वेद के वर्ण व्यवस्था को भारत में जातिवाद के नाम से गलत व्याख्या

वेद के वर्ण व्यवस्था को भारत में जातिवाद के नाम से गलत व्याख्या

डॉ. चंद्र बहादुर थापा,

अधिवक्ता एवं विधि सलाहकार पतंजलि समूह

जन्मना जायते शूद्र: संस्कारात् भवेत् द्विज:
वेद पाठात् भवेत् विप्र: ब्रह्म जानातीति ब्राह्मण:।।
अर्थात् व्यक्ति जन्मत: सभी शूद्रवत् हैं, संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। ब्रह्म को जानने वाला ब्राह्मण होता है। जन्मना जायते शूद्र: से ये नहीं हो जाता कि जन्म से सभी शूद्र हैं; इसका अर्थ हैजन्म से सभी शूद्रवत् हैं, अर्थात्वेद के अनाधिकारी हैं किन्तु संस्कार होने से द्विज, वेद का अधिकारी होता है
भारत में विशेषकर सनातनावलम्बी हिन्दुओं में अच्छे कहलाने अथवा दिखने की रोग इस समूह को अत्यंत दारुण स्थिति पर पहुँचाया है, शठे शाठ्यं समाचरेत्व्यवहार करना चाहिए परन्तु गंगा जमुनी' तहजीव कहकर धोखा खाते रहते हैं। सबसे ज्यादा पूर्वजों द्वारा प्रकृतिजन्य मानव में स्वस्फुरित कार्य प्रणाली के प्रति स्वत: झुकाव के वैज्ञानिक वर्गीकरण आधारितवर्ण व्यवस्थायथा, ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य और शूद्र के कार्य विभाजन को जातिवाद के नाम से स्वनामधन्य विद्वानों के अनर्गल प्रलाप सहित लेख और प्रवचन अत्यंत दुखद और विद्वेषकारी हैं। जबकि वर्ण व्यवस्था अनुरूप चार वर्ण विश्वभर में सभी प्रकार के  कार्यालयों, चाहे बड़े-बड़े राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर अथवा छोटे-छोटे स्थानीय स्तर के हों, अथवा साम्यवादी कम्युनिस्टों के कार्यालय ही क्यों हों, में कर्मचारी वर्गीकरण समूह में अनिवार्य रूप से पाए जाते हैं, नाम चाहे जो कुछ भी दिया गया हो।
वास्तव में जिस वर्णव्यवस्था को जातिवाद के नाम से दुष्प्रचार कर सनातन के मूलशाखा हिन्दुपंथ को बदनाम करते हुए और इसके कमजोर दूरदराज के वंचित वर्ग के साथ साथ गावों और शहरों के गरीब  वर्ग में आपस में फुट डालकर वैज्ञानिक आधार पर वर्गीकृत वर्णव्यवस्था के चारों वर्गों में विशेषकर ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य के विरुद्ध उनके ही भाई शूद्रों को भडक़ाकर गाँधी और आंबेडकर नाम से अहिंसा कहकर परन्तु आर्थिक, शारीरिक और मानसिक हिंसा और भय फैलाकर विगत पांच-सात सदियों से सनातन पद्धति को ही नष्ट करने की कट्टर क्रिस्चियन, मुस्लिम और कम्युनिस्टों तथा अनीश्वरवादी राक्षसी प्रवृति के हिन्दू नामधारी  परन्तु विपरीत काम वाले छद्म हिन्दू राजनीतिज्ञों, द्वारा दुष्प्रयास किया गया और वोट बैंक के लिए विभिन्न पार्टियों द्वारा किया जा रहा है; यह केवल भारत अपितु सम्पूर्ण विश्व के लिए अत्यंत घातक विध्वंसकारी षड्यंत्र है जिसको समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो प्रत्येक सामाजिक घटक के लिये नि:संदेह आत्मघाती सिद्ध होगा।
भारत में जाती और वर्णव्यवस्था पर पाश्चात्य  तथाकथित विद्वान और उनके विद्यार्थी अथवा शासन  सत्ता द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय, शैक्षिक संस्थान के  इतिहासकार, प्रोफेसर, व्याख्याता, विश्लेषक इत्यादि अथवा राजनेताओं ने, स्वयं के  अज्ञान, व्यक्तिगत विद्वेष, प्रलोभन, उकसावा, दबाव, पंथगत- जातिगत घृणा, पंथ विशेष को विश्वभर फैलाने की दुस्वप्न, इत्यादि अनेकों, ज्ञात-अज्ञात अपने नितांत-निहित विभिन्न स्वार्थों के कारण अकेले अथवा समूह में अथवा पार्टी विशेष, पन्थ विशेष अथवा अंतर्राष्ट्रीय  संगठन  विशेष के मंच के उपयोग करते हुए, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया इत्यादि में अत्यंत भ्रामक लेख लिखे हैं, और साथ साथ चर्चों, मदरसों, मस्जिदों, अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन इत्यादि से प्रचार किये हैं, जिसमे भारत के विभिन्न कानूनों के साथ-साथ भारत का संविधान भी सम्मिलित है, जहाँ जाति आधारित आरक्षण से लेकर अनेकों समाज विभाजक प्रावधानों की समामेलन की गई है जिसके वजह से आज यह शब्द ही नहीं हिन्दू समाज विघटन के कगार पर पहुँच गया है और लगता है सनातन धर्म का यह मूल पंथ- हिन्दू को विश्व पटल से समाप्त करना ही ये स्वनामधन्य सेकुलरवादी की प्रमुख लक्ष है।
परन्तु वास्तविकता विपरीत है- जातिवाद भारत में तो प्रारम्भ से ही व्यवस्थित कार्य विभाजन के वैज्ञानिक दृष्टिकोण आधारित था, क्योंकि किसी भी विकसित प्रणाली में उसके निरंतरता और अधिकतम प्रतिफल हेतु कार्य विभाजन ही सबसे उपयुक्त साधन है। वर्ग संघर्ष के सिद्धांत पर आधारित कम्युनिस्ट पद्दति हो अथवा एक किताबिये मुस्लिम और क्रिस्चियन हो या अनीश्वरवादी ही क्यों हो, सभी अपने अपने संस्थान के लिए वैदिक कार्य विभाजन के नक़ल चार श्रेणी के कर्मचारी नमूना ही वास्तविक दैनिक जीवन में प्रयोग करते हैं, भले ही जातिवाद कहकर मूल नमूना को गाली देते हों।
वैदिक काल में जो उन्नत समाज था उसने उस समय के आवश्यकता अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य और शूद्र के रूप में कार्य विभाजन किया, कालांतर में वैदिक समाज के ऊपर बारहवीं सदी से मुस्लिम  और सत्रहवीं सदी से ब्रिटिश शासन के नियंत्रण तथा अन्य पंथों के पादुर्भाव से अनेक विरोधी तत्व के हिन्दू समाज में जातिवाद के नाम पर नयी नयी षड्यंत्रों द्वारा प्रताडऩा, वितण्डा, प्रलोभन, भय, त्रास, घृणा, दुष्प्रचार, जाति आधारित आरक्षण इत्यादि अनेकों चौतर्फी प्रहार से किसी तरह अपना अस्तित्व बचा रहा है, जबकि जो इस के घोर विरोधी हैं वही लोग (चाहे कम्युनिस्ट, क्रिस्चियन, मुस्लिम, एक किताबी, अनीश्वरवादी, मानव अधिकारवादी, इत्यादि जो कोई भी हो) आधुनिक प्रशासन और प्रबंधन के नाम पर  हर कार्य समूह को चार तह में विभाजित किये हैं- प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी और गौर से देखें तो जो-जो बुराइयां मनु के जातिवाद में इन लोगों ने गिनाये हैं उससे बढक़र ये आधुनिक कर्मचारी श्रेणी में हैं। नाम चाहे जो भी दिया गया हो, वास्तव में यह वैदिक काल से स्थापित चार वर्णों की वर्ण व्यवस्था समाज में विश्वभर में अद्यतन शासन प्रशासन, प्रबंधन तथा संगठन ढांचों में अद्यतन विद्यमान है, उदाहरणत: एक व्यक्ति सेना प्रमुख हो या विभाग प्रमुख हो अथवा संस्था प्रमुख हो, घर-परिवार के प्रमुख हो, नेता हो, अभिनेता हो, कुछ भी हो, जब अपने अधीनस्थ को शिक्षा-दीक्षा, तालीम-सीख, देता है खुद भी नई-नई विधाएँ सीखता है, तो ब्राह्मण के कार्य करता है, आज्ञा देता है, अनुशासन कायम करता है, दंड या पुरस्कार देता है, शासन-प्रशासन चलाता है, तो क्षत्रिय के कार्य करता है, व्यापार-वाणिज्य, व्यवसाय चलाता है या चलाने के कार्य को व्यवस्थापन, सम्बर्धन, प्रतिपादन इत्यादि करते समय वैश्य बन जाता है और क्योंकि सेवा कार्य कर रहा है तो शूद्र बन जाता है और हो सकता है वह व्यक्ति ये चारों वर्णों के कार्य एक ही जगह पर एक साथ कर रहा है- अर्थात् यह स्वयं से स्वीकारने की बात है की बहस करने की अथवा बिना सोचे समझे वैदिक वर्ण व्यवस्था पर आक्षेप लगाने की अथवा हिन्दू वर्ण व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुये घृणा फैलाने की। 
इस भयावह स्थिति से उबरने के लिए धर्म, पंथ, वर्णव्यवस्था, जाति, समाज, मानव उद्भव और लय-प्रलय के साथ मानव समूहों के भूगोलार्ध में बिखराव के साथ विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में सामाजिक बस्ती-वसाव और विकास, वैज्ञानिक-आर्थिक-राजनैतिक आंदोलन और राज्यों के गठन-विघटन इत्यादि मूलभूत तत्वों के वास्तविक अर्थ, कारण, वातावरण सहित परिस्थितियों को जानना और इनसे निबटने की रणनीति, अपने पूर्वजों के श्रुति-स्मृति सहित लेखन आधारित समसामयिक परिस्थितियों के सटीक आंकलन से, बनाना अत्यावश्यक है। 

 शब्दों के भ्रमजाल

भाषा के व्युत्पत्तिशास्त्र (Etymology) में विचार किया जाता है कि कोई शब्द उस भाषा में कब और कैसे प्रविष्ट हुआ; किस स्रोत से अथवा कहाँ से आया; उसका स्वरूप और अर्थ समय के साथ किस तरह परिवर्तित हुआ है। व्युत्पत्तिशास्त्र में शब्द के इतिहास के माध्यम से किसी भी राष्ट्र, प्रांत एवं समाज की भाषिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि अभिव्यक्त होती है।निघण्टुसन्दर्भित किये बिनाधर्म, ‘पन्थ, ‘जाती, ‘जनजाति, ‘जाति प्रथा, आदि के अर्थ अंग्रेजी के शब्दों के अनुवाद अपने तरीके से लेखकों के सुविधा और स्वार्थ-सिद्धि के लिए हिन्दू वर्ग के अच्छाईयों के विरुद्ध किये गए हैं। हिटलर के प्रचार मंत्री जोसेफ़  गोयबल्स की एक बात बड़ी मशहूर है- ‘कि किसी झूठ को इतनी बार कहो कि वो सच बन जाए और सब उस पर यक़ीन करने लगें.... वे अपना झूठ इतने यक़ीन से पेश करते हैं कि वह सच लगने लगता है। हमें लगता है इंसान इतने भरोसे से कह रहा है, तो बात सच ही होगी।
ऐसा नहीं है की जाति अन्य पंथों में नहीं है, परन्तु लक्षित जो है उसी के बारे में लिखेंगे, बोलेंगे, भ्रम फैलाएंगे ताकि उनका निहित स्वार्थ की शीघ्रातिशीघ्र पूर्ण हो और उनको धन, पद, इत्यादि मिले चाहे उससे दूसरे की अस्तित्व ही क्यों मिटे। इसका ज्वलंत उदाहरण - अपने स्वार्थसिद्धि के लिए ये लोग हिन्दू के वर्ग विभाजनजातिके लिए तो अंग्रेजी का शब्द 'CASTE' प्रयोग करते हैं और उनके अपने जाति के लिए अंग्रेजी का शब्द 'TRIBE' जिसको हिंदी में अनुवादितजनजातिके लिए करते हैं, और संविधान मेंअनुसूचित जाति(Scheduled Caste) एवंअनुसूचित जन-जाति(Scheduled Tribe)  के साथपिछड़ा वर्ग(BackwardClass) भी लगा देते हैं, तो क्या यह मजाक नहीं है कि विरोधी के फिरके अनगिनत भी केवलट्राइब्समें ही सिमित हुए और हिन्दू के गिने चुने भी कोईकास्टकोईट्राइबऔर कोईक्लासहो गए। कोई अर्थ के अनर्थ करने वाले को मुहतोड़ जवाब देने वाला तो है नहीं, उलटे महात्मा गाँधी से लेकर नेहरू तथा उनके नाम से चलने वाली पार्टी के साथ साथ उनसे छिटक कर बने पारिवारिक क्षेत्रीय पार्टी भी हिन्दू को गाली देने पर तो खुश हो जायेंगे, कुछ बोल भी गए तो पुरातनी कट्टरपंथी दक्षिणपंथी कहलायेंगे, खूब उड़ाओ मजाक और मिटाओ दुनिया से हिन्दू को।

प्राचीन वर्गीकरण

ऋग्वेद के सूक्तों में अग्नि, वायु, इन्द्र, वरुण, मित्रावरुण, अश्विनीकुमार, विश्वदेवा, सरस्वती, ऋतु, मरुत, त्वष्टा, ब्रह्मणस्पति (गणेश), सोम, दक्षिणा इन्द्राणी, वरुनानी, द्यौ, पृथ्वी, पूषा आदि देवी-देवताओं की स्तुतियों का विस्तृत वर्णन मिलता है। जो लोग देवताओं की अनेकता को नहीं मानते है, वे सब नामों का अर्थ परब्रह्म परमात्मा वाचक लगाते हैं, और जो अलग-अलग मानते हैं वे भी परमात्मात्मक रूप में इनको मानते है। भारतीय गाथाओं और पुराणों में इन देवताओं का मानवीकरण हुआ है, फिर इनकी मूर्तियाँ बनने लगी, फिर इनके सम्प्रदाय बनने लगे, और अलग अलग पूजा पाठ होने लगे। निरुक्तकार यास्क के अनुसार, ‘देवताकी उत्पत्ति आत्मा से ही मानी गयी है, ‘तिस्त्रो देवताअर्थात ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीन प्रधान देवता हैं, जिनको सर्वशक्तिमान परमात्मा द्वारा क्रमश: सृष्टि का निर्माण, पालन और संहार  की जिम्मेदारी दी गयी है। महाभारत के (शांति पर्व) में इनका वर्णन क्रम इस प्रकार से किया गया है-
आदित्या: क्षत्रियास्तेषां विशस्च मरुतस्तथा, अश्विनौ तु स्मृतौ शूद्रौ तपस्युग्रे समास्थितौ, स्मृतास्त्वन्गिरसौ देवा ब्राह्मणा इति निश्चय:, इत्येतत सर्व देवानां चातुर्वर्नेयं प्रकीर्तितमअर्थात् आदित्यगण क्षत्रिय देवता, मरुदगण वैश्य देवता, अश्विनी गण शूद्र देवता, और अंगिरस ब्राह्मण देवता माने गए हैं। शतपथ ब्राह्मण में भी इसी प्रकार से देवताओं को माना गया है। शुद्ध बहु ईश्वरवादी धर्मों में देवताओं को पूरी तरह स्वतन्त्र माना जाता है।

भारत के संपर्क में आने के समय के यूरोप की सामाजिक स्थिति

जर्मन-अमरीकी इतिहासकार एंड्रे गंडर की 1998 में लिखी किताब रीओरिएंट: ग्लोबल इकॉनमी इन एशियन एजमें लिखा है किअठारहवीं शताब्दी के दूसरे हिस्से तक भारत और चीन आर्थिक रूप से पूरे संसार पर हावी थे। स्थिति तब बदली जब यूरोप का विस्तार शुरू हुआ और कई देशों में उपनिवेश बनें, इसी दौरान अंग्रेज़ों का भारत पर कब्ज़ा हुआ
सत्रहवीं शताब्दी में पहली बार भारत का ब्रिटेन से सम्पर्क हुआ। यह सम्पर्क दो परस्पर-विरोधी संस्कृतियों का परस्पर टकराना-मात्र था। उन दिनों समूचा ब्रिटेन अर्धसभ्य किसानों का उजाड़ देश था। उनकी झोपडिय़ाँ सरकंडों की बनी होती थीं, जिनके ऊपर मिट्टी या गारा लगाया हुआ होता था। घास-फूस जलाकर घर में आग तैयार की जाती थी जिससे सारी झोपड़ी में धुआँ भर जाता था। धुँए को निकालने के कोई राह ही थी। उनकी खुराक जौ, मटर, उड़द, कन्द और दरख्तों की छाल तथा मांस थी। उनके कपड़ों में जुएं भरी होती थीं। आबादी बहुत कम थी, जो महामारी और दरिद्रता के कारण आए दिन घटती जाती थी। शहरों की हालत गाँवों से कुछ अच्छी थी। शहरवालों का बिछौना भूस से भरा एक थैला होता था। तकिये की जगह लकड़ी का एक गोल टुकड़ा। शहरी लोग जो खुशहाल होते थे, चमड़े का कोट पहनते थे। गरीब लोग हाथ-पैरों पर पुआल लटेपकर सर्दी से जान बचाते थे। कोई कारखाना था, कारीगर, सफाई का इन्तजाम, रोगी होने पर चिकित्सा की व्यवस्था। सडक़ों पर डाकू फिरते थे और नदियां तथा समुद्री मुहाने समुद्री डाकुओं से भरे रहते थे। उन दिनो दुराचार का तमाम यूरोप में बोलबाला और आतशक-सिफलिस की बीमारी आम थी। विवाहित या अविवाहित, गृहस्थ पादरी, यहाँ कि पोप दसवें लुई तक भी इस रोग से बचे थे। पादरियों का इंग्लैंड की एक लाख स्त्रियों को भ्रष्ट किया था। कोई पादरी बड़े से बड़ा अपराध करने पर भी केवल थोड़े-से जुर्माने की सज़ा पाता था। मनुष्य-हत्या करने पर भी केवल : शिलिंग आठ पैंस- लगभग पांच रुपये-जुर्माना देना पड़ता था। ढोंग-पाखण्ड, जादू-टोना उनका व्यवसाय था।
सत्रहवीं शताब्दी के अंतिम चरण में लंदन नगर इतना गंदा था और वहाँ के मकान इस कदर भद्दे थे कि उसे मुश्किल से शहर कहा जा सकता था। सडक़ों की हालत ऐसी थी कि पहियेदार गाडिय़ों का चलना खतरे से खाली था लोग लद्दू-टट्टुओं पर दाएं-बाएं पालनों में असबाब की भाँति लदकर यात्रा करते थे। उन दिनों तेज़ से तेज़ गाड़ी इंगलैंड में तीस से पचास मील का सफर एक दिन में तय कर सकती थी। अधनंगी स्त्रियां जंगली और भद्दे गीत गाती फिरती थीं और पुरुष कटार घुमा-घुमाकर लड़ाई के नाच नाचा करते थे। लिखना-पढऩा बहुत कम लोग जानते थे। यहाँ तक कि बहुत-से लार्ड अपने हस्ताक्षर भी नहीं कर सकते थे। बहुधा पति कोड़ों से अपनी स्त्रियों को पीटा करते थे। अपराधी को टिकटिकी से बाँधकर पत्थर मार-मारकर मार डाला जाता था। औरतों की टाँगों को सरेबाजार शिकंजों में कसकर तोड़ दिया जाता था। शाम होने के बाद लंदन की गलियां सूनी, डरावनी और अंधेरी हो जाती थीं। उस समय कोई जीवट का आदमी ही घर से बाहर निकलने का साहस कर सकता था। उसे लुट जाने या गला काटे जाने का भय था। फिर उसके ऊपर खिडक़ी खोल कोई भी गन्दा पानी तो फेंक ही सकता था। गलियों में लालटेन थीं ही नहीं। लोगों को भयभीत करने के लिए टेम्स के पुराने पुल पर अपराधियों के सिर काट कर लटका दिए जाते थे। धार्मिक स्वतन्त्रता थी। बादशाह के सम्प्रदाय से भिन्न दूसरे किसी सम्प्रदाय के गिरजाघर में जाकर उपदेश सुनने की सजा मौत थी। ऐसे अपराधियों के घुटने को शिकंजे में कसकर तोड़ दिया जाता था। स्त्रियों को और लड़कियों को सहतीरों में बाँधकर समुद्र के किनारे पर छोड़ देते थे कि धीरे-धीरे बढ़ती हुई समुद्र की लहरें उन्हें निगल जाएं। बहुधा उनके गालों को लाल लोहे से दागदार अमेरिका निर्वासित कर दिया जाता था। उन दिनों इंग्लैंड की रानी भी गुलामों के व्यापार में लाभ का भाग लेती थी।
इंग्लैंड के किसान की व्यवस्था उस ऊद-बिलाव के समान थी जो नदी किनारे मांद बनाकर रहता हो। कोई ऐसा धंधा-रोजगार था कि जिससे वर्षा होने की सूरत में किसान दुष्काल से बच सकें। उस समय समूचे इंगलिस्तान की आबादी पचास लाख से अधिक थी। जंगली जानवर हर जगह फिरते थे। सडक़ों की हालत बहुत खराब थी। बरसात में तो सब रास्ते ही बन्द हो जाते थे। देहात में प्राय: लोग रास्ता भूल जाते थे और रात-रात भर ठण्डी हवा में ठिठुरते फिरते थे। दुराचार का दौर था। राजनीतिक और धार्मिक अपराधों पर भयानक अमानुषिक सजाएं दी जाती थीं।
यह दशा केवल ब्रिटेन की ही थी, समूचे यूरोप की थी। फ्रांस का बादशाह चौदहवां लुई यूरोप में सबसे अधिक पूरे बहत्तर वर्ष तक - औरंगजेब से बारह वर्ष पूर्व गद्दी पर बैठा और उसके मरने के आठ वर्ष बाद तक गद्दी पर रहा। वह सभ्य, बुद्धिमान और महत्वाकांक्षी था और चाहता था कि फ्रांस दुनियां का सबसे अधिक शक्ति-सम्पन्न राष्ट्र बन जाए। सन 1715 में जब वह मरा तो पेरिस अपनी शान-फैशन साहित्य, सौन्दर्य और बड़े-बड़े महलों तथा फव्वारों से सुसज्जित था और फ्रांस यूरोप की प्रधान राजनीतिक और सैनिक शक्ति बन गया था। परन्तु सारा देश भूखा और असन्तुष्ट था। उस काल में यूरोप का मुख्य प्रतिद्वन्द्वी आस्ट्रिया था जिसके राजा हाशबुर्ग के थे। पवित्र रोमन साम्राज्य के सम्राट का गौरवपूर्ण पद इसी राजवंश को प्राप्त था। यद्यपि इस पद के कारण आस्ट्रिया के राजाओं की शक्ति में कोई वृद्धि नहीं हुई थी पर उसका सम्मान और प्रभाव तथा प्रभुत्व समूचे यूरोप पर था।
उस समय जर्मन कोई एक राष्ट्र था, एक राज्य का नाम ही जर्मनी था। तब जर्मनी लगभग तीन सौ साठ छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था, जिनमें तनिक भी राजनीतिक एकता थी। वे नाममात्र को आस्ट्रिया के धर्मसम्राट की अधीनता मानते थे।
यही दशा इटली की थी। इटली कोई राष्ट्र है, यह कोई जानता था। वहाँ भी अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्य थे, जिसके राजा निरंकुश स्वेच्छाचारी थे। जनता को शासन में कहीं कोई अधिकार प्राप्त था।
स्पेन इस काल में यूरोप का सबसे अधिक समर्थ राज्य था। पन्द्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में ही उसने अमेरिका में उपनिवेश स्थापित करके अपनी अपार समृद्धि बढ़ा ली थी। स्पेन के राजा यूरोप के अनेकों देशों के अधिपति थे।
पोलैण्ड सोलहवीं शताब्दी तक यूरोप का एक समर्थ राज्य था। सत्रहवीं शताब्दी में पीटर के अभियानों ने उसे जर्जर और अव्यवस्थित कर दिया था और फिर वहाँ किसी शक्तिशाली केन्द्रीय शासन का विकास नहीं हो पाया।
स्वीडन, डेनमार्क, नार्वें, हालैण्ड और स्विटजऱलैण्ड का विकास अभी हुआ ही नहीं था। अभी ये देश पिछड़े हुए थे।

हठधर्मिता पुरानी है

399 ईसा पूर्व (आज से 2420 वर्ष पूर्व) यूनानी तरुणों को बिगाडऩे, देवनिंदा और नास्तिक होने का दोष लगाकर जहर देकर मारने के दंड प्राप्त सुकरात ने विषपान के समय कहा है प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और प्राण के प्रति मोह होता है। भला प्राण देना कौन चाहता है? किंतु यह उन साधारण लोगों के लिए हैं जो लोग इस नश्वर शरीर को ही सब कुछ मानते हैं। आत्मा अमर है फिर इस शरीर से क्या डरना? हमारे शरीर में जो निवास करता है क्या उसका कोई कुछ बिगाड़ सकता है? आत्मा ऐसे शरीर को बार-बार धारण करती है अत: इस क्षणिक शरीर की रक्षा के लिए भागना उचित नहीं है। क्या मैंने कोई अपराध किया है? जिन लोगों ने इसे अपराध बताया है उनकी बुद्धि पर अज्ञान का प्रकोप है। मैंने उस समय कहा था- विश्व कभी भी एक ही सिद्धांत की परिधि में नहीं बाँधा जा सकता। मानव मस्तिष्क की अपनी सीमाएँ हैं। विश्व को जानने और समझने के लिए अपने अंतस् के तम को हटा देना चाहिए। मनुष्य यह नश्वर कायामात्र नहीं, वह सजग और चेतन आत्मा में निवास करता है। इसलिए हमें आत्मानुसंधान की ओर ही मुख्य रूप से प्रवृत्त होना चाहिए। यह आवश्यक है कि हम अपने जीवन में सत्य, न्याय और ईमानदारी का अवलंबन करें। हमें यह बात मानकर ही आगे बढऩा है कि शरीर नश्वर है। अच्छा है, नश्वर शरीर अपनी सीमा समाप्त कर चुका। टहलते-टहलते थक चुका हूँ। अब संसार रूपी रात्रि में लेटकर आराम कर रहा हूँ। सोने के बाद मेरे ऊपर चादर ओढा देना।"
404 .पू. में प्लेटो सुकरात का शिष्य बना तथा सुकरात की मृत्यु के बाद प्रजातंत्र के प्रति प्लेटो को घृणा हो गई। उसने मेगोरा, मिस्र, साएरीन, इटली और सिसली आदि देशों की यात्रा की तथा अन्त में एथेन्स लौट कर अकादमी की स्थापना की और अन्त तक प्रधान आचार्य बना रहा। प्लेटो के अनुसारमानव के व्यक्तित्व के तीन आंतरिक तत्त्व होते हैं- बौद्धिक, ऊर्जस्वी और सतृष्ण। और अपने 380 ईसापूर्व के आसपास रचित ग्रन्थरिपब्लिक(मूल यूनानी नाम : Πολιτεία / पॉलीतिया ) के माध्यम से कहते हैं किमनुष्य की आत्मा के तीन मुख्य तत्त्व हैं - तृष्णा या क्षुधा (Appetite), साहस (Spirit), बुद्धि या ज्ञान (Wisdom) यदि किसी व्यक्ति की आत्मा में इन सभी तत्वों को समन्वित कर दिया जाए तो वह मनुष्य न्यायी बन जाएगा। ये तीनों गुण कुछेक मात्रा में सभी मनुष्यों में पाए जाते हैं लेकिन प्रत्येक मनुष्य में इन तीनों गुणों में से किसी एक गुण की प्रधानता रहती है। इसलिए राज्य में इन तीन गुणों के आधार पर तीन वर्ग मिलते हैं। पहला, उत्पादक वर्ग - आर्थिक कार्य (तृष्णा), दूसरा, सैनिक वर्ग - रक्षा कार्य (साहस), तीसरा, शासक वर्ग - दार्शनिक कार्य (ज्ञान/बुद्धि) और जब सभी वर्ग अपना कार्य करेंगे तथा दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे और अपना कर्तव्य निभाएंगे तब समाज राज्य में न्याय की स्थापना होगी। अर्थात् जब प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य का निर्वाह करेगा, तब समाज में न्याय स्थापित होगा और बना रहेगा।
प्लेटो के अनुसार- नागरिको में सद्चरित्र और सदगुणों का विकास शिक्षा द्वारा ही संभव है। प्लेटो का कथनशिक्षा मानसिक रोग का मानसिक उपचार हैआज भी यूनेस्को की प्रस्तावना का आधार बना हुआ है, जिसमे लिखा है कियुद्ध मनुष्य के मस्तिष्क में जन्म लेते हैं। यदि मनुष्य के मस्तिष्क में शान्ति स्थापित कर दी जाए, तो स्थायी अंतर्राष्ट्रीय शांति की स्थापना संभव है। और प्लेटो से तत्कालीन शासन व्यवस्था इतना नाराज बना की मृत्युदंड तो नहीं दिया परन्तु दासत्व (स्लेवरी) में धकेल दिया।

धर्म और पंथ

वर्तमान प्रयोग में भारत में आतंरिक राजनैतिक कारणों एवं अन्य निहित स्वार्थों के साथ साथ आधुनिक काल के उच्च शिक्षित वर्ग द्वारा पाश्चात्य अनुकरण और अज्ञानता के कारण, ‘धर्मऔरजातिके अर्थ अंग्रेजी केरिलिजनऔरकास्टके अनुवाद के रूप में करते हैं। प्रथमत: किसी भी भाषा के निहित अर्थ के  किसी दूसरे भाषा के अनुवाद में बिल्कुल वैसा ही होने के सम्भावना ज्यादा होता है और उसके दुष्परिणाम स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत के राजनीती और सामाजिक सामंजस्य में आई हुई विकृति और विघटन और संस्कार के साथ साथ सांस्कृतिक मूल्यों में ह्रास के साथ-साथ जातीय विद्वेष और राष्ट्र के संपत्ति के नुकसान के साथमॉब लिंचिंग(भीड़ हत्या) के बढ़ते घटनाओं से स्पष्ट दिखाई पड़ता है।
उधारणत: एक पंथ विशेष सभी के द्वारा अंग्रेजी मेंइस्लाम रिलिजनकहे जाने के कारण  भारतीय भाषा मेंइस्लाम धर्मअनुदित किया गया। इसका आधारकुरानहै औरकुरानके आदेश अनुसार इस्लाम के स्वीकार करने वालेकाफ़िरहैं औरकाफ़िरको मारना जायज है अथात् उचित है, मान्य है, जब की किसी भी मानव तो क्या किसी भी जीव को मारनाहिन्दूजैनबुद्धपंथ के अनुसार पाप है अर्थात् अनुचित है अमान्य है। धर्म क्योंकि शाश्वत है अत: यदिइस्लामहिन्दूजैनबुद्धको  पंथ के जगहधर्ममानें तो क्या धर्म विपरीतार्थी हो सकता है, कदापि नहीं।  धर्म के मूल तत्व तोजियो और जीने दो है।
अत: जातीय व्यवस्था के वास्तविक अर्थ जानने से पहले धर्म और पंथ की वास्तविक अर्थ स्पष्ट होना जरुरी है।

धर्म का वास्तविक अर्थ

धर्म मनुष्यों तक ही सीमित नहीं वह तो अखिल-विश्व/ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, पशु-पंछियों और वृक्षों के अतिरिक्त पंच महाभूत भी धर्म से ही संचालित हैं वास्तव में धर्म प्रकृति की संचालिका-शक्ति है!
अग्नि निहित ताप, ब्रह्माण्ड के तारे, ग्रह, इत्यादि पिंडो के गुरुत्वाकर्षण, पानी के तरलता, वायु में प्राण तत्व, जीव के जन्म-मरण, माताओं में शिशु-जन्म के समय दुग्ध श्राव, गर्भस्थ शिशु के गर्भ प्रवेश से लेकर जन्म के उपक्रम तक गर्भ में  बृद्धि और मृत्यु पर्यन्त शारीरिक अवयवों के विकास एवं क्षरण और मृत्यु, पृथ्वी में अवस्थित ठोस, तरल और वायुतत्व के जीवन तत्व के साथ समामेलन एवं सामंजस्य, आदि में संतुलन, जैसे अनेक उदाहरण धर्म को समझाने के लिए हैं जो किसी भी भाषा, पंथ, पद्धति मानने वाले सहित सृष्टि के सभी अवयव और आयामों में समान रूप से लागु होता है, जिन के वजह से यह सृष्टिक्रम चल रहा है, और यह समामेलन, सामंजस्य और सम्मीलन के संतुलन रूपी धर्म जिस शक्ति से संचालित है किसी को पता नहीं, परन्तु प्रतीकात्मक रूप में परलौकिक शक्ति का नाम दिया है। जिस दिन या समय या क्षण ये धर्म में असंतुलन होगा भूमण्डल के कोने से लेकर संपूर्ण सृष्टि तक उद्दवेलित होगा और तहस नहस होगा। अर्थात् परलौकिक शक्ति ही ईश्वर है जो धर्म का अधिष्ठाता है और संचालन करता है। अत: धर्म आज के तथाकथित विद्वानों के विश्लेषण अनुरूप किसी के विशेष विचारधारा आधारित अथवा भिन्न-भिन्न अनेक नहीं हो सकतेइसीलिए केवल ईश्वर एक हैं धर्म भी एक ही है जिसको सन्दर्भ सुलभता सरलता हेतु सनातन कहा जाता है।
एकं ब्रह्म द्वितीय नास्ति नेह ना नास्ति किंचनअर्थात् एक ही ईश्वर है दूसरा नहीं है, नहीं है, नहीं है- अंशभर भी नहीं है।
यह शाश्वत सत्य है की, तो किसी को यह सृष्टि कब शुरू हुआ मालूम है ही किसने शुरू किया, अत: धर्म के संतुलन एवं संचालनकर्ता के बारे में निश्चित जानकारी होने के कारण जीवो में से उत्कृष्ट प्राणी मानव जब अपने भावनायें और प्रकृतिजन्य आपद-विपद में जिनको भी वह नहीं जानता की कैसे और कहाँ से उसमे आते हैं, अज्ञात भय से अपने आप को सुरक्षित करने की परिकल्पना मे प्रार्थना करता है की वह अदृष्य शक्ति उसको बचाये उन परेशानियों से, आपद-विपद से, यहाँ तक की अपने ही समूह के अन्य सदस्यों से। विश्व के सभी वर्ग स्वीकार करते हैं की पृथ्वी के अनेक लय-प्रलय हो चुके हैं, अर्थात यह स्वयं सिद्ध है की वत्र्तमान संसार अनेक प्रलय-विनाश के बाद की सृष्टि में चल रहा है और इसका भी अनुमानित जीवन है जिस अवधि के समाप्ति के बाद प्रलय होगा और फिर सृष्टि होगा। ये ही निरंतरता ही धर्म है की इनका अनुपालन पद्धति या परिस्थितिजन्य जीवन शैली चलाने के लिए व्यक्ति विशेष के द्वारा चलाये गए मत-मतान्तर।

पंथ का वास्तविक अर्थ

भिन्न-भिन्न भौगोलिक वातावरण के लोग अथवा जीव भिन्न-भिन्न तरीके से रहते हैं, बोलने के तौर तरीके, रहन-सहन अलग रहते हैं और स्वभावत: उनके किसी से निवेदन करने प्रार्थना करने के तरीके भी भिन्न होंगे, जिस समूह में जिस तरीके की व्यवस्था होगी उस समूह का सदस्य उस जगह और समूह में रहने तक तो उसी तरीके को अपनाएगा, उससे विभिन्न कारणों से हटने पर भी उसको छोड़ेगा नहीं, उल्टा कोशिश करेगा की और भी उसी के तरीके को अपनाये ताकि उसका समूह बढ़े और खुद को मेहनत करना पड़े अथवा उसका नेता बन सके। क्योंकि ये तौर तरीके भिन्न-भिन्न परिवेश और भौगोलिक वातावरण के निवासी के हैं, सामान्यत: समरूप नहीं हो सकते, समरूप होने के लिए या तो उसी समूह का होना पड़ेगा या उस समूह के आधीन; चाहे लोभ, डर, बदला लेने के प्रवृति, शत्रुता, जोर जबरदस्ती, इत्यादि कारणों की मज़बूरी के कारण क्यों हो। इन सभी भिन्न-भिन्न तौर तरीके उन स्थानों के लिए प्रार्थना पद्दति के साथ साथ जीवन पद्दति भी बनेंगे, और कालांतर में पंथ बन जायेंगे जिनको पाश्चात्य विद्वान धर्म लिखते आये हैं, जो की वास्तव में पंथ है, धर्म नहीं।
इस प्रकार पन्थ किसी एक परलौकिक शक्ति, या उस पारलौकिक शक्ति के स्थान विशेष एवं समूह विशेष के अपनाये गए पंथ अनुसार बने हुए अवधारणा के अनुरूप भिन्न भिन्न स्थान के एक से अधिक शक्तियों में विश्वास और इसके साथ-साथ उसके साथ जुड़ी रीति, रिवाज, परम्परा, पूजा-पद्धति और दर्शन का समूह है।

धर्म के लक्षण

मनु ने मानव धर्म के दस लक्षण बताये हैं-
धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम्।।
अर्थात्, धृति (धैर्य), क्षमा (दूसरों के द्वारा किये गये अपराध को माफ कर देना, क्षमाशील होना), दम (अपनी वासनाओं पर नियन्त्रण करना), अस्तेय (चोरी करना), शौच (अन्तरंग और बाह्य शुचिता), इन्द्रिय निग्रह: (इन्द्रियों को वश मे रखना), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग), विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की पिपासा), सत्य (मन वचन कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध करना); ये दस मानव धर्म के लक्षण हैं।
जो अपने अनुकूल हो वैसा व्यवहार दूसरे के साथ नहीं करना चाहिये - यह धर्म की कसौटी है।
श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चौव अनुवत्र्यताम्।
आत्मन: प्रतिकूलानि, परेषां समाचरेत्।।
(धर्म का सर्वस्व क्या है, यह सुनो और सुनकर उस पर चलो! अपने को जो अच्छा लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये।)
गौतम ऋषि कहते हैं - ‘यतो अभ्युदयनिश्रेयस सिद्धि: धर्म।(जिस काम के करने से अभ्युदय और निश्रेयस की सिद्धि हो वह धर्म है।)

 पंथ के लक्षण

परलौकिक शक्ति, जो धर्म का अधिष्ठाता और संचालक है, के तथाकथित विद्वानों के विश्लेषण अनुरूप किसी के विशेष विचारधारा आधारित अथवा भिन्न-भिन्न नहीं हो सकते, इसीलिए केवल ईश्वर एक हैं, धर्म भी एक ही है जिसको सन्दर्भ सुलभता सरलता हेतु सनातन कहा जाता है। सनातन अर्थात् जो आदि काल से चला रहा है। सनातन धर्म मूल रूप है, ‘सनातनका अर्थ है - शाश्वत याहमेशा बना रहने वाला, अर्थात् जिसका आदि है अन्त।
पुराविज्ञानियों ने दक्षिण अफ्रीका की एक गुफा में एकआस्ट्रेलोपिथिकस सेडिबाके अवशेष पाया है, जो लगभग 20 लाख वर्ष पूर्व पृथ्वी पर पाया जाता था और बंदर जैसा दिखता है। इस प्राणी के मस्तिष्क, कूल्हे, हाथों और पांव के नए विवरणों से पता चला है कि इसमें प्रारंभिक मानव के साथ-साथ आधुनिक मानव के भी गुण हैं। इन गुणों के चलते वैज्ञानिकों का मानना है कि यह जीव होमो जीनस का पूर्वज होने के कारण इसे कपि और मानव के बीच की खोई हुई कड़ी कहा जा रहा है। इन जीवाश्मों की आयु 19 लाख 77 हज़ार वर्ष के आसपास मानी गई है, जो मानव जीवाश्म इतिहास में होमो परिवार के गुणों की सबसे पुरानी खोज है। अब तक पाए गए सबसे पुराने जीवाश्मों की आयु 19 लाख साल है, जोहोमो हैबिलिसऔरहोमोर्यूडोफेंसिसके हैं। इन्हेंहोमो इरेक्टसका पूर्ववर्ती माना जाता है और आधुनिक वैज्ञानिक इन्हें निश्चित तौर पर मनुष्य के निर्विवाद पूर्वज मानते हैं।
अत: लाखों साल पहले चाहे मानव कहीं से भी उद्भव हुवे हों, निश्चय ही आज के युग के शुरुवात पर तो पृथ्वी के जहाँ-जहाँ भी उपयुक्त जगह थे वहां रहे चाहे प्रलय के बाद बचे हों चाहे समूह के वंश संरक्षण से बच कर फैले हों, उन्ही मानव समूह विभिन्न तरीके से अपने अपने स्वस्थान के अथवा सुदूर प्रदेश स्थित समूह की सूचना तंत्र स्थापित कर सभी आवश्यकताएँ अथवा सुरक्षा के साथ-साथ विकास के भी संचारण करते थे, उनको आज 'Tribals' अर्थात्जन-जातिकहा जाता है।

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