अनुमार्जन (शोधन)

अनुमार्जन (शोधन)

श्रद्धेय गुरुदेव आचार्य प्रद्युम्न जी महाराज

    'वेदसब सत्य विद्याओं का पुस्तक है’। वेद शब्द का अर्थ होता है 'सत्यज्ञान’। मानव जीवन को शारीरिक व मानसिक दोनों ही दृष्टियों से स्वस्थ, प्रसन्न, उत्साहयुक्त, तेजस्वी, वर्चस्वी बनाने के लिए जीवन के प्रथम चरण (First Step) से लेकर अन्तिम चरण (Last Step) तक की यात्रा का वेदों में वर्णन मिलता है। किन-किन विषयों पर व्यक्ति को अपना पूरा मन लगा देना चाहिए, यह सब हमें वेदों से सीखने को मिलता है। अर्थात् चहुँमुखी विकास की एक सततगामी प्रक्रिया का हमें वेदों से दिग्दर्शन प्राप्त होता है। वैदिक जीवन की मुख्य-मुख्य विशेषताओं को एक माला में पिरोकर देखा जाए तो वे होंगी-निर्भयता (यतो यत: समीहसे ततो नोऽभयं कुरु- यजु. ३६.२२) ईश्वर को सर्वव्यापक जानना एवं मानना (ईशावास्यमिदं सर्वं, स पर्यगात्, स ओत: प्रोतश्च) 'इह’ या 'अद्य’ ही अपनी जीवन सम्बन्धी समस्याओं का समाधान खोजना, त्यागपूर्वक (अर्थात् अनासक्ति पूर्वक) भोग (तेन त्यक्तेन भुञ्जिथा: - यजु. ४०.१), अर्थलोलुपता का परित्याग (मा गृघ: कस्य स्विद्धनम्  - यजु. ४०.१), मित्रदृष्टि से सबका अवलोकन (मित्रस्य मा चक्षुषा समीक्षन्ताम् - यजु. ३६.१८), मन की संकल्पशक्ति, शुचिता-पवित्रता (पवित्रेण शतायुषा - यजु. १९.३७), मन व इन्द्रियों पर पूर्ण संयम (यन्मे छिद्रं चक्षुषो हृदयस्य मनसो वातितृण्णं बृहस्पतिर्मे तद्दधातु - यजु. ३६.२), फलेच्छा के त्यागपूर्वक कर्मों में सतत प्रवृत्त रहना, (कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा:), सर्वत्र एक आत्मा का दर्शन (एकत्वमनुपश्यत:), आसुरी प्रवृत्तियों का परिणाम (असुय्र्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता: - यजु. ४०.३) विद्या और अविद्या (कर्म) असम्भूति व सम्भूति (Being and Becoming) को एक साथ जानना, सतत ऊध्र्वारोहण इत्यादि।
आज हम अपने प्रिय पाठकों के साथ जीवन का अनुमार्जन, शोधन विषय पर कुछ चर्चा करना चाहेंगे, क्योंकि शुद्धि का परिणाम ही समस्त अभावों से मुक्ति है और उसका परिणाम आनन्द और फिर अन्त में पूर्णता है।
ऋषि:- वामदेव:। देवता- त्वष्टा। छन्द:- विराट्त्रिष्टुप्।।
सं वर्चसा पयसा सन्तनूभिरगन्महि मनसा सँशिवेन।
त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोऽनुमाष्र्टु तन्वो यद्विलिष्टम्।। २.२४।।
(वर्चसा, पयसा, तनूभि:) तेजस्विता, दूध, पुष्ट शरीर तथा (शिवेन मनसा सम् अगन्महि) उत्तम मन से हम युक्त हुए हैं या युक्त होवें। (सुदत्र: त्वष्टा) उत्तम दाता त्वष्टा (राय: विदधातु) हमें अनेक प्रकार का धन देवें। (तन्व: यद् विलिष्टम्) हमारे  शरीरों की जो न्यूनता हो (लिश अल्पीभावे) ([तत्] अनुमाष्र्टु) उसे दूर करें, उसका शोधन कर डालें।
उपर्युक्त मन्त्र में वैदिक ऋषि जीवन को सर्वविध पूर्णता से युक्त देखना चाहता है- स्वस्थ शरीर, उसका साधन पोषक पय (दूध) 'पय’ में सब प्रकार से शरीर के आप्यायन का भाव छुपा है, शारीर तेज जो कि संयम व जितेन्द्रियता का फल है, इन सबके साथ जो अत्यन्त महत्वपूर्ण बात कही गई वह है 'शिवेन मनसा’ शिव मन के साथ संगत होवें। वैदिक संस्कृति की यह सबसे बड़ी विशेषता कही जा सकती है जो कि बाह्य साधनों या धन ऐश्वर्य के साथ शिव मन की संकल्पना है। वेदों में सर्वत्र ओर से छोर तक यह सूत्र पिरोया हुआ मिलता है- 'शिवेन मनसा’। अन्यत्र भी कहा है- 'तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु’ मेरा मन शिव संकल्पों से ओतप्रोत रहे। यहाँ हम स्पष्ट रूप से यह भी देख सकते हैं बाह्य जीवन के प्रति यदि उनका उपेक्षाभाव होता तो वे ऐसी प्रार्थना कैसे करते कि 'त्वष्टा सुदत्रो विदधातु राय:’ उत्तमरूपों का निर्माणकर्ता त्वष्टा उत्तम धनों को प्रदान करे। शरीरों में कुछ न्यूनता हो तो त्वष्टा देव उसको ठीक कर दे।
यह जो प्रार्थना होती है- इसका ठीक-ठीक अभिप्राय इस रूप में लेना चाहिए- जिस विषय में हम प्रार्थना कर रहे हैं, उसकी अन्तिम आवश्यकता का हमें अनुभव होने लगे। हमारे व्यक्तित्व का प्रत्येक घटक उसे पाने के लिए उत्कण्ठित हो जाए। हमारे रक्त का अणु-अणु उस प्राथ्र्यमान विषय की उपयोगिता व आवश्यकता को तीव्रता के साथ महसूस करने लगे। इस भावविशेष के साथ यदि प्रार्थना की जाती है तो उसका अवश्य प्रत्युत्तर मिलता है। जिन विषयों की, जिन पदार्थों की वैदिक ऋषि प्रार्थना कर रहे हैं, इसका सीधा सा अर्थ है कि उन्हें जीवन की पूर्णता के लिए उन-उन विषयों की आवश्यकता अनुभव हो रही है।
किसी बात को जोर देने के लिए सकारात्मक व नकारात्मक दोनों तरफ  से कहा जाता है। जैसे- तुम सदा धर्म का ही आचरण करो, अधर्म का नहीं। प्रकृत में भी पहले तो यह कहा कि 'वर्चसा पयसा तनूभि: सम् अगन्महि’ अर्थात् हम उत्तम शरीरों से युक्त हों और फिर यह भी कह दिया 'अनुमाष्र्टु तन्वो यद् विलिष्टम्’ शरीर की जो न्यूनता है त्वष्टा उसका अवश्य शोधन, अनुमार्जन कर दे। संस्कृत भाषा का यह नियम है कि जब किसी क्रिया पद पर जोर देना चाहते हैं तो उसे वाक्य के आदि में रखते हैं। जैसा कि यहाँ 'अनुमाष्र्टु’ क्रिया को वाक्य के आदि में रखा है। यदि 'ग्रामं गच्छ’ कहते हैं तो सामान्य कथन माना जाता है किन्तु जब कहते हैं 'गच्छ ग्रामम्’ तो उसका तात्पर्य अवश्य गमन में होता है।
उचित आहार, उचित निद्रा, उचित ब्रह्मचर्य व उचित शारीरिक परिश्रम के अभाव में शरीर में कमी आने लगती है। शरीर की न्यूनता या अपूर्णता को दूर करने के लिए इन सभी बिन्दुओं पर ध्यान देना होता है। आयुर्वेदोक्त रीति से यदि आहारादि का यथातथ प्रबन्ध किया जाए, उन सभी नियमों की अनुपालना की जाए जिनसे शरीर में आई हुई न्यूनता का आपूरण होता है तो निश्चित ही शरीर की आयु बढ़ जाती है। जैसे प्रकृत मंत्र में 'पयसा’ का संकेत करते हुए यह रहस्य प्रकट किया कि शारीरस्वास्थ्य के लिए पय (गोदुग्ध) सर्वोत्तम है।
आहार विषय में विशेष रूप से तीन बातों की तरफ ध्यान देना होता है- आहार की मात्रा (Quantity), प्रकार (Quantity), और समय (Time)। आयुर्वेद कहता है- 'मात्रावद् अश्नीयात्’। सात्त्विक पदार्थ भी यदि अपने शरीर की क्षमता से अधिक ग्रहण किए जाते हैं तो वे तामसिक हो जाते हैं तथा स्वास्थ्यप्रद न होकर हानिप्रद हो जाते हैं। आहार के प्रकार को सामने रखकर धर्मशास्त्र के अनुसार सात्त्विक, राजसिक, तामसिक भेद किए हैं और आयुर्वेद के अनुसार ऋतुचर्या, वात-पित्त-कफ आदि व्यक्ति की प्रकृति तथा आहार द्रव्यों के गुण-रस-वीर्य-विपाक-प्रभाव आदि का वर्णन मिलता है। चरक संहिता के विमानस्थान के प्रथम अध्याय में आहार के प्रकार विशेष और हितत्व-अहितत्व को लक्ष्य कर प्रकृति-करण-संयोग-राशि (आहार-परिमाण)-देश-काल-उपयोगसंस्था (आहार के उपयोग करने के नियम कि इस प्रकार आहार का उपयोग करना चाहिए, ऐसी अवस्था में नहीं करना चाहिए)-उपयोक्ता (आहार का उपयोग करने वाला जिसको कि अभ्यासवश कुछ पथ्य-अपथ्य सात्म्य हो जाता है)- इन आठ हेतुओं की चर्चा व विरुद्ध आहार द्रव्यों की लम्बी सूची दी है। साथ ही रात्रि में दधि भोजन का निषेध किया है, ये सब बिन्दु मिलकर पथ्य-अपथ्य का निर्धारण करते हैं। आयुर्वेद शास्त्र में समय पर भोजन और अजीर्ण अवस्था (बिना भूख) में भोजन न करें- इन दो बातों पर विशेष बल दिया है। इसी प्रकार ऋतुचर्या में निद्रा को अभिलक्ष्य कर निद्रा के नियम, जैसे कि ग्रीष्म ऋतु को छोड़कर दिन में न सोना इत्यादि की चर्चा मिलती है। प्रात: काल शीघ्र उठकर नित्यकर्म से निवृत्त होकर प्रतिदिन शारीरिक श्रम (व्यायाम) का नियम तथा ऋतुचर्या के अनुसार ब्रह्मचर्य नियमों की एक विशेष व्यवस्था दी गई है। इन सभी नियमों का पालन करने से शरीर स्वस्थ रहता है और फिर भी इन सबका श्रेय वैदिक ऋषि अपने प्रभु को ही देते हैं।
यहाँ मन्त्रों में हमारे सामने एक लक्ष्य भर रख दिया जाता है, उसकी विधि नहीं बताई जाती है। उसको कैसे सिद्ध किया जाए, यह सब विस्तार से किसी को जानना हो तो अन्य-अन्य शास्त्रों से समझना होता है। मन के शिवत्व को प्राप्त करने के लिए सम्पूर्ण उपनिषद् साहित्य, श्रीमद्भगवद्गीता, योगशास्त्र का श्रवण-मनन-निदिध्यासन, निष्काम कर्म, कामना या तृष्णा का त्याग, इन्द्रियसंयम, अपने शरण्य में अनन्य भक्तिभाव, सबके प्रति कल्याण का भाव, यथाशक्ति दूसरों का तन-मन-धन से सहयोग, सतत भगवान् की स्तुति-प्रार्थना-उपासना, चित्तवृत्तियों के निरोध हेतु अभ्यास व वैराग्य, चित्त की प्रशान्तवाहिता हेतु यत्न, विषयविमुखता, द्रष्टा की अपने स्वरूप में स्थिति- ये सब साधन विहित हैं।
हमारे मन का एक बहुत ही छिछला भाग है जो वस्तु-व्यक्ति-सम्बन्धों से सुख लेने में ही व्यस्त रहना चाहता है। उसके सामने जो भी घटना या परिस्थिति उत्पन्न होती है चाहे वह सुखमय है या दु:खमय, केवल प्रतिक्रिया करना जानता है। वह जीवन को इतना ही समझ पाया होता है कि अपनी पूरी शक्ति लगाकर मुझे प्रतिकूल परिस्थितियों का परिवर्तन करना है। उसकी इतनी ही समझ बनी होती है कि सुखमय जीवन का एक ही सूत्र है- 'परिवर्तन’। वह संसार को देखता है, यद्यपि उसके समक्ष तीन तरह के लोग होते हैं- कुछ उसके समान, कुछ ऊपर, कुछ नीचे किन्तु उसने जीवन के विकास का यही एक सूत्र समझा होता है कि सदा अपने से ऊपर वालों को देखो और अपनी पूरी शक्ति लगाकर वहाँ तक पहुँचने का प्रयास करो; क्योंकि उसने मात्र 'स्पर्धा’ को ही जीवन के विकास का मूल सिद्धान्त जाना होता है, अत: किसी भी क्षेत्र में अपनी ही रुचि या कर्मप्रवृत्ति की दृष्टि से आगे बढ़े हुए लोगों को अपना आदर्श मानकर वहाँ तक पहुँचने के लिए अपनी सारी शक्ति लगाता रहता है। वह विकास के प्रवाह में यह नहीं देख पाता कि इस प्रक्रिया में उसे कितना दु:ख-दर्द-पीड़ा या कष्ट झेलना पड़ रहा है, आंशिक उपलब्धि से मिलने वाली खुशियाँ उसे सदा अतृप्ति की व्यथा से अनजान रखती हैं। एक छिछले मन को विविध कामनाएं और उनको पूरा करने के लिए महान् संघर्ष, इससे आगे कुछ दिखाई नहीं देता अर्थात् वह संघर्ष के सुख से तो परिचित होता है, किन्तु परमशान्ति, अपार सन्तोष, सहज आनन्द, सहज प्रस्फुटन, परमतृप्ति से अपरिचित ही बना रहता है। छिछला मन कभी भी यह नहीं जान सकता कि नि:स्वार्थ प्रेम, स्वार्थरहित सेवा, अपने द्वारा अपने में तृप्ति, अन्त:प्रकाश, रस का अन्त:स्रोत, आन्तरिक रस से उद्भूत परम उत्साह इत्यादि कोई अलग चीजें होती हैं, इनका कोई अलग स्वरूप होता है। परिस्थितियों की अनुकूलता से उत्पन्न रस, किसी अपने संकल्प की पूर्ति और विजय से उत्पन्न हर्षोल्लास, अपने व्यक्तित्व के बाह्य विस्तार से मिलने वाली अद्भुत तृप्ति, अपने मस्तिष्क या हाथों से सृष्ट जागतिक बाह्य कार्यों के परिणामस्वरूप उपलब्ध एक सुखद सन्तोष तक ही होती है छिछले मन की दौड़।
अपने व्यक्तित्व कि सच्ची गहराई में प्रवेश पाने के लिए या विशालता में अपने आपको ऊपर उठाने के लिए व्यक्ति को अपने मन के सम्पूर्ण ढाँचे को समझना होता है। कितने भी ऊँचे से ऊँचे ग्रन्थों के मात्र स्वाध्याय-प्रवचन, अहं के किसी भी संकुचित या संवर्धित रूप अर्थात् संसार में एक महान् त्यागी के रूप में अपने को प्रतिष्ठापित करने के लिए किये गये अहं के विलोपन या अहंतृप्ति हेतु किये गये बड़े से बड़े लोकोपकार के द्वारा व्यक्ति अपनी गहराई में प्रविष्ट नहीं हो सकता। गहरा मन ही मन के पार जा सकता है या विशालता में उन्नीत हो सकता है। गहरा मन व्यक्ति को अहं से मुक्त कर देता है। किसी भी रूप में अहं का बचा रहना यह सूचित करता है कि मन की अपेक्षित गहराई या मन की विशालता प्राप्त नहीं हो पाई। कामना का सम्बन्ध अहं के साथ ही होता है। गहरे मन, समनस्क मन, विज्ञानवान् मन, सुसंस्कृत मन में कोई कामना नहीं होती क्योंकि वहाँ अहं छुट जाता है। इस विषय में काठक श्रुतियों को प्रमाण रूप में उपस्थित किया जा सकता है-
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथे:।।
यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा।
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथे:।।
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्यमनस्क: सदाशुचि:।
न स तत्पदमाप्रोति संसारं चाधिगच्छति।।
यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्क: सदा शुचि:।
स तु तत्पदामाप्रोति यस्माद्भूयो न जायते।।
विज्ञानसारथिर्यस्तु मन: प्रग्रहवान् नर:।
सोऽध्वन: पारमाप्रोति तद्विष्णो: परमं पदम्।। (१.३.५-९)
अर्थात् जो (बुद्धिरूप सारथी) सर्वदा अविवेकी एवं असंयतचित्त से युक्त होता है, उसके अधीन इन्द्रियाँ इसी प्रकार नहीं रहती जैसे सारथी के अधीन दुष्ट घोड़े।
परन्तु जो (बुद्धिरूप सारथी) कुशल और सर्वदा समाहितचित्त रहता है उसके अधीन इन्द्रियाँ इस प्रकार रहती हैं जैसे सारथी के अधीन अच्छे घोड़े।
किन्तु जो अविज्ञानवान्, अनिगृहीतचित्त और सदा अपवित्र रहने वाला होता है, वह उस पद को प्राप्त नहीं कर सकता, प्रत्युत संसार को ही प्राप्त होता है।
किन्तु जो विज्ञानवान् संयतचित्त और सदा पवित्र रहने वाला होता है। वह तो उस पद को प्राप्त कर लेता है जहाँ से वह फिर उत्पन्न नहीं होता।
जो मनुष्य विवेकयुक्त बुद्धिरूप सारथी से युक्त और मन को वश में रखने वाला होता है वह संसारमार्ग से पार होकर उस विष्णु (व्यापक परमात्मा) के परमपद को प्राप्त कर लेता है।
श्रीमद्भगवद्गीता में इस गहरे मन को ही शुद्ध मन कहा है-
एवं बुद्धे: परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।। (गीता ३.४३)
अर्थात् इस प्रकार बुद्धि से अति श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और आत्मा से ही आत्मा को स्तम्भन करके अर्थात् शुद्ध मन से अच्छी प्रकार आत्मा को समाधिस्थ करके हे महाबाहो! इस कामरूप दुर्जय शत्रु का त्याग कर दो।
इस शुद्ध मन के लिए एक अन्य काठक श्रुति में 'अग्रीबुद्धि’ या 'सूक्ष्मबुद्धि’ शब्द का प्रयोग हुआ है-
एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते।
दृश्यते त्वग्र्या बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभि:।। (१.३.१२)
सम्पूर्ण भूतों में छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशमान नहीं होता। यह तो सूक्ष्मदर्शी पुरुषों द्वारा अपनी तीव्र और सूक्ष्मबुद्धि से ही देखा जाता है।
प्रकृत मन्त्र में इस गहरे मन, सुसंस्कृत मन, शुद्ध मन, समनस्क मन, विज्ञानवान् मन, अग्रीबुद्धि, सूक्ष्मबुद्धि इत्यादि का कथन करने के लिए ही 'शिवेन मनसा’ इस शब्द का प्रयोग हुआ है। शिव मन से संयुक्त हुआ व्यक्ति उस छिपे हुए आत्मा को जान जाता है जिसके लिए कहा गया है- 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति’ सारे वेद जिस प्राप्तव्य पद की चर्चा करते हैं। शिव मन जीवन की अन्तिम उपलब्धि है।
प्रश्न- किन्तु मन्त्र की पहली पंक्ति में 'शिवेन मनसा’ कहने पर भी उत्तराद्र्ध में 'अनुमाष्र्टु तन्वो यद्विलिष्टम्’ यह प्रार्थना की है।
उत्तर- मन्त्र में जो वर्णन होता है, वह पौर्वापर्य की दृष्टि से नहीं होता है, कि उसके बाद यह, फिर उसके बाद यह। चीजें गिना दी गई हैं, जिसकी जहाँ जब योग्यता हो वहीं उसी समय उसे प्राप्त करना होता है। मीमांसा का एक नियम भी है- 'पाठक्रमादर्थक्रमो बलवान्’। पाठक्रम से अर्थ का क्रम बलवान् होता है, अत: ऐसा समझ सकते हैं- 'मुझे शिव मन प्राप्त करना है’ यह संकल्प जिस दिन व्यक्ति में उदित होता है, उसी दिन कार्य का आरम्भ तो हो जाता है किन्तु उसकी पूर्णता तो अपने समय पर ही होती है। पूर्णता का लक्षण है- 'जिसके पाने पर कुछ पाना शेष नहीं रहता’। व्यक्ति कह उठता है- 'प्राप्तं प्रापणीयम्, क्षीणा: क्षेतव्या क्लेशा:’। शिव मन को ही योगशास्त्र में 'विप्लवरहित विवेकख्याति’ इस शब्द से कहा है जिसका फल है- आत्यन्तिक दु:खनिवृत्ति व परमानन्द प्राप्ति।

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