नेशन स्टेट का संकुचन तथा अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं और निकायों का उभार

नेशन स्टेट का संकुचन तथा अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं और निकायों का उभार

प्रो. कुसुमलता केडिया  

     द्वितीय महायुद्ध के बाद बनी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के विकास के साथ अनेक विषयों और क्षेत्रों में सार्वभौम नेशन स्टेट की सम्प्रभुता का क्षेत्राधिकार सीमित हुआ है। अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों का विकास हुआ है जो अन्तर्राष्ट्रीय संधियों पर हस्ताक्षर करने वाले सभी नेशन स्टेट पर लागू होता है। जैसे- मानवाधिकार के कानून, बालश्रम से संबंधित कानून, विमानों और समुद्री जहाजों के आवागमन से संबंधित अन्तर्राष्ट्रीय कानून, महिलाओं तथा बच्चों से संबंधित अन्तर्राष्ट्रीय कानून, पर्यावरण और नागरिक समूहों के अधिकारों से संबंधित अन्तर्राष्ट्रीय कानून आदि। 20वीं शताब्दी के उत्तराद्र्ध से अनेक दिशाओं में और अनेक विषयों में अन्तर्राष्ट्रीय कानून विकसित हुये हैं क्योंकि आधुनिक जीवन की जटिलता बहुआयामी हुई है। प्रत्येक समाज कतिपय विशेष सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक मूल्यों पर श्रद्धा रखता है और उनके आधार पर समाज व्यवस्था विकसित होती है तथा कानूनी ढांचा भी उसी प्रकार का बनता है। परंतु नये अन्तर्राष्ट्रीय कानून अनेक विषयों में नेशन स्टेट की सम्प्रभुता में हस्तक्षेप करते हैं। वस्तुत: अन्तर्राष्ट्रीय कानून एक अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक व्यवस्था के विचार के साथ ही विकसित हुये हैं। इसी विचार से जुड़ी अन्तर्राष्ट्रीय विधि व्यवस्था को भी विकसित किया जा रहा है। जिसकी मुख्य पहल संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड तथा फ्रांस आदि पश्चिमी यूरोपीय शासकों के द्वारा होती है और अन्य देशों पर भी उनका ही बौद्धिक वर्चस्व निर्णायक है।
अन्तर्राष्ट्रीय कानून एक ऐसे विश्व व समाज को ध्यान में रखकर बनाये जाते हैं जिस समाज की सबसे प्रमुख और निर्णायक संस्थाराज्य’ (दि स्टेट) हो। संयुक्त राज्य अमेरिका तथा पश्चिमी यूरोपीय देशों के वर्चस्व में विश्व स्तर पर ऐसे परिवर्तन लाये गये हैं जिनमें लोगों की आशाओं और आकंाक्षाओं का प्रतिनिधित्व मुख्यत: राज्य ही करने लगा है। उनके जीवन और सम्पत्ति का संरक्षण भी राज्य पर ही निर्भर है। इसीलिए अन्तर्राष्ट्रीय विधि में एक सम्प्रभु इकाई द्वारा अन्य सम्प्रभु इकाई की सीमाओं की समग्रता और अखंडता में हस्तक्षेप को वर्जित किया गया है। विवादों के समाधान में सैन्य बल का प्रयोग न करने के भी अन्तर्राष्ट्रीय नियम बने हैं। इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रत्येक नेशन स्टेट को समान मताधिकार देना भी इसी प्रक्रिया का अंग है। यद्यपि इस प्रक्रिया को लेकर अनेक प्रश्न स्वाभाविक उठते हैं। क्योंकि नेशन स्टेट्स के आकार में बहुत अधिक अंतर है। कुछ नेशन स्टेट्स में केवल कुछ सौ नागरिक हैं तो भारत और चीन जैसे देश हैं जहाँ नागरिकों की संख्या 140 से 150 करोड़ तक है। यूरोप के नेशन स्टेट 4 से 5 करोड़ के आसपास की जनसंख्या वाले हैं। जबकि द्वितीय महायुद्ध के बाद बने पश्चिमी एशिया और मध्यपूर्व के अनेक नेशन स्टेट केवल कुछ लाख जनसंख्या वाले हैं। इस प्रकार नेशन स्टेट को एक इकाई मानकर चल रही अन्तर्राष्ट्रीय संस्थायें मनुष्य के मूल्य के मापन में भीषण भेदभाव करती हुई दिखती हैं। क्योंकि 100 लोगों की एक इकाई और करोड़ों लोगों की भी एक इकाई मानना 100 मनुष्यों को करोड़ों मनुष्यों को मानने जैसा है। अत: इस विधि व्यवस्था में निर्णायक राज्य संस्था ही है, न्याय संस्था नहीं। क्योंकि न्याय की दृष्टि से 100 मनुष्य करोड़ों मनुष्यों के बराबर नहीं हो सकते।
इसके साथ ही विश्व राजनीति को नियंत्रित करने के लिये ही पश्चिमी यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में अन्तर्राष्ट्रीय संस्थायें बनी हैं और वे विभिन्न राज्यों के बीच होने वाले टकरावों को अपने नियंत्रण में रखने का प्रयास करती हैं। यद्यपि इसमें हर बार सफलता नहीं मिलती। सम्प्रभु राष्ट्र अपने स्तर पर युद्ध के निर्णय लेते रहते हैं और अन्तर्राष्ट्रीय संस्थायें उनमें हस्तक्षेप और बीच-बचाव करती रहती हैं। अन्तर्राष्ट्रीय शांति सेना भी इसी प्रयोजन से बनाई गई है कि वह युद्ध विराम का दबाव बनाये और निगरानी रखे।
द्वितीय महायुद्ध के बाद बने नये राज्यों को नियंत्रित रखने का काम तो अन्तर्राष्ट्रीय कानून करता ही है, वह विश्व के सभी नेशन स्टेट की सम्प्रभुता में सीमित हस्तक्षेप भी करता है। क्योंकि बहुत से कानून केवल नेशन स्टेट को एक इकाई मानकर नहीं बनाये गये हैं अपितु वे व्यक्तियों समूहों तथा सार्वजनिक और निजी संस्थाओं से भी सम्बद्ध हैं। पर्यावरण संरक्षण, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार, मानवाधिकार, अन्तर्राष्ट्रीय श्रम, विश्व स्वास्थ्य, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों के लिये बनी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थायें और अन्तरिक्ष के उपयोग और संचार संबंधी विश्व व्यवस्था से जुड़े नियम, ऐसे क्षेत्र हैं जिसके लिये अन्तर्राष्ट्रीय प्रावधान रखे गये हैं जो स्पष्ट रूप से राष्ट्रराज्य की सम्प्रभुता में हस्तक्षेप करते हैं। सम्प्रभु नेशन स्टेट के ऊपर इस तरह अन्तर्राष्ट्रीय नियमों का नियंत्रण उल्लेखनीय सीमा तक बढ़ा है।
उल्लेखनीय है कि विएना कांग्रेस ने 1815 ईस्वी में ही यूरोप की अपनी दशाओं के अनुरूप एक राजनैतिक व्यवस्था और तद्नुरूप अन्तर्राष्ट्रीय विधि व्यवस्था रचे जाने के विषय में निर्णय लिया था। तभी से इस दिशा में पश्चिमी यूरोपीय देश और संयुक्त राज्य अमेरिका संयुक्त रूप से प्रयास कर रहे हैं। इस विषय में पश्चिमी यूरोपीय और अमेरिकी विधिवेत्ताओं में 4 प्रकार की विचार श्रेणियाँ हैं। यथार्थवादी कहे जाने वाले विधिवेत्ताओं के अनुसार एक अराजक अन्तर्राष्ट्रीय सिस्टम में राज्य का मुख्य लक्ष्य होता है स्वयं को जीवित और पुष्ट रखना। इसके लिये वे अपनी सत्ता और अपनी सीमाओं की रक्षा के लिये अपनी शक्ति का अधिकतम उपयोग करते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था जिस सीमा तक राज्यों के हितों का संरक्षण करेगी, वहीं तक वे उससे सहमत होंगे। अत: राज्य केवल उन्हीं व्यवस्थाओं और विधिक प्रतिमानों को स्वीकार करते हैं जो उनकी अपनी शक्ति बढ़ाये और अपेक्षाकृत कमजोर राज्यों पर उनके आधिपत्य को व्यवस्थित रूप दे। इस प्रकार वे अपने हित में जानबूझकर अन्तर्राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करते रहते हैं। इसीलिये अन्तर्राष्ट्रीय कानून केवल उन्हीं क्षेत्रों तक स्वीकार्य हो सकते हैं जहाँ वे राज्यों की प्रभुसत्ता को और स्वायत्ता को बाधित नहीं करें। इस प्रकार वस्तुत: अन्तर्राष्ट्रीय कानून एक उल्लंघन की ही वस्तु बन जाते हैं। इसीलिये उनको बलपूर्वक लागू कराने की व्यवस्था तथा उल्लंघन करने वाले को दंडित करने की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिये।
एक अन्य मत उदारतावाद का है। अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों में उदारतावादी लोग इस मत के हैं कि राज्यों के बीच सहमति का आधार उनकी घरेलू नीतियों से ही निर्धारित होता है। इसीलिये लोकतांत्रिक सरकारें अन्तर्राष्ट्रीय विधि को अधिक सहजता से स्वीकार कर लेती हैं परंतु अलोकतांत्रिक सरकारें इन्हें सहजता से नहीं स्वीकार करतीं। लोकतांत्रिक समाजों में सिविल सोसायटी और प्रशासनतंत्र अनेक स्तरों पर अन्तर्राष्ट्रीय या बहुराष्ट्रीय सहयोग में रूचि रखते हैं। इसीलिये वहाँ अन्तर्राष्ट्रीय विधि की स्वीकृति सहज होती है। उनके बीच आपसी विश्वास का वातावरण सहज होता है।
एक अन्य मत तर्कपूर्ण चयन और खेल के सिद्धांत का है। इस मत को मानने वाले बाजार की शक्तियों पर अधिक भरोसा करते हैं। लोग अपनी पसंद का विस्तार करने की दृृष्टि से तर्कपूर्ण निर्णय लेते हैं। अत: आर्थिक सिद्धांतों के अनुरूप ही अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था होनी चाहिये। अन्तर्राष्ट्रीय विधि का सबसे अधिक प्रभाव और दबाव राज्यों की विदेश नीति पर होता है। इसके लिये अन्तर्राष्ट्रीय विधि की पूरी प्रक्रिया पर अलग-अलग दबाव समूह अपना-अपना प्रभाव और दबाव बढ़ाने का प्रयास करते रहते हैं। मानवाधिकारवादियों, स्त्रीवादियों, पर्यावरणवादियों ओर शांतिवादियों ने अपने-अपने नेशन स्टेट्स  के भीतर रहते हुये भी अन्तर्राष्ट्रीय समुदायों के रूप में स्वयं को संगठित किया है। जो अपने नेशन स्टेट्स पर भी और अन्तर्राष्ट्रीय विधि व्यवस्था पर भी अपने अनुकूल दबाव डालने के लिये कार्य करते रहते हैं। इस प्रकार अनेक प्रभावशाली समुदाय और विचार समूह राष्ट्रों की प्रभुसत्ता और सम्प्रभुता को सीमित करने के लिये कार्यरत हैं।
इस दृष्टि से ही संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई थी और फिर विश्व व्यापार संघ, विश्व स्वास्थ्य संगठन, अन्तर्राष्ट्रीय श्रम न्यायालय, अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय आदि अनेक विश्व संस्थायें बनती चली गई हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना द्वितीय महायुद्ध के बाद की गई। इसके उद्देश्य इसके घोषणापत्र में वर्णित हैं। जिसका पहला ही अनुच्छेद कहता है कि ‘‘संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को कायम रखने के लिये की गई है। शांति को जहाँ भी खतरा हो वहाँ उसकी रोकथाम के लिये प्रयास करने और आक्रामक पक्ष को रोकने तथा शांतिपूर्ण ढंग से समाधान निकालने का प्रयास करने के लिये की गई है। राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित हों और समानता के अधिकार तथा आत्मनिर्णय के सिद्धांत के आधार पर वे परस्पर मैत्रीभाव रखें यह प्रयास करना संयुक्त राष्ट्र संघ का उद्देश्य है। आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक मानवीय व्यवहार से संबंधित सभी क्षेत्रों में अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग के द्वारा समस्याओं के समाधान का प्रयास हमारा लक्ष्य है। राष्ट्रों के साझे हित के लिये विश्व के कल्याण की दृष्टि से राष्ट्रों के बीच सामन्जस्य स्थापित करने का प्रयास हम करेंगे।’’
स्पष्ट है कि ये प्रयोजन बहुत व्यापक हैं और इसके लिये अनेक स्तरों पर अनेक संस्थाओं के माध्यम से काम करना आवश्यक है। संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के अनुच्छेद 2 (7) के अनुसार संयुक्त राष्ट्र संघ अपने सदस्य राष्ट्रों की स्वतंत्रता और सम्प्रभुता को मान्यता देता है। इसीलिये किसी भी राष्ट्र के घरेलू मामलों में वह सामान्यत: हस्तक्षेप नहीं करेगा।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्वयं के और राष्ट्र राज्यों के आचरण के लिये अनेक आदर्श और प्रतिमान निर्धारित किये हैं। संघ के 6 मुख्य अंग हैं - महासभा, सुरक्षा परिषद, आर्थिक एवं सामाजिक परिषद, ट्रस्टीशिप परिषद, सचिवालय तथा अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय।
सुरक्षा परिषद
सुरक्षा परिषद का कार्य है अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा। संयुक्त राष्ट्र संघ के 15 नेशन स्टेट इसके सदस्य हैं। इनमें से 5 इसके स्थायी सदस्य हैं- संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन), रूस, चीन और फ्रांस। इनको वीटो का भी अधिकार प्राप्त है। शेष सदस्य हर 2 वर्ष बाद चुने जाते हैं। इन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के द्वारा चुना जाता है।
1945 ईस्वी में राजनैतिक सत्ता की स्थिति के आधार पर ये देश चुने गये। किसी निर्णय के पक्ष में 9 वोट पडऩे पर वह निर्णय बाध्यकारी होगा। सिद्धांत के रूप में वीटो का अधिकार अन्य सदस्यों को भी उचित समय आने पर किया जा सकता है परन्तु वह प्रक्रिया अत्यन्त जटिल है। सुरक्षा परिषद का विस्तार भी विचाराधीन है।
इसकी तीन स्थायी समितियाँ हैं- प्रक्रिया के नियम बनाने वाले विशेषज्ञों की समिति, प्रशासन की समिति और सुरक्षा परिषद की मीटिंग बुलाने और व्यवस्था करने वाली समिति। इसके साथ ही अनेक तदर्थ समितियाँ भी हैं। सुरक्षा परिषद के निर्णय उसके सभी सदस्यों के लिये बाध्यकारी हैं। शांतिपूर्ण समाधान और बलपूर्ण समाधान दोनों ही विकल्प परिषद के समक्ष होते हैं और दोनों का ही उसे अधिकार है।
महासभा
महासभा ही संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थायी निकाय है। सभी सदस्य राष्ट्र राज्यों के प्रतिनिधि इस महासभा में होते हैं। वर्तमान में 192 राष्ट्र राज्यों के प्रतिनिधि महासभा में हैं। सभी 192 सदस्यों का एक-एक वोट माना जाता है। जबकि सदस्य राष्ट्र राज्यों में आकार, जनसंख्या, संसाधन आदि की दृष्टि से बहुत अधिक विषमता और भिन्नता है। इसके अतिरिक्त जो अन्य तीन प्रमुख अंग हैं वे अपने नाम के अनुरूप विशेष कार्यक्षेत्र से जुड़े हैं और उसी के लिये कार्य करते हैं। स्पष्ट है कि ये सभी संस्थायें राष्ट्र राज्यों की प्रभुसत्ता पर बड़ी सीमा तक हस्तक्षेप करती हैं और कई स्थानों पर उन्हें बाधित करती रहती है।
कतिपय दृष्टांत
इस दृष्टि से कतिपय दृष्टांत उपयोगी होंगे। इस संदर्भ में यह अवश्य ध्यान रखने योग्य है कि ये अन्तर्राष्ट्रीय संस्थायें राष्ट्र राज्यों के समकक्ष नहीं हैं अपितु ये अपने क्षेत्र के विशेषज्ञों के द्वारा शासित होती हैं। इनके लिये संसाधनों का विनिवेश राष्ट्र राज्यों के द्वारा ही किया जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन
1946 ईस्वी में विश्व स्वास्थ्य संगठन की रचना की गई। इसका उद्देश्य प्रारंभ में तो यह घोषित किया गया था कि परमाणु शस्त्रों के प्रयोग का जनस्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा और इसलिये उनके प्रयोग को किस प्रकार रोकने का प्रयास किया जाये। परंतु धीरे-धीरे इसका कार्यक्षेत्र बढ़ता ही गया और यह विश्व में स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सेवाओं की दिशा निर्धारित करने या उसे प्रभावित करने का प्रयास करता है।
यूनेस्को
इसी प्रकार 16 नवंबर 1945 को यूनेस्को की स्थापना की गई। यूनेस्को का पूरा नाम संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन है। यह एक ऐसा संगठन है जो शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति और संचार में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए काम करता है। यूनेस्को का मिशन है- शांति की संस्कृति का निर्माण करें, गरीबी उन्मूलन करें, सतत विकास को बढ़ावा दें और अंतर-सांस्कृतिक संवाद को प्रोत्साहित करें।  
इसका मुख्यालय पेरिस में है। इसके 195 सदस्य और 8 सहयोगी सदस्य हैं।  
यूनेस्को के कुछ उल्लेखनीय कार्यक्रम इस प्रकार हैं:-
1.    सार्वभौमिक कॉपीराइट कन्वेंशन (1952)
2.    मनुष्य और जीवमंडल कार्यक्रम (1971)
3.    विश्व विरासत सम्मेलन (1972)
4.    अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए कन्वेंशन (2003)
यूनेस्को दुनिया भर में सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत की पहचान, सुरक्षा और संरक्षण के लिए भी काम करता है। भारत में 43 यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं, जिनमें असम मेंअहोम राजवंश की टीला-$फनाने की प्रणालीभी शामिल है, जिसे 2024 में जोड़ा गया था।
इस प्रकार स्पष्ट है कि यूनेस्को विभिन्न राष्ट्रों की शिक्षा, संस्कृति और विज्ञान संबंधी नीतियों और कार्यक्रमों को प्रभावित करता है। यद्यपि औपचारिक रूप से तो यह संबंधित राष्ट्रराज्य की सहमति से ही कार्य करता है परंतु इसकी संरचना में ही यूरो ईसाई आस्थायें और मान्यतायें बद्धमूल हैं। अत: भिन्न संस्कृति और भिन्न आस्थाओं वाले समाज पर यूनेस्को के लोग रूपान्तरणकारी प्रभाव डालते हैं जो स्पष्ट रूप से परंतु सूक्ष्म रूप में राष्ट्रराज्य की सम्प्रभुता में हस्तक्षेप है।

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