दिवाली का वैदिक स्वरूप एवं महत्त्व
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डॉ. महावीर
प्रति-कुलपति, पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार
जैसे ऋतुओं में ऋतुराज बसन्त का, पर्वतों में नगाधिराज हिमालय का, सरिताओं में भगवती भागीरथी का, फूलों में गुलाब का, पक्षियों में मयूर का सर्वोत्तम स्थान एवं महत्त्व है, ठीक ऐसे ही वर्षभर में आने वाले पर्वों में दीपावली का सर्वोकृष्ट स्थान है। एक साथ अपने आप में भारत देश महान् की अनेकानेक आदर्श परम्पराओं, विश्ववारा वैदिक संस्कृति के उदात्त भावों, सांस्कृतिक जीवन मूल्यों, वैदिक शिक्षाओं को जन-जन तक पहुँचाकर जनमानस को उत्साह, ऊर्जा, स्फूर्ति, नवोल्लास, प्र्रेम, विश्व बन्धुत्व आदि से ओत-प्रोत कर देने वाले प्रकाश पर्व की स्वागत की तैयारी एक माह पूर्व प्रारम्भ हो जाती है।
अश्विन शुक्ल प्रतिपदा के शुभागमन के साथ ही आलोक पर्व के आगमन की पद-चाप सुनाई देती है। अपार धन-सम्पत्ति के स्वामियों से लेकर अति साधारण निर्धन व्यक्ति भी दीपोत्सव के आगमन मात्र के संकेत से अति हर्षित हो जाता है। जिस प्रकार बसन्त आनन्द का पर्यायवाची माना जाता है, वैसे ही दीपावली भी धन, ऐश्वर्य, प्रसन्नता पारिवारिकता एवं प्र्रेम का सन्देश वाहक होता है। देश के किसी राज्य, नगर, महानगर में जीविकोपार्जन के लिये गये हुए प्रत्येक व्यक्ति के मन में अपने घर, अपने जन्मस्थान, अपने परिवार और अपने माता-पिता के पास किसी भी प्रकार से पहुँचने की प्रबल इच्छा रहती है। इन दिनों यातायात के समस्त साधन अपर्याप्त लगने लगते हैं। ऐसा क्या है इस पर्व में? आइये! इन बिन्दुओं पर थोड़ा विचार कर लें। कात्र्तिक मास की अमावस्या के दिन यह उत्सव आता है। जैसे शरद-पूर्णिमा की चन्द्रमा और तारों से जगमगाने वाली रात्रि सर्वाधिक ज्योतिष्मती होती है, वैसे कार्तिक अमावस्या की विभावरी सर्वाधिक तमसावृता होती है। इस अन्धकाराछन्न शर्वरी को देखकर सहसा ही कोटि-कोटि कण्ठों से प्रार्थना के स्वर मुखरित होते हैं।
‘असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय।’हमें असत्य से सत्य की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो, इन तीन प्रार्थनाओं में जीवन का समग्र सार अनुस्यूत है। असत्य, अन्धकार और मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सत्यपथ गामी, ज्योतिष्मान होकर मोक्ष का अधिकारी बनना ही तो मानव जीवन का लक्ष्य है। पुरुषार्थ चतुष्ट्य में भी यही भाव ओत-प्रोत है। जलते हुए दीप इसी भाव को जागृत करते हैं। ‘आत्मदीपो भव’ का यही अभिप्राय है। हम अपने जीवन को जलते हुए दीपक के समान बनायें। दीपोत्सव हमारे भीतर इसी संकल्पना को जगाता है। इस पर्व को शारदीय नवसस्येष्टि भी कहा जाता है। वर्षभर में यही एक ऐसा अवसर होता है, जब हम अपने भवनों को स्वच्छ बनाने का अभियान चलाते है। ‘विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव’ सारे दुर्गुण, दुर्व्यसनो की तरह घर का सारा कूड़ा-करकट दूर कर घर को निर्मल बनाना, केवल इसी त्यौहार के साथ जुड़ा हुआ है।
इस पर्व के साथ अनेक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं आध्यात्मिक पक्ष जुड़े हुए है। यद्यपि समय के प्रवाह के साथ इसे लक्ष्मी पूजन अर्थात् धन-ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये लक्ष्मी के आह्वान का उत्सव मान लिया गया है।
शान्त, सात्त्विक मन से चिन्तन करने पर इस उत्सव के अनेक उज्वल पक्ष हमें आनन्द से भर देते हैं।
कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से प्रारम्भ होने वाले पर्व का प्रथम दिवस धनतेरस कहा जाता है। इस दिन हिन्दू जन बहुत बड़े प्रमाण में सुवर्ण एवं रजत के आभूषण, सिक्के, नाना प्रकार के पात्र (बर्तन) आदि क्रय करते हैं। यह कार्य बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। यह आयुर्वेद ज्ञान के प्रदाता महर्षि धन्वन्तरि का जयन्ती दिवस है। आयुर्वेद, चिकित्सा विज्ञान के साथ एक अत्युत्तम जीवन पद्धति है। ‘जीवेम शरद: शतम्’ की प्रार्थना को पूर्ण कराने वाला अमोघ साधन है। संयमित दिनचर्या, सात्त्विक भोजन एवं प्रकृति ने हमारे चहुं ओर वृक्ष-लतागुल्म, पुष्प, फल आदि के रूप में जो अनमोल उपहार दिया हुआ है, इन सबसे लाभान्वित होते हुए स्वस्थ, सुखी और प्रसन्नता से युक्त जीवन जीयें। इस दिन आरोग्यदाता महर्षि धन्वन्तरि के उपकारों एवं शिक्षाओं को स्मरण करना चाहिए। किन्तु धन को ही जीवन का सर्वस्व समझने के कारण नाम साम्य से इसे धनतेरस मानकर धन की कामना करते हुए इसे सुवर्ण, रजत, हीरे, जवाहरात आदि से जोड़ दिया गया।
अमावस्या की निशा दीपावली, दीपोत्सव, आलोक पर्व या प्रकाश पर्व के रूप में विश्वविख्यात है। बड़े-बड़े राज प्रासादों से लेकर निर्धन की झोपड़ी दीप मालाओं से, विद्युत प्रकाश से जगमगाने लगती है। सर्वत्र हर्ष की असंख्य धारायें प्रत्येक भारतीय को अन्दर तक भिगो देती हैं। घर के खुले हुए द्वार से लक्ष्मी के शुभागमन की सबको आतुरता से प्रतीक्षा रहती है। यहाँ विशेष रूप से यह ध्यातव्य है कि दीपावली के दिन हम केवल लक्ष्मी का आह्वान करते हैं। पौराणिक आख्यानों के अनुसार विष्णु को लक्ष्मी कान्त अर्थात् लक्ष्मी का पति कहा जाता है। आलंकारिक शैली में लक्ष्मी का वाहन उल्लू एवं विष्णु का वाहन गरुड़ माना जाता है। जब हम केवल लक्ष्मी को पुकारते हैं, तब तक वह अपने वाहन उल्लू पर आरूढ़ होकर आती हैं अर्थात् याचक की बुद्धि को भ्रमित कर देती हैं। उल्लू प्रकाश का उपासक न होकर अन्धकार प्रेमी होता है। जो मानव केवल धनम्, धनम् की उपासना में लगा रहता है, वह गहन अन्धकार में डूबा रहता है, जबकि विष्णु अर्थात् सर्वव्यापक ईश्वर का स्मरण करते हुए ‘ईशावास्यमिदं सर्वं यत् किञ्च जगत्यां जगत्, तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:, मा गृध: कस्यस्विद्धनम्’ इस वेद मन्त्र पर पूर्ण विश्वास रखते हुए धन की प्राप्ति करता है। ‘वयं स्याम पतयो रयीणाम्’ का जाप करता है, उसके लिए लक्ष्मी सब प्रकार का सुख देती है। इसलिए ईश्वर विश्वास के साथ लक्ष्मी की कामना करनी चाहिए।
दीपावली की तमसावृता रजनी में जलते हुए असंख्य दीप हमें सन्देश देते हैं- मानव! अपने भीतर के अन्धकार को दूर कर परमात्म ज्योति से उसे आलोकित करो। जब तक काम, क्रोध, लोभ, अहंकार, ईष्र्या, द्वेष आदि का अंधेरा दूर नहीं होगा, तब तक बाहर का प्रकाश भला क्या करेगा। आज इसी की सर्वाधिक आवश्यकता है। आज से १३७ वर्ष पूर्व अपना जीवन दीप शान्त कर कोटि-कोटि मानवों के जीवन को ज्ञानालोक से आलोकित करने वाले युगप्रवर्तक, देशोद्धारक, आदित्य ब्रह्मचारी महर्षि दयानन्द सरस्वती का महाप्रयाण हम भारतवासियों के लिए अखण्ड प्रेरणा स्रोत है और सदैव प्रकाशमार्ग पर चलने की प्रेरणा देता रहेगा। प्रतिवर्ष दिवाली का पर्व उस महान् योगी के जीवन का पावन स्मरण कराता है। स्वामी दयानन्द के हम पर इतने उपकार हैं कि उन्हें गिनाया नहीं जा सकता। उनके महाप्रयाण का अलौकिक दृश्य आज भी हमें रोमांचित करता है, क्षौर कर्म कराके, स्नान आदि से निवृत्त होकर, पद्मासन लगाकर योग अवस्था में स्थित होकर मन्त्रोच्चारण करते हुए अंतिम श्वास लेने से पूर्व अलौकिक ईश्वरीय आभा से देदीप्यमान मुख चन्द्रमा वाले ऋषि ने प्रभु का स्मरण करते हुए कहा था- ‘प्रभो’! तेरी इच्छा पूर्ण हो, तूने बड़ी लीला की। प्राणोत्सर्ग के इस अद्भुत दृश्य को देखकर नास्तिक गुरुदत्त महान् आस्तिक बन गए थे और कोटि-कोटि भारतीयों के अन्त:करण प्रकाशमान हो गए। ऋषि के उपकारों को स्मरण करते हुए उर्दू के एक कवि ने कितना अच्छा लिखा है-
गिने जायें मुमकिन है सेहरा के जर्रे।
समुन्दर के कतरे फलक के सितारे।।
मगर कैसे मुमकिन है कि गिन सकें हम।
जो अहसां किये हैं ऋषि ने वे सारे।।
महर्षि दयानन्द निर्वाणोत्सव के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा का अनुष्ठान भी प्रबल प्रेरणा देने वाला है। हमने गौ को माँ कहकर पुकारा है। गौ को सर्वदेवमयी कहा जाता है। भगवती श्रुति कहती हैं- ‘माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभि:।’यह रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री एवं आदित्यों की भगिनी और अमृत की नाभि है। महर्षि दयानन्द ने गोकरुणानिधि नामक अपनी अमर कृति में गौ माता के उपकारों की गौरव गाथा वर्णित की है और कहा है कि कृषि प्रधान भारत देश की अर्थव्यवस्था का केन्द्र बिन्दु जिस दिन गौ माता होगी, उस दिन यह देश विश्व का सर्वधिक वैभवशाली, स्वस्थ, रोगरहित राष्ट्र होकर विश्वगुरु पद को प्राप्त कर सकेगा।
दीपावली के उत्सव की शृंखला का अन्तिम सोपान ‘भ्रातृद्वितीया’ भैय्या-दूज। भाई-बहन के पवित्र प्रेम की परम्परा को अभिव्यक्त करने वाला दिन। वेद का सन्देश है-
‘मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन् मा स्वसारमुत स्वसा’
भाई-भाई, भाई-बहन परस्पर कभी किसी प्रकार का द्वेष न करें। सदा स्नेह व्यवहार रखते हुए सुखमय जीवन जीयें। रक्षा बन्धन (श्रावणी) के दिन बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधती है। भाई वचन देता है, प्रतिज्ञा करता है कि यदि बहन की रक्षा के लिए प्राणों की आहूति देनी पड़े तो वह भी मैं सहर्ष दूंगा। इस संकल्प की पुनरावृत्ति है भैय्या दूज का पर्व। दीपावली की इस पावनी शृंखला के साथ काल प्रवाह से अनेक अवैदिक मान्यताएं, कथानक जुड़ते चले गए। न जाने कितने अज्ञानी इस सर्वश्रेष्ठ पर्व पर द्यूत क्रीड़ा (जुआ) से अपने परिवार को ही दरिद्रता के पंक में डुबो देते हैं। जबकि वेद की शिक्षा है- ‘अक्षैर्मा दिव्य: कृषिमित् कृषस्व’
हे मानव! जुआ खेलकर अपना जीवन नष्ट मत कर। खेती करके अपने घर को सुख का धाम बना।
इस प्रकार दीपावली हमें हर प्रकार की उत्तम प्रेरणा, शिक्षा और आनन्द प्रदान करने वाला सर्वश्रेष्ठ उत्सव है। इसे हम अज्ञान के अन्धकार में न डुबोयें, अपितु ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशमान करें। प्रतिदिन यज्ञ रचायें, वेद मन्त्रों की मधुर ध्वनि से, स्वाहा-स्वधाकार से धरती और आकाश को गुंजायमान कर दें। दीपों और यज्ञाग्रि के प्रकाश से अमावस्या के अन्धकार को दूर कर समूची वसुधा को जगमग-जगमग कर दें। सुविचारों-सुसंस्कारों और सत्संकल्पों से अपनी जीवन-ज्योति को प्रदीप्त करें।
प्रकाश पर्व पर यज्ञ में उच्चार्यमाण मन्त्रों के अर्थ पर यदि हम चिन्तन करेंगे तो हमारा जीवन पथ आलोकित होगा, इन्हीं भावों के साथ आप सब प्रबुद्ध, चिन्तनशील भाई-बहनों को दीपोत्सव की कोटि-कोटि हार्दिक शुभकामनाएं।
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