भगवान् गुरु के द्वारा प्रदत्त अमोघ आश्वासन
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श्रद्धेय गुरुदेव आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज
यह सर्वविदित है कि प्राचीन भारतीय वाङ्मय में 'श्रीमद्भगवद्गीता’ का अपना एक अन्यतम स्थान है। इस ग्रन्थ की पृष्ठभूमि है- मनुष्यों में अग्रगण्य एक अर्जुन जैसे अप्रतिम वीर योद्धा की आध्यात्मिक समस्या। बाहरी तौर पर कोई ऊपर-ऊपर से देखे तो उसे ऐसा लगेगा कि अर्जुन की मात्र एक व्यावहारिक नैतिक समस्या है कि वह अपने चाचा, ताऊ व गुरुजनों के साथ कैसे युद्ध करे। पूज्यजनों का तो वाणी से भी तिरस्कार अशोभनीय माना जाता है और उसे युद्ध करना पड़ रहा है। किन्तु समस्या के मूल में जाकर देखा जाए तो उसकी जड़ें संसार की कारणभूत अविद्या और उससे उत्पन्न मोह व शोक में पायेंगे। गीता शास्त्र के अध्येता को सदा यह बोध बना रहना चाहिए कि यह शास्त्र श्रीकृष्णार्जुन संवाद है और यह शास्त्र मात्र अर्जुन की विशिष्ट समस्या का समाधान करने के लिए नहीं बोला गया है बल्कि अर्जुन जैसी ही चेतना के स्तर पर जीने वाले उन सभी साधक-साधिकाओं के लिए है जो अपने को अविद्या और तज्जन्य शोक-मोह से घिरा हुआ अनुभव कर रहे हैं तथा अर्जुन की तरह ही अपने से किसी बड़ी शक्ति के समक्ष शरणागत होकर समाधान पाने के इच्छुक हैं। जैसा कि गीता के २.७ श्लोक में अर्जुन की मन:स्थिति का यथार्थ स्वरूप ज्ञात हो रहा है-
कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव: पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता:।
यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।।
कार्पण्य (दैन्य) रूप दोष से उपहत (नष्ट) स्वभाव वाला अर्थात् दैन्य दोष से जिसका क्षात्र स्वभाव दब चुका है ऐसा मैं तथा धर्म के विषय में सम्मूढ चित्त वाला अर्थात् कर्तव्य-अकर्तव्य विषय में भ्रान्त हुआ मैं तुमसे पूछता हूँ। हे कृष्ण! मैं तुम्हारा शिष्य हूँ, मुझे शरणागत समझकर इस परिस्थिति में जो मेरे लिए हितकर हो, कर्तव्य हो, वह मुझे बतलाओ।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि 'कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये’ गीता २.४ इत्यादि श्लोकों द्वारा अर्जुन ने पितामह, गुरु, गुरुपुत्र, मित्र, सुहृद्, स्वजन, सम्बन्धी और बान्धवों के विषय में 'अहमेषां ममैते’ 'यह मेरे हैं, मैं इनका हूँ इस प्रकार अज्ञान जनित स्नेह और उसके विच्छेद आदि कारणों से होने वाले अपने शोक और मोह दिखाए हैं। अर्थात् उनमें ममता के कारण जो स्नेह है वह 'मोह’ और इनके साथ स्नेह विच्छेद हो जाने पर अथवा इनके मारे जाने पर जो पातक लगेगा, इसे देखकर हृदय में जो भाव उत्पन्न हो रहा है, वह 'शोक’ नाम से जाना जाता है। तात्पर्य यह है शोक, मोह, अभिमान, ममत्व आदि दोष से घिरे हुए चित्त वाले सभी प्राणियों के द्वारा स्वभावत: स्वधर्म का परित्याग और निषिद्ध का सेवन होने लगता है।
स्वधर्म में प्रवृत्त व्यक्तियों के भी शरीर, मन व वाणी की प्रवृत्ति यदि फलाशापूर्वक और अभिमानपूर्वक हो रही हो तो उससे धर्माधर्म की वृद्धि होगी जिससे इष्ट-अनिष्ट जन्म प्राप्त होगा। फिर तो सुख-दु:ख का प्राप्तिरूप संसार चलता रहेगा, मिटेगा नहीं। जो भी अच्छा लगता है, जहाँ भी लगाव है, मधुर समझकर हम जिसकी ओर आकृष्ट होते हैं, जिसने हमको बाँध रखा है, जो हमारे मुक्त-विहार में बाधक बना हुआ है, उस सबके मूल में मोह होता है और जो कुछ भी वियोग या विछोह के रूप में अथवा किसी पाप या पश्चाताप के रूप में, कड़वाहट की स्मृति के रूप में उपस्थित होता है, जो हमारे हृदय को छीलता रहता है, यहाँ शोक उस सब का उपलक्षण है।
गीता शास्त्र एक अर्थ में द्वापर युग के श्रेष्ठतम पुरुष नर चोले में नारायण की जीवनी है। इस जीवनी को काव्यमय रूप में प्रस्तुत करने वाले हैं-उन्हीं के युग के श्रेष्ठतम मुनि, ज्ञान के सागर, पञ्चम वेद भारत संहिता के रचयिता, सदा सत्य में स्थित, साक्षात् कृतधर्मा, विदितवेदितव्य, अधिगतयाथातथ्य, परापरज्ञ, ब्रह्मसूत्रों के रूप में मानवजाति के लिए अमूल्य धरोहर के प्रदाता, कृष्णद्वैपायन, बादरायण, वेदव्यास आदि अनेक नामों से विदित, अपनी अखण्ड समाधि में लीन, धर्मनिष्ठ तेजस्वी महापुरुष। किसी भी जीवनी के दो प्रमुख हिस्से होते हैं- एक उसका व्यक्तित्व तथा दूसरा कृतित्व अर्थात् जीवन व कार्य। दूसरे शब्दों में कहें तो दृष्टि व स्थिति। जीवनी लेखक को, जिसकी वह जीवनी लिखता है, उसकी दृष्टि समझनी होती है कि वह महान् पुरुष इस अस्तित्व को किस रूप में देखता था या देखता है और उनकी स्वयं की स्थिति कैसी थी? या कैसी है? भगवान् वेदव्यास जी ने भगवान् श्रीकृष्ण के जीवन को अपनी खुली आँखों से देखा, समय-समय पर आपस में मिलते भी थे, चर्चा भी होती थी। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में जब यह समस्या उपस्थित हुई कि इस यज्ञ के श्रेष्ठतम पुरुष के रूप में किसे अघ्र्य दान दिया जाए जिसमें बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, भीष्म, द्रोण, विदुर, वासुदेव तथा स्वयं वेदव्यास इत्यादि सभी महापुरुष उपस्थित थे। ऐसे कठिन समय में स्वयं वेदव्यास जी सामने आये और उन्होंने कहा कि हम सबके लिए ही पूज्यतम व्यक्ति के रूप में श्रीगोविन्द उपस्थित हैं। भगवान् श्रीकृष्ण के जीवन को भगवान् वेदव्यास ने मानवीय दैनन्दिन व्यवहार में परम पुरुष का साक्षात् विग्रहस्वरूप ही देखा। इस प्रकार भगवान् वेदव्यास उनकी दृष्टि और स्थिति से भली प्रकार परिचित थे। उनके व्यक्तित्व व उनके कार्यों को तथा इस समस्त प्रपञ्च के बीच उनकी महिमामय उपस्थिति व स्थिति को देखते थे।
जैसे वैदिक ऋषि अपौरुषेय वेदज्ञान के केवल माध्यम बने हैं, उनके माध्यम से वेदज्ञान धरती पर अवतीर्ण हुआ। उन्होंने अपनी तरफ से उस विशुद्ध ज्ञान में कुछ भी मिलावट नहीं की। इसी प्रकार गीता ज्ञान के संदर्भ में भी यह देखना चाहिए कि अर्जुन की घटना तो केवल निमित्तमात्र है। वह यहाँ मनुष्यमात्र की सभी आध्यात्मिक समस्याओं का प्रतिनिधित्व कर रहा है और उधर भगवान् वेदव्यास भी निमित्त मात्र बने हुए हैं, वस्तुत: तो योगेश्वर भगवान् गुरु ही जीवन की सभी आन्तरिक या आध्यात्मिक समस्याओं का समाधान कर रहे हैं अर्थात् सम्पूर्ण गीताशास्त्र में जो समस्याएँ उठाई गई और उनका जो समाधान किया गया, उसमें अर्थ (विषय-वस्तु) भगवान् गुरु का है और शब्द भगवान् वेदव्यास के। यहाँ यह बात भी कभी भूलनी नहीं चाहिए कि यद्यपि समस्या कालविशेष या देशविशेष में प्रकट हुई दिखती है और उसका समाधान भी काल विशेष या देश विशेष से जुड़ा है किन्तु ध्यान से देखने पर विदित हो जाता है कि देश व काल का अंश तो यहाँ बहुत ही स्वल्प है। समस्या जीवन्त बन जाये, आकारहीन अवस्था में न रहे, देखने वाले को साक्षात् साकार रूप में दिखाई दे, इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए घटना विशेष को पकड़ लिया गया है। भगवान् की वाणी में प्रदत्त समाधान तो कभी पुराना हो ही नहीं सकता। जब तक सूर्य और पृथ्वी रहेगी, मनुष्य रहेंगे, गीता से उनकी समस्याओं का समाधान मिलता रहेगा।
संसार में तीन तरह के लोग दिखाई देते हैं- एक वे हैं जिन्होंने अपनी समस्याओं का समाधान खोज लिया है, समस्याओं से पार चले गये हैं, जिनके जीवन में कोई भी समस्या शेष नहीं बची। सचमुच ऐसे लोग बहुत थोड़े ही होंगे। उनके लिए गीताशास्त्र नहीं है। दूसरे वे लोग हैं जो अर्जुन जैसी स्थिति में हैं, जो अपने आपको समस्याग्रस्त अनुभव कर रहे हैं। जो किंकर्तव्य विमूढ़ हैं, जिनके चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा है किन्तु प्रकाश पाने की तीव्र जिज्ञासा है, ऐसे लोगों के लिए ही गीताशास्त्र है। तीसरे प्रकार के लोगों के लिए भी गीताशास्त्र नहीं है जो अंधकार में होते हुए भी अंधकार का अनुभव नहीं कर पा रहे। पूर्ण रूप से समस्याओं में डूबे हुए हैं किन्तु उन्हें कोई समस्या नहीं दिख रही। बीच-बीच में जीवन के जो सुख मिलते रहते हैं वे उनके लिए इतने आकर्षक होते हैं कि उन्हें इससे ज्यादा और कुछ नहीं चाहिए। कभी-कभी उनके ऊपर दु:खों का पहाड़ जैसा टूट पड़ता है तो भी दु:खों का प्रभाव उनके ऊपर नहीं होता, बस दु:खी होते रहते हैं। सुख की तरफ ताकते रहते हैं, प्रतीक्षारत रहते हैं कि कभी तो हमारे भी अच्छे दिन आयेंगे। दु:ख से पार जाने का विचार उनके मन में नहीं आता। ऐसी स्थिति वाले लोगों को कहते हैं सांसारिक। अर्थात् सुख-दु:ख के भोग में जो रचे-पचे हैं। इन भोगियों के लिए गीताशास्त्र का उपदेश नहीं है। गीता से समाधान पाने के लिए किसी भी व्यक्ति को योग का, भक्ति का, समाधान का या तत्त्वज्ञान का जिज्ञासु होना चाहिए। जितनी जिज्ञासा तीव्र होती है उतना ही यहाँ उसका प्रवेश सहज है।
जिज्ञासा का जागरण उन्हीं लोगों में होता है, जिन्हें भोगों के बड़े से बड़े सुख भी सारहीन नजर आने लगे हैं। जिनको यह निश्चय हो गया कि केवल भोगों का आरम्भ ही सुखदायक है, अन्त तो सदा ही विचारशील के हृदय को जलाता रहता है, विषयों से मिलने वाली तृप्ति बार-बार अतृप्ति में ले जाती है, व्यक्ति को पराधीन बना देती है, विषयों को पाने से पहले जो अभाव की स्थिति होती है, विषय-तृप्ति के उत्तरकाल में भी वही अभाव आकर खड़ा हो जाता है। संसार के सभी बड़े से बड़े सुखों के प्रति जब साधक की यह दृष्टि विकसित हो जाती है तब उसके भीतर जिज्ञासा पैदा होती है कि क्या जीवन का यही रूप है। कभी सुख-कभी दु:ख, कभी हँसना-कभी रोना, कभी हर्ष-कभी शोक या इससे अलग भी कोई रू पहो सकता है। तब वह भगवान्, आत्मा, अत्यन्त दु:खनिवृत्ति, अमृतत्व, मुक्ति, परमशान्ति इत्यादि को पाने के लिए किसी ऐसे आत्मतृप्त गुरु की शरण ग्रहण करता है। गीता के उपदेष्टा जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण ऐसे ही शरण्य हैं जो दु:खहारी बनकर शिष्य के दु:खों को हर लेते हैं, जो शिष्य के लिए ज्ञानी गुरु बनकर शिष्य के अज्ञान को मिटाकर ज्ञान से परिपूर्ण कर देते हैं। जो शिष्य को बन्धन मुक्त कर स्वाधीन बना देते हैं, जो शिष्य के अशान्त मन को शान्त कर देते हैं।
अब हम सबसे पहले अपने पाठकों से यह निवेदन करना चाहेंगे कि वे इस बात पर विचार करें कि लोक व्यवहार में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी जैसा व्यक्ति जब किसी राजनेता को अलग से बुलाकर आश्वासन दे देता है कि आप अपना जोर-शोर से काम कीजिए, आपके लिए अमुक पद सुरक्षित है। इतना सुनते ही वह व्यक्ति उसके पास जो कुछ होता है-तन, मन, धन, विद्या, बल, समय इत्यादि सब को बिना बचाए, बिना आगे-पीछे देखे सारा का सारा झौंक देता है। हम दूर क्यों जाएं, स्वयं श्री स्वामी रामदेव जी महाराज किसी व्यक्ति को कोई बड़ा आश्वासन दे दें कि आप अमुक विषय में कुछ करके दिखाएँ, हम आपको योगपीठ में सम्यक् महत्त्व व पद प्रदान करेंगे, तो वह व्यक्ति अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ेगा। किसी जिज्ञासु को या किसी विद्यार्थी को कोई गुरु-आचार्य आश्वासन दे देता है कि तुम निश्चिन्त रहो-मैं तुम्हारे साथ हूँ तो वह अपने श्रद्धेय की वाणी सुनकर एकदम विश्वस्त हो जाता है। इन सभी उपर्युक्त उदाहरणों में या इसी प्रकार के और भी सभी लौकिक प्रसङ्गों में हम सबका अनुभव है कि आश्वासन देने वाला व्यक्ति यदि शक्तिशाली है, सामथ्र्यवान् है, तो जिसको आश्वासन मिलता है वह व्यक्ति कभी भी उसकी वाणी में संशय या संदेह नहीं करता, अविकल रूप से उसे वैसा ही स्वीकार करता है। शास्त्र के संदर्भ में भी जिज्ञासु की अधिक नहीं तो कम से कम इतनी निष्ठा, श्रद्धा, भक्ति, विश्वास तो होना ही चाहिए। जितना कि लौकिक जनों को अपने-अपने आश्वासन प्रदाता में होता है। जिज्ञासु के संज्ञान में यह बात बनी रहनी चाहिए कि वेदों में जो कहा गया है ऋषि-मुनियों या आप्त पुरुषों के द्वारा जो कहा गया हैं, गीता-उपनिषद् में जो कहा गया है, वह पूर्ण अनुभूत सत्य है, कल्पना में जाकर कुछ भी नहीं कहा है, मैं भी उसका अनुभव करके देख सकता हू।
गीता को गीता इसलिए कहते हैं कि वह श्रीभगवान् के द्वारा गायी गई है। जैसे उपनिषद् का प्रत्येक वाक्य वेदान्त कहा जाता है, उसी प्रकार गीता शास्त्र का प्रत्येक वाक्य श्रीभगवान् गुरु के द्वारा गाया गया है। इसीलिए प्रत्येक अध्याय के अन्त में 'ॐ तत् सदिति श्रीमद़्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे’ इत्यादि वचन पुष्पिका के रूप में सुनने को मिलता है। यह ब्रह्मविद्या है, यह योगशास्त्र है, यह उपनिषदों का सार है, ध्यातव्य है इस पुष्पिका में 'श्रीमद्भगवद्गीतासु’ इस शब्द को बहुवचन में पढ़ा गया है अर्थात् भगवान् के श्रीमुख से निकले हुए ये वचन हैं, इनमें संशय या संदेह करने के लिए कहाँ गुंजाइश है। भगवान् कहते ही उसको हैं जो सर्वसमर्थ हो, जिसमें समग्र ऐश्वर्य हो, धर्म, यश और श्री का साक्षात् विग्रह हो, जिसमें निरतिशय ज्ञान और वैराग्य हो। जो सबका हो, जो सबमें हो, जो सर्वदा हो, जो सर्वत्र हो। ऐसे भगवान् की तथ्यपूर्ण वाणी है गीता। भगवान् नारायण के ही एक रूप हैं-'योगेश्वर श्रीकृष्ण’।
गीता के भगवान् गुरु ने शरणागत शिष्य को आदेशात्मक, तत्त्वकथनपरक, चेतावनीपरक, सलाह इत्यादि कई रूपों में अपनी वाणी सुनाई। साथ में बड़े ही शक्तिशाली, अमोघ, कभी व्यर्थ न जानने वाले आश्वासन भी दिए हैं। हम अपने पाठकों के साथ मिलकर उदाहरणस्वरूप कुछ ऐसे आश्वासनों का अध्ययन करना चाहेंगे, जिससे इस मार्ग पर चलने वाले साधकों का उत्साह बढ़े।
सबसे पहले भगवान् गुरु ने गीता के दूसरे अध्याय के आरम्भ में ही शिष्य को यह समझाया कि तुम अविनाशी हो, अजर-अमर हो, शरीर मरता है, जन्मता है, आत्मा का न तो जन्म होता है न मरण, आत्मा को अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकार्य जानकर शोक से पार चले जाओ। अवस्थाएँ देह की होती हैं, तुम देह की उन सब अवस्थाओं से अतीत हो जो जागरित-स्वप्र-सुषुप्ति के रूप में जानी जाती हैं, इन्द्रियों और विषयों के संयोग से शीत-उष्ण व सुख-दु:ख आदि मिलता रहता है। वे सब आगमापायी अनित्य हैं, उनको सहन करो अर्थात् उन्हें अपने अधीन रखो, उनको अभिभूत करके रखो। भगवान् ने आगे कहा-
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदु:खसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते।।
हे नरश्रेष्ठ! सुख-दु:ख को समान मानने वाले जिस धीर (ज्ञानी) पुरुष को ये इन्द्रिय अनुभूतियाँ व्यथित नहीं करती, वही अमृतत्व अर्थात् ब्रह्म को पाने में सक्षम होता है। यहाँ भगवान् आश्वासन देते हैं-
सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।
सुख-दु:ख, लाभ-हानि, जय-पराजय को एक जैसा समझकर फिर अपने सहज प्राप्त कत्र्तव्य को पूरा करो, ऐसा करने से तुम्हें पाप नहीं लगेगा।
भगवान् का कहना है- कर्मबन्धन से मुक्त होने के दो मार्ग हैं-
एक का नाम है-ज्ञानमार्ग या सांख्यमार्ग और दूसरा है कर्मयोग।
आत्मा को नित्य स्वीकार करते हुए यदि अपने बुद्धि व मन को आत्मा के साथ मिलाते नहीं, उनका परस्पर तादात्म्य नहीं करते तो आत्मा असङ्ग निर्लेप बना रहता है, कर्म उसे बाँधता नहीं। कर्मयोग से भी यह स्थिति आ सकती है। कब? जब कत्र्तव्यबुद्धि से युक्त होकर कर्म किए जाते हैं तो इस प्रक्रिया से भी साधक का चित्त शुद्ध हो जाता है और वह आत्मस्थ हो जाता है। निष्काम होकर सतत कर्म में लगे रहने से पाप-प्रायश्चित्त के लिए भी कोई अवकाश नहीं रहता क्योंकि पाप का मूल तो कामना है।
è शेष आगामी अंक में
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