भारतीय संस्कृति की उभरती वैश्विक सार्थकता
On
प्रो. जगमोहन सिंह राजपूत
भारतीय संस्कृति को सनातन धर्म से अलग कर नहीं देखा जा सकता। ऐसा मुख्य रूप से इसके मूल रूप को न समझ पाने के कारण ही होता है। यह विश्व की उस एकमात्र सभ्यता का आधार स्तम्भ रहा है जो अंतिम सत्य तक पहुँचाने के लिए अनेक मार्गों को स्वीकार करता है, उन्हें उचित और सत्य मानता है, उनके अनुयायियों को अपने मार्ग पर ही सही ढंग से चलने को प्रेरित करता है। आज के हिंसा, भय, अविश्वास, युद्ध, असुरक्षा से घिरे विश्व को राह दिखा सकने वाले दर्शन और व्यावहारिक अनुपालन का जितना अनुभव भारत के पास है, उतना अन्य किसी सभ्य देश के पास नहीं है। अत: भारत का यह नैतिक उत्तरदायित्व चुनौती बनकर उसके समक्ष उपस्थित है कि वह मानव सभ्यता को इस झंझावात से मुक्ति दिलाये। पहला कदम तो अपने को जानना, अपने वैश्विक उत्तरदायित्व के निर्वाह के लिए सक्षम बनाने से ही प्रारम्भ होगा। यह तभी संभव है जब भारत के लोग भारत को जानें, उसकी शक्ति को पहचानें और अपने कर्तव्यों को 'सर्वभूतहिते रता:’ की संस्कृति के आधार पर निर्धारित कर आत्म-विश्वास के साथ आगे बढ़ें। इस संस्कृति में 'मैं सबसे अंत में आता है, इसमें सम्बन्ध उपयोगिता के आधार पर नहीं बनते, वरन श्रद्धा, सम्मान तथा निरंतरता पर दृढ़ होते हैं, यह मानकर कि जीवन आदर्श उद्देश्यों की प्राप्ति में ही लगाया जाना चाहिए। इस चिंतन का संबल है प्राणिमात्र की एकता, यानी सभी का उस परम सत्य का अंश होना। प्राचीन भारतीय संस्कृति का उद्भव जिस 'सद्-आचरण’ यानी 'धर्म’ की राह दिखाता है उसकी सार्थकता शाश्वत बनी रहेगी। यह विश्वास अब फिर से प्रस्फुटित हो रहा है। भारतीयों को अपने ऐतिहासिक उत्तरदायित्व को निभाने का समय आ गया है। इसके लिए प्राचीन भारत की सोच, सभ्यता, और मानव तथा प्रकृति के मध्य समन्वय की संस्कृति की व्यावहारिकता को विश्वपटल पर लाने का उत्तरदायित्व भारतीयों का है और उन्हें इसके लिए तैयार करना आवश्यक है। शिक्षा व्यवस्था को तदनुसार परिवर्तित करना आवश्यक होगा।
21वीं सदी के इस दूसरे दशक में विश्व के सामने अनेक समस्याएँ विकराल और विकट रूप में चुनौती बनकर उभरी हैं और समाधान के लिए सामने खड़ी हैं। मानव सभ्यता जिस स्वरूप में विकसित हुई है, उस पर समय के साथ गहरे प्रश्न चिह्न लगते जा रहे हैं। महात्मा गांधी ने तो 1909 में अपनी कालजयी रचना 'हिन्द स्वराज’ में इस पर गंभीर प्रश्न उठाये थे। उन्होंने इसे शैतानी सभ्यता कहा था। अपेक्षा तो यह थी कि स्वतंत्र भारत अनगिनत ऋषियों और मनीषियों द्वारा विकसित अपनी सनातन ज्ञानार्जन परंपरा, संस्कृति तथा सभ्यता की गतिशीलता को जीवंत रखते हुए उसे समसामयिक सन्दर्भ में विश्व के समक्ष एक सशक्त व्यावहारिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत करेगा। यह भी अपेक्षा थी कि वह स्वयं अपने विकास और प्रगति का मार्ग चुनते समय इसका उपयोग करेगा। ऐसा हुआ नहीं यद्यपि भारत के ज्ञानकोष, मानव तथा प्रकृति की पारस्परिकता और ब्रह्माण्ड के संबंधों की गहरी समझ और उससे उपजी आध्यात्मिकता व श्रेष्ठता को तो सारे विश्व ने हजारों सालों से स्वीकार किया हुआ है। भारत से आज भी कितनी बड़ी आशाएँ और अपेक्षाएँ हैं, भारत को सही ढंग से समझने वाले विद्वान् लगाए हुए हैं, इसका अनुमान अर्नाल्ड टायनबी के इन शब्दों से लगाया जा सकता है- 'यह भली भाँति स्पष्ट है कि एक अध्याय जिसकी शुरुआत पाश्चात्य थी, यदि उसका अंत मानवजाति के आत्मसंहार में नहीं होना है तो समापन भारतीय होगा। मानव इतिहास के इस सबसे अधिक खतरनाक क्षण में मानवजाति की मुक्ति का यदि कोई रास्ता है, तो वह भारतीय है। चक्रवर्ती अशोक और महात्मा गांधी का अहिंसा का सिद्धांत और श्री रामकृष्ण परमहंस के धार्मिक सहिष्णुता के उपदेश ही मानवजाति को बचा सकते हैं। यहाँ हमारे पास एक ऐसी मनोवृत्ति व भावना है जो मानवजाति को एक परिवार के रूप में विकसित होने में सहायक हो सकती है। आज अणु युद्ध में विनाश का यही विकल्प है (सब धर्मों का सार एक है, नानी पालखीवाला, भारतीय विद्या भवन, बम्बई, 1993 पृष्ठ, 19), यह कुछ दशक पहले लिखा गया था। आज की परिस्थिति तो उस समय के मुकाबले कई गुना अधिक विनाशकारी दिखाई देती है। मनुष्य के पास इस पृथ्वी को अनेक बार नष्ट करने के हथियार उपलब्ध हैं, वह इनमें लगातार वृद्धि करता ही जा रहा है। जितनी हिंसा, हत्या, धर्मान्धता, अविश्वास, शोषण, प्रकृति का अंधाधुंध दोहन, बिमारी व भुखमरी इस समय विश्व में है, उतनी पहले कभी नहीं थी। दूसरी तरफ विज्ञान और तकनीकी नित नए आयाम प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे संपन्न वर्ग के लिए जीवन अधिक सरल और सक्रिय बनता जा रहा है। आज मनुष्य के पास इतने कौशल, तकनीक, साधन तथा क्षमता उपलब्ध हैं कि विश्व का हर नागरिक एक गरिमामय मानवीय जीवन बिता सकता है, हर किसी को सम्मानपूर्वक जीने के संसाधन उपलब्ध कराये जा सकते हैं। गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, बिमारी इत्यादि से हर व्यक्ति को बाहर लाया जा सकता है। मगर ऐसा हो नहीं रहा है। क्यों, क्योंकि हम विश्वग्राम में एक-दूसरे के पड़ोस में आ गए हैं, मगर पड़ोसी का धर्म भूल गए हैं।
सर्वविदित है कि भारत में स्वतन्त्रता के पहले से स्थापित परम्परागत शिक्षा प्रणाली को नष्ट कर रोपित प्रणाली और मातृभाषा के स्थान पर अंग्रेजी के माध्यम से शिक्षा देने का जो नीतिगत परिवर्तन किया गया, वह विदेशियों के दृष्टिकोण से इतना सफल रहा कि उसका प्रभाव आज भी घटा तो नहीं, वरन बढ़ता ही जा रहा है। आज भारत अन्य देशों का अनुकरण करने में सबसे आगे माना जाता है। हमने अपने जीवन मूल्य तक भुला दिए हैं। अपनी परम्पराओं से दूरी बना ली है, धार्मिकता को पंथनिरपेक्षता की स्वार्थ-परक प्रचार पर न्यौछावर कर दिया है। हम अपनी मातृभाषाओं से जानबूझ कर न केवल स्वयं दूर हो रहे हैं, साथ में देश की भावी पीढिय़ों को भी दूर करते जा रहे हैं। कुल मिलाकर स्वतंत्र भारत ने अपनी उस पहचान को भुलाने के लिए लगातार प्रयास और परिश्रम किया है जो उसकी मूल सनातन संस्कृति की श्रेष्ठता से उपजी थी और विश्व के समक्ष भारत की पहचान के रूप में सराही गई थी। अन्तर्निहित स्वार्थपरक उद्देश्यों के कारण भारत में सेक्युलर शब्द का घोर दुरुपयोग भारतीयों को भारत से दूर करने के लिए भारतीयों के एक वर्ग द्वारा ही लगातार किया गया है। भारत की अपनी मेधा, प्रतिभा और प्रवृत्ति से उसके पीढिय़ों को 'सेक्युलरिज्म’ के नाम पर अलग करना कितना आत्मघाती हो सकता है इसे कहने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अब इसके परिणाम सामने आने लगे हैं। हमारे अनेक समकालीन मनीषियों ने अपनी दूरदृष्टि तथा अंतर्दृष्टि से आगे आनेवाली परिस्थितियों का अनुमान तो स्वतंत्रता के पहले से लगा लिया था। स्वामी विवेकानंद इनमें अग्रणी थे। भारत की मूल संस्कृति की आत्मा तो उसकी पवित्रता -सेक्रेड- धार्मिकता में ही निहित है जिसमें सफल जीवन जीने की और उसमें परम आनंद 'सत्-चित्-आनंद’ प्राप्त करने के मुख्य उद्देश्य के स्वरूप में सामने आती है। इसी से उत्पन्न सामाजिकता ने राजर्षि की न केवल संकल्पना की, वरन् उसे व्यवहार में मूर्त रूप देकर सफलतापूर्वक नेतृत्व तथा सामाजिक और सांस्कृतिक एकता को साकार कर विश्व को नया मार्ग दिखाया। इसके पीछे का दर्शन कितना सहज और सुलभ लगता है, मगर इस अवस्था को प्राप्त तो प्रयत्न पूर्वक ही किया जा सकता है। पहले 'स्व-नियंत्रण फिर औरों पर नेतृत्व’ जैसा विचार धार्मिकता को सेवा भाव में परिवर्तित कर देता है। महात्मा गांधी ने इसे समझा, और तभी वे कह सके, 'मेरा जीवन ही मेरा सन्देश है’ वह भारतीय मेधा में ही संभव था कि चन्द्रगुप्त और चाणक्य, अशोक और उपगुप्त, विक्रमादित्य एवं कालिदास साथ आ सके और राजर्षि की संकल्पना को साकार कर सके। ऋषि वही जो बुद्धि से तथा दूरदृष्टि से आगे की संकल्पना कर सके, वही राजा यानी कार्यकारक को मार्ग दिखा सकता है, उसे राजधर्म पर सदा व्यवस्थित बने रहने की प्रेरणा देता रहता है। साथ ही उस पर एक पैनी निगाह भी बनाए रखता है। क्या हर भारतीय युवक को राजा जनक जैसे व्यक्तित्व से परिचित नहीं होना चाहिए या उन्हें विदेह शब्द के पीछे के दर्शन, उसकी आवश्यकता और पृथ्वी पर मनुष्य तथा प्रकृति के बीच के संबंधों को बनाए रखने की आवश्यकता में योगदान को अपना कत्र्तव्य नहीं मानना चाहिए।
यहाँ हर सफल शासक की सफलता में उसके गुरु, यानी बुद्धि तत्त्व तथा आध्यात्मिक तत्त्व सदा ही अग्रणी रहा है। गुरु-शिष्य संवाद की अप्रतिम धरोहर का साकार स्वरूप- गीता जीवन के हर उस पक्ष को उजागर करता है जिसके निहित दर्शन के आधार पर भारत की मूल संस्कृति और उसकी संरचना इस देश को एक अद्भुत एकता में बांधती है। यहाँ हर प्रकार की विविधता स्वीकार्य है क्योंकि सभी कुछ जड़ और चेतन उस एकमात्र 'सत्य’ के द्वारा ही सृजित है, और उसकी उपस्थिति सर्व-व्यापी है। अत: कुछ भी और कोई भी त्याज्य हो ही नहीं सकता है। प्रकृति ने जो कुछ भी मनुष्य के जीवन यापन के लिए दिया है उस पर सभी का बराबर का अधिकार है। इसमें जो सभ्यता पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों तक को सम्मिलित करती है, उन्हें देवत्व प्रदान करती है, वह किसी को भी उसके पंथ, मत या पूजा पद्धति के आधार पर ऊँच-नीच जैसे किसी भेदभाव को सिद्धांतत: स्वीकार कर ही नहीं सकती है। ऐसी सभ्यता ही प्रतिपादित कर सकती है-
अयं निज: परोवेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानान्तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।
इस समय देश के समक्ष यह प्रश्न लगभग लगातार ही उठाया जाता है कि ज्ञानार्जन के क्षेत्र में विशेषकर शोध एवं नवाचार में भारत अपनी वैश्विक स्थिति के अनुपात से अत्यंत क्षीण योगदान कर पा रहा है। आज के समय जो कुछ भी हमें आकर्षित करता है और जिसका उपयोग सभी करते हैं या करना चाहते हैं उसमें से कुछ भी ऐसा नहीं है जिसकी खोज भारतीयों ने पिछले सौ-पचास वर्षों में की हो। कार, फ्रिज, मोबाइल, टीवी, एसी, रेलवे ट्रेन, एयरो प्लेन, रॉकेट और अन्य कितने ही साधनों और उपकरणों का हम उपयोग तो करते हैं मगर हम इसी से प्रसन्न हो जाते हैं कि हमारे युवाओं ने नासा और सिलिकॉन वैली में जाकर अपना स्थान बनाया, भारत का मान बढाया। क्या यह उस देश के लिए काफी है जिसके मनीषियों, ऋषियों, वैज्ञानिकों, आचार्यों ने सभ्यता के उस दौर में प्रकृति के रहस्यों की खोज में जीवन अर्पित केवल इस लिए किया कि उनका ही नहीं मानव मात्र का ज्ञान भण्डार बढ़े, लोगों की समझ, बुद्धि और विवेक सतत बढ़ता रहे ताकि हर मनुष्य एक मानवीय जीवन व्यतीत कर सके। ज्ञान सर्जन की इस प्राचीन परंपरा में अनेक व्यवधान आये, इसे नष्ट करने के नियोजित प्रयास किये गए, मगर इसकी जड़ें इतनी गहरी थीं कि वे मजबूती से पुन: प्रस्फुटन के अवसरों की प्रतीक्षा करती रहीं। पिछले सात दशकों से यह अवसर हमारे समक्ष पुन: उपस्थित हुआ है। हम इसका लाभ उठाने के लिए अपने को तैयार नहीं कर पाए, हम पश्चिम की सभ्यता और संस्कृति के चकाचौंध में अपनी संस्कृति से दूर हो गए। बड़े आहत मन से यह कहना पड़ता है कि जिन्हें इस दिशा में भारत को ले जाना था वे स्वयं ही भारत के गौरव गाथा से अपरिचित थे, उसके महत्व से अनभिज्ञ थे और राजनीति में ओछे उद्देश्यों को प्रमुखता देने से आगे न तो बढ़ सके, न सोच सके। यह प्राचीन भारतीय सभ्यता, संस्कृति तथा सनातन धर्म की सम्मिलित व्यावहारिकता ही थी जिसने अन्य सभ्यताओं, पंथों तथा उनके मतावलम्बियों को अलग या दूसरे लोग नहीं माना। सभी को एक ईश्वर की संतान माना। इस ऐतिहासिक स्वीकृति के महत्व को 'सांझा संस्कृति’ या मिश्रित संस्कृति के समक्ष योजनाबद्ध ढंग से स्वतन्त्रता के बाद नकारा गया। परिणाम स्वरूप भारत की तीन पीढियाँ अपनी विरासत और 'स्वीकृति की संस्कृति’ से पूर्ण परिचय प्राप्त ही नहीं कर सकीं। परिणाम स्वरूप वे पश्चिम की ओर आकर्षित होती गईं। यह कैसी विडम्बना है की मध्य पूर्व से बड़ी संख्या में आये शरणार्थियों के साथ मिलकर निर्वाह करने में पश्चिम के देश असहज स्थिति में हैं और वे भारत की ओर समाधान के लिए देख रहे हैं।
शिक्षा में स्वामी विवेकानंद जी की दृष्टि
भारत की आध्यात्मिकता की समझ की श्रेष्ठता और उसकी सभ्यता की निरंतरता को, जो उसकी ज्ञानार्जन की परम्परा के आधार पर लगातार विकसित और समृद्ध होती रही, विश्व के सामने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने वालों में स्वामी विवेकानंद का स्थान अप्रतिम है। उन्हीं के शब्दों में-'हम यह भी जानते हैं कि सबसे अधिक शक्ति सूक्ष्म में है, स्थूल में नहीं। उसी से अनेक सूक्ष्म नियम हैं जो हम जानते है, इन भौतिक नियमों से अतीत हैं। मतलब यह कि भौतिक जगत्, मानसिक जगत् या आध्यात्मिक जगत् इस तरह की कोई नितान्त स्वतंत्र सत्ताएं नहीं हैं। जो कुछ है, सब एक तत्त्व है। या हम यूँ कहेंगे कि यह सब ऐसी वस्तु है, जो यहाँ पर मोटी है और जैसे जैसे ऊँची चढ़ती है, वैसे ही वह सूक्ष्मतर होती जाती है, सूक्ष्मतम को हम आत्मा कहते हैं और स्थूलतम को शरीर। और जो कुछ छोटे परिमाण में इस शरीर में है, वही बड़े परिमाण में विश्व में है। जो पिंड में है वही ब्रह्मांड में है। यह सारा विश्व ठीक उसी प्रकार का है। बहिरंग में स्थूल घनत्व है और जैसे-जैसे यह ऊँचा उठता है, वैसे वैसे सूक्ष्मतर होता जाता है और अंत में परमेश्वर-रूप बन जाता है’ (शिक्षा, रामकृष्ण मठ, नागपुर, पृष्ठ 21)। जब तक व्यक्ति स्थूलता में ही भ्रमित रहता है, उसे भौतिकवाद की चमक घेरे रहती है, वह उसी में और गहराई तक प्रवेश कर जीवन में सुख और आनंद की खोज में लग जाता है। भारत की सभ्यता के आधार स्तम्भ उसके शास्त्रों तथा प्राचीन ग्रंथों में उजागर किये गए हैं। मनु ने आत्म-नियंत्रण, दानशीलता, इन्द्रियों को वश में करना, सत्य की खोज, पवित्रता, क्रोध पर विजय, धैर्य, दुर्भावना तथ घृणा से दूर रहने जैसे तत्वों को उल्लिखित किया है। महाभारत में आहिंसा, सत्य, क्रोध का परित्याग, आत्म-नियंत्रण, उदारता/दानशीलता, जैसे गुणों को आवश्यक माना है। कुल मिलाकर एक सफल, संतोषप्रद, सेवाभाव से परिपूर्ण जीवन के लिए इन्हें दिशा-निर्देश के रूप में ही इंगित किया गया है। रामायण, महाभारत में वर्णित चरित्र जिन गुणों से परिपूर्ण हैं, उनसे नई पीढ़ी अपनी संस्कृति से परिचित होती है और साथ ही साथ उसे अपने लिए जीवन-लक्ष्य निर्धारित करने में सहायता भी प्राप्त होती है। स्वामी विवेकानन्द के अनुसार 'मनुष्य को पूर्ण विकसित बनाना- यही इस शास्त्र का उपयोग है। युगानुयुग प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं। जैसे एक काठ का टुकड़ा केवल खिलौना बन समुद्र की लहरों द्वारा इधर-उधर फेंका जाता है, उसी प्रकार हमें भी प्रकृति के जड़ नियमों के हाथों खिलौना बनने की आवश्यकता नहीं है। यह विज्ञान चाहता है कि तुम शक्तिशाली बनो, कार्य को अपने हाथ में ले लो, प्रकृति के भरोसे मत छोड़ो और इस छोटे से जीवन के उस पार हो जाओ। यही वह उदात्त ध्येय है’ (शिक्षा, रामकृष्ण मठ, नागपुर, पृष्ठ 25)।
रामायण, महाभारत में वर्णित चरित्र जिन गुणों से परिपूर्ण हैं, उनसे नई पीढ़ी अपनी संस्कृति से परिचित होती है और साथ ही साथ उसे अपने लिए जीवन-लक्ष्य निर्धारित करने में सहायता भी प्राप्त होती है। |
ऐसा बहुत कुछ यहाँ उद्धृत किया जा सकता है जिसकी शाश्वत उपयोगिता हर व्यक्ति के जीवन को ऊँचा उठा सकने में सहायक हो सकती हैं। इनका किसी भी पूजा-पद्धति या पंथ या 'रिलीजन से कोई विरोधाभास हो ही नहीं सकता है। भारत के ज्ञानकोश, उसकी संस्कृति, आध्यात्मिक चिंतन और दर्शन की प्रमुखता से विश्व को परिचित कराने में जिन मनीषियों का नाम श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है, उन सबमें सबसे प्रमुख तत्त्व था विश्व कल्याण की भावना। जिन्हें विदेशों में मान्यता मिली, जो सराहे गए, उन्होंने किसी पंथ विशेष का प्रचार-प्रसार न कर केवल सर्वमान्य मानवीय सिद्धांतों को जीवन में उतारने के लिए प्रेरणा दी। ऐसे उदाहरण और कहाँ मिलते हैं जहाँ अपने धर्म या पंथ को पूर्ण रूप से जीवन में उतारने वाला व्यक्ति अन्य सभी धर्मों/पन्थों को अपने के समान सत्य में अपनाने वालों को उसके निर्देशों पर चलने के लिए प्रेरित करे। संभवत: सनातन धर्म तथा भारतीय संस्कृति का यह दर्शन कि उस एकमात्र सत्य को सभी स्वीकार करें, मगर यह रंचमात्र भी आवश्यक नहीं है कि उस तक पहुँच पाने के लिए सभी एक ही मार्ग पर चलें, या किसी एक ही मार्ग, पद्धति, पंथ, या 'रिलीजन’ को ही एकमात्र सही मार्ग माना जाए। जब भी कहीं पर वैश्विक भाईचारे, विश्व शांति, समग्र एवं समेकित प्रगति, मानवाधिकारों की सर्व-व्यापकता, प्राकृतिक संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण और उनके संरक्षण में भागीदारी जैसे प्रश्नों पर विचार-विमर्श हो तब सबसे पहले प्रार्थना के रूप में यह स्वीकार्यता मंच से दोहराई जानी चाहिए, सभी यह स्वीकार्य करते हैं कि उनका रास्ता उनके लिए सर्वश्रेष्ठ है मगर उनके पड़ोसी का मार्ग और पद्धति उसके लिए सर्वश्रेष्ठ है और मेरा कत्र्तव्य है कि मैं उसे उसी के मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित करूँ। भारतीय दर्शन 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ से अधिक सशक्त आधार विश्व शांति के लिए कोई दूसरा हो ही नहीं सकता है। भारत की इसी परंपरा का निर्वाह करते रहे सनातन धर्म संस्कृति से प्रेरित वे सभी मनीषी जिन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में कार्य किया मगर उन्होंने किसी संप्रदाय विशेष के प्रचार प्रसार में अपना समय नहीं लगाया। उनके सारे प्रयास उन मानवीय मूल्यों के प्रचार-प्रसार के लिए थे जो विश्व में हर मत या रिलीजन के मानने वाले के लिए उपयोगी थे, उसके जीवन को बिना किसी मत-परिवर्तन के सुधार सकते थे, सुखमय तथा संतोषप्रद बना सकते थे। विश्व में भाईचारा और प्रेम के संबंध बना सकते थे, मनुष्य को मनुष्य के प्रति सहायता, सहृदयता और भाईचारे का पाठ पढ़ा सकते थे। भारतीय दर्शन की इस शक्ति को आइंस्टीन, ओपन हाईमर, मार्टिन लूथर, किंग, नेल्सन मंडेला, जैसे अनेक अन्य मतावलंबियों ने पहचाना और उस पर अपने निर्भीक विचार प्रस्तुत करने में हिचके नहीं।
इसके व्यावहारिक पक्ष को वैश्विक स्तर पर जाना और सराहा गया। पश्चिम के देशों में भारत के प्राचीन ग्रंथों के संबंध में जानकारी विदेशियों द्वारा ही जानी पहचानी गई। जर्मनी के विद्वानों ने संस्कृत भाषा का अध्ययन किया, फिर वेद, पुराण उपनिषद्, रामायण, महाभारत और विशेषकर गीता को अनुवाद के माध्यम से पश्चिम के लोगों से परिचित कराया। जुलाई 2017 को एक चीनी प्रोफेसर ने दो भागों में एक लेख प्रकाशित किया है, जिसके शीर्षक का तात्पर्य कुछ इस तरह है कि क्या प्राचीन भारत को आवश्यकता से अधिक महत्त्व दिया जा रहा है। उनका तात्पर्य वर्तमान राजनीतिक तथा आर्थिक बहस से न होकर प्राचीन भारत के ज्ञान, विज्ञान, गणित, अध्यात्म, इत्यादि पर विश्व सभ्यता में किये गए प्राचीन भारतीय सभ्यता के अप्रतिम योगदान पर केन्द्रित है। इस व्यक्ति ने भारत का अध्ययन किया और कुछ ऐसे तथ्य सामने रखे जो भारतीय दर्शन को उन भारतीयों के सामने भी उजागर करते हैं जिन्हें प्राचीन भारत पर चर्चा भी पसंद नहीं है। इस लेख में कुछ उदाहरण दिए गए हैं कि किस प्रकार भारतीयों के द्वारा किये गए आविष्कारों तथा खोजों को पश्चिम के देशों ने संभवत: जानबूझ कर अनदेखा किया, सारा श्रेय आपस में बाँट लिया। पृथ्वी गोलाकार है, इसकी वैज्ञानिक आधार पर खोज का श्रेय अरस्तू को दिया जाता है जो ईसा से 384 वर्ष पूर्व उपस्थित थे। वास्तविकता यह है कि ईसा से 890 वर्ष पहले याज्ञवल्क्य इस तथ्य को उजागर कर चुके थे। उन्होंने पृथ्वी द्वारा सूर्य का एक चक्कर लगाने में लगने वाले समय की गणना भी की थी। अब यह स्वीकार हो चुका है कि वहाँ न्यूटन और लेब्नित्ज से पाँच सौ साल पहले ही कैलकुलस और ट्रिग्नोमेट्री विकसित हो चुकी थी। वहाँ पर एक स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स की स्थापना कुछ वर्ष पहले हुई है। इस प्रकार के अनेकों प्रयासों की आवश्यकता सारे देश में है। इतिहास और ज्ञान परंपरा के विकास से कोई भी सभ्यता अपने को दूर नहीं कर सकती है।
एक अन्य उदाहरण सिंधु घाटी सभ्यता का है। इस सम्बन्ध में अनेक नए तथ्य समसामयिक खोज, उत्खनन और शोध के आधार पर स्थापित किए गए हैं। इस सभ्यता के संबंध में भी भारतीयों को न तो अधिक जानकारी मिलती है और न उनके अंतर्मन में एक गौरव का भाव उत्पन्न किया जाता है। स्कूलों में तो बच्चों को लगातार यही पढ़ाया जाता रहा कि सरस्वती नदी केवल एक कल्पना मात्र है। लोथल में 4,000 वर्ष पहले दूरी मापने के लिए रूलर मिले यानी नापने के औजार सबसे पहले भारतीयों ने आविष्कृत किए और इन्हें उपयोग में लाया। यह हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और लोथल सभी जगह सिद्ध हुआ है। योग आज विश्व भर में भारत के इसी नवाचार करने की शक्ति का उदाहरण प्रस्तुत करता है। आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य तीन महान् गणितज्ञ प्राचीन भारत में हुए। इन्होंने शून्य को आविष्कृत कर विभिन्न समय पर आगे बढ़ाया। ब्रह्मगुप्त ने शून्य के लिए सबसे पहले 'सिंबल’ का आविष्कार किया। भास्कराचार्य उसे बीज गणित में प्रयोग में लाए। शून्य और दशमलव का आविष्कार विज्ञान की प्रगति में अपना अद्भुत स्थान रखता है और यह सदा बना रहेगा। अरब के लोगों ने यह सब भारतीयों से सीखा, वे उसे हिन्दसा कहते थे। यूरोप के लोग उसे अरेबिक न्यूमेरल्स कहने लगे और भारतीयों ने उसे बिना सोचे-समझे अपना लिया। आयुर्वेद विज्ञान की उपयोगिता के संबंध में विश्व में किसी को भी अब कोई शक नहीं है कि विश्व में विज्ञान और सभ्यता की प्रगति में यह भारत का अभूतपूर्व योगदान है। सुश्रुत और चरक ने जो कार्य सर्जरी में किए उन्हें अनेक लोग गलत ढंग से पेश करते हैं, वहीं कुछ अपने को आधुनिक मानने वाले लोग इन खोजों की उपस्थिति से ही अपने को दूर रखना पसंद करते हैं। आचार्य कणाद का नाम संभवत: विदेशी अधिक जानते हैं और भारतीय कम। उन्होंने अणु और परमाणु की संरचना और संबंधों की विस्तृत विवेचना की थी। प्राचीन भारत के स्थापत्य की गहन जानकारी की उपस्थिति तथा वास्तु का वैज्ञानिक प्रयोग मंदिरों में देखा जा सकता है। यह विज्ञान में भारतीय दर्शन और चिंतन की स्वच्छता को इंगित करते हैं। श्री रविन्द्रनाथ टैगोर ने कोणार्क मंदिर के बारे में कहा था 'यहां पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से बहुत आगे है’।
आज के समय में विश्व में भारत के आर्थिक विकास की चर्चा लगातार हो रही है, परंतु उसी के साथ-साथ यह भी चर्चा का विषय विद्वानों और जानकारों के बीच बनता रहता है कि भारत अपनी संस्कृति, अपनी सभ्यता, अपने ज्ञान और विज्ञानभण्डार से इतना दूर क्यों होता जा रहा है? जिस देश ने दुनिया को विज्ञान में इतना कुछ दिया वह आज केवल पश्चिम के देशों की नकल करने तक सीमित क्यों हो गया है? इस समय भारत की शिक्षा संस्थाओं, उसके स्कूल और विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में यह स्पष्ट देखा जा सकता है कि वहाँ पर अधिकांश जोर पश्चिम की खोजों और आविष्कारों तथा शोध और अध्ययन पद्धतियों पर ही है। पश्चिम से आए ज्ञान के आगे जा सकने की सोच भी लगभग समाप्त हो गई है। यदि अपनी ज्ञान परंपरा की ऊँचाइयों से प्रारम्भ से ही परिचय रहा होता तो यह आत्म-विश्वास इतना कमजोर नहीं होता। प्राचीन भारत के अनेक पक्षों को प्रायोजित ढंग से तथा जाने पहचाने कारणों से लगभग भुला दिया गया है। यह भी एक तथ्य है कि भारत की जीवंत और गतिशील ज्ञान और नवाचार परम्परा के प्रवाह में अनेक अवरोध आये, जिनमें से कुछ ने तो उसे पूरी तरह ध्वस्त करने का आधिकारिक प्रयास भी किया। इसमें वह आक्रमण और विदेशी आधिपत्य के वे हजार साल भी सम्मिलित हैं जिसमें बाहरी तत्त्वों ने भारत की शिक्षा व्यवस्था और ज्ञान अर्जन की परंपरा को मिटाने के प्रयास विशेष रूप से किये। ये प्रयास लगभग पूरी तरह तक सफल भी हुए।
भारत अपनी संस्कृति, अपनी सभ्यता, अपने ज्ञान और विज्ञानभण्डार से इतना दूर क्यों होता जा रहा है? जिस देश ने दुनिया को विज्ञान में इतना कुछ दिया वह आज केवल पश्चिम के देशों की नकल करने तक सीमित क्यों हो गया है? |
इस समय भी भारत के बच्चे स्कूलों में शिवाजी, महाराणा प्रताप, गुरु गोविन्द सिंह, बन्दा बहादुर, पृथ्वीराज चौहान, सुभाष चन्द्र बोस, अश्फाकुल्लाह खान जैसे जीवन न्यौछावर करने वाले स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों के संबंध में ऐसे जानकारी नई पीढ़ी को नहीं दे पा रहे हैं जो उनकी कर्तव्यशीलता और कर्मठता को नई धार दे सके। क्या कोई देश गुरु तेगबहादुर की 'पंथ निरपेक्षता’ के लिए किये गये बलिदान को नकार कर औरंगजेब को अपना राष्ट्रीय आदर्श स्थापित करने का दुस्साहस कर अपनी भावी पीढ़ी के साथ जानबूझ कर अन्याय करेगा, भारत में ऐसा हुआ है। विश्व के इतिहास में किसी भी धर्म या पंथ के इतने अनुयाइयों का इतनी बड़ी संख्या में वध धर्मांध आक्रमणकारियों ने नहीं किया है जितना सनातन धर्म के मानने वालों का किया गया। क्या यह आश्चर्यजनक तथ्य नहीं है कि इस देश की संस्कृति विचार ही नहीं, व्यवहार में भी मानती थी की सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं, सभी अपने हैं, और क्षमा से बड़ा गुण नहीं है। दूसरे को पीड़ा पहुँंचाने से बड़ा अधर्म नहीं है। इस आध्यात्मिक आधार पर अत्याचारी आक्रमणकारियों के साथ भी यहाँ के लोग मिलजुलकर सदियों से रहते रहे हैं।
स्वतंत्र भारत में अनेक ऐसे नीतिगत निर्णय लिए गए जिनके कारण भारत का इतिहास, संस्कृति और विश्व सभ्यता के विकास में उसके योगदान को नई पीढ़ी के सन्मुख सही ढंग से नहीं रखा जा सका। सामाजिक सद्भाव और पंथिक भाईचारे के नाम पर नीतियों को कुछ इस प्रकार तोडा-मरोड़ा गया की शिक्षा संस्थानों में संस्कारों की चर्चा और प्राचीन भारतीय संस्कृत की चर्चा लगभग वर्जित है। प्राचीन भारतीय संस्कृति के रामायण, महाभारत, गीता, वेद, पुराण को एक पंथ विशेष के ग्रन्थ घोषित कर किनारे कर दिया गया। विश्व में कोई देश अपनी प्राचीन धरोहरों के साथ ऐसा खिलवाड़ नहीं करा सका है। क्या गीता, योग, ध्यान, जैसे ज्ञान और नवाचार के स्रोत विश्व की धरोहर नहीं हैं? क्या गीता के दस श्लोक पाठ्यपुस्तकों में डाला जाना और उनसे कर्मठता, विश्व-बंधुत्व तथा मानव मूल्यों का पाठ पढ़ाना साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देना माना जा सकता है? आज जन-जीवन में, शासन-प्रशासन में, मूल्यों के क्षरण का एक कारण यह दृष्टिकोण ही है। आज सारा विश्व योग को स्वीकार कर रहा है, उसकी उपयोगिता को समझ रहा है, भारत में उसे स्कूलों में लागू करने पर विरोध किया जा रहा है, और उसे समर्थन मिल रहा है। आज के तनाव, हिंसा, अविश्वास, आशंका, धर्मान्धता के लगातार बढ़ते वातावरण में मनुष्य को बिना किसी भेदभाव के यदि कोई संसाधन सर्व-सुलभ है, तो वह योग और ध्यान ही हैं जिनसे राहत प्राप्त हो सकती है। हर भारतवासी भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का वारिस या उत्तराधिकारी है, उसका पंथ मत या विचारधारा कितनी ही अलग-अलग क्यों न हो। दुर्भाग्य से आज हम ऐसे वारिस बन गए हैं जो अपनी शक्ति और क्षमता को जाने-पहचाने बिना ही पश्चिम का अनुकरण करने के लिए जाने जाते हैं। क्या यह स्थिति बदलना आवश्यक नहीं है कि योग और ध्यान जैसे भारत की प्राचीन सभ्यता के योगदान भारत में ही विरोध और आक्षेप सहन करें? हमारे अपने लोग ही अपने देश की सभ्यता से परिचय पाने के हर प्रयास को शक की निगाहों से देखें?
दुर्भाग्य से हम केवल पश्चिम के आचार, विचार, व्यवहार और आविष्कार, सभी की नकल में ही इतने आत्म-तुष्ट हो गए हैं की हम यह जानकर भी विचलित नहीं होते। चिंता का विषय यह भी है कि जिस भारतीय ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति और दर्शन में सारे विश्व में हर व्यक्ति को एक गरिमामय जीवन बिताने के लिए नीतियाँ उपलब्ध हैं, साधनों-संसाधनों का वितरण कर आर्थिक नीति बनाने के सारे आयाम उपस्थित हैं, उसे अपने देश में ही वह निर्बाध मान्यता और स्वीकार्यता नहीं मिली है जो मिलनी चाहिए। परिणाम स्वरूप हमारे यहाँ नवाचार करने वाले संभवत सीमित लोग ही बचे हुए हैं। इसके बजाय उस समय की स्थिति की कल्पना करने का प्रयास करें जब जीवन के पहले और जीवन के बाद के संबंध में उठे प्रश्नों का समाधान करने के लिए कितने मनीषियों ने अपना सारा जीवन लगा दिया। उनका उद्देश्य मनुष्य और प्रकृति के बीच के संबंधों और रहस्य को जानना इसलिए आवश्यक था ताकि इन दोनों के बीच के सम्बन्ध सदा अक्षुण्ण बने रहें। जैसे-जैसे मनुष्य ने अपने स्वार्थ तथा लालच की पूर्ति के लिए प्रकृति के संसाधनों के दुरुपयोग का रास्ता अपनाया, जलवायु परिवर्तन, तापमान बढऩा, ओजोन परत पर आघात, जैसी कठिन समस्याएँ विश्व के सामने उभरीं। प्राचीन भारत की संस्कृति और ज्ञान परंपरा की शक्ति को आज के सन्दर्भ में गांधी जी ने इस विश्वविख्यात वाक्य में कहा कि- प्रकृति के पास सभी की आवश्यकता पूर्ति के संसाधन हैं परंतु एक के भी लालच की पूर्ति के लिए नहीं है। इसके द्वारा वे भारतीय दर्शन के एक अत्यंत सजीव और सटीक अंग को ही विश्व के सामने प्रस्तुत कर रहे थे। उसमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष सदा ही 'सर्वभूतहिते रता:’ ही रहा है। और उसका स्रोत बिंदु आत्मा की संकल्पना और आत्मा से साक्षात्कार को सर्वोच्च मानना रहा है। यह सोच ही ऐसे विचारों को जन्म दे सकी जो आज विश्व की अनेक समस्याओं का समाधान करने की क्षमता रखते हैं।
जीवन की अवस्थाओं को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के अन्तर्गत विभाजित कर प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन को सार्थक और संतोषप्रद बनाने का रास्ता प्राचीन भारतीय मनीषियों ने सभी के सम्मुख रखा, उनके सामने भी, जो सनातन संस्कृति और धर्म को मानने वाले माने जाते हैं, और उनके भी, जो अन्य मतावलम्बी हों, उदाहरण के लिए- पुनर्जन्म को न मानते हों। इस संस्कृति में तो चार्वाक को भी ऋषि स्वीकार किया गया था। सारे निर्णय लेने का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को निर्बाध रूप से उपलब्ध था, वह ईश्वर को माने या न माने, निर्गुण माने या सगुण माने, और यदि सगुण माने तो जिस स्वरूप में मानना चाहे माने, देवी के रूप में, विष्णु, शिव, राम, कृष्ण या अन्य कितने ही स्वरूपों में परम सत्य को जानने का प्रयास करे। ऐसे में किसी भी अन्य पंथ को मानने वाले के साथ पंथिक आधार पर कोई भेदभाव करने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता है। प्राचीन भारतीय सभ्यता में सबसे महत्त्वपूर्ण अवयव 'मस्तिष्क’ की स्वतन्त्रता है जो हर मनुष्य को प्रदान की गई है। इसका स्वरूप है प्रश्न पूछना। हर व्यक्ति कोई भी प्रश्न उठा सकता है, ईश्वर की उपस्थिति मात्र पर भी प्रश्न कर सकता है और फिर भी उसी संस्कृति और धर्म का अंग बना रह सकता है। महाभारत में युधिष्ठिर तथा यक्ष के बीच प्रश्न-उत्तर तथा गीता में कृष्ण और अर्जुन के बीच का संवाद इस परंपरा के परिचित उदाहरण हैं। गुरुकुल प्रणाली ने इस आधार पर 'प्रश्न-प्रतिप्रश्न-परिप्रश्न’ की सार्थकता को 'अध्ययन, मनन, चिंतन, उपयोग’ के रूप में निरुपित किया गया। गुरुकुलों में विकसित इस पद्धति की सार्थकता पर किसी भी आधुनिक विद्वान् शिक्षाविद् ने कभी कोई कोई प्रश्न नहीं उठाया। ऐसे अनेक विचार उस संस्कृति की धरोहर है और उसको समय-समय पर उसके जानकार प्रकट और प्रस्तुत भी करते रहते हैं। परन्तु इतना करना ही पर्याप्त नहीं है। आज के वैश्विक गाँव की वास्तविकता को स्वीकार करते हुए इस संस्कृति को विश्व के समक्ष प्रस्तुत करने के प्रयास सघन स्वरूप में प्रारम्भ किये जाने चाहिए। जो अभी हो रहे हैं उन्हें और सार्थक बनाकर विस्तार देने की आवश्यकता है।
सबसे पहले शिक्षा केन्द्रों में इस संस्कृति से अध्यापकों का उन्मुखीकरण कर उन्हें यह छूट देनी होगी कि वे बेहिचक प्राचीन संस्कृति से बच्चों का परिचय कराएँ, उसकी सार्वभौमिकता और मूलभूत मानवीय एकता की समझ की गहराई से उन्हें परिचित कराएँ। अनेक सभ्यताएँ विश्व में विभिन्न स्थानों पर पनपीं, उनमें से अनेक समय के साथ विलुप्त हो गयीं। वे जिन्होंने केवल संग्रह, भौतिक सुख-सुविधा तथा ऐन्द्रिक सुख को ही लक्ष्य बनाया, आज बची नहीं है। भारत की प्राचीन संस्कृति और सभ्यता जिसका प्रभाव जापान और चीन की सभ्यताओं पर भी पड़ा, आज भी विद्यमान है। भारतीय तथा ग्रीक सभ्यताएँ अलग-अलग तथा भिन्न प्रकार की परिस्थितियों में पनपीं थीं। ग्रीक सभ्यता में बाह्य जगत् के असीम फैलाव पर चिंतन-मनन किया गया।
भारत की सभ्यता के विकास में 'आंतरिक असीम’ को जानने, पहचानने और समझने का प्रयास किया गया। भौतिकता की चकाचौंध से प्रभावित आज के विश्व में आज फिर से यह सोच पनप रही है कि असीम धन संग्रह करने वाले भी सुख और आनंद प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं, जिस 'सत्-चित्-आनंद’ की कल्पना भारतीय संस्कृति में निहित है, वहाँ तक पहुँचने का तो प्रश्न ही नहीं उठता है। उसका रास्ता, जो सर्वोपयोगी है और किसी मत-मतान्तर से प्रभावित नहीं होता, भारत ने पहले ही दिखा रखा है'धनाद्धर्मं तथा सुखम्’। धनार्जन और सुख प्राप्ति के बीच में कुछ और भी है और वह है सद्-आचरण। धर्म उसे कहते हैं, जिसका पूरी तरह अन्य भाषा में समतुल्य शब्द अभी तक तो जानकारी में नहीं आया है।
भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है कि वह अपनी नई पीढ़ी को प्राचीन भारतीय संस्कृति की सार्वभौमिकता से सघन परिचय कैसे कराये, उनमें उसके प्रति सम्मान और गौरव का भाव पैदा करे और उन्हें इसे विश्व पटल पर आज की प्रचलित शैली में प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध करे। यह कार्य राष्ट्रहित में बिना किसी आशंका या संशय के होना चाहिए।
(प्रोफेसर जगमोहन सिंह राजपूत पद्म श्री से सम्मानित शिक्षाविद तथा लेखक हैं। यूनेस्को ने उन्हें 'जान अमोस कोमेनिउस’ पदक शोध और नवाचार में अप्रतिम योगदान के लिए प्रदान किया है। इस समय वे यूनेस्को के कार्यकारी बोर्ड में भारत के प्रतिनिधि हैं।)
लेखक
Related Posts
Latest News
01 Jan 2025 17:59:35
ओ३म हमारे सपनों का भारत 1. सच्चे सनातनी बनें - हम सभी ऋषि-ऋषिकाओं की सन्तानें वंशधर सनातन धर्म के मूल...


