मत्त: सर्वभूतेभ्योऽभयमस्त

मत्त: सर्वभूतेभ्योऽभयमस्त

सन्यास आश्रम में दीक्षित होते समय सर्वस्वत्याग की प्रक्रिया में व्यक्ति को 'एकै साधे सब सधेइस नियम के अनुसार इस 'अहम्की ही आहुति देनी होती है। क्योंकि का आशय है त्याग। तो प्रश्न उठता है कि त्याग किसका? तो ऋषियों ने कहा अपने 'अहम्का अर्थात् अपने 'मैंका या 'मेरेका। दूसरे शब्दों में कि हम सांसारिक वस्तुओं को आवश्यकतानुसार प्राप्त करें, पर उन वस्तुओं में आसक्त न हों। उनके साधन भाव को दृष्टि से ओझल न होने दें और सतर्क रहें, कि कहीं साधन साध्य न बन जाये। जबकि होना यह चाहिए कि उन वस्तुओं को जो कुछ प्राप्त हुआ या प्राप्त होता है अथवा जो कुछ प्राप्त किया या प्राप्त करते हैं, हम उस सबका प्रभु के चरणों में समर्पण करते रहें। पदार्थों व क्रियाओं के न्यासी (ट्रस्टी) बनकर रहें न कि उनके मालिक। 'अहम्या 'अस्मिताकी अपने अन्दर ग्रन्थी न बनने दें, ताकि प्रिय वस्तु भी छूटे तो हमारे हृदय-समुद्र में दु:ख की छोटी सी भी लहर पैदा न होने पाए। किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार के साथ सम्बन्धित होने या न होने में एकसम बने रहें, साक्षी (Witness) या उदासीन (Indifferent) तटस्थ द्रष्टा (Seer) बने रहें।
आज विश्व शांति, विश्व सृजन व विश्व निर्माण के लिए संपूर्ण दिशा में ऐसी ही गूंज की जरूरत है। हम भी समय की पुकार सुनें।
संन्यास आश्रम में दीक्षित होते समय सर्वस्वत्याग की प्रक्रिया में व्यक्ति को 'एकै साधे सब सधे’ इस नियम के अनुसार इस 'अहम्’ की ही आहुति देनी होती है। क्योंकि का आशय है त्याग। तो प्रश्न उठता है कि त्याग किसका? तो ऋषियों ने कहा अपने 'अहम्’ का अर्थात् अपने 'मैं’ का या 'मेरे’ का। दूसरे शब्दों में कि हम सांसारिक वस्तुओं को आवश्यकतानुसार प्राप्त करें, पर उन वस्तुओं में आसक्त न हों। उनके साधन भाव को दृष्टि से ओझल न होने दें और सतर्क रहें, कि कहीं साधन साध्य न बन जाये। जबकि होना यह चाहिए कि उन वस्तुओं को जो कुछ प्राप्त हुआ या प्राप्त होता है अथवा जो कुछ प्राप्त किया या प्राप्त करते हैं, हम उस सबका प्रभु के चरणों में समर्पण करते रहें। पदार्थों व क्रियाओं के न्यासी (ट्रस्टी) बनकर रहें न कि उनके मालिक। 'अहम्’ या 'अस्मिता’ की अपने अन्दर ग्रन्थी न बनने दें, ताकि प्रिय वस्तु भी छूटे तो हमारे हृदय-समुद्र में दु:ख की छोटी सी भी लहर पैदा न होने पाए। किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार के साथ सम्बन्धित होने या न होने में एकसम बने रहें, साक्षी (Witness) या उदासीन (Indifferent) तटस्थ द्रष्टा (Seer) बने रहें।
अथर्ववेद के एक मन्त्र में कहा गया है- 'स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्। आयु:, प्राणं, प्रजां पशुं, कीर्तिं, द्रविणं, ब्रह्मवर्चसं, मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम्’। (१९.७१.१) इस मन्त्र में 'मया’ और 'मह्यम्’ के द्वारा एक ही सत्य का संकेत हुआ है। आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, द्रविण (धन), ब्रह्मवर्चस (ब्रह्मतेज अर्थात् ब्रह्म का ज्ञान) ये सब व्यक्ति के द्वारा जीवन में पाने की चीजें हैं। वेदमाता ने प्राप्तव्य चीजों की सूची हमारे समक्ष रखी है और साथ में यह भी कह दिया कि ये सब चीजें अपने पास नहीं रखनी, यहाँ तक कि ब्रह्मवर्चस भी। क्योंकि अपने पास रखने का अर्थ है- अपने अहं को पुष्ट करना। अर्पित कर देने का अर्थ है- निरहं (निरहङ्कार व निर्मम) हो जाना। इसके अतिरिक्त ब्रह्मलोक में जाने का कोई रास्ता नहीं है। इसीलिए संन्यास धर्म में दीक्षित होता हुआ संन्यासी अपने ऊपर ओढ़े हुए सभी लिबासों को उतार देता है।
कोई क्या छीनेगा?
जो अकेला हो जाता है वही फिर सर्वगत सत्य के साथ एक हो सकता है। और जो साधक अकेला (केवल) होने की कला सीख लेता है, वही निर्भय, सर्वथा निर्भय रह सकता है। क्योंकि अकेले को कौन डरा सकता है? डरने के लिए तो कुछ पाने की चाह होनी चाहिए, इसके अतिरिक्त उस चाह में कोई बाधा उपस्थित होने की संभावना दिखाई देने लगे तो भी भय हो, सकता है, किन्तु जिसने वस्तु, व्यक्ति, विचार और यहाँ तक कि अपने शरीर से भी तादात्म्य हटा लिया हो तो अब उससे कोई क्या छीनेगा? और वह क्यों किसी से बाधित होगा?
आचार्य चरक ने भय के कारणों पर विचार करते हुए सूत्ररूप में एक वचन बोला- 'असमर्थता भयकराणाम्’ अर्थात भयदायक जितने भी हेतु हो सकते हैं उनमें 'असामथ्र्य’ प्रकृष्टतम है। जो व्यक्ति ज्ञान में, बल में, धन में, जनसमर्थन में, विद्या में, वक्तृता में, गुणों में बढ़ा हुआ है वह किसी से क्यों डरेगा? असमर्थ अवस्था में ही व्यक्ति अपने आपको भयभीत पाता है। डायबेटिक व्यक्ति ही मीठे से डरेगा, स्वस्थ व्यक्ति क्यों डरेगा, कारण उस विषय में उसकी कमजोरी समाप्त हो गयी है किसी भी विषय में भय, कमजोरी को और निर्भयता मजबूती को प्रकट करती है। यदि निर्बल लोगों के समक्ष बलवान् अपनी किसी प्रकार की शक्ति का प्रयोग करे- राजशक्ति, धनशक्ति, पदशक्ति, मन्त्रशक्ति, तर्कशक्ति, विद्याशक्ति, शारीरिक शक्ति, मन:शक्ति इत्यादि चाहे जो भी हो तो निर्बल व्यक्ति का भयभीत होना स्वाभाविक है कि यह मेरा कुछ छीन लेगा, मेरा शोषण करेगा, मुझे दबायेगा। पर संन्यासी का कोई क्या छीनेगा जिसका अपना कहा जाने योग्य कुछ है ही नहीं, कुछ बचा ही नहीं। संन्यासी ऐसा व्यक्तित्व है जो समस्त परिग्रह का त्याग कर सर्वथा 'अपरिग्रही’ हो गया है तथा आगे के लिये भी वस्तु-व्यक्ति-विचार के संग्रह को स्थान नहीं देना चाहता।
स्वयं समीक्षक बनें:
जो व्यक्ति लौकिक स्तर पर कहीं खड़ा है, वह दूसरे किसी भी अपने से आगे निकल जाने में अपनी हानि देखता है। लोक का व्यवहार भी है कि कोई भी व्यक्ति अपने को पीछे नहीं देखना चाहता है। लोक का यह संघर्ष सर्वजनविदित है और सर्वजनसंवेद्य है। लौकिक व्यक्ति यही चाहता है- कि पुत्र से, शिष्य से, धन से, बल से, पद से, प्रतिष्ठा से, शक्ति से मेरे ही नाम का सिक्का चले, मैं सबसे विशेष समझा जाऊँ। किसी भी उपाय से या शिष्ट सम्मत उपायों से मैं सबसे आगे निकलूँ। सबसे आगे निकलने में उसे सर्वातिशायी प्रसन्नता की अनुभूति होती है। जबकि संन्यासी अपनी इच्छा से संसार की इस दौड़ से अपने आपको अलग कर रहा होता है। वह सबको अभयदान दे रहा होता है कि ऐ संसार के लोगों! मैं अब आप लोगों की किसी प्रकार की हानि नहीं करूँगा। मैं आप लोगों के साथ किसी भी स्पर्धा में भाग नहीं लूँगा। संन्यास (त्याग) एक ऐसी इच्छा मुक्त पूर्ण स्थिति है कि इसमें दूसरों के समक्ष अपने आप को प्रमाणित करना नहीं होता, केवल स्वयं ही अपने द्वारा अपना आकलन करते हुए अपने ऊपर कार्य करना होता है।

45

भय रहित हों:
श्रीमद्भगवद्गीता में सदा 'अभय’ रहना एक दैवी सम्पत्ति कहा गया है। भगवान् के भक्त के स्वरूप का चित्रण करते हुए कहा गया  कि  'यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य:’। (१२.१५) अर्थात् भगवान् के भक्त का एक प्रमुख लक्षण यह है कि उससे कोई भयभीत नहीं होता, क्योंकि दूसरों के जीवन में उसने व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करना छोड़ दिया है, दूसरों के साथ उसकी स्पर्धा समाप्त हो गयी है। जैसे किसी प्रसिद्ध खिलाड़ी ने खेल से संन्यास ले लिया, अब उसके साथी उससे क्यों भयभीत होंगे या एक उच्चकोटि के राजनेता ने राजनीति से अपने को मुक्त कर लिया, तो प्रतिष्पर्धी उसके साथी उससे तत्काल निर्भय हो जाते हैं। एक उद्योगपति उद्योग जगत् से मुक्त होकर संन्यासी बन जाता है, तो पहले जो उसके साथी उससे भयभीत रहते थे, वे सब अब भय मुक्त हो जाते हैं। किसी चुनाव में एक सीट के लिये पाँच उम्मीदवार हैं, सब एक दूसरे से भयभीत रहते हैं। उनमें से अपनी इच्छा से कोई एक या दो अपने को उस दौड़ से वापस कर लेते हैं तो withdraw वाले से अन्य सब निर्भय हो जाते हैं। इसी प्रकार वह स्वयं भी किसी से भयभीत नहीं होता, क्योंकि वह किसी भी प्रकार के सुख की अपेक्षा नहीं रखता। सुख की चाह के साथ भय सदा ही अविनाश भाव रूप से सम्बद्ध रहता है। इसके विपरीत मनुष्य के अन्दर जितना-जितना ज्ञान बढ़ता जाता है, उसके अनुपात में ही उसमें लेने का भाव कम और देने का भाव अधिक होता जाता है।
संन्यासी की उच्चावस्था:
यदि विचार किया जाये कि मनुष्य दूसरों के लिये या अपने ही साथी भाइयों के लिए क्या-क्या दे सकता है तो बहुत सारी चीजें गिनाई जा सकती हैं- धन, वस्तु, उनके कार्यों का समर्थन (एक प्रकार का प्रोत्साहन), विद्या, शिक्षा-संस्कार, सेवा, पथ-प्रदर्शन, समयदान और अभयदान। इन सभी को देने का अपना-अपना महत्त्व है। कुछ दानों में पदार्थ दिया जाता है, कुछ में ज्ञान और कुछ में भाव। अभयदान एक उच्चकोटि का भाव है, जिसका दान करने के लिए न पदार्थ की आवश्यकता होती है न समय की, केवल मन का एक विशेष भाव बनाना होता है। संन्यास दीक्षा में इसी उच्च भाव को सब प्राणियों तक फैलाने की बात कही गई है। यही संन्यासी की परम स्थिति है, जिसका फल है ''मत्त: सर्वभूतेभ्योऽभयमस्तु’’
वास्तम में एक सामान्य व्यक्ति भी जब संकल्पित होता है कि न तो मैं किसी भी विषय में किसी के साथ स्पर्धा के भाव में जीऊँगा, न किसी की सत्ता, सम्पत्ति या सम्मान में बाधा डालूँगा, प्रत्येक विषय में अपने लिए दूसरों से निरपेक्ष रहूँगा, अचाह रहूँगा, केवल जिज्ञासुओं की या दु:खियों की अपनी सम्पूर्ण सामथ्र्य से सेवा करता रहूँगा इत्यादि, तो उसका भी यह संन्यास भाव की दिशा में प्रयास ही कहा जायेगा। आज विश्व शांति, विश्व सृजन व विश्व निर्माण के लिए संपूर्ण दिशा में ऐसी ही गूंज की जरूरत है। हम भी समय की पुकार सुनें।

Related Posts

Advertisment

Latest News

शाश्वत प्रज्ञा शाश्वत प्रज्ञा
ओ३म हमारे सपनों का भारत 1.  सच्चे सनातनी बनें - हम सभी ऋषि-ऋषिकाओं की सन्तानें वंशधर सनातन धर्म के मूल...
सनातन संस्कृति मानवता की पोषक
प्राणविद्या
पतंजलि योगपीठ (ट्रस्ट) तथा भारतीय शिक्षा बोर्ड के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित सम्मान समारोह में युग पुरुष प्रो. रामदरश मिश्र को ‘पतंजलि शिक्षा गौरव सम्मान’
रेनोग्रिट
गीता का ज्ञान पाने की अभीप्सा का स्वरूप क्या है?
शाश्वत प्रज्ञा
एजुकेशन फॉर लीडरशिप का शंखनाद
सुबह की चाय का आयुर्वेदिक, स्वास्थ्यवर्धक विकल्प  दिव्य हर्बल पेय
गीतानुशासन