आयुर्वेद में मांस-वर्णन एक समीक्षा
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आचार्य विजयपाल प्रचेता, पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार
मनुष्य को भगवान् ने प्राकृतिक रूप से शाकाहारी बनाया है, इसके दाँत व आँतों की रचना भी शाकाहारी प्राणियों जैसी ही है। अपनी प्रकृति के अनुसार निरामिष भोजन ही मनुष्य के लिए हितकर है। यही शरीर व मन के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है। मांसाहारी को हृदयरोग, कैंसर आदि गम्भीर बीमारियाँ शाकाहारी की अपेक्षा अधिक होती हैं। उसका दया भाव सर्वथा नष्ट हो जाता है- 'न दया मांसभोजिन:’ (चाणक्यनीति- 11.5) दया ही धर्म का मूल है। इसीलिए कहा है- 'न च धर्मो दयापर:’। अर्थात् दया से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। अन्यत्र भी कहा है- 'त्यजेद् धर्मं दयाहीनम्’ (चाणक्यनीति- 4.16) जिस धर्म में दया नहीं हो, उसे छोड़ देना चाहिए; क्योंकि वस्तुत: वह धर्म ही नहीं है। दया को धर्म का मूल कहा है, अत: दया के बिना कैसा धर्म? दया को बिना छोड़े, बिना हिंसा किए मांस नहीं मिलता है।
हिंसा को नैतिक व आध्यात्मिक दृष्टि से कथमपि उचित नहीं ठहराया जा सकता है। अत: मांसभक्षण सभी के लिए अनुचित है। चाणक्य ने कहा है- 'मांसभक्षणमयुक्तं सर्वेषाम्’ (चाणक्यसूत्र-563)। फिर भूख मिटाने के लिए, स्वाद के लिए या शरीरपुष्टि के लिए मांसभक्षण को उचित मानना तो विवेक को अंगूठा दिखाना है, आत्मवञ्चना है। उक्त प्रयोजनों के लिए तो एक से एक बढ़कर शाकाहारी भोज्यपदार्थ सुलभ हैं। उन्हें छोड़कर मांसभक्षण करना पाप की गठरी भरना है; क्योंकि मांसभक्षण बिना पीड़ा दिए सम्भव नहीं है और पीड़ा देने वाले को अवश्य वैसी ही पीड़ा मिलेगी, जैसी वह मांस खाने के लिए दूसरे प्राणी को देता है। यह कर्मफल का अटल सिद्धान्त है। इसीलिए मनुस्मृति में 'मांस’ का स्वरूप बताते हुए कड़ी चेतावनी दी है-
मां स स भक्षयितामुत्र यस्य मांसमिहाद्म्यहम्। इति मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति विपश्चित:।। (मनु.-5.50)
अर्थात् मांस शब्द- 'मां स:’ इन दो पदों से बना है। इसका अर्थ है- मेरा भक्षण वह करेगा, जिसका भक्षण मैं कर रहा हूँ। अत: यदि वधकालीन मर्मान्तक पीड़ा से बचना चाहें तो दूसरों को ऐसी पीड़ा देने से बाज आएं। जो मांसाहारी यह समझते हैं कि हम केवल खाते हैं, मारने का काम तो कोई और ही करता है, इसका फल हमें क्यों मिलेगा? ऐसा सोचना उनकी बहुत बड़ी भ्रान्ति है; क्योंकि यदि खाने वाला नहीं होगा तो मारने वाला भी नहीं होगा। इस प्रकार खाने वाला ही मारने वाले द्वारा की जाने वाली हिंसा का निमित्त है। महाभारतकार की स्पष्ट शब्दों में घोषणा है-
यदि चेत् खादको न स्यान्न तदा घातको भवेत्।
घातक खादकार्थाय तद् घातयति वै नर:।।
(महाभारत, अनुशासनपर्व-115.29)
अर्थात् यदि खाने वाला नहीं होगा तो मारने वाला भी नहीं होगा। अत: उपर्युक्त भ्रान्ति को पालने वाले लोगों को महर्षि मनु ने भी यथार्थता बताते हुए चेताया है कि उनकी हिंसा में पूरी भागीदारी है-
अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रय-विक्रयी।
संस्कत्र्ता चोपहत्र्ता च षडेते घातका: स्मृता:।।
(मनु.-5.51)
अर्थात् अनुमति देने वाला (अनुमोदन करने वाला), मारने वाला, क्रय करने वाला, विक्रय करने वाला, मांस को पकाने वाला, परोसने वाला- ये सभी हिंसा में समान रूप से भागीदार हैं। कर्म के शाश्वत एवं अटल सिद्धान्त की उपेक्षा करते हुए जो विवेक दृष्टि को स्थगित कर मिथ्या तर्क से आत्मतुष्टि की चेष्टा करते हैं, उन्हें तो महर्षि वेदव्यास की यह मर्मभेदी चेतावनी याद कर लेनी चाहिए-
सन्दिग्धेऽपि परे लोके त्याज्यमेवाशुभं नरै:।
यदि नास्ति तत: किं स्यादस्ति चेन्नास्तिको हत:।।
(वररुचि-विरचित सारसमुच्चय-117)
अर्थात् भले ही परलोक के विषय में सन्देह हो कि परलोक (पुनर्जन्म) है या नहीं? तो भी मांसभक्षण जैसा अशुभ कर्म तो शीघ्र ही छोड़ देना चाहिए। यदि परलोक नहीं है, तो शुभ कर्म करने से अपना क्या घटा? परन्तु यदि हुआ तो नास्तिक मारा जाएगा। उसे पापों के घोर फल से कोई बचा नहीं सकेगा। अत: मांसभक्षण से सर्वथा दूर रहने में ही भलाई है।
अब प्रश्न होता है कि आयुर्वेद के ग्रन्थों में जो मांस का वर्णन मिलता है, वह क्यों? इसका उत्तर है कि मूलत: आयुर्वेद का प्रणयन उन ऋषि-महर्षियों ने किया है, जो परम आध्यात्मिक व कारुणिक थे। उनका जो परम करुणा भाव था, वही आयुर्वेद के भूलोक पर अवतरण का सबसे बड़ा कारण था-
तदा भूतेष्वनुक्रोशं पुरस्कृत्य महर्षय:।
समेता: पुण्यकर्माण: पाश्र्वे हिमवत: शुभे।।
(च.सं.सू.-1.7)
धर्मार्थं नार्थकामार्थमायुर्वेदो महर्षिभि:।
प्रकाशितो धर्मपरैरिच्छद्भि: स्थानमक्षरम्।।
नार्थार्थं नापि कामार्थमथ भूतदयां प्रति।
वर्तते यश्चिकित्सायां स सर्वमतिवर्तते।।
(च.सं.चि.-1.4.57-58)
इस प्रकार रोगपीडि़त प्राणियों के प्रति करुणा भाव से द्रवित होकर ही परम कारुणिक महर्षियों ने आयुर्वेद को भूमण्डल पर प्रचारित किया था। इसके पीछे उनकी सर्वभूतहित की भावना ही प्रमुख थी। संहिताओं में पद-पद पर इसे अपनाने का उपदेश मिलता है-
सत्यवादिनमक्रोधं निवृत्तं मद्यमैथुनात्।
अहिंसकमनायासं प्रशान्तं प्रियवादिनम्।।
(च.सं.चि.-1.4.30)
आनृशंस्यपरं नित्यं नित्यं करुणवेदिनम्।।
(च.सं.चि.-1.4.32)
मूल संहिताओं में आये ऐसे अनेक उपदेशों में मनुष्य को नित्य अहिंसक, आनृशंस्य-परायण (क्रूरता-रहित) व नित्य करुणवेदी (करुणापूर्ण संवेदना वाला) बने रहने का निर्देश दिया है। अभिनिवेशपूर्वक (आग्रहपूर्वक) ऐसा उपदेश करने वाले अपार करुणा के सागर वे मुनिगण मांस-भक्षण का क्रूरतापूर्ण विधान नहीं कर सकते। यह उनकी मूल भावना व मूल सोच के सर्वथा विपरीत है; क्योंकि उन्होंने आध्यात्मिकता, दयालुता आदि गुणों को चिकित्सा व स्वास्थ्य-लाभ का मूल आधार माना है। अत: यह सिद्ध होता है कि आयुर्वेदीय ग्रन्थों में मांसभक्षण के प्रसंग पीछे से मिलाए गए हैं। ये मूलसंहिताओं के अंश नहीं हैं। आज आवश्यकता है आयुर्वेद को इनसे मुक्त करने की।
मांस-भक्षण का जो वर्णन आयुर्वेदीय ग्रन्थों में प्रविष्ट कर दिया गया है, द्रव्यगुण-विवेचन की दृष्टि से समझना चाहिए, न कि मनुष्य के लिए उपादेय रूप में। इस विषय में हमें अष्टांग-संग्रहकार वाग्भट का यह कथन सदा ध्यान में रखना चाहिए-
उपदिष्टे विचित्रेऽस्मिन् वक्तव्यार्थानुरोधत:।
कत्र्तव्यमेव कत्र्तव्यं प्राणाबाधेऽपि नेतरत्।।
(अष्टांगसंग्रह, वाजीकरणविधि-49.88)
अर्थात् वक्तव्य के अनुरोध से सिद्धान्त भर दिखाने के लिए भी कुछ योगों का उल्लेख आयुर्वेद में होता है, परन्तु उन्हें कदापि नहीं अपनाना चाहिए, प्रत्युत कत्र्तव्य एवं धर्म के अनुसार ही योगों को ग्रहण करना चाहिए। मृत्यु भले ही हो जाए, परन्तु हिंसात्मक एवं निर्दयतापूर्ण योगों को स्वीकार नहीं करना चाहिए।
कतिपय विचारकों का मत है कि स्वास्थ्यलाभ के लिए मांस का प्रयोग कर लेना चाहिए। इसी प्रकार संकट काल में प्राण रक्षा के लिए एवं अति दुर्बलता की स्थिति में पुष्टि के लिए मांस का सेवन कर लेना चाहिए, परन्तु इस विचार को अन्तत उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह निष्कर्ष चक्रपाणि दत्त ने चरक संहिता के निम्र वचन की व्याख्या करते हुए इस प्रकार किया है-
ब्रह्मचर्यज्ञानदानमैत्रीकारुण्यहर्षोपेक्षाप्रशमपरश्च स्यादिति।।29।।
(चरकसंहिता, सूत्रस्थान- 8.29)
चक्रपाणि दत्त की व्याख्या का भाव यहाँ हिन्दी में प्रस्तुत किया जा रहा है-
मैत्री का अर्थ है कि सभी प्राणियों के प्रति आत्मवत् भावना रखते हुए अविरोधी व्यवहार रखना। आयुर्वेद में व्यक्ति को मैत्रीपरायण रहने के लिए कहा है, परन्तु यहाँ शंका होती है कि इस शास्त्र में शास्त्रकार ने स्वयं ही दिग्ध, विद्ध एवं स्वयंमृत का मांस त्याज्य बतलाते हुए वयस्थ (यौवनावस्था वाले) मृग आदि के ताजा मांस के सेवन का कथन किया है, यह सर्वथा ही मैत्री विरुद्ध हिंसात्मक कार्य है। इस शंका का उत्तर यह है कि जो व्यक्ति स्वयं ही राग पूर्वक मांस भक्षण करते हैं, उनके लिए आयुर्वेदोपदेष्टा ग्रन्थकार ने किसी रोग में किसी मांस का हिताहित रूप बताया है न कि मांस भक्षण का विधान किया है। इसी प्रकार मदिरा का भी कहीं-कहीं रोगीवृत्त या स्वस्थवृत्त में हितकारित्व बतलाने से उसका विधान नहीं माना जा सकता है, अपितु जो पहले से ही रागपूर्वक मदिरापान करते हैं, उनके ऊ पर होने वाले प्रभावमात्र का वर्णन किया है।
इसी प्रकार रोगाधिकार में राजयक्ष्मा आदि की चिकित्सा में जो मांसोपदेश है तथा शरदृतुचर्या में जो 'लावान् कपिञ्जलानेणान्’ इत्यादि कथन है, वह भी पूर्वत: ही रागवश इनका मांस खाने वालों के ऊपर उसके हितत्वमात्र का वर्णन है, विधि नहीं। अत: उक्त प्राणियों का मांस खाने वाले रोगी एवं स्वस्थ व्यक्ति भी हिंसाजन्य पाप के भागीदार अवश्य ही होंगे। इस प्रकार मांसभक्षण मैत्री एवं सर्वभूतहित का उपदेश करने वाले आयुर्वेद के प्रणेता मुनियों के अभिप्राय के विरुद्ध है, यह चरकसंहिता के व्याख्याकार चक्रपाणि दत्त ने स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है।
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