शाकाहारी बनो...!

शाकाहारी बनो...!

डॉ. नारायणी मलिक 

कंद-मूल खाने वालों से
मांसाहारी डरते थे।
पोरस जैसे शूर-वीर को
नमन 'सिकंदरÓ करते थे।
चौदह वर्षों तक खूंखारी
वन में जिसका धाम था।
मन-मन्दिर में बसने वाला
शाकाहारी राम था।
चाहते तो खा सकते थे वो
मांस पशु के ढेरों में।
लेकिन उनको प्यार मिला
'शबरीके जूठे बेरों में।
चक्र सुदर्शनधारी थे
गोवर्धन पर भारी थे।
मुरली से वश करने वाले
गिरधर शाकाहारी थे।
पर-सेवा, पर-प्रेम का परचम
चोटी पर फहराया था।
निर्धन की कुटिया में जाकर
जिसने मान बढ़ाया था।
सपने जिसने देखे थे
मानवता के विस्तार के।
नानक जैसे महा-संत थे
वाचक शाकाहार के।
उठो जरा तुम पढ़ कर देखो
गौरवमय इतिहास को।
आदम से आदी तक फैले
इस नीले आकाश को।
दया की आँखें खोल देख लो
पशु के करुण क्रंदन को।
इंसानों का जिस्म बना है
शाकाहारी भोजन को।
अंग लाश के खा जाए
क्या फिर भी वो इंसान है?
पेट तुहारा मुर्दाघर है
या कोई कब्रिस्तान है?
आँखें कितना रोती हैं जब
उंगली अपनी जलती है।
सोचो उस तड़पन की हद
जब जिस्म पे आरी चलती है।
बेबसता तुम पशु की देखो
बचने के आसार नहीं।
जीते जी तन काटा जाए,
उस पीड़ा का पार नहीं।
खाने से पहले बिरयानी,
चीख जीव की सुन लेते।
करुणा के वश होकर तुम भी
गिरी गिरनार को चुन लेते।
 
शाकाहारी बनो...!

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