मनुष्य का स्वाभाविक गुण है ‘दया’

मनुष्य का स्वाभाविक गुण है ‘दया’

डॉ. विपिन कुमार द्विवेदी 

पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार

 

समर्थ व्यक्ति तो इस दया के कारण विपन्न की विपन्नता का हरण कर सकता है, शुष्क चेहरे पर प्रसन्नता का संचार कर सकता है। दया किसी भी व्यक्ति के जीवन को आधार बना सकती है। दया के कारण हिंसक हिंसा छोड़ सकता है। वह सात्विक प्रवृत्ति का बन सकता है और लोकोपकार में सतत संलग्न रह सकता है। दया ने ही लुटेरे रत्नाकार को वाल्मिकी बनाया। दया ने ही राम जटायु को गले लगाया। दया ने ही पत्थर को अहिल्या बनाया। वह दया गुण ही मनुष्य को देवत्व की कोटि में ला देता है। भूखे, लाचार, रोगग्रस्त, वृद्ध, आपातग्रस्त स्त्री संसार के कष्टपन्न निर्दोष प्राणियों को देखकर हृदय का द्रवित हो जाना, और उसके लिए आंसू बहना ही तो दया है, जो कि व्यक्ति  को उसकी सेवा के लिए दृढ़ संकल्पित करती है और उस व्यक्ति को मानव से महामानव बना देती है।
दया मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है। दया को यदि दूसरे शब्दों में कहा जाय तो इसे संवेदना भी कह सकते हैं। जब व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति अन्य जगत् के प्राणी को विपन्न अवस्था में देखता है, तो उसके अन्दर भी उसी प्रकार के दु: का भाव उत्पन्न होता है जैसे विपन्न व्यक्ति के अन्दर दु: का। दोनों में इतना ही फर्क होता कि एक तो उस विपत्ति से ग्रस्त होकर उस अवस्था के अनुकूल रुदन जड़ता आदि की स्थिति अभिव्यक्त करता है अर्थात् ये स्थितियाँ उस व्यक्ति से झलकती हैं, किन्तु जो इस अवस्था को देखता है, वह कुछ विशेष ही अनुभव करता है, एक ही समय में रुदनादि क्रियाओं के साथ पुलकावलि का उठना, कष्ट रुधना, नेत्रों का जड़ हो जाना आदि की अभिव्यक्ति के साथ करुण रस मग्न हो जाता है। वह विपन्न व्यक्ति के उस विपन्नता को दूर करने का उपाय भी ढूंढ सकता है। समर्थ व्यक्ति तो इस दया के कारण विपन्न की विपन्नता का हरण कर सकता है, शुष्क चेहरे पर प्रसन्नता का संचार कर सकता है। दया किसी भी व्यक्ति के जीवन को आधार बना सकती है। दया के कारण हिंसक हिंसा छोड़ सकता है। वह सात्विक प्रवृत्ति का बन सकता है और लोकोपकार में सतत संलग्न रह सकता है। दया ने ही रत्नाकार को ऋषि वाल्मिकी बनाया। दया ने ही राम जटायु को गले लगाया। दया ने ही पत्थर को अहिल्या बनाया। वह दया गुण ही मनुष्य को देवत्व की कोटि में ला देता है। भूखे, लाचार, रोगग्रस्त, वृद्ध, आपातग्रस्त स्त्री संसार के कष्टापन्न निर्दोष प्राणियों को देखकर हृदय का द्रवित हो जाना, और उसके लिए आंसू बहना ही तो दया है, जो कि व्यक्ति को उसकी सेवा के लिए दृढ़ संकल्पित करती है और उस व्यक्ति को मानव से महामानव बना देती है। दया के कारण ही व्यक्ति में भावों का सागर उमड़ता है, जो कि उस व्यक्ति को कवि जैसी परम पावनी पदवी को प्राप्त करा देता है। पाश्चात्य विद्वान् शेक्सपियर ने तो इस दया को ईश्वरीय गुण बताया है।
It is an attribute to God himself (Mercy- poem) शेक्सपियर ने तो दया को करने वाले और दया को स्वीकार करने वाले उन दोनों प्राणियों के लिए आशीर्वाद बताया है, उन्होंने कहा कि दया बहुत शक्तिशाली व्यक्तियों में अत्यन्त शक्तिशाली गुण है। उन्होंने एक बहुत ही सुन्दर बात कही कि सिंहासन पर बैठने वाले राजा के मुकुट से कहीं ज्यादा शोभित होती है, तो दया, यदि वह उस राजा के हृदय में आरूढ़ है तो।
दया समर्थशालियों की शोभा बन सकती है, वह असमर्थों की मनुजता का भी प्रतीक है। इस संसार में कोई भी व्यक्ति किसी भी परिस्थिति का शिकार हो सकता है तथा उस स्थिति में वह अन्य व्यक्तियों द्वारा दया संवेदना का पात्र बन जाता है। दया-गुण को ईश्वरीय इसलिए भी माना जाता है क्योंकि उसका आरोप किसी भी व्यक्ति में नहीं किया जा सकता है। वह तो एक स्वाभाविक गुण है। जिसमें रहता है, वे व्यक्ति ही ईश्वर के सच्चे प्रतिनिधि हैं। श्रीकृष्ण ने भी श्रीमद्भगवदगीता में सम्पदाओं के विषय में बताते हुए अर्जुन से कहा है -
अंहिसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।
(गी. १६/)
 इसमें उन्होंने दया भूतेषु- अर्थात् प्राणियों के दया इसको भी दैवी सम्पत्तियों में से एक माना है, तो फिर क्यों इसे अपनाने वाला मानव से देव कोटि में आए। दया का वर्णन प्राच्य पाश्चात्य साहित्य में विस्तारपूर्वक प्राप्त होता है। भर्तृहरि भी नीतिशतक में लिखते हैं कि लोकाचार की मर्यादा और स्थिति उन कला कुशल नर रत्नों पर निर्भर है कि जो स्वजनों के साथ उदारता परजन में दया भाव आदि रखते हैं जैसे-
दाक्षिण्यं स्वजने दया परजने शाठ्यं सदा दुर्जने।
                                                                              (नी. श्लोकांश २२)
 यहाँ पर भर्तृहरि ने दूसरों पर दया करने के भाव को नीति के रूप में लिया है, जिसे अपनाने पर जीवन की मात्रा बड़े ही सुगमता से निरापद होकर चलती है। अमेरिका में हुए दया पर शोध के अनुसार यह स्पष्ट हुआ है कि दया रखने वाले व्यक्ति हिंसक आक्रामक व्यक्तियों से कहीं ज्यादा सफल होते हैं और उनकी जीवनीयता पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। ऐसे लोग कार्य को बेहतर ढंग से करते हैं और अपने आस-पास समरसता का वातावरण स्थापित करने में पूर्ण समर्थ होते हैं।
महाकवि कालिदास द्वारा रचित नाटक अभिज्ञान शाकुन्तल के प्रथमाङ्क का एक दृश्य दया की मूर्तिमती स्थिति को प्रकट करता है। जब राजा दुष्यन्त वन में शिकार खेलते हुए मृग का पीछा करते हैं, तभी वहाँ विचरण करते हुए वैखानस कहता है कि हे राजन! इस कोमल शरीर वाले मृग पर बाण मत छोडि़ए क्योंकि इन हिरणों का जीवन अत्यन्त चञ्चल निर्दोष है, जैसे-
खलु खलु बाण: सन्निपात्योऽमुस्मिन्,
मृदुनि मृगशरीरे तूलराशीवाग्नि:
(अभि.शा. /१० श्लोकांश)
 
तपोमय वनों में विचरण करने वाले पशु-पक्षियों का आश्रय ऋषि-कुटीर हुआ करते हैं। ऋषियों का उनके साथ समभाव हो जाता है, इसी समभाव के दयार्द होकर वैखानस राजा से हिरणों को बचाने की सिफारिश करता है।
एक दूसरा प्रसंग प्रसिद्ध महाकाव्य नैषधचरितम् से है जिसमें एक हंस राजा नल द्वारा पकड़े जाने पर उनके अन्दर दया को उद्दीप्त करने के लिए अपनी व्यथा कहता है- हे राजन्! मेरी माँ एक पुत्र वाली है, वृद्ध हो गयी है। मेरी पत्नी एकाकिनी है, उसके साथ मेरे भाई-बन्धु नहीं हैं, उसे अभी एक पुत्र हुआ है। उन दोनों की गति यही व्यक्ति है, क्या  मुझे पकडऩे से तुम्हे करुणा नहीं रोकती? जैसे-
भेदकपुत्रा जननी जरातुरा नवप्रसूतिर्वरटा तपस्विनी।
गतिस्तयोरेष जनस्तमर्दयहन्नहो विधे त्वां करुणा रुणद्धि न।।
(नैष. .)
 
इस प्रकार दया के अनेकानेक प्रसंग संस्कृत वाङ्मय में भरे हुए हैं। उन सभी का उल्लेख करना स्थानाभाव के कारण यहाँ करना संभव नहीं है। अन्त में मैं यही कहूँगा कि प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे की परिस्थिति में खड़ा होना चाहिए और यह भाव रखना चाहिए कि ईश्वर ने मुझे अपने सबसे दिव्य गुण दया का प्रयोग करने का सुअवसर प्रदान किया है, इसलिए इसे मैं अपने हाथ से नहीं जाने दूँगा और मानवता का प्रहरी बनकर उसकी सदा रक्षा करता रहूँगा। अंहकार द्वेष ये विष हैं, अत: इनका कभी भी पान नहीं करूँगा, समभाव में जीता हुआ जीवन को दया से अलंकृत करते हुए जीवन यापन करुँगा।

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