पाठ आदि से युद्ध में जय होती है। यज्ञ करते समय, हाथों में खंग और खेटक धारण किये _ाईस भुजाओं वाली दुर्गा देवी का ध्यान करना चाहिए।
श्रीगेहे विष्णु गेहे वा श्रियं पूज्यं धनं लभेत्।
आज्याक्तै स्तण्डुलै लक्षि जुहुयात्खदिरानले।।
राजावश्यो भवेद्व द्धि:श्रीञ्चस्यादुतरोत्तरम्।
सर्षपाभ्योऽभिषेकेण नश्यते सकला ग्रहा:।।
-. पु. . 307 श्लोक 3, 4
अर्थ:- लक्ष्मी के मन्दिर में अथवा विष्णु के मन्दिर में लक्ष्मी जी की यज्ञ से पूजा करके धन को प्राप्त करे। घी से मिले हुए चावलों से खैर की अग्नि में एक लाख हवन करने से राजा वश में होता है और उत्तरोत्तर लक्ष्मी की वृद्धि होती है।
सरसों और पानी के अभिषेक करने से सब ग्रह नष्ट हो जाते हैं।
श्रीकाम: शान्तिकामो वा ग्रह यज्ञं समारभेत्।
वृष्टयायु: पुष्टिकामो वा तथैवाभिचरन्पुन:।।
-. पु.. 164 श्लो. 1
अर्थ:- लक्ष्मी की कामना करने वाला अथवा शान्ति की कामना करने वाला, ग्रहों का हवन करे। वृष्टि, आयु अथवा वृष्टि की कामना करने वाला उसी प्रकार नवग्रहों का हवन करे।
संसाध्येशानमन्त्रेण तिलहोमो वशीकर:
जय पद्मास्तु दूर्वाभि: शान्तिकाम: पलाशजै:।।
पुष्टि:स्यात्काक पक्षेण मृतिर्द्वषादिकं भवेत्।
ग्रहक्षुद्रभयापत्तिं जवमेव मनुर्भवेत्।।
-आग्ने. पु.. 307 श्लोक 20, 21
अर्थ:- सिद्ध किये हुए ईशान मन्त्र से तिलों का हवन करने से सब वश में होते हैं। कमलों के हवन से जय की प्राप्ति होती है। शान्ति की कामना करने वाले दूब का हवन करें। पलाश के फूलों का हवन करने से पुष्टि होती है। काक पक्ष से सब दोषादिकों का अन्त होता है। क्षुद्रग्रह, भय, आपत्ति मानों सब नष्ट हो जाती हैं।
पुष्पं क्षिपाययेच्छिश्य मानयेदग्नि कुण्डकम्।
यवैद्धान्यस्तिलै: राज्यो मूलविद्या शतं हुनेत्।।
स्थावरत्वं पुरा होमं सरीसृपमत: परम।
पक्षिमृग पशुत्वं मानुषं ब्राह्ममेव च।।
विष्णुत्वञ्चैव रुद्रत्वमन्ते पुर्णाहुतिर्भवेत्।
एकयाचैवह्याहुत्या शिष्यस्याद्दीक्षितो भवेत्।।
मोक्षं यतिपरं स्थानं यद्गत्वा निवर्त्तते।
यथा जले जलं क्षिप्तं जलंदेही शिवस्तथा।।
अर्थ:- पुष्पों को क्षेपण करावे, शिष्य से अग्नि मँगावें, यव, धान्य, तिल, घी इत्यादि के द्वारा मूल मन्त्र से सौ आहुति दें।
पहले स्थावरों के लिए हवन करें, सरीसृपों के लिए, फिर पक्षी, मृग, पशुओं के लिए, मनुष्यों के लिये और ब्रह्म के लिए हवन करें, विष्णु के लिए, रुद्र के लिए हवन करें अन्त में पूर्णाहुति दें।
एक ही आहुति से शिष्य दीक्षित हो जाता है। इस प्रकार वह स्थान जो मोक्ष है, उसको प्राप्त होता है, जहाँ जाकर प्राणी लौटता नहीं।
जिस प्रकार जल में जल को डालने से अलग नहीं होता, उसी प्रकार यह देही जल है और शिव भी जल रूप हैं। देही रूप जल शिव रूपी जल में मिलकर पुन: नहीं लौटता।
चरुणास घृतेनैव केवलं पयसापिवा।
जुहुयात् कालमृत्योर्वा प्रतीकार: प्रकीत्र्तित:।।
-लिं. पु.. 53 श्लो. 4
अर्थ:- घी से युक्त चरु से अथवा केवल दूध से मृत्युञ्जय मन्त्र द्वारा हवन करने से काल तथा मृत्यु का प्रतिकार हो जाता है।
ताबद्धोमं तिलै: कुर्यादच्युताद्र्धनपूर्वकम्।
दीनानाथ जनेभ्यस्तु यजमान: प्रयत्नत:।।20।।
तावच्च भोजनं दद्याद्यावद्वोभं समाचरेत्।
समाप्ते दक्षिणां दद्यात् ऋत्विभ्याश्रद्र्धयान्वित: ।।21।।
यथा ता लाभेन तत: शान्त्युदकेन च।
प्रोक्षयेत्माममध्ये तु व्याधितांन्तुविशेषत: ।।22।।
एवं कृते तु होमस्य पुरस्य नगरस्य च।
राष्ट्रस्य महाभाग राजो जनपदस्य ।।23।।
सर्वयाषा प्रशमनी शान्तिभवति सर्वदा।
मार्कण्डेय उवाच- इत्येतच्छौनक प्रोक्तं कथितं नृपनन्दन।
लक्षहोमादिकविधिं राष्ट्र कार्य सुशान्तिदम् ।।24।।
प्रामे गृहे पुरवाह्यदेशे द्विजैरये यत्नकृत: पुरोविधि:
तत्रापि शान्तिभविता नराणां गवां भृत्यै: सह भूपतेश्च ।।25।।
- नृसिंह पुराण . 25
अर्थ:- जब तक लक्ष संख्यात्मक या कोटि संख्यात्मक हवन हो, उस काल तक भगवान का पूजन करके तिल के द्वारा हवन करना चाहिए। यजमान दीन तथा अनाथ मनुष्यों को भोजन करावे तथा यज्ञान्त में ऋत्विजों को पुष्कल दक्षिणा देवे और कलशोदक से शान्तिमन्त्रों का पाठ करते हुए ग्राम के मध्य में प्रोक्षण करना चाहिए तथा व्याधियुक्त दुखी मनुष्यों को विशेष प्रोक्षित करे। इस प्रकार होम करने पर पुर का, नगर का तथा राष्ट्र, राज्य और उस देश का कल्याण होता है एवं सर्वबाधा को शान्त करने वाली शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है।
 
विधिपूर्वक स्थापित हुई अग्नि में, तीन बार मधु से भिगोये हुए हविष्य, द्राक्षा, केला, मातुलिंग, ईख, नारियल, तिल, जातिफल, आक तथा अन्य मधुरद्रव्यों से दस आवृत्ति सप्तशती के प्रत्येक मन्त्र से हवन करें और एक सहस्र नवार्ण मन्त्र से भी हवन करें। फिर आवरण देवताओं के लिये, उनके नाम मन्त्रों द्वारा हवन करके यथोचित रूप से पूर्णाहुति दें। तत्पश्चात् ब्राह्मणवृन्द देवताओं सहित अग्नि का विसर्जन करें। यजमान को कलश के जल से अभिषिक्त करें। इस प्रकार करने पर जगत् अपने वश में होता है और सभी उपद्रव नष्ट हो जाते हैं।
उपरोक्त कुछ प्रमाणों से यहां पर विभिन्न सिद्धियों के लिए यज्ञों का वर्णन बताया यह एक झलक मात्र है वेदादी प्राचीन ग्रंथो में देखें तो अनेकानेक यज्ञ विधान, यज्ञ के लाभ, यज्ञ की महिमा हमें प्राप्त होती है जो मानव को अतींद्रिय शक्तियों से युक्त करने के साथ ही दृष्ट-अदृष्ट, भौतिक-आध्यात्मिक, लौकिक-पारलौकिक सिद्धिया प्राप्त होती है।
सहस्रंभर: शुचिजिह्नो अग्नि: -ऋग्. 2.9.1
पवित्र ज्वाला वाली यज्ञाग्नि हजारों-हजारों लाभ प्रदान करती है। 

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