ऑटो इम्युमिन डिजीज में कारगर औषधि 'अश्वशिला’
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डॉ. अनुराग वार्ष्णेय
उपाध्यक्ष- पतंजलि अनुसंधान संस्थान
अश्वशिला अश्वगंधा और शिलाजीत का मिश्रण है। जोकि बहुत ही गुणकारी औषधि है। इस औषधि का उपयोग ऑटो इम्यूमिन डिजीज में भी काफी प्रभावी रूप से देखा गया है। इसका प्री-क्लिनिकल वैलिडेशन चेक करने के लिए पतंजलि अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिकों की टीम ने इस पर काम किया। इसमें यह देखने का प्रयास किया गया कि यह दवाई काम कैसे करती है और किस-किस बीमारियों मेें कैसे-कैसे इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।
क्या है रूमेटाइड अर्थराइटिस?
जैसा कि आप सभी जानते भी हैं कि ऑटो इम्यून डिजीज ऐसी बीमारी है जिसमें खुद शरीर की कोशिकाएं हमारे खिलाफ काम करने लगती हैं और ऐसी ही एक ऑटो इम्यून डिजीज है रूमेटाइड अर्थराइटिस। इसे हिन्दी में रूमेटाइड गठिया भी कहते हैं। इसके प्रारम्भिक लक्षण हड्डियों के जोड़ों में दिखाई पड़ते हैं। इसमें हाथ-पैरों की उंगली टेढ़ी हो जाती हैं। जोड़ों में दर्द होना शुरू हो जाता है। जोड़ों पर काफी सूजन भी देखने को मिलती है। यह नॉर्मल अर्थराइटिस है जो ज्यादा उम्र की वजह से होती है, ओस्टियो अर्थराइटिस उससे थोड़ी सी अलग होती है। यह किसी भी उम्र में हो सकती है। वैसे तो आजकल बच्चों में भी यह देखने को मिल जाती है, जुबिनाइल रूमेटाइड अर्थराइटिस भी आजकल रिपोर्टिड है।
आयुर्वेद बनाम एलोपैथ
इस बीमारी का हम क्या उपचार कर सकते हैं? इसमें कौन सी दवाई ठीक रहेगी? इसको लेकर हमारी टीम ने तीन-चार श्रेष्ठ औषधियों पर काम किया जिसमें से एक है अश्वशिला तथा दूसरा आमवातारी रस, जोकि एक क्लासिकल मैडिकेशन है। शिलाजीत और अश्वगंधा का एक अच्छा मिश्रण है। अश्वशिला कैप्सूल में यह एक-एक के अनुपात में होता है। यह ५०० एम.जी. का कैप्सूल होता है। इस कैप्सूल में २५०+२५० एम.जी. के दोनों कम्पोनेंट होते हैं। यह शिलाजीत व अश्वगंधा का घनसत्व (एब्स्ट्रैक्ट) है।
विश्व प्रसिद्ध शोध पत्रिका 'नेचर’ में प्रकाशित हुआ पतंजलि का अनुसंधान
अश्वशिला के इस अनुसंधान पर आधारित लेख हमने वर्ष २०२० में प्रकाशित किया। यह पतंजलि अनुसंधान संस्थान का पहला रिसर्च पेपर था जो विश्व प्रसिद्ध अनुसंधान पत्रिका 'नेचर’ में प्रकाशित हुआ। यह हमारी श्रेष्ठ खोज थी जिसे सांइटिफिक फिल्ड में व्यापकता से स्वीकार किया गया था। सांइटिफिक रिपोर्ट जो नेचर गु्रप का पब्लिकेशन है उसमें इसका पब्लिकेशन किया गया है। आज पतंजलि के जितने भी रिसर्च पेपर प्रकाशित हैं उनको विश्व के टॉप जनरल में स्थान मिलता है। सारी दुनिया अब योग के साथ-साथ आयुर्वेद का भी लोहा मान रही है। पतंजलि आज दुनिया में एकमात्र ऐसी संस्था है जो आयुर्वेद का प्रतिनिधित्व करती है।
चूहों पर आयुर्वेद का सफल प्रयोग
हमने चूहों के अंदर रूमेटाइड अर्थराइटिस का एक मॉडल डेवलप किया। रूमेटाइड आर्थराइटिस का एक कारण एक प्रकार का कोलेजन होता है जिसके खिलाफ हमारे शरीर में एंटीबॉडी बनती है। जब उस एंटीबॉडी का कन्संट्रेशन हमारे शरीर में बढ़ जाता है तब रूमोटाइड आर्थराइटिस पैदा होना शुरू हो जाती है। हमने एंटीबॉडी को बाजार से खरीदा और चूहों को देना शुरू कर दिया। फिर हमने चूहों के अन्दर रूमोटाइड आर्थराइटिस पैदा की। ऐसे प्रयोगों में जानवरों को बीमार करते हैं। पहले हमने चूहों के अंदर एंटीबॅाडी कोलेजन डाले और फिर यह देखने का प्रयास किया कि क्या उनमें वह लक्षण पैदा हो रहे हैं, जैसा कि इंसानों के अन्दर होते हैं? यहाँ पर चूहों के घुटने व एड़ी में बहुत ज्यादा सूजन आ चुकी थी। वह सूजन उसी प्रकार की थी जैसी सूजन हम इंसानों में देखते हैं। जब आश्वस्त हो गए कि जानवर बीमार हो गये हैं तो हमने नापना शुरू किया क्या इनके जो डिजीज पैरामीटर है वह मेजरेबल हैं। यहाँ दो पैरामीटर बहुत आवश्यक हैं- जिनमें एक है दर्द। जिनको घुटनों में सूजन आती है, अर्थराइटिस होती है, उनको दर्द बहुत ज्यादा होता है। फिर हमने चूहों का दर्द नापा और एक ऐसा दर्द नापा जो सामानयत: कम लक्षणों से ज्यादा दर्द होता है। जैसे किसी को पिन चुभा देते हैं तो थोड़ा दर्द होगा किन्तु जिनको अर्थराइटिस है उनको उसी पिन से ज्यादा दर्द होगा। हमने उन सभी को नापा। फिर हमने चूहों के दर्द को देखा कि कितनी देर में वह अपना पैर हटा रहे हैं। उनके पैरों में थोड़ा सा वजन टांगा और यह देखने का प्रयास किया कि वे कितना वजन सहन कर पा रहे हैं। उसकेआधार पर तय किया कि जो दर्द के लक्षण हैं वह अर्थराइटिस की वजह से बढ़ गये थे। तब हमने इन चूहों को अश्वशिला और साथ में एलोपैथिक की जानी-मानी तथा क्लिनिकली प्रूव्ड मेडिकेशन मैथोट्रैक्सेट को साथ-साथ चलाया। फिर हमने पाया कि मैथोट्रैक्सेट के जैसे परिणाम हमें अश्वशिला से मिले। यह हमारी टीम के लिए बहुत बड़ी बात थी।
एलोपैथी की दवा केवल दर्द कम करती है,
उसके कारण का निवारण नहीं करती
यहाँ एक बात समझनी आवश्यक है कि एलोपैथी की दवा केवल दर्द को कम करती है, उसके कारण का निवारण नहीं करती। हड्डियों के अन्दर अन्त: संरचना को एलोपैथी की कोई दवाई सही नहीं करती, उन सभी बीमारियों को सही करने का कार्य अश्वशिला करती है।
एलोपैथ में दुष्प्रभाव, अश्वशिला सुरक्षित औषधि
जो लोग मैथोट्रैक्सेट की दवा खाते हैं उनके लिवर तथा किडनी पर दुष्प्रभाव अवश्य पड़ता है और उनको बकायदा किडनी व लिवर की दवा साथ-साथ दी जाती है। जबकि अश्वशिला बिल्कुल सुरक्षित व ठीक पायी गयी। इसका किसी भी बॉडी के अंगो में किसी भी प्रकार का एक्यूमिलेशन (संचय) नहीं पाया गया।
रूमेटाइड अर्थराइटिस में पतंजलि का अनुसंधान
फिर हम लोग क्रएक्सरेञ्ज वाली टीम के पास गये क्योंकि जब हड्डियों की बात होती है तो क्रएक्सरेञ्ज सबसे पहला मार्कर है। फिर हमने चूहों की हड्डियों का क्रएक्सरेञ्ज किया और पाया कि जो भी जोड़ घिस गये थे, उन जोड़ों में जो भी खराबी आ गयी थी वह भी अश्वशिला के सेवन से सही हो गयी थी। ऐसा हमने शरीर के दोनों बड़े-बड़े जोड़ों घुटनों तथा टखनों में पाया। फिर हमने इन चूहों की हड्डियों को चिप्स के आकार में काटा। उनको बारीक-बारीक काटकर उनकी हिस्टोपैथोलॉजी की फिर देखा की सेल के लेवल पर जो मॉडिफिकेशन हैं, वह कैसे है? उन सब सैल्स के बदलाव में हमने पाया कि अश्वशिला ने उसको पूरा रिवर्स किया था। ऐसा हमने घुटनों में भी पाया और एड़ियों में। इसके साथ-साथ हमने यहाँ काॢटलेज को भी चैक किया, कि काॢटलेज का रिजन्रेशन शुरु हुआ या नहीं? हमने पाया कि अश्वशिला ने वह रिजन्रेशन भी शुरु कर दिया था। इसका रिस्पॉन्स हमने बिल्कुल मैथोट्रैक्सेट के बराबर पाया जोकि दुष्प्रभाव रहित था।
यहाँ पर एक बड़ी बात है उसे भी समझने की आवश्यकता है क्योंकि कुछ लोगों का कहना है कि इसमें शिलाजीत है तो इसका कोई साईड इफेक्ट तो नहीं है? क्योंकि यह एक भस्म या मिनरल रूप में होती है। फिर हमने यहाँ चैक किया, जो लिवर के जो बड़े मार्कर हैं स्.त्र.क्क.ञ्ज., स्.त्र.ह्र.ञ्ज. जिनको ्रञ्जढ्ढञ्ज और ्ररुञ्ज भी कहते हैं। जिन चूहों को हमने दवा दी थी उनमें यह देखा कि इनके लेवल तो नहीं बढ़े थे। यहाँ पर हमने पाया कि किसी भी प्रकार की कोई फाइंडिंग नहीं पायी गयी बल्कि इसका परिणाम मैथोट्रैक्सेट से भी अच्छा पाया था।
चुकि हमने यह परीक्षण अभी तक चूहों पर ही किया था तो इसे हमने इंसानो के शरीर मेें भी देखा और पाया कि इंसानो के सैल्स के अंदर ऐसा होता है या नहीं। उसे भी हमने अनुसंधान के माध्यम से समझने की कोशिश की। इसमें जो इंसानों के सैल्स होते हैं, जो इम्यून सैल्स हैं उन पर किसी प्रकार का कोई साइड इफेक्ट तो नहीं आ रहा है इसमें अध्ययन के उपरांत पाया कि कोई भी साइड इफेक्ट नहीं पाया गया बाकि जो साइटोकाइन होते है जिनकी वजह से इनफिलिमेशन होते है रूमोटाइड अर्थराइटिस भी एक इनफिलिमेशन डिजीज है उन साइटोकाइन के लेबल को भी अश्वशिला ने डोज डिपेन्ड तरीके से कम किया था वो भी बिल्कुल सेफ लिमिट के साथ-साथ यह हमें फिनोटाइप मिली थी।
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