धर्ममय राजदण्ड की स्थापना कर ही दी नरेन्द्र ने

धर्ममय राजदण्ड की स्थापना कर ही दी नरेन्द्र ने

प्रो. कुसुमलता केडिया

श्री नरेन्द्र मोदी ने समस्त विरोधों के मध्य भारत के परम्परागत धर्ममय राजदण्ड की स्थापना कर ही दी। इससे उनके आत्मबल और संकल्प की दृढ़ता प्रगट होती है। सम्राटों के यही मुख्य लक्षण हमारे यहाँ गिनाये गये हैं। संकल्प, उत्साह, ओज, बल, विक्रम और रणनैतिक चातुर्य शासक के अनिवार्य गुण हैं। नई वैश्विक भू-राजनीति में भारत का केन्द्रीय महत्व है और श्री नरेन्द्र मोदी ही इस ऐतिहासिक कालखंड में भारत के सुयोग्य नेतृत्व में सक्षम शासक हैं।
अपने राष्ट्र को सबल सुदृढ़ बनाने वाले सम्राट या शासक वर्तमान समय में कैसे कार्य करते हैं, इसका अच्छा उदाहरण हैं बिस्मार्क। 1870 ईस्वी में बिस्मार्क ने पहली बार जर्मन राष्ट्र के एकीकृत स्वरूप की बात की। उसके पहले तक सम्पूर्ण जर्मन क्षेत्र 300 से अधिक अलग-अलग राजनैतिक इकाइयों में बंटा था। वस्तुत: जर्मन शब्द स्वयं हूण का तद्भव रूप है। यह बात जर्मन भी जानते हैं और सम्पूर्ण यूरोप भली-भांति जानता है। तो बिस्मार्क ने दावा किया कि जहाँ-जहाँ हूणों का कब्जा रहा है, वह सम्पूर्ण क्षेत्र जर्मन राष्ट्र है। अब यह बात अलग है कि हूण वस्तुत: भरतवंशी क्षत्रिय हैं और वाल्मीकीय रामायण तथा महाभारत में उन्हें भारतीय क्षत्रिय ही कहा गया है और सम्पूर्ण पुराणों में तथा टॉड के द्वारा संकलित क्षत्रियों की वंशावली में भी हूणों को भारतीय क्षत्रिय ही कहा गया है, परंतु ईसाई पादरियों ने और ईस्ट इंडिया कंपनी के बाबू तथा सैनिक एवं अन्य निचली श्रेणी के कर्मचारियों ने अपने राजनैतिक और आर्थिक लक्ष्यों के लिये मनमाने झूठ रचे और उसे ही यूरोप में प्रचारित किया। इसलिये बिस्मार्क को हूणों के भरतवंशी क्षत्रिय होने वाला तथ्य स्मरण नहीं था। यद्यपि जर्मन लोग हूणों को यानी स्वयं को 20वीं शताब्दी ईस्वी में आर्य तो कहने ही लगे थे।
जर्मन राष्ट्र के उभार से कांप उठे इंग्लैंड-फ्रांस
जर्मन राष्ट्र के 1870 ईस्वी में इस उभार के साथ ही यूरोप में सत्ता संतुलन लड़खड़ा गया। इंग्लैंड के पास तब तक कोई संगठित सेना नहीं थी। इसीलिये बिस्मार्क ने कहा था कि इंग्लैंड के सैनिकों को तो हमारी जर्मन पुलिस ही गिरफ्तार करके ले आयेगी।
इंग्लैंड और फ्रांस कांप गये और उन्होंने रूस से संधि की तथा वहाँ अपने अनुकूल राजनैतिक परिवर्तन घटित होने में विशेष रूचि ली। साथ ही उन्होंने तुर्की से भी संधि का प्रयास किया। तब तक तुर्की एक शक्तिशाली राज्य था और इसीलिये उसने इंग्लैंड और फ्रांस की चालों को भांप लिया तथा कूटनैतिक वार्ता करता रहा और जर्मनी से भी मैत्री रखे रहा। यु़द्ध में मुख्यत: भारतीय सैनिकों की सहायता से धुरी राष्ट्रों के विरूद्ध कथित मित्र राष्ट्रों को सफलता मिली और उन्होंने तुर्की को अनेक छोटे-छोटे नेशन स्टेट में बांट दिया तथा जर्मनी को भी खंडित करने का प्रयास करने लगे। अंतत: द्वितीय महायुद्ध में पुन: जीतकर वे जर्मनी को बांटने में सफल ही हो गये। यद्यपि इन तीनों ही नेशन-स्टेट में शासकों के प्रतिस्पर्धी और विरोधी शक्तिशाली समूह सक्रिय थे। परंतु युद्ध के परिवेश में उन सबको दबाना और अपनी-अपनी राष्ट्रीयता की बात करते हुये ऐसा करना सुगम हो गया।
नये-नये नेशन स्टेट्स खड़े किये गये
कथित मित्र राष्ट्रों के गुट ने स्वयं यूरोप में अनेक नेशन स्टेट खड़े किये। 2 करोड़ 20 लाख सैनिकों की इन दोनों युद्धों में मृत्यु हुई और नवोदित नेशन स्टेट जर्मनी, पुराने आस्ट्रिया-हंगरी राज्य और तुर्की का राज्य तीनों ही बांट दिये गये। तुर्की का नाम बिगाड़कर उस राज्य के शासक उस्मान-वंश को अपने यहाँ के एक शासक ऑटो से सादृश्य दिखाने के लिये इंग्लैंड आदि उसे ऑटोमन राज्य कहने लगे। नाम बिगाड़ना भी इनकी सुपरिचित रणनीति रही है।
लेनिन स्तालिन को खड़ा किया इंग्लैंड अमेरिका ने
साथ ही स्वयं रूस में गृह युद्ध भड़काकर वहाँ ईसाई शासक जार को उखाड़ फेंकने में लेनिन और स्तालिन की सहायता की गई और विश्व का पहला कम्युनिस्ट राज्य इंग्लैंड, फ्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका के सहयोग से खड़ा हुआ। संयुक्त राज्य अमेरिका ने सम्पूर्ण विश्व में अमेरिकीकरण की नीति अपनाई और लेनिन तथा स्तालिन ने सम्पूर्ण विश्व में सोवियत प्रभाव फैलाने तथा लेनिनीकरण और स्तालिनीकरण की नीति अपनाई। इस प्रकार इनकी मैत्री प्रतिस्पर्धा में बदल गई।
भारत राष्ट्र का विखंडन ऐसे किया गया
इसी क्रम में भारत राष्ट्र के वीर सैनिकों की शक्ति दोनों महायुद्धों में अपने पक्ष में काम में लाने के बाद भविष्य में उसकी शक्ति से आशंकित होकर भारत राष्ट्र का भी विखंडन सुनिश्चित किया गया। भारत राष्ट्र के उत्तरी हिस्से के पांच राज्य तुर्कमेनिस्तान, कजाकिस्तान, ताजकिस्तान, अजरबेजान, किर्गिजिस्तान को 20वीं शताब्दी ईस्वीं के पूर्वार्द्ध में ही अपने लिये अगम्य पाकर इंग्लैंड ने लेनिन और स्तालिन के हवाले कर दिया था। शेष बचे भारत में से अफगानिस्तान को भी 1922 ईस्वी में ही एक अलग रियासत बना दिया था। बाकी हिस्से को और विखंडित करने के लिये योजना बनाई गई तथा पूर्व और पश्चिम दोनों हिस्सों के खाद्यान्न, मेवे तथा खनिज आदि बहुमूल्य सम्पदाओं वाले हिस्सों को अलग करने की रणनीति बनी और इसके लिये योजना पूर्वक हिन्दू-मुस्लिम टकराहटों को पराकाष्ठा तक ले जाया गया और पूर्वी तथा पश्चिमी पाकिस्तान बना दिये गये। यह मूल रूप से इंग्लैंड, फ्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका की योजना के अनुसार हुआ और गांधी जी, नेहरू जी तथा जिन्ना का चतुराई भरा उपयोग किया गया। योजना के मूल स्वरूप को ढ़कने के लिये इसे मुस्लिम अलगाववाद के रूप में प्रस्तुत किया गया। जबकि वास्तविक मुस्लिम बहुलता वाले इलाके- उत्तरप्रदेश तथा अन्य हिस्सों को यथावत रहने दिया गया और पूर्व तथा पश्चिम में जिन इलाकों को मजहबी राज्य बनाया गया, वहाँ 15 अगस्त 1947 ईस्वी तक बहुत बड़ी संख्या में मंदिर, तीर्थस्थल संस्कृत और हिन्दू धर्म के बड़े केन्द्र तथा हिन्दू जनसंख्या विद्यमान थी। जिससे स्पष्ट है कि मुस्लिम मजहबी उन्माद का केवल आवरण था और मूल रणनीति कथित मित्र राष्ट्रों की थी। इस प्रकार ये नेशन स्टेट बने हैं।
नई भू-राजनीति
अब नई भू-राजनीति वैश्विक स्तर पर इन नेशन स्टेट को पिघला रही है। नये समीकरण बन रहे हैं तथा संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड आदि को अपने मित्र के रूप में भारत की आवश्यकता है। हिन्दू भारत की आवश्यकता है। चीनी विस्तारवाद और मजहबी आतंकवाद- दोनों से निपटने के लिये उन्हें हिन्दू भारत चाहिये। रूस और यूक्रेन के वर्तमान टकराव में भी इंग्लैंड-अमेरिका के पक्ष को भारत की तटस्थता अपेक्षित है। सौभाग्यवश भारत में एक सच्चा तेजस्वी राष्ट्रीय नेतृत्व उपस्थित है जो विश्व राजनीति को भी अच्छी तरह समझ रहा है और उसका लाभ लेना जानता है। हमारे नरेन्द्र तो रात-दिन राष्ट्र की ही चिंता करने वाले शासक हैं। उन्होंने 2021 में 15 अगस्त को लाल किले से कहा था- 'यही समय है, सही समय है, भारत के अनुकूल समय है।’
संयुक्त राज्य अमेरिका की बदलती रणनीतियाँ
यह अकारण नहीं है कि संयुक्त राज्य अमेरिका के भू-राजनैतिक अध्ययनों में मध्य एशिया और अफगानिस्तान से लेकर चंपा (वियतनाम) तक के भारत का अभिन्न अंग ऐतिहासिक रूप से रहे होने की बात कही जा रही है। रूस से हाल ही में अलग हुये पांचों स्थान भी भारत के साथ साझा संघ बनायें, यह संयुक्त राज्य अमेरिका और इंग्लैंड चाहेंगे। जापान से भी अब उन्हें द्वेष नहीं है और चीन को हिंद महासागर की ओर तथा प्रशांत महासागर में बढ़ने से रोकने के लिये उन्हें जापान सहित उस क्षेत्र के सभी नेशन स्टेट्स की सहायता आवश्यक है। उनकी भारत से मैत्री इस समय संयुक्त राज्य अमेरिका को लाभकारी लगेगी। तिब्बत की स्वतंत्रता और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साम्राज्यवाद का अंत तथा सांस्कृतिक चीन का पुन: उदय संयुक्त राज्य अमेरिका को अप्रिय नहीं लगेगा। इस प्रकार अखंड भारत के पक्ष में नई वैश्विक भू-राजनीति स्वत: उभर रही है और इससे एक सशक्त राष्ट्र भक्त संगठन की समुचित भूमिका का सहयोग मिलने पर अखंड भारत का उभरना विश्व शक्तियों को सर्वथा स्वीकार होगा।
मोदी जी के होने का महत्व
इस परिप्रेक्ष्य में जी 20 के राष्ट्रों का शिखर सम्मेलन भारत में होना अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यह सम्मेलन नई दिल्ली में हो रहा है और इसका उद्घोष है - 'वन अर्थ, वन फैमिली’।
वस्तुत: 19 देशों और 20वीं यूरोपीय यूनियन को मिलाकर जी 20 समूह बना है। ये मिलकर विश्व की जनसंख्या का दो तिहाई अंश हो जाते हैं तथा विश्व व्यापार का तीन चौथाई एवं वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 85 प्रतिशत अंश है। अत: यदि इन देशों की सरकारों के मध्य नीतिगत न्यायपूर्ण व्यवहार का निर्णय होता है तो यह सचमुच समस्त विश्व के लिये ही कल्याणकारी होगा। यहाँ तक कि विश्व व्यापार संगठन और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व बैंक - कहीं भी नीतिगत न्याय नहीं है। सभी जगह यूरोप एवं अमेरिका के पक्ष में तथा विश्व के अन्य क्षेत्रों के प्रति भेदभावपूर्ण नीतियाँ एवं नियम बने हैं।
सौभाग्यवश इस समय भारत का नेतृत्व श्री नरेन्द्र मोदी कर रहे हैं जो व्यापार और वाणिज्य तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यवहार के प्रति अत्यंत सजग राष्ट्र नेता हैं। उन्हें इस बात का सजग स्मरण रहता है कि वे 140 करोड़ लोगों के राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वे इसका बल जानते हैं और निर्भय होकर न्याय का आग्रह करना भी जानते हैं।
अपने इसी बल का ज्ञान होने के कारण उन्होंने भारत विरोधी विदेशी शक्तियों से प्रेरित समस्त विरोध की उपेक्षा कर ली और संसद के नये सुंदर और शुभ भवन में परम्परागत धार्मिक क्रियाओं के साथ धर्ममय राजदण्ड (सेंगोल) की प्रतिष्ठा कर दी है। वे काम करना जानते हैं।
सच्चे राष्ट्रीय नेतृत्व की भूमिका
इस प्रकार वर्तमान राष्ट्रीय नेतृत्व पूर्व के नेतृत्व से नितांत भिन्न है और सच्चे और गहरे अर्थों में राष्ट्रीय है। वह राष्ट्र की शक्ति को अच्छी तरह जानता है और राष्ट्रहित में उसका सर्वोत्तम उपयोग किस प्रकार हो सकता है, इसकी उसे गहरी समझ है। सीधे नेशन स्टेट की सीमायें बढ़ाना इस युग में इतना आवश्यक और महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि परस्पर सहयोग और सामंजस्य के एक वृहत्तर क्षेत्र का निर्माण करना। श्री नरेन्द्र मोदी इसमें पूर्ण सक्षम हैं। इस प्रकार चक्रवर्ती सम्राट के हमारे शास्त्रों में प्रतिपादित अनेक गुणों से सम्पन्न हैं हमारे नरेन्द्र।

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