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गलत दवाएं खाने से खराब हो रहे हैं 20% तक लिवर : एक्सपर्ट
दुनिया में दवा से लिवर को पहुंचने वाली इंजरी के मामले काफी बढ़ रहे हैं, ऐसे ही न खाएं प्रोटीन सप्लिमेंट्स, पेन किलर या एंटीबायोटिक्स
लिवर को हो रहे नुकसान की एक बड़ी वजह अब दवाएं बनती जा रही हैं। दुनिया भर में दवा के मिसयूज की वजह से 10 से 20 प्रतिशत तक लिवर खराब हो रहे हैं। भारत में भी इसकी वजह से लिवर खराब होने का आंकड़ा जो पहले 2 से 3 प्रतिशत था, अब वह बढ़कर 10 प्रतिशत तक पहुंच गया है। कोरोना के समय और कोरोना के बाद इम्यूनिटी बढ़ाने, बॉडी स्ट्रेंथ के लिए बिना डॉक्टरी सलाह के मनमाने प्रोटीन सप्लिमेंट्स का इस्तेमाल करना, पेन किलर, एंटीबायोटिक्स, टीबी की दवा लेने से लिवर को इंजरी हो रही है। आईएलबीएस हॉस्पिटल के चेयरमैन डॉक्टर एस.के. सरीन ने अपने दावे में यहां तक कहा कि जो बहुत ज्यादा अल्कोहल लेते हैं, अगर वो शराब के सेवन के साथ दिन भर में 4 परासिटामोल भी लेते हैं, तो यह भी उनके लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है।
प्रोटीन सप्लिमेंट्स का प्रयोग खतरनाक
डॉक्टर सरीन ने एनबीटी से बात करते हुए कहा कि हम जो भी चीज खाते हैं, वह लिवर में जाता है। खाना या दवा, हर चीज लिवर तक पहुंचता है। इन दिनों युवाओं में रैपिड वेट बढ़ाने के लिए प्रोटीन सप्लिमेंट्स का इस्तेमाल काफी बढ़ गया है। इसकी वजह से युवाओं के लिवर में सीवियर इंजरी हो रही है।
दवाओं का दुष्प्रभाव भी जिम्मेदार
टीबी की दवा भी बहुत खतरनाक होती है। टीबी से पीड़ित लोग पहले से कमजोर होते हैं, उनका वजन कम होता है। कुछ ऐसी दवाएं हैं, जिनके लेने से उनका लिवर खराब हो जाता है। इसी प्रकार एंटीबायोटिक, पेन किलर खाने की वजह से भी ऐसा होता है।
ड्रग्स से लिवर खराब होने के मामले में गंगाराम अस्पताल के गेस्ट्रोलॉजी विभाग के एचओडी डॉ. अनिल अरोड़ा ने कहा कि प्रोटीन से नुकसान नहीं होता, लेकिन जब कोई प्रोटीन सप्लिमेंट्स लेता है तो इसमें से कई में स्टेरॉयड होता है। स्टेरॉयड की वजह से लिवर खराब हो जाता है। बॉडी बिल्डिंग में अक्सर युवा अपने मन से रैपिड वेट गेन के लिए प्रोटीन सप्लिमेंट्स ले लेते हैं, जिसकी वजह से कई युवाओं में डीप जॉन्डिस हो रहा है। उन्होंने कहा कि एंटी टीबी की दवा बहुत खतरनाक होती है, कई बार तो यह लिवर फेल की भी वजह बनती है।
प्रेग्नेंट महिलाएं, बुजुर्ग तथा डायबिटीज के मरीज कोई भी दवा सोच समझकर लें
डॉक्टर सरीन ने कहा कि गला खराब होने में लोग पेन किलर और एंटीबायोटिक खा रहे हैं। प्रेग्नेंट महिलाएं, बुजुर्ग, डायबिटीज के मरीज, कम वजन वाले लोग, उन्हें कोई भी दवा सोच समझकर लेनी चाहिए। अपने मन से कोई भी दवा नहीं लेनी चाहिए, चाहे प्रोटीन सप्लिमेंट्स हो या एंटीबायोटिक या पेन किलर यह खतरनाक है और उनके लिए उनकी दवा ही जहर बन जाती है। लिवर की बीमारी 5वें स्टेज में होती है, मरीज इलाज के लिए स्टेज 4 में पहुंचते हैं। स्टेज 3 और 4 तो बहुत कॉमन हो रहा है। इसलिए जागरूकता जरूरी है, बिना जाने-समझे दवा का इस्तेमाल न करें।
साभार : https://navbharattimes.indiatimes.com/metro/delhi/other-news/10-to-20-percent-liver-damage-caused-due-to-wrong-use-of-medicines/articleshow/96367768.cms
रोज 50 ग्राम मोटा अनाज खाने से हृदय रोग और डायबिटीज का खतरा 30 प्रतिशत तक कम होता है, यह कोलेस्ट्रॉल घटाता है, इंसुलिन सुधारता है
साल 2023 को संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष घोषित किया
संयुक्त राष्ट्र ने 2023 को अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष घोषित किया है। मोटे अनाज को साबुत अनाज या होल ग्रेन भी कहा जाता है। आखिर यह साबुत अनाज क्या है, जिसकी अचानक से मांग बढ़ी है। लोगों में सेहत के लिए ये पहली पसंद बन रहा है। मायो क्लिनिक के अनुसार साबुत अनाज न केवल बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करता है बल्कि गुड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाता है। इंसुलिन के स्तर को संतुलित करता है। ब्लड प्रेशर घटाता है। इससे हृदय रोग, स्ट्रोक और डायबिटीज का खतरा घटता है। आंतों के कैंसर का खतरा भी कम होता है। होल ग्रेन काउंसिल के अनुसार यदि व्यक्ति रोजाना ५० ग्राम या उससे अधिक मोटा अनाज या उससे बने पदार्थों का सेवन करता है तो कई गंभीर बीमारियों का खतरा कम होता है। हार्ट फाउंडेशन के अनुसार इसका सुबह नाश्ते में सेवन सबसे अच्छा होता है। दिन में खाना ज्यादा फायदेमंद है।
मोटा अनाज है क्या?
फसलों से पैदा हुए खाए जा सकने वाले बीज को अनाज कहा जाता है जैसे गेहूं, चावल, बाजरा आदि। किसी भी अनाज के तीन हिस्से होते हैं। जिस अनाज में ये तीनों हिस्से हों उसे साबुत अनाज कहते हैं।
ब्रान या चोकर
यह अनाज की सबसे ऊपरी कठोर परत होती है। इसमें अनाज का सर्वाधिक फाइबर होता है। साथ ही विटामिन्स और मिनरल्स भी होते हैं।
जर्म
यह बीज का वो हिस्सा है जो नए पौधे के रूप में अंकुरित होता है। इसमें कई विटामिन, हेल्दी फेट और पौधों में पाए जाने वाले अन्य पोषक तत्व होते हैं। यह खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करता है।
एंडोस्पर्म
यह हिस्सा बीज की ऊर्जा आपूर्ति करता है, इसमें ज्यादातर स्टार्च होता है। इसमें बहुत कम मात्रा में प्रोटीन, विटामिन और फाइबर होता है।
हार्वर्ड ने बताया मोटा अनाज है कितना फायदेमंद?
हृदय रोग : खतरा 30% तक कम
हार्वर्ड ने महिलाओं पर 10 साल तक किए गए अध्ययन में पाया कि जो महिलाएं भोजन में रोजाना 35 से 50 ग्राम तक साबुत अनाज या उनसे बने प्रोडक्ट का सेवन करती थीं उनमें हार्ट अटैक या हृदय रोगों से मृत्यु का खतरा 30% तक कम पाया गया।
टाइप-2 डायबिटीज : इसका खतरा भी 30 प्रतिशत तक कम होता है
हार्वर्ड इंस्टीट्यूट ने 1.60 लाख महिलाओं पर 18 साल तक किए गए अध्ययन में पाया कि रोजाना औसतन 50 ग्राम साबुत अनाज का सेवन करने वाली महिलाओं में टाइप-२ डायबिटीज होने का खतरा 30 प्रतिशत तक कम होता है।
कैंसर : आंतों में होने वाले कैंसर की आशंका 21 प्रतिशत तक कम
5 लाख महिलाओं और पुरुषों पर ५ वर्ष तक किए गए अध्ययन में पाया गया कि साबुत अनाज का सेवन करने से आंतों में होने वाले कैंसर का खतरा २१ प्रतिशत तक कम होता है। दरअसल इसमें पाया जाने वाला फाइबर आंतों का सेहतमंद रखता है।
भोजन में ऐसे करें शामिल?
बाजरा, ज्वार, चना, जौ, राजगिरा, ब्राउन राइस, मक्का और रागी हमारे यहां पाए जाने वाले प्रमुख मोटे अनाज हैं। इन्हें निम्र तरीके से भोजन में शामिल किया जा सकता है।
चना : चने को अंकुरित करके खाना सबसे आसान और सर्वाधिक फायदेमंद होता है। इसे गेहूँ के आटे के साथ भी मिलाकर खा सकते हैं।
बाजरा : यह कैल्शियम, प्रोटीन, आयरन, मैग्ग्रीशियम का प्रमुख स्रोत है। इसकी खिचड़ी या दलिया बनाकर खाएं। इसे भोजन में चावल की जगह शामिल किया जा सकता है।
जौ : इसका दलिया और रोटी आसानी से बनती है।
राजगिरा : इसमें विटामिन बी-२, बी-६, जिंक, मैग्रीशियम आदि होते हैं। मुरमुरे की तरह लड्डू बनाकर खा सकते हैं।
रागी : आयरन और कैल्शियम का प्रमुख स्रोत है। इसे आटे के साथ मिलाकर रोटी के रूप में खा सकते हैं।
सब्जियों में मिले यौगिक से बन सकती हैं कैंसर की नई दवाएं
सर के उपचार के लिए दुनियाभर के वैज्ञानिक नए-नए शोध करते रहते हैं। अब पोलैंड के शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन में बताया कि आने वाले समय में सब्जियों से कैंसर की दवाएं बनाई जा सकती हैं। शोधकर्ताओं नेसालनम जीन वाले पौधों में ऐसे बायोएक्टिव यौगिकों की पहचान की है, जिनकी मदद से कैंसर की नई दवाएं बनाई जा सकती हैं।
गौरतलब है कि आलू (सोलनम ट्यूबरोसम), टमाटर (सोलनम लाइकोपर्सिकम) और बैंगन (सोलानम मेलोन्गेना) जैसे पौधे जीन सोलनम का हिस्सा हैं। यह शोध हाल ही में 'जर्नल फ्रंटियर्स इन फार्माकोलॉजी’ में प्रकाशित हुआ है।
कैंसर का इलाज करने की क्षमता
यह अध्ययन प्रोफेसर मैग्डालेना विकील के नेतृत्व में पालैंड के पोजनैन स्थित 'एडम मिकीविक्ज यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने किया। उन्होंने ग्लाइको अल्कलॉइड नामक बायोएक्टिव यौगिकों की समीक्षा की है, जो आमतौर पर आलू, टमाटर जैसी सब्जियों में पाया जाता है। पता चला है कि इस यौगिकों में कैंसर का इलाज करने की क्षमता है।
गुणों को तलाशने की जरूरत
प्रोफेसर विकील का कहना है कि कैंसर के इलाज के लिए उन औषधीय पौधों की भी मदद ली जा सकती है, जिनका विभिन्न बीमारियों के उपचार में वर्षों से सफलतापूर्वक उपयोग किया गया है। शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन में पांच ग्लाइको अल्कलॉइड यौगिकों- सोलनिन, चाकोनीन, सोलासोनाइन, सोलामार्गिन और टोमैटिन का अध्ययन किया है, जो पौधों के सोलानेसी परिवार से प्राप्त होने वाल कच्चे अर्क में पाए जाते हैं, जिन्हें अक्सर नाइटशेड भी कहा जाता है। शोधकर्ताओं ने कहा कि कई पौधे ऐसे हैं, जो जहरीले होते हैं, लेकिन सही खुराक जहर को भी दवा में बदल सकती है। ऐसे में यदि वैज्ञानिकों को अल्कलॉइड की एक सुरक्षित खुराक मिल जाए तो इनकी मदद से कई रोगों के लिए दवाएं बनाई जा सकती हैं।
संभावनाएं मौजूद
नए शोध में पता चला है कि ग्लाइको अल्कलॉइड विशेष रूप से कैंसर कोशिका की वृद्धि को रोक सकता है और कैंसर कोशिका को खत्म करने में मददगार हो सकता है। शोध में इस बात के प्रमाण भी मिले हैं कि ग्लाइको अल्कलॉइड विषाक्त नहीं होते और न ही डीएनए को नुकसान पहुंचाते हैं।
साभार : हिन्दुस्तान समाचार पत्र
कैंसर, डायबिटीज़, मोटापे का कारण हैं ये ४ व्हाइट फूड, यूँ पहुँचाते हैं नुकसान
शक्कर, नमक और मैदा जैसे उत्पादों का कितना इस्तेमाल उचित है?
स्वास्थ शरीर के लिए सबसे जरूरी है कम खाना और ज्यादा शारीरिक मेहनत करना। लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है भोजन में अच्छे न्यूट्रिशन का होना। बदली हुई जीवनशैली, भोजन में फास्ट फूड और पैकेज्ड फूड की बढ़ी हुई मात्रा को कम कर दिया है। इनमें चीनी, नमक, मैदा और अजीनोमोटो जैसे पदार्थ शामिल हैं। खास बात यह है कि प्रोसेस्ड फूड में इनकी मात्रा खतरनाक स्तर तक होती है। हार्वर्ड इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के अनुसार ये न केवल कैंसर, टाइप-२ डायबिटीज, मोटापा, ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन रहे हैं। इतना ही नहीं, यह उम्र को कम से कम दस साल तक कम कर सकते हैं। जानिए उन चार खाद्य पदार्थों के बारे में जिनका ओवरयूज़ बहुत खतरनाक है।
शक्कर : कैंसर, डायबिटीज जैसी बीमारियों का कारण
नुकसान : रिफाइंड शुगर यानी चीनी को एम्पिटी कैलोरी भी कहते हैं। इसमें कोई भी पोषक तत्व नहीं होते। जैसे ही यह हमारी पाचन नली में पहुँचती है ग्लूकोज और फ्रक्टोज में टूटती है। जो लोग शारीरिक श्रम नहीं करते, उनके लिवर में यह फैट के रूप में जमा हो जाती है। इसका इंसुलिन पर भी बुरा असर पड़ता है, जिससे डायबिटीज होने का खतरा बढ़ता है।
सही मात्रा : भारतीय परिवेशमें केवल ५ चम्मच चीनी ही प्रतिदिन काफी है। ४० की उम्र के बाद इसे और घटाएँ।
अजीनोमोटो : दिल के लिए बेहद नुकसानदायक
नुकसान : अजीनोमोटो मोनोसोडियम ग्लूटामेट है। जो चाइनीज फूड, सूप आदि में मिलाया जाता है। यह प्राकृतिक रूप से टमाटर, अंगूर में पाया जाता है।
सही मात्रा : कृत्रिम रूप से लेने की कोई आवश्यकता नहीं है।
सफेद नमक : हाई ब्लड प्रेशर के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार
नुकसान : नमक शरीर में पानी की मात्रा पर असर डालता है। यदि हम ज्यादा नमक खाते हैं तो शरीर में जमा हुआ अतिरिक्त पानी ब्लड प्रेशर को बढ़ा देता है। इसके अलावा जब नमक को रिफाइन किया जाता है तो इसमें पाया जाने वाला आयोडीन हट जाता है। वहीं रिफाइन किए जाने के दौरान इसमें फ्लोराइड्स मिलाए जाते हैं जो ज्यादा खाने पर नुकसान पहुँचाते हैं।
सही मात्रा : रोज के खाने में अधिकतम १ छोटा चम्मच नमक लेना चाहिए। बीपी है तो डायटिशियन से परामर्श जरूरी।
मैदा : मोटापा, कोलेस्ट्रॉल जैसी बीमारियों का कारण
नुकसान : मैदा बनाने के लिए गेहूं को प्रोसेस करने के दौरान इसमें पाए जाने वाले टिशू जिन्हें इंडोस्पर्म कहते हैं, खत्म हो जाते हैं। ऐसे ही पाचन के लिए आवश्यक इसकी चोकर भी हट जाती है। कुल मिलाकर गेहूँ से मैदा बनाते समय इसके लगभग पूरे पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं। ऐसे में यह पाचन सबंधी गंभीर समस्या पैदा करता है।
सही मात्रा : मैदा से बने खाद्य पदार्थ सप्ताह में एक बार खा सकते हैं। वो भी सिर्फ टेस्ट करने लायक।
लिवर कैंसर से बचना है तो वजन काबू में रखें
ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने साढ़े तीन लाख लोगों पर किया अध्ययन
अगर आप मोटे हैं और आपका वजन आपके कद के अनुरूप बहुत ज्यादा है तो आप एक नहीं, कई गंभीर बीमारियों के जोखिम में हैं। एक नए अध्ययन मेें चेतावनी दी गई है कि वजन बढ़ने से पाचन तंंत्र की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, जिससे मध्यम आयु वर्ग में लिवर कैंसर हो सकता है।
अध्ययन के अनुसार, बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) की प्रत्येक अतिरिक्त इकाई के लिए पेट या यकृत में ट्यूमर के विकास का खतरा 13 प्रतिशत बढ़ जाता है। वहीं भोजन नली का कैंसर और अग्याशय के कैंसर की आशंका भी क्रमश: 10 और 6 प्रतिशत बढ़ जाती है।
यूकेबायोबैंक से प्राप्त किया गया डाटा:
ब्रिटिश और स्वीडिश शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में उन्होंने यूके बायोबैंक डाटाबेस से प्राप्त किए गए 3,50,000 से अधिक लोगों के डाटा का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि वजन का बढ़ना कैंसर के जोखिम से जुड़ा हुआ था। वहीं एक अन्य अध्ययन के मुताबिक, आपके बॉडी इंडेक्स मॉस में हुई प्रत्येक पांच किलोग्राम प्रति वर्गमीटर की बढ़ोतरी से पुरुषों में लिवर कैंसर होने खतरा 38 फीसदी, जबकि महिलाओं में 25 फीसदी बढ़ जाता है।
दुनिया की दो-तिहाई आबादी मोटापे से परेशान:
इसमें कोई शक नहीं कि मोटापा लाइफस्टाइल से जुड़ी एक तरह की बीमारी है जिसकी वजह से शरीर में कई तरह की बीमारियां और हो जाती हैं जिसमें कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी भी शामिल है। यह स्टडी और रिसर्च एक ऐसे समय पर आयी जब दुनिया की करीब-करीब दो तिहाई आबादी मोटापे की समस्या से जूझ रही है जिसमें व्यस्कों के साथ-साथ बच्चों में भी मोटापे का खतरा तेजी से बढ़ रहा है।
क्या वजन कम करने से नहीं होगा कैंसर:
कैंसर का खतरा कई दूसरी चीजों पर भी निर्भर करता है जिसमें वातावरण से जुड़े फैक्टर अहम होते हैं। साथ ही तंबाकू और केमिकली प्रोसेस्ड फूड प्रॉडक्ट के सेवन से भी कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। लेकिन मोटापा लाइफस्टाइल से जुड़ी एक अहम समस्या है जिससे कैंसर होनेकी संभावना बढ़ती है। लिहाजा वजन कम करना महज इसलिए जरूरी नहीं कि ताकि आप अच्छे दिखें और अच्छे कपड़े पहन सकें बल्कि इसका बहुत हद से संबंध आपकी सेहत से भी है।
नए उपचार ने उम्मीद जगाई:
वैज्ञानिकों द्वारा वजन घटाने वाला एक नया उपचार खोजा गया है। इस उपचार ने चूहों का पसीना निकाला और वसा को कम कर दिया। वैज्ञानिकों का कहना है कि मोटापे से निपटने के लिए इसका इस्तेमाल मनुष्यों पर भी किया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रतिरक्षा प्रणाली को लक्षित करके पेट की चर्बी को कम करना संभव है। उन्होंने साइटोकाइन थाइमिक स्ट्रोमल लिम्फोपोइटिन (टीएसएलपी) के साथ चूहों का इलाज करने के बाद खोज की। यह एक प्रकार का प्रतिरक्षा प्रणाली प्रोटीन है, जिसके कारण वसा और वजन कम हुआ।
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