प्राण और प्राणायाम का महत्व
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श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज
प्राणों के होने पर जीवन एवं प्राणों के न रहने पर मृत्यु होती है। प्राणायाम से अभिप्राय है-प्राणशक्ति का नियमन, नियंत्रण, विस्तार और लयबद्धता। प्राणवायु को मानव-जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक माना गया है, जिसको प्राणायाम के द्वारा नियंत्रित किया जाता है। |
धरती पर आने के बाद व्यक्ति यदि सर्वप्रथम कोई क्रिया करता है, तो वह क्रिया है-प्राण लेना और जीवन की अन्तिम क्रिया है-प्राण को छोडऩा।
प्राण के विषय में प्रश्नोपनिषद् में सौर्यायणी गाग्र्य ने पिप्पलाद ऋषि से पूछा कि भगवन्! इस मनुष्य के सो जाने पर भी कौन है जो जागता रहता है? इसके उत्तर में ऋषि कहते हैं- पाँच प्राणाग्नियाँ ही इस मानव-शरीर में सब इन्द्रियों के सो जाने पर भी जागती रहती हैं। श्वास-प्रश्वास हमारे जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्रिया है, इसलिए उसकी ओर हमारा ध्यान जाना भी स्वाभाविक ही है।
प्रश्नोपनिषद् में ही प्राण को माता की भाँति हमारी रक्षा करने वाला बताते हुए कहा है कि- जैसे माता पुत्र की रक्षा करती है, ऐसे ही यह प्राण हमारी रक्षा करता है।
त्रिलोक में जो कुछ भी प्रतिष्ठित है, वह सब प्राण के वश में है। प्राण हमें श्री अर्थात् भौतिक ऐश्वर्य तथा प्रज्ञा अर्थात् बौद्धिक व आध्यात्मिक ऐश्वर्य प्रदान करता है। इस सम्पूर्ण विषय का शास्त्रों में वर्णन किया गया है। शतपथ-ब्राह्मण तथा प्रश्नोपनिषद् में उदय होते हुए सूर्य को साक्षात् जीवनदाता प्राण कहा है- सहस्ररश्मि: शतधा वत्र्तमान: प्राण: प्रजानामुदयत्येष सूर्य: (प्रश्नोपनिषद् १.८) अर्थात् हजारों रश्मियों वाला यह सूर्य हमारे लिए प्राण के रूप में उदय होता है।
ब्रह्माण्ड में यज्ञ करते समय विशिष्ट देवों के लिए जो हवि प्रदान की जाती है, वह हवि वायु अर्थात् प्राण के माध्यम से ही इन्द्र आदि समस्त देवों तक पहुँचती हैं। पिण्ड (शरीर) में जो कुछ भी अन्न या जलादि हवि के रूप में हम अन्दर डालते हैं, उसका पोषण प्राणवायु के माध्यम से सम्पूर्ण शरीर के प्रत्येक अङ्ग को प्राप्त होता है।
महर्षि पतंजलि ने 'योगसूत्र’ में व्याधि आदि अन्तरायों के निवारण तथा समाधि की प्राप्ति के लिए अष्टाङ्गयोग का विधान किया है। अष्टाङ्गयोग के अन्तर्गत चतुर्थ अंग प्राणायाम प्राण से सम्बद्ध उत्कृष्ट यौगिक क्रिया है।
यह प्राणायाम साधना की सिद्धि से सम्बद्ध समयसीमा की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। यह निश्चय ही अष्टाङ्ग योग का प्राण है, जो बहिरङ्ग एवं अन्तरङ्ग योगाङ्गों को जोडऩे का सेतु है।
प्राणायाम से अभिप्राय है-प्राणशक्ति का नियमन, नियंत्रण, विस्तार और लयबद्धता। प्राणवायु को मानव-जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक माना गया है, जिसको प्राणायाम के द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
प्राण, हृदय व मन का स्वाभाविक रूप से घनिष्ठ सम्बन्ध है, अत: प्राण की अनुकूलता से व्यक्ति का सम्पूर्ण आन्तरिक और बाह्य जीवन शान्त, सहज और नीरोग रहता है। प्राणायाम के अभाव में योगसिद्धि अर्थात् समाधि की अवधारणा पूर्णत: अधूरी है; क्योंकि मनोवृत्ति प्राण पर आश्रित रहती है।
प्राणायाम मानवशरीरस्थ सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्वों, यथा-पाँच मुख्य प्राणों एवं पाँच उपप्राणों को सन्तुलित एवं स्वस्थ रखने का सर्वाधिक प्रामाणिक, नैसर्गिक व प्रत्यक्ष साधन है।
प्राण से ही प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की डोर बँधी हुई है तथा प्राण से ही मनुष्य के अस्तित्व और जीवन को गति मिलती है। अत: प्राण को प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का आधार कहा जाता है।
प्राणों के धरातल पर समस्त सृष्टि के क्रियाकलापों का सृजन होता है। प्राणों को स्वस्थ एवं सन्तुलित करना तथा मन को ओजस्वी एवं संकल्पवान् बनाना प्राणायाम का मुख्य प्रयोजन है।
वैदिक वाङ्मय में तीन प्रकार की चिकित्साओं का वर्णन उपलब्ध होता है- (1) दैवी-चिकित्सा, (2) मानुषी-चिकित्सा एवं (3) आसुरी चिकित्सा। जिसमें प्राणायाम के द्वारा रोगों को दूर किया जाता है वह 'दैवी-चिकित्सा’ कहलाती है।
ऋग्वेद में प्राण की स्तुति करते हुए कहा है कि-हे प्राण! औषध बनकर तुम हमें प्राप्त होओ तथा जो अशुद्धि, रोग या विकार हैं, उनको दूर कर दो। तुम्हीं सम्पूर्ण औषध हो और साथ ही तुम देवताओं के दूत हो अर्थात् दिव्य-भावों को प्रदान करने वाले हो।
आ वात वाहि भेषजं वि वात वाहि यद्रप:।
त्वं हि विश्वभेषजो देवानां दूत ईयसे।। (ऋग्- १०.१३७.३)
आयुर्वेदानुसार जीवन के प्रमुख तीन स्तम्भ अर्थात् त्रिदोष में से वात सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। यहाँ वात से तात्पर्य प्राण-तत्त्व से ही है। आयुर्वेदशास्त्र में कहा गया है कि- कोई भी रोग केवल कफ या केवल पित्तजन्य नहीं होता, अपितु वात का आश्रय लेकर ही समस्त विकार वृद्धि को प्राप्त होते हैं अर्थात् प्रत्येक रोग में वात की कुछ-न-कुछ भूमिका होती ही है।
वात या प्राण-तत्त्व शरीर की प्रत्येक कोशिका में व्याप्त है। इसी को सन्तुलित व सम रखने के लिए प्राणायाम का अभ्यास सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। वस्तुत: प्राणायाम प्राणों को और अधिक बलवान् बनाने का कार्य करता है।
अश्विनी कुमार अर्थात् प्राण-अपान ही शरीरस्थ च्यवन-प्रक्रिया (Metabolism) को ठीक करके पुन: स्वास्थ्य और आयु की वृद्धि कर सकते हैं। शरीरस्थ रसों को फिर से बलिष्ठ बनाने वाली विधि है प्राणायाम।
पञ्चकोश का योग में बड़ा महत्त्व है। इन पञ्चकोशों में भी प्राणमयकोश को ऊर्जा का केन्द्र कहा गया है। प्रकृति में चारों ओर व्याप्त यह वायु का सूक्ष्मातिसूक्ष्म अंश ही शरीरस्थ प्राण (जीवनीय-तत्त्व) के रूप में जाना जाता है। प्राणायाम द्वारा प्राण-साधना के निरन्तर अभ्यास से प्राणमयकोश स्वस्थ व सन्तुलित होकर सम्पूर्ण शरीर व मन को स्वस्थ व ऊर्जावान् बनाये रखता है। अतएव प्राचीन ऋषियों ने प्राणविद्या की यथार्थता को जानकर जिस योगविद्या का आविष्कार किया, वही विधि अनन्तकाल तक दीर्घायुष्य और मोक्ष की प्राप्ति के लिए सर्वोत्कृष्ट मानी जाती रहेगी। इस प्रकार प्राण की प्रतिष्ठा ही अमृतत्व है और प्राण की उत्क्रान्ति ही मृत्यु है, अत: धरातल पर प्राणायाम अष्टाङ्गयोग के प्राण के रूप में प्रतिष्ठित है। अग्रिम अंक में हम प्राणायाम के नियमों का वर्णन करेंगे।
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