अमर हुतात्मा स्वामी श्रद्धानन्द

अमर हुतात्मा स्वामी श्रद्धानन्द

डॉ. महावीर

प्रति-कुलपति, पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार

अप्रैल सन् 1856 में वीर भूमि पंजाब के जालन्धर जनपद् के तलवन ग्राम में जन्म लेकर 23 दिसम्बर 1926 को राष्ट्र, धर्म और संस्कृति की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहूति देने वाले स्वामी श्रद्धानन्द का नाम भारतवर्ष के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। हम बचपन से गाया करते थे- ‘श्रद्धा से श्रद्धानन्द ने सीने पे खाई गोलियाँदुरात्मा अब्दुल रशीद द्वारा छलपूर्वक चलाई गोलियों से स्वतन्त्रता संग्राम के महायोद्धा, आर्य जाति के संरक्षक, वैदिक धर्म के रक्षक, प्राचीन गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति के पुनरूद्धारक स्वामी श्रद्धानन्द शहीद हो गये थे।
स्वामी जी का जीवन, लोहे से कुन्दन बनने की एक अमर गौरव गाथा है। दुव्र्यसनों की दलदल में धंसा हुआ मानव किसी पारसमणि सदृश महामानव के संसर्ग से राष्ट्रवन्द्य बन जाता है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है स्वामी जी का दिव्य जीवन।
स्वामी जी का संन्यास से पूर्व का नाम था मुंशीराम। पिता श्री नानकचन्द जी एक प्रतिष्ठित पुलिस अधिकारी थे। कानून की उच्च शिक्षा प्राप्त कर सम्मानित वकील बने। माता पिता के लाड़-प्यार और बुरे लोगों की संगति के कारण दुर्व्यसनों में फंस गये। पिता चिन्तित रहने लगे, ऐसे में प्रभु कृपा से वेदोद्धारक, राष्ट्रिय जागरण के पुरोधा महर्षि दयानन्द सरस्वती अपने क्रान्तिकारी समाज सुधार आन्दोलन के प्रचारार्थ बरेली पहुंचे। उनके व्याख्यानों की शान्ति व्यवस्था के लिए नगर कोतवाल श्री नानकचन्द को शासन द्वारा नियुक्त किया गया था। ऋषि के वैदिक, धार्मिक एवं देशभक्ति से ओत-प्रोत व्याख्यान सुनकर वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने पुत्र मुंशीराम को व्याख्यान श्रवण करने के लिए जाने की प्रेरणा दी। पिता की आज्ञा का पालन करते हुए मुंशीराम अपने साथियों के साथ सभा स्थल पर पहुंचे, तो वहां उन्होंने श्रोताओं में पादरी स्काट तथा तीन अन्य यूरोपियनों को देखा। ऋषिवर का व्याख्यान ध्यानपूर्वक सुना, अपनी शंकाओं का समाधान भी किया, फिर भी मुंशीराम के हृदय में ईश्वर के प्रति श्रद्धा जागृत नहीं हुई और वे ऋषि से कहते हैं - ऋषिवर आपने मेरी समस्त शंकाओं का समाधान कर दिया है, फिर भी मेरी ईश्वर पर आस्था नहीं हो रही है। इस पर ऋषि कहते हैं- मुंशीराम! तुम्हारा काम प्रश्न करने का है और मेरा काम उत्तर देना है। ईश्वर में विश्वास तो ईश्वर की कृपा से ही होता है।
बस इस घटना ने नास्तिक मुंशीराम को पक्का आस्तिक बना दिया। स्वामी दयानन्द की जीवनचर्या ने उनके जीवन को बदल दिया। पारसमणि के स्पर्श ने लोहे को सुवर्ण का आकार प्रदान करना प्रारम्भ कर दिया। वे केवल आस्तिक मुंशीराम ही नहीं बने, अपितु महात्मा मुंशीराम और स्वामी श्रद्धानन्द के रूप में विश्व विख्यात हो गए।

गुरुकुल की स्थापना

महर्षि दयानन्द के सत्यार्थ प्रकाश आदि अमर ग्रन्थों का अध्ययन कर और देश की शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा को देखकर प्राचीन भारतीय ज्ञान, शील और उत्तम जीवनचर्या पर आधारित गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली को पुनरूज्जीवित करने के लिये हरिद्वार में गंगा तट पर कांगड़ी गांव के समीप 04 मार्च 1902 में गुरुकुल की स्थापना करके शिक्षा के क्षेत्र में एक क्रान्तिकारी अध्याय का सूत्रपात किया। शिक्षा के माध्यम से देश के रूपान्तरण की प्रक्रिया इस गुरुकुल से प्रारम्भ हुई। आध्यात्मिकता, श्रमनिष्ठा, ब्रह्मचर्य, देशभक्ति और गुरु-शिष्य के मधुर सम्बन्धों पर आधारित इस गुरुकुल ने जीवन के विविध क्षेत्रों में अद्भुत कार्य करने वाले विद्वान् स्नातक राष्ट्र को दिये। वेद रूपी गंगा की अवरूद्ध धारा जिसे स्वामी दयानन्द ने पुन: इस धराधाम पर प्रवाहित करना प्रारम्भ किया था, उसे सर्वत्र प्रचारित, प्रसारित करने का अभिनन्दनीय कार्य गुरुकुल के आचार्यों एवं स्नातकों ने किया। वेद, उपनिषद्, दर्शन, योग, आयुर्वेद, उपनिषदादि की शिक्षा से ही देश में आत्म-गौरव का भाव जागृत होगा, इस आत्म विश्वास के साथ गुरुकुल ने अनेक ऐतिहासिक कार्य किये।
महात्मा मुंशीराम के राष्ट्रिय विचारों से प्रभावित होकर गुरुकुल के ब्रह्मचारियों ने एक महीने तक निरन्तर एक समय का भोजन त्यागकर और दूधिया बांध पर पत्थर ढोकर 1500/- रूपये एकत्रित किये और वह राशि अफ्रीका में संघर्षरत गांधी जी को भेजी। तब महात्मा गांधी ने स्वामी श्रद्धानन्द को लिखा था कि ‘‘यह राशि इस तथ्य का प्रतीक है कि आप जैसा महात्मा स्वतंत्रता के लिए विद्यार्थियों में ऐसे महान् संस्कार डाल रहा है, जो अपने देश पर सर्वस्व न्यौछावर करने के लिये कटिबद्ध हैं। मैं आपके दर्शन करना चाहता हूँ, आपके चरणों में अपना सिर रखना चाहता हूँ- गुरुकुल के इन विद्यार्थियों से मिलना चाहता हूँ। मैं स्वदेश आकर सर्वप्रथम गुरुकुल आउंगा और आपके दर्शन करूंगा।’’
महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से जब भारत आए, तब गुरुकुल कांगड़ी भी आए। उन्होंने स्वामी श्रद्धानन्द के चरणों में अपना सिर झुकाया। स्वामी जी ने उन्हेंमहात्माकहकर सम्बोधित किया और तबसे मिस्टर गांधी, सम्पूर्ण संसार में महात्मा गांधी के नाम से विख्यात हो गये।

वीर योद्धा

स्वामी जी स्वातन्त्र्य समर के अप्रतिम योद्धा थे। जलियां वाला काण्ड के बाद संपूर्ण देश में व्याप्त भय के वातावरण को दूर कर पुन: देशवासियों में वीरता के भाव भरने के लिये और अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने की भावना, जन-जन में जागृत करने के लिये कांग्रेस के 43वें राष्ट्रीय अधिवेशन का दायित्त्व स्वामी जी ने स्वीकार किया। अमृतसर में आयोजित इस अधिवेशन के स्वागताध्यक्ष के रूप में स्वामीजी ने सारी व्यवस्थायें की तभी मूसलाधार वर्षा ने सारे तम्बू उखाड़ दिये, शहर की गलियों में घुटनों तक पानी भर गया। दूसरे दिन अधिवेशन के लिए 12 विशेष ट्रेनों प्रतिनिधियों की आनी थी। स्वामी जी की प्रेरणा से सम्पूर्ण अमृतसर नगर ने अपने-अपने घरों के द्वार अतिथियों के सत्कार के लिये खोल दिये। स्वामी जी ने अपना स्वागत भाषण हिन्दी में देकर सबके अन्दर देशभक्ति और उत्साह का संचार कर दिया। सम्मेलन में अछूतोद्धार का प्रस्ताव पारित हुआ। रोलेट ऐक्ट के विरोध का संकल्प लिया गया, गांधी जी ने सत्याग्रह करने का निश्चय किया; हड़ताल हुई, जुलूस निकाले गए।
दिल्ली के चान्दनी चौक में जुलूस आगे बढ़ रहा था, जिसका नेतृत्त्व स्वामी श्रद्धानन्द कर रहे थे। अंग्रेज सैनिकों ने बन्दूकें तान दी, तब स्वामी श्रद्धानन्द ने अंग्रेज सैनिकों के सामने खड़े होकर छाती खोलकर उन्हें ललकारते हुए कहा था- ‘‘साहस है तो पहले गोली मुझ पर चलाओ’’स्थिति बड़ी भयानक थी। एक वीर योद्धा, विदेशी आक्रान्ताओं से मुकाबला कर रहा था। सरकार घबराई, सैनिकों को पीछे हटने का आदेश दिया, गोरे सिपाहियों की संगीनें झुक गई। इस प्रकार इस वीर योद्धा ने देश को नया साहस एवं नेतृत्त्व दिया।
वे सच्चे अर्थों में कल्याण मार्ग के पथिक थे। स्वामीजी के जीवन के ऐसे अनेक मार्मिक प्रसङ्ग हैं, जिन्हें स्मरण कर रोमांच हो जाता है। 12 अप्रैल 1917 को मायापुरी वाटिका कनखल में संन्यास आश्रम में प्रवेश कर स्वामी श्रद्धानन्द के नाम से विख्यात हुए। उस ऐतिहासिक अवसर पर अपने मनोभावों को प्रकट करते हुए स्वामीजी ने कहा था-
‘‘ईश कृपा से श्रद्धा से प्रेरित होकर ही आज तक के जीवन को मैंने पूरा किया है, श्रद्धा मेरे जीवन की आराध्या देवी है। अब भी श्रद्धाभाव से प्रेरित होकर ही संन्यास आश्रम में प्रवेश कर रहा हूँ। यज्ञकुण्ड की अग्नि को साक्षी रखकर मैं अपना नाम श्रद्धानन्द रख रहा हूँ।’’उन्होंने श्रद्धा को गुरु बनाया। किसी से संन्यास दीक्षा नहीं ली। अत: पुत्रैषणा, लोकैषणा, गुरुकुलैषणा त्याग कर निद्र्वन्द्व होकर लोक सेवा में जुट गये।
कठोपनिषद् के ऋषि वाजश्रवा तथा अपने गुरु स्वामी दयानन्द सरस्वती की तरह सर्वमेध यज्ञ किया। सबसे पहले अपने पुत्रों को गुरुकुल में प्रविष्ट किया। 1959 में अपना पुस्तकालय 1964 में सत्यधर्म प्रचारक प्रैस और अन्त में तीस हजार रूपये लागत की अपनी कोठी दान कर सर्वं वै पूर्णं स्वाहा करके सर्वमेध यज्ञ की पूर्णाहुति दे दी।
एक दिन ब्रिटिश प्रधानमंत्री श्री रेमजे मैकडानल्ड गुरुकुल पधारे। मुख्य द्वार पर उनका स्वागत किया गया। सभी अध्यापक एवं ब्रह्मचारी दोनों ओर पंक्तिबद्ध खड़े थे। श्री मैकडानल्ड हाथी से उतरे, महात्मा जी ने उनकी अगवानी की और गुरुकुल के अन्दर ले गये। दोनों का व्यक्तित्व भव्य एवं आकर्षक था। बाद में लन्दन पहुँचकर मैकडानल्ड ने अपनी इस यात्रा का विस्तृत समाचार वहाँ के दैनिक समाचार पत्रों में छपवाया। महात्मा मुंशीराम के विषय में अत्यन्त भावुकता के साथ वे लिखते हैं -
‘‘अगर आप आज के युग में पूज्य एवं पवित्र क्राइस्ट (ईसा) के दर्शन करना चाहते हैं, तो भारत के गुरुकुल कांगड़ी, हरिद्वार में, हिमालय की रमणीय तलहटी में गंगा की पवित्र धाराओं के मध्य, सघन वनों की छाया में, हिंसक जन्तुओं के मध्य, शिष्यों प्राचीन ऋषियों के रूप में निर्माण कर रहे, महात्मा मुंशीराम से मिलिये। आपकी आत्मा अद्भुत, अनिर्वचनीय पवित्रता से आनन्दित होगी।
अन्त में उन्होंने ने शुद्धिकरण को अपने जीवन का मुख्य अंग बनाया। इसी कार्य को करते हुए उन्होंने अपने प्राणों की आहूति दे दी। 23 दिसम्बर 1926 को अब्दुल रशीद नामक व्यक्ति उनसे मिलने आया। स्वामी जी बिमार थे, फिर भी उसको मिलने का समय दिया और उस आततायी ने उन पर गोलियाँ चलाई और वीर योद्धा के प्राण ले लिये। उस समय गोहाटी में कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा था। अधिवेशन की कार्यवाही रोक दी गई और शोक प्रस्ताव पारित किया गया। स्वामी श्रद्धानन्द के प्रति अपने उद्गार व्यक्त करते हुए गांधीजी नेयंग इंडियामें लिखा था किवे एक वीर योद्धा थे, वीर की तरह जीवित रहे। वीर कभी चारपाई पर नहीं मरता, वह तो युद्ध करता हुआ वीरगति को प्राप्त होता है। उनकी मृत्यु भी वीर की भांति धर्मयुद्ध के मैदान में हुई।
अपने तप, त्याग, सेवा, वीरता, राष्ट्र प्रेम, गुरुकुलीय शिक्षा के प्रति प्रेम के कारण वे इतिहास पुरुष बन गये। धरती से उठकर नील-गगन की ऊँचाईयों को छूने की स्वामीजी की अमर कहानी युगों-युगों तक प्रेरणा देती रहेगी। उनकी पावन स्मृति को कोटि-कोटि नमन।
 

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