योग अभ्यास से परिष्कृत व्यक्तित्व का निर्माण
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डॉ. अभिषेक कुमार भारद्वाज
एसोसिएट प्रोफेसर-मनोविज्ञान विभाग,
पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार
हमारा देश भारतवर्ष सदियों से ज्ञान-विज्ञान तथा अनुसंधान का शिक्षण-प्रशिक्षण केन्द्र रहा है। यहाँ के ऋषि-मुनियों, योगी-तपस्वियों, महापुरुषों द्वारा अपने जीवन की प्रयोगशाला में कई उच्चस्तरीय अनुसंधान सम्पन्न हुआ करते थे। वास्तव में रिसर्च (ऋषि-अर्चन) का वह स्वरूप काफी अनोखा रहा होगा। हमारा स्वर्णिम इतिहास रहा है कि हमने नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों से उच्च उद्देश्य के लिए जीने वाले अनेक मानव तैयार किये। ऐसे महापुरुषों ने मानव, समाज तथा राष्ट्र निर्माण के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया था। यह उनके विराट् व्यक्तित्व की झाँकी ही तो थी। उस समय के विद्यार्थियों हेतु अध्ययन के साथ-साथ उनके मन: प्रतिरोधक क्षमता निर्माण, पात्रता विकास, क्रमबद्ध व लयबद्ध जीवन, आत्मनिर्भरता एवं स्वावलम्बन के प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाता था। इसीलिए उनमें सकारात्मकता, उच्च जीवन-गुणवत्ता स्तर, अन्तर्दृष्टि एवं आत्म-सिद्धि का उच्चतम विकास देखने को मिलता था जो मानव कल्याण के लिए हमेशा उपयोगी होते थे। परोपकारिता, सामाजिकता के साथ ही धैर्य, साहस, सांवेगिक स्थिरता जैसे न जाने कितने शीलगुण/विशेषक उनके व्यक्तित्व के शृंगार हुआ करते थे। ऐसे महान एवं विशेष लोगों के जीवन-परिचय को पढक़र उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को जाना समझा व जीवन में धारण किया जा सकता है।
हम एक-दूसरे के बारे में जानने-समझने में आदिकाल से रूचि लेते रहे हैं। व्यक्ति के विभिन्न प्रकार के व्यवहार अथवा व्यक्ति विशेष के बारे में विभिन्न जानकारी प्राप्त करना एवं उनका मूल्यांकन करना पसंद करते रहे हैं। मनोविज्ञान वैज्ञानिक ढंग से व्यक्ति के व्यवहार के विभिन्न पहलुओं के अध्ययन का प्रयास करता है। इस प्रकार के अध्ययन न केवल मनोवैज्ञानिकों को बल्कि सामान्यजन को भी व्यक्तित्त्व के बारे में स्पष्ट विचार बनाने में सहायक होते हैं। यह न केवल व्यक्ति को अपने व्यवहार के बारे में अवगत कराता है बल्कि दूसरों के व्यवहार के प्रति उसे संवेदनशील भी बनाता है। यह ज्ञान उसे अपने अथवा दूसरों के व्यवहार द्वारा होने वाली समस्याओं को जानने और उनसे समायोजन में सहायता करता है।
व्यक्तित्व के अनेक पहलू होते हैं। व्यक्तित्व की संरचना, उसकी गतिकी, उसका मापन एवं मूल्यांकन कर हम किसी के व्यक्तित्व को समझ सकते हैं। सच्चाई तो यह है कि बिना स्वयं को जाने-समझे अन्य लोगों के व्यक्तित्व को समझना मुश्किल है, अपूर्ण है। यूँ तो हम सभी अपना-अपना व्यक्तित्व विकास कर अपना उत्कर्ष चाहते हंै और अपने तरीके से प्रयास भी करते हैं। व्यक्तित्व विकास के अनेक साधनों में योग मुख्य है। योग के विभिन्न अभ्यास जैसे-तप, स्वाध्याय, भक्तियोग, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, षट्कर्म, मुद्रा, बन्ध आदि का मनो-शारीरिक प्रभाव स्पष्ट है। ये अभ्यास हमारी मनोवृत्ति को सकारात्मक बनाते हैं, जीवन को निम्न उद्देश्य से उच्च उद्देश्य की ओर मोड़ते हैं। सतत् आत्म-निरीक्षण, विवेक (Right understanding) के जागरण में सहायक होते हैं। पाश्चात्य मनोविज्ञान में कई व्यक्तित्व सिद्धान्तों की चर्चा है जो व्यक्तित्व के पूर्ण स्वरूप की स्पष्ट व्याख्या करने में सक्षम नहीं हैं। भारतीय मनोविज्ञान के ग्रंथ तो व्यक्तित्व की गूढ़ एवं सम्पूर्ण व्याख्या करते हैं। गीता, योगदर्शन, यजुर्वेद, योग वाशिष्ठ आदि ग्रन्थों में व्यक्तित्व के स्वरूप की चर्चा है।
व्यक्तित्व-प्रकार :
हजारों वर्ष पूर्व भारतीय दार्शनिकों तथा मनोवैज्ञानिकों ने विभिन्न आधारों पर व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं तथा प्रकारों का वर्णन किया था। भारतीय मनोविज्ञान वस्तुपरक (Positive) विज्ञान होने के साथ-साथ आदर्श मूलक (Normative) विज्ञान भी है। फलत: यह न केवल व्यक्तित्व का विश्लेषण करता है, बल्कि उसके आदर्श स्वरूप को भी स्पष्ट करता है। योगदर्शन (भारतीय मनोविज्ञान का एक प्रामाणिक ग्रंथ) के अनुसार चित्त की पाँच अवस्थाएँ हैं, जो अग्रांकित हैं- 1. मूढ़ 2. क्षिप्त, 3. विक्षिप्त, 4. एकाग्र एवं 5. निरुद्ध। चित्त की विभिन्न अवस्था में व्यक्ति का व्यक्तित्व भी भिन्न-भिन्न होता है।
1. चित्त की मूढ़ अवस्था :
चित्त की इस अवस्था में तमोगुण की प्रधानता होती है तथा रज् व सत् दबे रहते हैं। तमोगुण की अत्यन्त वृद्धि से जन्मे क्रोधादि के कारण जब चित्त कत्र्तव्य-अकत्र्तव्य का निश्चय करने में असमर्थ होता है तो वह चित्त मूढ़ अवस्था वाला कहलाता है तथा ऐसे चित्त वाला पुरुष निद्रा, तन्द्रा, आलस्य, प्रमाद आदि वृत्तियों से घिरा होता है। मनोविज्ञान की दृष्टि में यह सामान्य व्यवहार से विचलित व्यक्ति की स्थिति है जिसका मानसिक स्वास्थ्य गंभीर रूप से रुग्ण है। इसे असामान्य व्यवहार की गंभीर विकृत अवस्था कह सकते हैं, जिसका उचित उपचार जरूरी है।
2. चित्त की क्षिप्त अवस्था :
सुख की आशा में चित्त निरन्तर विभिन्न प्रकार के विषयों में भ्रमण करता रहता है फिर भी उसे वास्तविक सुख नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में चित्त निरन्तर अस्थिर बना रहता है और ऐसा चित्त क्षिप्त अवस्था वाला कहलाता है। इसमें रजोगुण की अधिकता रहती है। इसी वजह से ऐसा चित्त बराबर अशान्त और अस्थिर बना रहता है। ऐसे चित्त वाले व्यक्ति की दशा राग-द्वेष से पूर्ण होती है जो अनेक तरह के बंधनों व परेशानियों का कारण है।
3. चित्त की विक्षिप्त अवस्था :
सत्त्वगुण की वृद्धि से किसी-किसी समय स्थिरता को प्राप्त होने वाला चित्त, विक्षिप्त अवस्था वाला कहलाता है। कभी-कभी प्रियजन की मृत्यु से, असफलता से, किसी भावनात्मक आघात से चित्त ईश्वर भक्ति की ओर चल पड़ता है पर विषयों के आकर्षण से चंचलित होकर पुन: उस मार्ग को छोड़ देता है। यह चित्त क्षिप्त और मूढ़ से कुछ श्रेष्ठ तो होता ही है। अत: यहाँ सत्त्वगुण की प्रधानता रहती है तथा रजस व तमस दबे हुए रहते हैं। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इस दशा में व्यक्ति को मानसिक रूप से स्वस्थ माना जा सकता है।
4. चित्त की एकाग्र अवस्था :
बाह्य वृत्तियाँ जब पूर्ण रुप से निरुद्ध हो जाती हैं और ध्येयाकार एक आभ्यान्तर वृत्ति ही मात्र बची रह जाती है, ऐसा चित्त एकाग्र कहलाता है। चित्त की इस अवस्था में रजस् व तमस् नाम मात्र के ही रह जाते हैं, तथा वहाँ सत्व की अधिकता हो जाती है। समस्त विषयों से हटकर एक ही विषय पर ध्यान लग जाने के कारण यह समाधि के लिए उपयुक्त अवस्था होती है।
5. चित्त की निरुद्ध अवस्था :
जब निरन्तर अभ्यास से योगी की उस ध्येयाकार वृत्ति का भी निरोध हो जाता है तथा जिसमें केवल संस्कार ही शेष रहते हैं, ऐसा चित्त निरुद्ध कहलाता है। इस अवस्था में चित्त में स्थिरता पूर्ण रुप से स्थापित हो जाती है। इसमें पंच क्लेश (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष एवं अभिनिवेष) नष्ट हो जाते हैं। यह अवस्था समाधि के लिए सर्वोत्तम है।
इन उपरोक्त पाँच अवस्थाओं में प्रथम तीन योग के लिए अनुपयोगी हैं तथा अन्तिम दो अवस्थाओं में योग का उदय होता है। एकाग्र और निरुद्ध अवस्था में सत्व की प्रधानता होती है। अत: कोई रोग उत्पन्न ही नहीं होता। विविध मानसिक रोग मन की मूढ़ व क्षिप्त अवस्थाओं में ही उद्भूत होते हैं।
पातंजल योगशास्त्र एवं व्यक्तित्व :
महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन में एक सूत्र के माध्यम से चित्त (मन) प्रसाधन/स्वच्छता की चर्चा करते हुए बताया है कि किस प्रकार के व्यक्ति से कैसा भाव रखना चाहिए। इस सूत्र में व्यावहारिक जीवन की सभी समस्याओं के समाधान समाहित हैं अत: यह सूत्र व्यवहार चिकित्सा का आधारभूत तत्त्व है। यह सच है कि व्यवहार परिष्कृत होगा तो व्यक्ति का व्यक्तित्व भी परिष्कृत होगा।
मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदु:खपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्।। 1/33, योग दर्शन
व्यक्ति | भावना |
सुखी व आनंदित व्यक्ति के प्रति | मैत्री/मित्रता का भाव |
दु:खी/पीडि़त व्यक्ति के प्रति | करूणा/दया का भाव |
पुण्यवान/सफल व्यक्ति के प्रति | मुदिता/प्रसन्नता का भाव |
पाप कर्म करने वाले/समाज विरोधीया दूसरों को नुकसान पहुँचाने वालों के प्रति | उपेक्षा का भाव |
पातंजल योग दर्शन में व्यक्तित्व के प्रकार का भी संकेत मिलता है जिन्हें तीन वर्गों में रखा जा सकता है-
1. आदर्श/सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व या ईश्वर का व्यक्तित्व
2. मानव जीव का व्यक्तित्व और
3. उपजीवों का व्यक्तित्व।
ईश्वर एक ऐसा विशेष पुरुष है जो क्लेश (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश), कर्म (शुक्ल, कृष्ण, शुक्ल-कृष्ण तथा अशुक्ल-अकृष्ण), विपाक (कर्मों का फल-जाति, आयु, भोग) तथा आशय (कर्म संस्कारों का समुदाय) आदि से मुक्त रहता है।
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वर:।। 1/24, योग दर्शन
ईश्वर को बद्ध जीव को मुक्ति की ओर प्रेरित करने वाला व्यक्तित्व भी कहा जा सकता है। वह नित्य मुक्त है। मानव जीव क्लेश, कर्म, विपाक तथा आशय से गुजरने वाला, चित्त की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरने वाला व्यक्तित्व है यानि वह नित्य मुक्त नहीं है। इस तरह मानव (जीव) जिन्हें मुक्ति मिल गयी, वे ईश्वर की तरह नित्य मुक्त नहीं हुआ करते बल्कि वे बंधन ग्रस्त थे लेकिन उन्हें अब मुक्ति मिली है। परन्तु बहुत-से मानव अभी मुक्त नहीं हो पाये हैं जिन्हें क्लेश, कर्म, विपाक आदि से गुजरना है और मुक्ति के लिए प्रयास करते रहना है। अन्त में उपजीव का व्यक्तित्व जो एक तरह से क्लेश, कर्म, विपाक, आशय से गुजर रहे हैं और मूलत: भोगते हुए अपने कर्माशय का क्षय करते हैं। इस तरह योग में आदर्श व्यक्तित्व नित्य मुक्त ईश्वर को ही माना जा सकता है। मानव जीव का व्यक्तित्व बद्ध एवं मुक्त (जो नित्य मुक्त नहीं हैं पर योग मार्ग का अनुसरण कर निर्बीज समाधि को प्राप्त होकर अब मुक्त हुए हैं) दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। लेकिन उपजीव जिन्हें भोगते हुए विभिन्न योनियों को पार करते हुए मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करना होता है और उच्चतर योनियों में आरोहण पथ पर चलना होता है।
पातंजल योग दर्शन में शुक्ल कर्म (अच्छे, पुण्य कर्म यानि शास्त्रानुकूल कर्म), कृष्ण कर्म (बुरे, पाप कर्म यानि शास्त्र विरूद्ध कर्म), शुक्ल-कृष्ण कर्म (जब उपरोक्त दोनों कर्म एक साथ किये जाते हैं; सामान्य रूप से सांसारिक मनुष्य कभी पुण्य और कभी पाप कर्म करते हैं) तथा अशुक्ल-अकृष्ण कर्म (न पुण्य, न ही पाप कर्म; ऐसे कर्म योगी पुरूष ही करते हैं) की चर्चा है। इन कर्मों के अनुरूप भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्धारण होता है।
कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम्।। 4/7, योग दर्शन
योगियों के कर्म अशुक्ल और अकृष्ण होते हैं जबकि दूसरों के कर्म तीन प्रकार (शुक्ल अर्थात् पुण्य कर्म, कृष्ण अर्थात् पाप कर्म एवं शुक्ल-कृष्ण अर्थात् पुण्य-पाप मिश्रित कर्म) के होते हैं।
योग पथ पर चलने वाले पथिक अनवरत आत्म-निरीक्षण करते हैं, आत्म-विषलेषण करते हैं, चित्त भूमि में सत्त्व की अभिवृद्धि हेतु अभ्यास-वैराग्य का सहारा लेते हैं, क्लेशों से मुक्त होने को तत्पर होते हैं तथा उनके कर्म शास्त्रानुकूल होते हैं जिससे उनका व्यक्तित्व क्रमश: परिष्कृत एवं प्रकाशित होता चला जाता है।
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01 Mar 2025 17:58:05
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