नेत्र, मुख,त्वचा एवं वक्ष रोगों में कारगर बादाम
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आचार्य बालकृष्ण
वैज्ञानिक नाम : Prunus amygdalus Batsch (प्रूनस एमिग्डेलस) Syn-Prunus dulcis (Mill.) D.A. Webb Amygdalus communis Linn.; कुलनाम : Rosaceae (रोसेसी); अंग्रेजी नाम : Almond (एलमॉन्ड); संस्कृत : वाताद, वाताम, वातवैरी, सुफला, नेत्रोपमफल; हिन्दी : बादाम, बदाम; उड़िया : बादामो (Badamo); ऊर्दू : बादाम शिरिन (Badam Shirin); कोंकणी : अमेन्ड (Amendi); गुजराती : बादाम (Badam), तमिल : वडुम (Badumai), वादाम-कोट्टाइ (Vadam kottai); तेलुगु : बादाममू (Vadam kottai), बादामू (Badamu); बंगाली : बिलायती बादाम (Bilati Badam), बादाम (Badam); पंजाबी : बादाम (Badam); नेपाली : कागजी बादाम (Kagzi Badam); मराठी : बादाम (Badam); मलयालम : बादामकोट्टा (Badamkotta)। अंग्रेजी : आल्मण्ड ट्री (Almond Tree); अरबी : लौज़ (Lowz), लूजालहुलु (Lujaalhulu); फारसी : बादाम (Badam।
बादाम मूलत: एशिया, सीरीया, तुर्की एवं ईरान के साथ-साथ विश्व में बलूचिस्तान, अफगानिस्तान, यूरोप एवं भूमध्यसागरीय भागों में कृषित किया जाता है। भारत में कश्मीर के शीतल स्थानों एवं पंजाब में ७००-२४०० मी की ऊँचाई पर इसकी कृषि की जाती है। बादाम की गिरी अत्यन्त पौष्टिक, बलवर्धक तथा रुचिकर होती है। इसका प्रयोग मेवे के रूप में किया जाता है। चरक-संहिता एवं सुश्रुत-संहिता में अखरोट, पिश्ता आदि अन्य मेवों के साथ इसका उल्लेख मिलता है।
बाह्य स्वरुप:
बादाम लगभग 8 मी ऊँचा, मध्यमाकार, पर्णपाती वृक्ष होता है। इसकी काण्डत्वक् पाण्डुर बैंगनी भूरे वर्णी तथा झुर्रीदार, पत्र सरल, एकांतर, लम्बे, भालाकार, वृंतयुक्त, मध्य भाग में मोटे तथा दोनों ओर पतले, कोमल, पत्तों का रंग हरा तथा पुराने पत्रों का रंग स्वेताभ धूसर वर्ण का होता है। इसके पुष्प श्वेत वर्णी या हल्के रक्त वर्ण के लगभग वृंतहीन होते हैं। फल की प्रारम्भिक या अपक्व अवस्था के ऊपर का आवरण मखमली, रोमश एवं कोमल, कुछ पकाने पर ऊपर का आवरण कठोर हो जाता है। परिपक्व अवस्था में यह आवरण फीके पीले रंग का कठोर तथा मोटा हो जाता है। फलों के अन्दर की गुठली झुर्रीदार एवं सूक्ष्म छिद्रों से युक्त तथा कठोर होती है। इसकी गिरी खुरदरी, चपटी, अग्रभाग पर नुकीली तथा भूरे वर्ण के आवरण से आच्छादित होती है। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल जनवरी से अक्टूबर तक होता है। यद्यपि बादाम का औषधीय प्रयोग चिकित्सक के परामर्श अनुसार करें, फिर भी इसकी गिरी, फल त्वक, मूल व तेल प्रयोज्यांग होते हैं।
रासायनिक संघटन:
इसके बीज तैल में मिरिस्टिक, पॉमिटिक, स्टिएरिक, ओलिक एवं लिनोलीक अम्ल पाया जाता है।
तिक्त बादाम में अवाष्पशील तेल, प्रोटीन, हाईड्रोसाएनिक अम्ल, एमीगडेलीन, प्रुनेसिन, डॉकोस्टरिन, सिटोस्टीरॉल, हाईड्रोसाएनिक ग्लूकोसाईड एवं साएनोजेनेटिक ग्लाईकासाईड पाया जाता है।
मधुर बादाम में वाष्पशील तेल ग्लोबुलीन एवं एमेन्डीन नाम प्रोटीन, शर्करा, विटामिन ्र, क्च, जलीय तत्व, खनिज (कैल्शियम, फॉस्फोरस, लौह), डॉकोस्टरिन एवं सिटोस्टीरॉल पाया जाता है।
इसके बीज कवच में कौमेरिक अम्ल, n- ओक्टाकोसेनॉल, n- ट्राईएकॉन्टेन, β- सिटोस्टीरॉल, कैटेचिन एवं एपीकैटेचिन पाया जाता है|

औषधीय प्रयोग विधि:
शिरो रोग:
शिरोरोग - बादाम आदि द्रव्यों से निर्मित महामयूर घृत (५ ग्राम) का प्रयोग करने से सिर से संबंधित बीमारियों में लाभ होता है।
स्नायुविकार - बादाम को सिरके के साथ पीसकर लगाने से स्नायु-विकारों का शमन होता है।
कड़वे बादाम को पीसकर सिर पर लेप करने से सिर के जुंये (लीखें) मर जाती हैं।
नेत्र रोग:
नेत्राभिष्यंद - 7 बादाम की गिरी को महीन पीसकर उसमें घृत तथा मिश्री 5-5 ग्राम मिलाकर प्रात: सायं सेवन करने से नेत्राभिष्यंद में लाभ होता है।
मुख रोग:
दंतरोग - बादाम के छिलकों को जलाकर, भस्म बनाकर दांतों पर रगड़ने से दंत विकारों का शमन होता है।
वक्ष रोग:
क्षतक्षीण - बादाम आदि द्रव्यों से निर्मित अमृतप्राशघृत (५ ग्राम) का सेवन करने से क्षतक्षीण में लाभ होता है।
कास - बादाम तेल का प्रयोग खांसी की चिकित्सा में विशेष रूप से किया जाता है।
उदर रोग:
अरोचक - बादाम को आधा दिन (१२ घण्टे) तक पानी में फुलाकर, व पानी में ही उबाल कर, ऊपर का छिलका उतारें, तत्पश्चात चासनी में मिलाकर मुरब्बा बनाकर सेवन करने से अरुचि का शमन होता है।
आंत्रशूल - बादाम को अंजीर के साथ पीसकर खिलाने से हल्का विरेचन होता है तथा आंतों की पीड़ा मिटती है।
प्रजनन संबंधी रोग:
वीर्यविकार - बादाम की गिरी को सेवन करने से वीर्य विकारों का शमन होता है।
मासिक विकार - बादाम को पीसकर उसकी वर्ती बनाकर योनि में रखने से मासिक-धर्म के समय होने वाली पीड़ा का शमन होता है।
स्वप्नदोष - भिगोकर, छिलका निकाली हुई 1 बादाम गिरी को 3 ग्राम मिश्री के साथ पीस लें, उसमें 1 ग्राम गिलोय सत्, 3 ग्राम घृत तथा 2 ग्राम शहद मिलाकर प्रात:-सायं सेवन करने से स्वप्नदोष दूर हो जाता है।
3 से 5 ग्राम बादाम चूर्ण को दूध में मिलाकर प्रात:-सायं सेवन करने से स्तन्य की वृद्धि होती है।
पूयमेह - छिलका रहित 7 बादाम की गिरी लेकर उसमें 1 ग्राम श्वेत चन्दन चूर्ण तथा समभाग मिश्री मिलायें और पीसकर दिन में तीन बार जल के साथ पीने से पूयमेह में लाभ होता है।
अस्थिसंधि रोग:
वातरक्त - बादाम आदि द्रव्यों से निर्मित जीवनीय घृत का सेवन करने से वातरक्त(गठिया) में लाभ होता है।
त्वचा रोग:
झांई रोग - समभा ग सरसों, बादाम वचा तथा सेंधानमक को पीसकर चेहरे पर लेप करने से झाईयां मिटती हैं।
क्षत एवं त्वक् विस्फोट - बादाम के बीजों को पीसकर लेप करने से घाव तथा फोड़ों में लाभ होता है।
चर्मरोग - बादाम को पीसकर लगाने से चर्मरोगों में लाभ होता है।
खुजली - कड़वे बादाम को पीसकर लगाने से खुजली मिटती है
मानस रोग:
हिस्टीरिया - बादाम के बीजों का नियमित सेवन करने से योषापस्मार (हिस्टीरिया रोग) में लाभ मिलता है।
दौर्बल्य - सामान्य दौर्बल्य तथा शल्य कर्माेपरान्त होने वाले दौर्बल्य में 7 ग्राम भिगोए हुए बादाम, 7 ग्राम अश्वगंधा, 1/2 ग्राम पिप्पली तथा 1/2 ग्राम काली मिर्च को अच्छी तरह मिलाकर पीसकर उसमें दूध, घृत तथा शर्करा मिलाकर दिन में दो बार भोजन से पूर्व सेवन करने से लाभ होता है।
बादाम की गिरी (5-10 ग्राम) में मिश्री मिलाकर सेवन करने तथा बाद में दूध पीने से दौर्बल्य का शमन होता है तथा शरीर पुष्ट होता है।
रसायन वाजीकरण:
वाजीकरणार्थ - 5-10 बादाम की गिरी में 1 ग्राम सोंठ, 20 ग्राम भुने चने, 1 ग्राम काली मिर्च तथा 20 ग्राम मिश्री मिलाकर 5 से 10 ग्राम की मात्रा में प्रात:-सायं दूध के साथ सेवन करने से वाजीकरण संबंधी गुणों की वृद्धि होती है। वस्तुत: बादाम वह बनौषधि है जो आहार में स्वादवर्धक, पोषण में स्वास्थ्य वर्धक एवं शारीरिक व मानसिक शक्ति प्रदान करने वाला है, जिसका हम सब सेवन करें और जीवन को विकार रहित बनायें।
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