अनुशासन : योग का प्रथम सोपान
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वंदना बरनवाल
राज्य प्रभारी-महिला पतंजलि योग समिति, उ.प्र. (मध्य)
किसी भी विषय में आपकी रूचि जागृत रहे इसके लिए सम्बंधित विषय के बारे में मूलभूत बातों की जानकारी होना आवश्यक है। महर्षि पतंजलि ने योग दर्शन की रचना करते हुए इसका विशेष ध्यान रखा और निरर्थक शब्दों के प्रयोग से बचते हुए उन्होंने योग को समझाने के लिए सीधे-सीधे सूत्र ही दे डाले। योगदर्शन, चार पाद अर्थात समाधि पाद, साधन पाद, विभूति पाद और कैवल्य पाद नाम से चार अध्याय सुसज्जित एक ऐसा दर्शन जिसके सूत्र हर आम और खास के जीवन के तमाम प्रश्नों को हल करने के लिए उतना ही सक्षम है जैसे कि गणित या भौतिकी जैसे विषयों में किसी भी प्रश्न को हल करने का कोई सूत्र हो। जिस प्रकार से विद्यार्थी जीवन में जैसे-जैसे आपको सूत्र समझ आने लगते हैं, सम्बंधित विषय को समझना आसान होने लगता है। योग दर्शन के सूत्र भी ऐसे ही हैं जो जन्म से लेकर मृत्यु तक आने वाली सभी समस्याओं का समाधान प्रदान करते हैं।
महर्षि पतंजलि ने योग दर्शन के चारों अध्यायों में कुल मिलकर 195 सूत्र दिए हैं और इसमें सबसे पहला सूत्र है- अथ योगानुशासनम्। वैसे तो इस छोटे से और पढऩे में आसान लगने वाले सूत्र में अथ, योग और अनुशासन बस तीन शब्दों का ही प्रयोग हुआ है। वैसे तो ये सभी 195 योग सूत्र योग के प्रयोगों को सफल बनाने के लिए आवश्यक हैं किन्तु केवल तीन शब्दों से मिलकर बना यह छोटा सा सूत्र सफल जीवन के ताले की मास्टर चाबी है। पतंजलि ने योग दर्शन की रचना करते हुए अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जो कि यह स्थापित करता है कि अनुशासन ही जीवन में सफलता का सार्वभौमिक सूत्र है। तो आइये! सबसे पहले तो यह जानने की कोशिश करते हैं कि इन तीन शब्दों के क्या मायने हैं और तत्पश्चात जीवन में अनुशासन की खूबियों को भी समझने का प्रयत्न करते हैं।
अथ का अर्थ
आधुनिक विज्ञान की परिभाषा के अनुसार महर्षि पतंजलि एक महायोगी ही नहीं एक महावैज्ञानिक, एक महाचिकित्सक और रसायन विद्या में पारंगत एक ऐसे महर्षि थे जिन्होंने आत्म-शोध एवं आत्म-साक्ष्य के आधार पर मनुष्य जीवन की हर समस्या को हल करने के लिए ऐसे सफल सूत्रों की रचना की जो हर समय, काल में हर व्यक्ति के लिए पूर्ण प्रासंगिक रहे हैं और वर्तमान की चुनौतियाँ देखते समय इनकी प्रासंगिकता और भी बढ़ गयी है। योग दर्शन के प्रथम सूत्र का प्रथम शब्द है अथ। अथ यानि अब और अब यानि वह सुनहरा क्षण जब किसी साधारण से साधक के हृदय में योग साधना के लिए सच्ची चाहत अपने चरम को छूने लग जाये। एक ऐसी चाहत जब सामानांतर में उसका शिष्यत्व भी जागने लगे। इसलिए यदि आप सचमुच ही योग साधना में प्रवेश करना चाहते हैं तो आपको सबसे पहले अपने अथ को जानना चाहिए। बिना अथ को समझे आपका प्रयत्न अर्थहीन रह सकता है। जैसे-जैसे हम अथ को समझने लगते हैं, वैसे-वैसे हमारा जीवन अर्थवान बनता जाता है। अथ अर्थात अब, अब यानि की जीवन का वह क्षण जब आप चरम को छूने के लिए तैयार हों। इसलिए सर्वप्रथम अपने अथ को पहचानिए, सिर्फ योग साधना के लिए ही नहीं बल्कि जीवन साधना के लिए भी क्योंकि अच्छी शुरुआत यहीं से होगी।
योग मूलत: क्या है?
परम पूज्य स्वामी जी महाराज ने जब से योग की कमान संभाली है तब से योग के बारे में भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर के लोगों ने इतने अनुसन्धान कर डाले हैं कि आज योग एक ऐसा शब्द बन चुका है जो हर जुबान को प्रिय है, एक ऐसा विषय बन चुका है जिसमें सबकी रूचि है। योग के प्रयोग को हर कोई अपनाना चाहता है। लोगों में योग के प्रति बढ़ती आसक्ति को देखते हुए किसी के भी मन में यह प्रश्न उठाना स्वाभाविक है कि आखिर क्या है योग। अलग-अलग हाथ-पैरों को विभिन्न तरीकों से मोड़ लेना, अलग तरीकों से बैठ जाना, खड़े होकर हाथ ऊपर-नीचे कर लेना या फिर लेटकर हाथ पैर मोड़ लेना, क्या ये सब योग है? अगर यह योग है तब तो एक जिमनास्ट से बेहतरीन योगी और कौन हो सकता है भला। अद्भुत संतुलन, शक्ति, लचीलापन, चपलता, समन्वय, समर्पण और धीरज के मिश्रण के साथ जिम्नास्टिक एक ऐसा खेल है जिसमें खिलाड़ी के फुर्तीले प्रदर्शन को देखकर आश्चर्य होता है। एक अच्छे जिमनास्ट के लिए यह तभी संभव है जब वह एक योगी की तरह अपने मन और शरीर के बीच सामंजस्य स्थापित कर ले, पर बावजूद इसके क्या वह एक योगी के तौर पर जाना जायेगा। नहीं, एक जिमनास्ट एक अच्छा खिलाड़ी तो हो सकता है पर योगी नहीं। तो क्या फिर सांसों को लेना, साँसों को छोडऩा और या कभी कभार रोक देना योग की श्रेणी में आएगा। बिलकुल नहीं क्योंकि सांस लेने और छोडऩे की सामान्य किन्तु आवश्यक क्रिया तो जन्म से लेकर मृत्यु तक बिना रुके हर जीव में स्वत: ही चलती ही रहती है क्योंकि इसके बगैर जीवन संभव ही नहीं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि फिर योग क्या है, क्योंकि गणित की भाषा में तो योग का मतलब जोड़ है। एक अंजान व्यक्ति के लिए योग दर्शन के आरंभ में ऐसे अनेकों प्रश्नों का उठना स्वाभाविक है क्योंकि योग के प्रयोग से ही उपयोग, सहयोग, उद्योग आदि का उद्भव हुआ है। इसीलिए महर्षि पतंजलि ने योग को बहुत ही संक्षिप्त रूप में ‘अथ योगानुशासनम्’कहकर स्पष्ट कर दिया कि जीवन में अनुशासन का होना ही मूलत: योग है।
जीवन में अनुशासन
योग को समझने के लिए हमने अथ को समझा, योग को समझा और अब बारी है अनुशासन को समझने की। एक ऐसा शब्द जिसका अर्थ शायद ही कोई ऐसा हो जो नहीं समझता, पर अनुपालन कितना करता है, परिणाम उसी में निहित है। अनुशासन का मूल अर्थ तो यही है किसी भी कार्य को उसके आवश्यक दिशा निर्देशों का पालन करते हुए किया जाए। अथ योगानुशासनम सूत्र में इन्हीं आवश्यक दिशा- निर्देशों के पालन करने की बात कही गयी है। अध्यात्मिक ज्ञान और जीवन के लिए ही नहीं व्यावहारिक दृष्टि से भी यह जब पूरी तरह से स्थापित सत्य है कि जब भी अनुशासित होकर किसी कार्य को किया जाता है, कार्य की सफलता निश्चित हो जाती है। महर्षि पतंजलि इसे भली भांति जानते थे और उन्होंने इसीलिए योग दर्शन के शुरुआत में अथ योगानुशासनम् लिखकर यह स्पष्ट कर दिया कि बिना अनुशासन के योग नहीं हो सकता। दूसरे शब्दों में अगर कहें तो पतंजलि ने सबसे पहले यही समझाया है कि अनुशासन ही योग है। पर प्रश्न तो यही उठता है कि अनुशासित किसे करें? अपने पास-पड़ोस को या फिर एक-दूसरे को और वो भी कैसे? योगी तो एकांत में चिंतन करता है ऐसे में वह अनुशासित किसे और कैसे करेगा, इसके लिए तो उसे अपने चिंतन अपने एकांत से बाहर निकलना पड़ेगा। और तब पतंजलि ने इसे थोड़ा सा और स्पष्ट करते हुए कहा योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध हो जाना यानि सर्वथा रुक जाना या अचल स्थिर हो जाना योग है।
अनुशासित हो जाना ही योग
संस्कृत साहित्य में यह परंपरा है कि कोई भी नया विषय ‘अथ’शब्द से शुरू होता है और ‘इति’पर समाप्त होता है। योग एक अनुशासन है जिसमें दर्शन भी है और अभ्यास भी। दर्शन और अभ्यास दोनों ही शामिल होने से ही इसका पठन-पाठन ‘अब योग का अनुशासन’वाक्य से शुरू होता है और हमारा यही अनुशासन जीवन में हमारी सफलता को निर्धारित करता जाता है। अनुशासन यानि होने, जानने और सीखने की हमारी क्षमता। जैसे जैसे ये तीन बातें हमें समझ आती जाती हैं, हम अनुशासन की खूबियों को समझने लग जाते हैं। फिर हमें ज्ञात होता है कि अनुशासन कुछ और नहीं बल्कि स्वयं के भीतर की व्यवस्था को ठीक रखना है। स्वयं के भीतर की यही अनुशासित व्यवस्थाएं और अन्य संबंधित क्रियाएं ही तो योग हैं। कहते हैं जीवन में कुछ भी प्राप्त करना है तो आपके पास दो ही रास्ते हैं, युद्ध मार्ग या बुद्ध मार्ग। इन दोनों ही मार्र्गों पर आपके हाथ में जो सबसे कारगर उपकरण है- वो है योग। युद्ध में तलवार भी वही चला सकता है जिसने योग के महत्त्व को समझा और बौद्धत्व को भी वही उपलब्ध हो सकता है जिसने योग का पालन किया है। योग से हटकर संसार में कुछ भी नहीं है और यह बात किसी भी तरह से सिद्ध की जा सकती है। इसमें बहस के लिए कोई जगह नहीं। एक सच्चा योगी बहस करता भी नहीं है, करके ही दिखाता है। हमारे आपके आसपास असंख्य लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने कभी योग का नाम भी नहीं सुना होगा फिर भी योग दर्शन और योग सूत्र की परिभाषाओं के अनुसार वे परम योगी होंगे। इसलिए सनद रहे, योग सिर्फ आसन या प्राणायाम नहीं है। योग के ये दोनों अंग तो मात्र बाहरी उपक्रम हैं। अनुशासित जीवन तप के समान है और ‘चित्त वृति का निरोध’ तभी सम्भव हो सकेगा है जब स्वयं का, स्वयं पर शासन हो जाये, आत्म-नियन्त्रण हो जाये।
मूल तत्व है अनुशासन
पिछले तीन दशकों से अभी अधिक समय से परम पूज्य स्वामी जी महाराज योग के जिस ज्ञान स्वरूप से पूरी दुनिया को परिचित करवा रहे हैं उसका मूल तत्व भी अनुशासन ही है। ब्रह्म मुहूर्त से लेकर देर रात्रि तक बिना थके, बिना रुके, बिना अशांत हुए, जिस प्रकार से परम पूज्य गुरुवर कार्य कर रहे हैं वह योग के अनुशासन की ही देन है। जिस प्रकार गुरु कभी किसी का बुरा नहीं चाहते उसी प्रकार अनुशासन में रहने वाले व्यक्ति का भी कभी बुरा नहीं होता। गुरु का अनुशासन सदैव हितकारी होता है। गुरु का अनुशासन जीवन में रहे तो उसे चमकदार बना देता है। गुरु जो कहे, वह धारण, पालन और अनुसरण करें, ऐसा शिष्य ही अपना आत्मकल्याण कर सकता है। गुरु जीवन में नियम और अनुशासन देते हैं। गुरु की उपस्थिति सबसे बड़ा अनुशासन होती है। उपस्थिति भी, अनुपस्थिति भी। जीवन में गुरु की उपस्थिति होने से अनुशासन स्वत: ही कई स्तरों पर कार्य करता है पर इसका सबसे खूबसूरत स्वरूप है एक अभिभावक का। जिस प्रकार एक अभिभावक बच्चे की देखभाल, अभिरक्षा और नियंत्रण की मौलिक जिम्मेदारियाँ निभाता है उसी प्रकार अनुशासन भी एक सफल और समृद्ध जीवन के लिए एक गुरु एक अभिभावक की भूमिका निभाता है। किसी भी व्यक्ति में कार्यकुशलता जन्म से नहीं आती बल्कि एक गुरु की देखरेख किसी कार्य को करने का सही समय, लक्ष्य और आत्म नियंत्रण ही उसकी सफलता की कुंजी होती है। इसीलिए अनुशासन को जीवन का मूल तत्व कहते हैं।
अनुशासन का बहुस्तरीय अभ्यास
जब हम अध्यात्मिक साधना के लिए प्रयास करते हैं तब हमें कई स्तर पर अनुशासन को अपनाना होता है क्योंकि अनुशासन में प्रतिबद्धता, दृढ़ संकल्प और इच्छा शक्ति सब कुछ शामिल है और यह मन, कर्म और वाणी यानि त्रिस्तरीय अनुशासन को दर्शाता है। पर इसके लिए साधक को निरंतर अभ्यास की आवश्यकता होती है। वैसे अनुशासन को मुख्यत: दो प्रकार से देखा जाता है, एक बाह्य और दूसरा आंतरिक। बाह्य अनुशासन दिखावटी होता है जबकि आतंरिक अनुशासन मौलिक होता है। अगर कोई व्यक्ति शिक्षक के भय से अथवा कमांडर के भय से सीधा खड़ा है, तो वह अनुशासन में नहीं है। यदि हम नियमित आसन-प्राणायाम करते हैं लेकिन हमारी दिनचर्या अनुशासित नहीं है तो वह योग की श्रेणी मे नहीं आएगा। बिना स्थाई अनुशासन के किये गये आसन-प्राणायाम को केवल व्यायाम तो कहा जा सकता है, लेकिन योग नहीं। योगाभ्यास चाहे पार्क मे करें या घर पर करें, अनुशासन जरूरी है। अनुशासित योगाभ्यास ही लाभकारी है। बाहर के अनुशासन के लिए हम व्यायाम करते हैं, लेकिन भीतर के अनुशासन के लिए हमें प्राणायाम करना पड़ता है। देश में भगवान बुद्ध, महावीर और अनेक संत हुए हैं, उन्होंने आंतरिक अनुशासन का पालन किया। महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग के हर अंग में अनुशासन को ही तो परिभाषित किया है।
अनुशासन के आठ अंग
अष्टांग शब्द संस्कृत के दो शब्दों ‘अष्ट’और ‘अंग’से मिलकर बना है। ‘अष्ट’संख्या आठ को संदर्भित करती है जबकि ‘अंग’ का अर्थ है शरीर या अंग। इसलिए अष्टांग योग, योग के आठ अंगों का एक पूर्ण मिलन है जो कि योग सूत्रों के दर्शन की विभिन्न शाखाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। जीवन के विभिन्न क्षेत्र में अनुशासन के लिए महर्षि पतंजलि ने साधन पाद में इसके बारे में बताया है। योग दर्शन में वर्णित यह आठ अंग हैं यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
"यम" सामाजिक अनुशासन
यम का अर्थ हुआ नैतिकता जिसके पाँच भेद हैं अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। यम के माध्यम से पतंजलि ने सामाजिक अनुशासन की तरफ ध्यान दिलाया है। जो व्यक्ति इनका पालन नहीं करता है, वह अपने जीवन और समाज दोनों को ही दुष्प्रभावित करता है।
"नियम" व्यक्तिगत अनुशासन
नियम के भी पांच भेद हैं शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान जो कि व्यक्ति को व्यक्तिगत अनुशासन के बारे में जागरूक करता है कि कैसे मनुष्य को अपने जीवन में नियम के अनुसार कार्य करना चाहिए।
"आसन" अंगों का अनुशासन
इसके बाद आता है आसन जिसे देह को स्वस्थ रख बाह्य स्थिरता की साधना के रूप में समझा जा सकता है। शरीर के अंगों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर एवं ध्यान साधना के लिए पतंजलि ने आसन के रूप में अंगों के अनुशासन का वर्णन किया है। आसन वैसे तो हठयोग का एक मुख्य विषय है किन्तु योग दर्शन के सूत्र में स्थिर सुखम आसनं कहकर महर्षि पतंजलि ने इसे आम आदमी के लिए थोड़ा आसान भी कर दिया है।
"प्राणायाम" श्वास-प्रश्वास का अनुशासन
योग के चौथे अनुशासन के रूप में आता है प्राणायाम यानि श्वास और प्रश्वास का अनुशासन। यह एक शक्तिशाली अभ्यास है जो हजारों वर्षों से एक आध्यात्मिक अनुशासन के रूप में प्रचलित है। प्राणायाम प्राणस्थैर्य की साधना है जिसमें बाहरी वायु को अंगीकार करना श्वास है और भीतरी वायु का बहिर्गमन प्रश्वास है। यह सांस लेने की ऐसी कला है जिसके अभ्यास से प्राण में स्थिरता आती है और अंतर्मन की चंचलता समाप्त होती है। अनुशासित होकर सांस लेने की कला जिसे आ जाये फिर प्राण तो स्वत: ही आयामित हो जायेगा।
"प्रत्याहार" इंद्रियों का अनुशासन
इंद्रियां शरीर और मन का हिस्सा हैं। हमारे शरीर मे कुल चौदह इंद्रियाँ होती हैं, इनमे से आँख, नाक, कान, जीभ तथा त्वचा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं जिनके प्रयोग से हम चीजों को देखते, सूंघते, सुनते, चखते तथा महसूस करते हैं। प्रत्याहार इन्हीं इंद्रियों का अनुशासन है जिसके अभ्यास से संसार के विषयों से हटाकर मन को एकाग्र करते हैं। प्रत्याहार में जब हम इंद्रियों पर काबू पाने अर्थात् इंद्रियनिग्रह की बात करते हैं तो मूलत: हम अपने शरीर और मन दोनो पर पूर्णत: नियंत्रण पाने की बात कर रहे होते हैं।
"धारणा ध्यान समाधि" त्रयमेकत्र संयम
धारणा और ध्यान को आत्मा और शरीर के बीच का अनुशासन कहते हैं। विभूति पाद के चौथे सूत्र त्रयमेकत्र संयम : में धारणा, ध्यान व समाधि के मिश्रित प्रयोग की चर्चा की गयी है और इसे संयम कहा गया है। त्रयमेकत्र संयम : जिसमें त्रयम् का अर्थ है धारणा, ध्यान व समाधि, एकत्र यानि एक ही विषय में प्रयोग होना और संयम: अर्थात संयम होना। इसी संयम अर्थात अनुशासन की पूर्णता के साथ साधक अपनी योग की साधना को पूर्ण करता है और फिर वह एक नया इतिहास लिख डालता है। जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण परम पूज्य स्वामी जी महाराज स्वयं हैं। वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिन, क्या सर्दी क्या गर्मी और क्या थकान बावजूद इसके चौबीस में से अठारह से बीस घंटों की नि:स्वार्थ सेवा यह सब साबित करता है कि अनुशासन किस प्रकार किसी साधारण से व्यक्ति को असाधारण बना देता है।
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