भारत के भविष्य के लिए सनातन की उपयोगिता

भारत के भविष्य के लिए सनातन की उपयोगिता

प्रो. कुसुमलता केडिया

सनातन धर्म सम्पूर्ण ब्रह्मांड और इसके अंतर्गत समस्त सृष्टि के आधारभूत ब्रह्माण्डीय नियमों की प्रस्तुति है। दृष्टा ऋषियों के द्वारा इन दिव्य नियमों का साक्षात्कार किया गया है। सनातन धर्म के एक अंग के रूप में मनुष्यों के लिये मानव धर्म का प्रतिपादन किया गया है। जो समस्त मानवों के द्वारा पालनीय है। पालन करने पर अभ्युदय और उत्कर्ष होगा। न करने पर क्षय और अपकर्ष होगा। पालनीय का अर्थ यह नहीं है कि भारत के लोग अन्य समाजों या राष्ट्रों को इसके लिये विवश करने जा रहे हैं, अपितु केवल यह है कि वे उस सत्य का निरंतर स्मरण दिलाते रहेंगे कि मानव जाति के अभ्युदय और उत्कर्ष का यह मार्ग है और क्षय तथा अपकर्ष का मार्ग है धर्म का त्याग।

सनातन धर्म के प्रति भारत की भूमिका -

इस विषय में वर्तमान और भविष्य में भारत की क्या भूमिका होनी चाहिये, यह विचारणीय है। सर्वप्रथम तो स्वयं अपने देश में सनातन धर्म की पुन: प्रतिष्ठा आवश्यक है। बहुत दिनों तक धैर्यपूर्वक कांग्रेस के स्वैराचार को उदार हिन्दुओं ने यह सोचकर समय दिया कि संभवत: किसी भ्रांति में या विदेशी प्रभाव में आकर कांग्रेस धर्मविरोधी आचरण कर रही है। परंतु 1990 ईस्वी के बाद से जब यह स्पष्ट लगने लगा कि कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व योजनापूर्वक भारतवर्ष में सनातन धर्म को नष्ट करने के लिये कार्य कर रहा है तो भारत के मुख्य समाज ने पुनर्विचार किया और 24 वर्षों की दीर्घ अवधि तक विचारमंथन चलता रहा तथा अंत में हिन्दू समाज ने निर्णायक कदम उठाया। 2014 ईस्वी से भारत अपनी स्वाभाविक दिशा की ओर चल पड़ा  है। यह सनातन धर्म की पुनप्र्रतिष्ठा की दिशा है। इससे भारत का वर्तमान तो बेहतर हो ही रहा है, भविष्य के लिये भी पथ प्रशस्त हो रहा है।

सनातन धर्म की प्रतिष्ठा के लिए अनुकूल समय -

वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य सनातन धर्म द्वारा प्रतिपादित मानव धर्म की प्रतिष्ठा के लिये सर्वथा अनुकूल है। यूरो-ईसाई समुदायों के द्वारा शांति-शांति रटते हुये दो-दो विकराल महायुद्ध लड़े गये जिससे सर्वाधिक क्षति स्वयं यूरोप को ही हुई। संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा अमेरिकी महाद्वीप के लूट से संचित असीमित संसाधनों और धन के द्वारा दूसरे महायुद्ध के बाद यूरोप के लिये मास्टर प्लान शुरू किया गया। जिससे इंग्लैंड, फ्रांस आदि दुर्दशा से उबर सके, परन्तु पिछले दिनों पुन: रूस, यूक्रेन की टकराहट से यूरोपीय शांति को भीषण खतरा उत्पन्न कर दिया हैं। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र संघ की उपयोगिता एवं कार्यप्रणाली पर विचारमंथन आवश्यक हो गया है और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों में भी सनातन धर्म में प्रतिपादित मानवधर्म के ही अनुरूप निर्णय प्रक्रिया सुनिश्चित करने का महत्व सामने आ रहा है। पश्चिमी यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका में बहुत ही महत्वपूर्ण और उच्च पदस्थ लोगों ने मध्ययुगीन आस्थाओं को त्यागकर मानवधर्म या मानववाद को अपनाया है और उसी आधार पर अन्तर्राष्ट्रीय व्यवहार सुनिश्चित करने पर बल दे रहे हैं। यह भारत के लिये अत्यधिक महत्वपूर्ण अवसर है कि वह अपने इन सनातन नियमों के पालन के लिये विश्व स्तर पर परिवेश बनाने की पहल करे। सौभाग्यवश इस समय भारत में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी जैसा समर्थ नेतृत्व है और उन्हें वैश्विक स्थितियों तथा मामलों की अद्वितीय समझ है तथा उनके पास एक सक्षम टीम भी है। इसलिये भारत की यह पहल प्रभावशाली हो सकती है।

राष्ट्रों की शक्ति का पुनर्निधारण-

सनानत धर्म के नियमों- सत्य, अहिंसा, संयम, सदाचार, पवित्रता, ऋजुता आदि के आधार पर अन्तर्राष्ट्रीय न्याय व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। मनुष्यों की समानता के सिद्धांत के आधार पर अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों में विभिन्न राष्ट्रों की शक्ति का पुनर्निधारण किया जाना आवश्यक है। वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र संघ में परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों को वीटो पावर दिया गया है जो युद्ध और विध्वंस की शक्ति का महिमामंडन है। वर्तमान में वीटो अधिकार प्राप्त नेशन स्टेट उस अधिकार को त्यागने वाले नहीं हैं। परन्तु उस विषय पर गंभीर चर्चा विश्व मंच पर बार-बार उठाई जा सकती है। इसका नैतिक और कूटनैतिक दोनों प्रकार से दबाव बनेगा।
अधिक महत्वपूर्ण यह है कि मानवीय क्षमता के आधार पर नेशन स्टेट की शक्तियों का पुनर्निधारण किया जाये। अभी की स्थिति यह है कि नेशन स्टेट को इकाई मानकर जो संयुक्त राष्ट्र संघ बना है, उसमें सभी नेशन स्टेट सदस्य रहें, यह बात तो समझ में आती है परन्तु एक हजार या दस हजार मनुष्यों वाले छोटे नेशन स्टेट जैसे वेटिकन सिटी (कुल जनसंख्या 825), सेंट बार्थलेम्यू (10 हजार), सेंट पियरे (6 हजार), सेंट हेलेन (6 हजार) आदि नेशन स्टेट को भी एक वोट प्राप्त है, आईसिल ऑफ मैन (85 हजार), एन्डोरा (77 हजार), डोमिनिका (71 हजार), बरमूडा (62 हजार) आदि को भी एक ही वोट प्राप्त है और बहरीन (15 लाख), कतर (30 लाख), दुबई (35 लाख), कुवैत (44 लाख), संयुक्त अरब अमीरात (99 लाख) को भी एक ही वोट प्राप्त है तथा मैक्सिको (13 करोड़), रूस (15 करोड़), जापान (12 करोड़), संयुक्त राज्य अमेरिका (33 करोड़) को भी एक ही वोट प्राप्त है और 136 करोड़ जनसंख्या वाले भारत को भी एक ही वोट प्राप्त है तथा 150 करोड़ जनसंख्या वाले चीन को भी एक ही वोट प्राप्त है। खुलेआम इस तरह के भेदभाव को ढकने के लिये नेशन स्टेट नाम की एक परिकल्पित इकाई रची गई है जो लगभग 150 वर्ष पूर्व की गई नई परिकल्पना है तथा उसमें भी 1917 से 1950 के बीच अनेक नये नेशन स्टेट संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस के द्वारा बनाये गये हैं। इस तरह मनमाने तौर पर नेशन स्टेट का निर्माण कर फिर उनकी जनसंख्या और शक्ति किसी का भी विचार किये बिना सबको एक-एक इकाई घोषित कर देना अन्यायपूर्ण रणनीति है। निरन्तर जागरूक होती वैश्विक चेतना के संदर्भ में भारत जैसे सशक्त नेतृत्व की पहल होने पर यह अन्यायपूर्ण रणनीति बदलनी पड़ेगी। सनातन मूल्यों के आग्रह से अन्तर्राष्ट्रीय प्रबुद्ध जनमत न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था के लिये निश्चय ही दबाव बनायेगा।

न्यायपूर्ण आधार पर हो संसाधनों और ऊर्जा का व्यय -

इसी प्रकार संसाधनों और ऊर्जा के व्यय के विषय में भी न्यायपूर्ण नीति बनानी होगी। सभी जानते हैं कि स्वयं को विकसित कहने वाले नेशन स्टेट ने विश्व के संसाधनों का 60 प्रतिशत से अधिक उपभोग स्वयं किया है जबकि उनकी कुल जनसंख्या विश्व का 15 प्रतिशत ही है। प्रबुद्ध यूरोप में अब इस बात पर बल दिया जा रहा है कि विश्व के विभिन्न समाजों और देशों का अन्त:सम्बन्ध न्यायपूर्ण आधारों पर विकसित किया जाये। पश्चिमी यूरोपीय अमेरिकी देशों के प्रमुख लोगों और संगठनों के द्वारा शेष विश्व को केवल अपने ही विचारों का गृहीता बनाने की कोशिशों के विरूद्ध प्रबुद्ध जनमत जाग्रत हो रहा है। क्योंकि शेष विश्व स्वयं को केवल गृहीता मानने के तैयार नहीं है। वह स्वयं को दाता भी मानता है। तथ्य तो यह है कि एशिया अफ्रीका के देश आर्थिक संसाधनों सहित अनेक मामलों में दाता ही रहे हैं। पश्चिमी यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका की समृद्धि इन दाता देशों से प्राप्त संसाधनों पर ही संभव हुई है। निश्चय ही यह कार्य पश्चिमी यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा एशिया-अफ्रीका के देशों में अपने समर्थकों को ही सत्ता में लाने की रणनीति के द्वारा संभव हुआ है, परन्तु यह स्थिति बदल रही है और जिस प्रकार भारत में स्वतंत्र नेतृत्व का उदय हुआ है, उसकी छाप भी विश्व में पड़ रही है। ईरान, इराक जैसे मुस्लिम देशों में अपनी इस्लाम पूर्व की प्राचीन संस्कृति के प्रति आत्मगौरव का भाव जाग्रत हो रहा है और स्वयं यूरोप में बहुत बड़े स्तर पर ईसाइयत से पहले की यूरोपीय संस्कृति जो सनातन धर्म का ही क्षेत्रीय रूप थी, उसके विषय में गहरी जिज्ञासा जग गई है और प्राचीन समय में उपास्य देवी-देवताओं की प्रतिष्ठा फिर से हो रही है।
चीन भयंकर उथल-पुथल से गुजर रहा है और अगले कुछ वर्षों में वहाँ एकाधिकारी सत्ता का वर्तमान रूप संभव नहीं रहेगा। तब दक्षिणी मंगोलिया, तिब्बत आदि क्षेत्र अपनी स्वाधीनता को पुन: प्राप्त करेंगे और इसी प्रकार भारत से जुड़े मध्य एशिया के अनेक क्षेत्रों में अपने अतीत का सांस्कृतिक गौरव भाव जग सकता है। इस प्रकार सनातन का आग्रह जागृत विश्व में सर्वस्वीकार्य होगा तथा इससे स्वयं विश्व का भी कल्याण होगा और भारत का यश भी बढ़ेगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सनातन नियमों पर आधारित मैत्रीपूर्ण विश्व ही टिकाऊ वैश्वीकरण का आधार हो सकता है। वस्तुओं, पूंजी, सेवाओं और श्रम के प्रवाह को विभिन्न राष्ट्रों के मध्य बिना किसी बाधा के प्रवाहित होने की व्यवस्था आवश्यक है। वही सच्चा वैश्वीकरण होगा। सनातन की भूमिका इसमें स्पष्ट है और सनातन से भारत और विश्व दोनों का भविष्य उज्जवल होगा। उद्योगवाद एवं अर्थशास्त्र के यूरोपीय विचारों को विश्व के शीर्ष वैज्ञानिक मनुष्य जाति के लिये हानिकारक मानते हैं क्योंकि वे यूरोप द्वारा शेष विश्व के निर्मम शोषण के पक्ष में रचित विचार हैं। इसके स्थान पर हमारे समुद्र, हमारा पर्यावरण, हमारा साझा आकाश और भूमण्डलीय अर्थव्यवस्था तथा हमारे ईको सिस्टम्स सभी कुछ परस्परता और संयमित जीवनशैली के द्वारा ही टिकाऊ विकास का आधार बन सकते हैं। वैज्ञानिकों का बारम्बार यह आग्रह है कि सम्पूर्ण भूमण्डल का समस्त जीवन परस्पर निर्भर और अन्योन्याश्रित है। हमारी पृथ्वी एक जीवन्त संस्थान है और हम मनुष्य के रूप में इस जीवन्त संस्थान का एक जैव अवयव हैं। यह पृथ्वी निरंतर अपने नये-नये विकास को सामने लाती रहती है।
अत: सनातन के नियमों को ही नवीनतम वैज्ञानिक नियम भी माना जा रहा है और इसीलिये सनातन की प्रतिष्ठा और राष्ट्र जीवन में उसका प्रवर्तन भारत के भविष्य के लिये भी उपादेय है और विश्व के सुरक्षित भविष्य के लिये भी उसकी ही उपयोगिता प्रमाणित हो रही है।

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