नामकरण संस्कार

नामकरण संस्कार

स्वामी आनन्ददेव

किसी वस्तु को पहचानने तथा उसके संबंध में दूसरों के साथ व्यवहार करने में उसको कोई न कोई नाम देना आवश्यक है, परन्तु क्या सिर्फ नाम देना ही काफी है। संस्कार पद्धति का उद्देश्य श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर, उच्च से उच्चतर मानव का निर्माण करना है। इस दृष्टि से देखा जाए तो हर एक माता-पिता का कत्र्तव्य है कि संतान को ऐसा नाम दें, जो उसे हर समय जीवन के किसी लक्ष्य, किसी उद्देश्य की याद दिलाता रहे।
जात कर्म संस्कार के बाद पाँचवा संस्कार नामकरण संस्कार है, जिसमें नवजात बालक या बालिका का नाम रखा जाता है। अन्य संस्कारों को लोग भले ही न करते हों, परन्तु यह संस्कार इतने महत्त्व का है कि इसे घर-घर किया जाता है। नामकरण संस्कार का महत्त्व क्यों है? इसके संबंध में कुछ लिखना अप्रासंगिक न होगा।
किसी वस्तु का ज्ञान नाम के बिना नहीं होता। संसार का प्रत्येक व्यवहार नाम के आधार पर ही चलता है। जब तक किसी वस्तु या प्राणी की संज्ञा नहीं होती, तब तक उसके संबंध में ज्ञान प्रत्ययात्मक (Perceptual) तो हो सकता है, परन्तु क्रियात्मक, व्यवहारात्मक तथा उपयोगात्मक नहीं हो सकता। हमें गाय का ज्ञान है, घोड़े का ज्ञान है, परन्तु जब तक हम इस ज्ञान को कोई संज्ञा (नाम) नहीं देते, तब तक प्रत्ययात्मक रहेगा और हम तक ही सीमित रहेगा, हम इस ज्ञान को अपने व्यवहार में बातचीत में प्रयोग नहीं कर सकते। बिना नाम या बिना संज्ञा के ज्ञान 'निर्विकल्पक-ज्ञानहै, संज्ञा सहित या नाम सहित ज्ञान 'सविकल्प-ज्ञानहै। हमारा व्यवहार निर्विकल्पक ज्ञान पर नहीं चलता, सविकल्प ज्ञान पर चलता है। ज्ञान को सविकल्पक बना देने को ही नामकरण कहते हैं। बच्चे को अकेला नहीं रहना है, आगे संसार के साथ व्यवहार भी करना है, जिसके लिए उसे एक संज्ञा, एक नाम देना आवश्यक है। संज्ञा देने के इस कार्य को, नामकरण को, वैदिक विचार धारा में धार्मिक संस्कार का रूप दिया गया था।
नामकरण संस्कार को धार्मिक रूप देने का कारण किसी को पहचानने तथा उसके संबंध में दूसरे के साथ व्यवहार करने में उस व्यक्ति को नाम देना आवश्यक है। नाम ऐसा रखना चाहिए जो कि श्रेष्ठ माता-पिता-गुरु की भावनाओं को संक्षेप में व्यक्त करते हुए बालक को भी सदैव वैसा बनने के लिए प्रेरणा देता रहे। आने-जाने वाले सब व्यक्ति उस नवागत बालक का जब उस नाम से सम्बोधित कर उस पर अपना प्रेम व्यक्त करेंगे, तब प्रत्येक बार में नाम के वे शब्द उस बालक के हृदय तथा मस्तिष्क को उस नाम के अर्थ के अनुकूल रूप में प्रभावित कर रहे होंगे। यही कारण है कि नाम के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए वैदिक विचार धारा में इसका बड़ा महत्त्व है। नाम व्यक्ति के अस्तित्व, अहंकार से गहराई से जुड़ जाता है, जो कि मरण पर्यन्त उसके साथ रहता है, उसकी पहचान बनकर। व्यक्ति अपने नाम से प्रेरित, उत्साहित गुणवान होता रहे, इसके लिए जरूरी है कि उसका नाम सार्थक व शास्त्र सम्मत हो।
शब्द का प्रभाव- 'शब्दया 'वाणीमन और कर्म इन दोनों के मध्य में स्थित है। 'यन्मनसा मनुते तद् वाचा वदतियद् वाचा वदति तत् कर्मणा करोतिजो हम मन से सोचते हैं वही वाणी द्वारा  'शब्दसे बोलते हैं, वही 'कर्मसे करते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि शब्द के एक ओर मन बैठा है और दूसरी ओर कर्म बैठा है, शब्द इन दोनों के बीच में है। इन तीनों का आपस में संबंध है। इसी कारण से शब्द के प्रभाव से मन और कर्म दोनों पर प्रभाव पड़ता है। इस दृष्टि से सोचा जाए तो विचार को सूक्ष्म शब्द या सूक्ष्म वाणी कहा जा सकता है, वाणी या शब्द को स्थूल-विचार कहा जा सकता है। इसी तरह शब्द या वाणी को सूक्ष्म कर्म भी कहा जा सकता है, कर्म को स्थूल वाणी/शब्द कहा जा सकता है। विचार-शब्द-कर्म को एक दूसरे से पृथक् कर देना सम्भव नहीं है। शब्द एक तरह के कर्म या क्रिया है और कर्म या क्रिया भी एक तरह के  शब्द हैं। शब्द का शरीर पर प्रभाव इतना है कि किसी के प्रशंसा के शब्द या अपमान के शब्द सुनकर हम अपने मन और शरीर पर इसका प्रभाव देख सकते हैं। वैदिक संस्कृति में भी जप पर जो इतना अधिक बल दिया जाता है, उसका रहस्य भी इसी बात में निहित है कि शब्द का प्रभाव मन तथा शरीर दोनों पर होता है। शब्द का इतना महत्त्व है कि जो मंत्र प्रत्येक शास्त्र में मिलते हैं, उन्हें जब हम गुरु के मुख से गुरु-मंत्र के रूप में शब्दों द्वारा सुनते हैं, तब वे हमारे जीवन की अपूर्व निधि बन जाते हैं।
'शब्दनाम का ही दूसरा नाम है। प्रत्येक शब्द एक नाम है। जिससे हम किसी अर्थ को ग्रहण करते हैं। जब हम बालक को कोई नाम देते हैं, तब वस्तुत: उसके लिए शब्द चुन लेते हैं, जिसका प्रयोग उस बालक के लिए आयु भर किया जाता है। जिस शब्द का नाम के रूप में आयुभर प्रयोग किया जाता है, उसके चुनाव में कितना सतर्क होना चाहिए। यह स्वत: सिद्ध है।
नाम का चुनाव
संतान का नाम चुनना बड़ा महत्त्वपूर्ण है। जिस नाम से संतान को सम्बोधित करते हुए मानो उससे कह रहे हों कि बेटे, ये हैं हमारी तुमसे आशाएँ। इसके साथ वह संतान स्वयं और सभी सगे संबंधी भी जान सकें कि हमारी अपनी संतान के प्रति क्या आकांक्षाएँ हैं। अपने नाम को जब बालक बार-बार सुनेगा, तो उसका हृदय तथा मस्तिष्क अवश्य नाम में निहित अर्थ की भावना से प्रभावित होगा। इस दृष्टि से नाम के चयन के विषय में शास्त्रों में जो विधान है, वे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। नाम रखते समय कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए, जैसे- बालक-बालिकाओं के नाम जड़ पदार्थों, पशु-पक्षियों, देश-शहर के नाम पर या निरर्थक नहीं होने चाहिए।
मनुस्मृति (३/९) में कहा है- नक्र्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम्,
न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम्।। अर्थात् नक्षत्र, वृक्ष, नदी, पर्वत, पक्षी, साँप आदि नाम नहीं होने चाहिए। जिसका नाम जड़ पदार्थों को सूचित करता है, उसमें उन्नति की प्रेरणा कैसे हो सकती है।
ऊँची भावना जागृत करने वाला नाम रखना चाहिए। चरक संहिता में लिखा है- तत्र आभिप्रायिकं नाम- अर्थात् नाम सार्थक होना चाहिए, जो उच्च भावना को जगा सके, उदाहरणार्थ- वीरसेन अर्थात् जो युद्ध में वीर हो, सत्यव्रत अर्थात् जो जीवन में सदा सत्याचरण करने वाला हो, वेदव्रत अर्थात् जो वैदिक धर्म का पालन अपने वाणी, कर्म से करने वाला हो, भारद्वाज जो सभी को अन्न और बल, तेज से भरने वाला हो, आनन्द जो आनन्दित हो, सदा आनन्द बाँटे इत्यादि सभी उच्च भावनाप्रद सार्थक नाम हैं। ऐसा नाम भी नहीं रखना चाहिए जिनके साथ इतिहास में कोई बुरा संबंध जुड़ गया हो। उदाहरणार्थ दुयऱ्ोधन, शकुनि, जयचन्द्र, कंस, रावण आदि। जबकि युधिष्ठिर, भीम, कर्ण, विश्वामित्र, अभिमन्यु आदि नाम ऊँची भावनाओं के साथ जुड़े हुए हैं, इन नामों से व्यक्ति ऊँचा उठ सकता है। यह बात केवल वैदिक संस्कृति में पायी जाती है, विदेशों में निरर्थक नाम रखने का ही प्रचलन है। क्योंकि उन्होंने समझा नहीं कि नाम सिर्फ सम्बोधन के  लिए ही नहीं, बल्कि संतान के सामने नाम के द्वारा जीवन का एक लक्ष्य रख देना भी है। नाम सुगम होना चाहिए, जो कि स्पष्टता से बोला जा सके। कठिन नामों का ज्यादातर लोग सही उच्चारण नहीं कर पाते और गलत उच्चारण करते-करते नाम कुछ का कुछ बिगड़ जाता है।
नामकरण सम्बंधित और सूक्ष्म जानकारियों के लिए एक बार महर्षि दयानन्द रचित 'संस्कार विधिनामक पुस्तक में नामकरण संस्कार अवश्य देखें। जिससे अपने प्रिय बालक-बालिकाओं को शुद्ध, सार्थक और सटीक नाम रखने में आपको सुविधा होगी।
नामकरण संस्कार कभी भी, किसी के भी द्वारा नहीं किया जा सकता। इस संस्कार का समय संतान के जन्म होने के १० दिन बाद ११वें दिन होता है, अथवा जन्म से १०० दिन छोड़कर १०१ वें दिन, अथवा दूसरे वर्ष के प्रारम्भ में जिस दिन जन्म हुआ हो, उस दिन नामरकण संस्कार किया जा सकता है।
नामकरण संस्कार वैदिक विद्वान् पुरोहित के द्वारा विधिवत् यज्ञ करके सम्पन्न किया जाता है, जिसकी विधि मंत्रों सहित आपकी संस्कार विधि पुस्तक में देखने को मिल जाएगी।
आपके पुत्र-पुत्री आपका नाम रोशन करें, इसके लिए पहले आप उनका नाम वैदिक संस्कार विधि के द्वारा रोशन करें अर्थात् सार्थक, उच्च भावना जगाने वाला उपयुक्त नाम रखें। बड़े होने पर उसे अपने नाम का अर्थ भी बताएँ, जिससे वह अपने नाम की गहराई को अनुभव कर सके और स्वत: प्रेरित होता रहे। अगले क्रम में हम अन्नप्राशन संस्कार को जानेंगे।

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