अजीवात् जीवोत्पत्ति-वैदिक शिक्षा की वैज्ञानिक पुष्टि

अजीवात् जीवोत्पत्ति-वैदिक शिक्षा की वैज्ञानिक पुष्टि

डॉ. चंद्र बहादुर थापा, 

अधिवक्ता एवं विधि सलाहकार पतंजलि समूह

कुछ उम्र होने और पढ़-लिखने अथवा बिना पढ़े-लिखे भी, और किसी काम-काज में लगने के बाद मनुष्य किसी किसी रूप में सोच में पड़ जाता है कि जिस भूमि पर वह सोता, जागता, कार्य करता है वह किसने कब कैसे बनाया और सारे पदार्थ, जीव-वनस्पति, सजीव-निर्जीव, इत्यादि कहाँ से आये? इत्यादि-इत्यादि। हम हँसते, रोते, प्यार करते, घृणा करते, सोते जागते, कार्य करते, सुस्ताते, अपने-पराये, मित्र-शत्रु, बड़े-छोटे, मान्य-अमान्य, लाभ-हानि के वक्त अपने सोचे विचारे अनुरूप होने पर उस अदृश्य शक्ति को स्मरण करते हैं जिसको देखा तो नहीं परन्तु मानते अथवा अपने हिसाब से विश्वास करते हैं और किसी किसी भावना या भाषा में कहते हैं ‘‘कस्मै देवाय हविषा विधेम'' अर्थात् हम इसके अतिरिक्त किस देवता को हविष्य द्वारा पूजा-आराधना करें? पृथ्वी में जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई, यह एक वैज्ञानिक समस्या है जिसके लिए अभी तक स्पष्ट और अकाट्य तथ्यों से पूर्ण सर्वमान्य सिद्धान्त नहीं मिले हैं। प्राप्य सभी सिद्धान्त को किसी किसी स्तर पर आज के जीवों के जेनेटिक पदार्थों से जीवन पूर्व पृथ्वी पर हुए उन रासायनिक अभिक्रियाओं का अनुमान लगा कर किया गया है जिनसे संभवत: जीवन की उत्पत्ति हुई है। अजीवात् जीवोत्पत्ति (=निर्जीव से जीवन की उत्पत्ति; अंग्रेजी: Abiogenesis) सरल कार्बनिक यौगिक जैसे निर्जीव पदार्थों से जीवन की उत्पत्ति की प्राकृतिक प्रक्रिया को कहते हैं। जीवोत्पत्ति पृथ्वी पर अनुमानित 3.8 से 4 अरब वर्ष पूर्व हुई थी।

शून्य से अनंत और फिर शून्य - अनंत शून्यों की यात्रा

पृथ्वी सौरमंडल की सदस्य है। सौरमंडल, ब्रह्मांड का एक मामूली सा हिस्सा है और ब्रह्मांड, पृथ्वी से दिखने वाली आकाशगंगा का एक हिस्सा है। कितने आकाशगंगा हैं किसी को नहीं मालूम। मानव अपने अपने हिसाब से बचपन से लेकर मृत्यु पर्यन्त विज्ञान, पृथ्वी, आकाश, चांद, सूरज और दूसरे तारों के बारे में यही किस्से सुनता-सुनाता रहता हैं। हमारे आस्तिक पूर्वजों से लेकर, वैज्ञानिक और नास्तिक भी, मानते हैं कि दुनिया में  बहुत से ब्रह्मांड हैंक्योंकि आकाश अनंत है। इसका कोई ओर-छोर नहीं, किसी ने  इसको पूरा देखा है, जाना है, समझा है। अर्थात् सब कुछ इसी में समाया भी है और तब भी कुछ भी नहीं, शून्य और अनंत शून्य! माता के गर्भ के शून्य में ठोस, तरल, ग्यास और उस्मा (पञ्च तत्व- क्रमश: आकाश, पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि) में, अज्ञात शक्ति द्वारा नियत समय और प्रतिरूप के शिशुरूप के पूर्णता पर, गर्भ से निकलकर अज्ञात में बढ़ते आयु में अज्ञात शक्ति से प्रेरित कर्म बढ़ाते बढ़ाते एक स्थिति से सामान्यत: धीरे-धीरे, परन्तु कभी कभी अचानक ही, उस पञ्च तत्व से निर्मित आकार विशेष को त्याग कर शून्य में ही विलीन हो जाता है। यह प्रक्रिया मानव के तथा स्तनधारी के तो है ही, अण्डज और पादप (वनस्पति) में भी। गौर से देखें तो शून्य से प्राकट्य और शून्य में विलयन तो हर दिखने वाले पदार्थ का होता है चाहे सजीव, निर्जीव अथवा पत्थर ही क्यों हो। सबसे छोटा माना गया जीव एक कोशीय प्रोटोजोआ भी अपनी संतति को जन्माता है और उस जीव के लिए नियत अवधि पर मरता भी है। सब से जटिल सोचने, समझने के और परमात्मा के अवतारों को चुनौती देने क्षमता रखने वाला मानव भी मातृगर्भ के शून्य में रज-वीर्य संयोग से सामान्यत: 9 महीने में पल बढक़र अपने अंग-प्रत्यंग विकसित कर निरीह रूप में निकलता है, अदृश्य प्रेरणा से आयु अनुरूप, पूर्ण आयु में लगभग 100 वर्ष में बाल, युवा, वयस्क, वृद्ध के अवस्था में अनेकों कल्पनीय-अकल्पनीय कर्म करते हुए, सुख-दु:, हर्ष-शोक, प्यार-घृणा, स्फूर्ति-क्षोभ, क्रोध-क्षमा, इत्यादि अनुभव करते हुए, अथवा अल्प आयु में भी मृत्यु के रूप में फिर अज्ञात शून्य में चला जाता है। सब से बड़ा आश्चर्य तो यह है की अनगिनत पदार्थ और जीव-जंतु कोई भी हू--हू समानता नहीं रखता, कुछ कुछ अलग पहचान रखता है और वही पहचान बनाने वाली शक्ति ही ईश्वर तत्व, हिरण्यगर्भ है।

अंतरिक्ष और ब्रह्माण्ड- शून्य से अनंत की विस्तार

शून्य से अनंत में अनंत कितना वृहद है यह अंदाज से परे है, क्योंकि, ब्रह्माण्ड में पृथ्वी सहित अनगिनत ब्रह्माण्डीय पिण्ड हैं, इन सभी ब्रह्मांडीय पिंडों को समेटता दिखने वाला, एक दूसरे से दूरी के बीच, जो शून्य (void) होता है उसे अंतरिक्ष (Outer space) कहते हैं। यह पूर्णत: शून्य (empty) तो नहीं होता, किन्तु अत्यधिक निर्वात वाला क्षेत्र होता है जिसमें कणों का घनत्व अति अल्प होता है। इसमें हाइड्रोजन एवं हिलियम का प्लाज्मा, विद्युत चुम्बकीय विकिरण, चुम्बकीय क्षेत्र तथा न्युट्रिनो होते हैं। सैद्धान्तिक रूप से इसमेंडार्क मैटर' (Dark matter) औरडार्क ऊर्जा' (Dark energy) भी होती है। ब्रह्माण्ड संम्पूर्ण समय और अंतरिक्ष और उसकी अंतर्वस्तु को कहते हैं। ब्रह्माण्ड में सभी ग्रह, तारे, गैलेक्सियां, गैलेक्सियों के बीच के अंतरिक्ष की अंतर्वस्तु, अपरमाणविक कण, और सारा पदार्थ और सारी ऊर्जा शामिल है। अवलोकन योग्य ब्रह्माण्ड का व्यास वर्तमान में लगभग 28 अरब पारसैक (91 अरब प्रकाश-वर्ष) है। पूरे ब्रह्माण्ड का व्यास अज्ञात है और ये अनंत हो सकता है।
प्रकाश एक विद्युत चुम्बकीय विकिरण है, जिसकी तरंग दैध्र्य दृश्य सीमा के भीतर होती है। तकनीकी या वैज्ञानिक संदर्भ में किसी भी तरंग दैध्र्य के विकिरण को प्रकाश कहते हैं। प्रकाश का मूल कण फोटान होता है। तारे (Stars) स्वयं प्रकाशित (Self-luminous), उष्ण गैस की द्रव्य मात्रा से भरपूर विशाल, खगोलीय पिंड हैं। इनका निजी गुरुत्वाकर्षण (Gravitation) इनके द्रव्य को संघटित रखता है। मेघ रहित आकाश में रात्रि के समय प्रकाश के बिंदुओं की तरह बिखरे हुए, टिमटिमाते प्रकाश वाले बहुत से तारे दिखलाई देते हैं।
गैलेक्सी ब्रह्माण्ड की सब से बड़ी खगोलीय वस्तुएँ होती हैं। इनमे से एनजीसी 4414 एक 55,000 प्रकाश-वर्ष व्यास की, असंख्य तारों का समूह है जो स्वच्छ और अँधेरी रात में, आकाश के बीच से जाते हुए अर्ध चक्र के रूप में और झिलमिलाती सी मेखला के समान दिखाई पड़ता है। यह मेखला वस्तुत: एक पूर्ण चक्रका अंग हैं, जिसका क्षितिज के नीचे का भाग नहीं दिखाई पड़ता। भारत में इसे मंदाकिनी, स्वर्ण गंगा, स्वर्नदी, सुर नदी, आकाश नदी, देव नदी, नागवीथी, हरिताली आदि भी कहते हैं। पृथ्वी और सूर्य जिस गैलेक्सी में अवस्थित हैं, रात्रि में हम नंगी आँख से उसी गैलेक्सी के ताराओं को देख पाते हैं। गैलेक्सियों ने अपना जीवन लाखों-करोड़ों वर्ष पूर्व प्रारम्भ किया और धीरे-धीरे अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त किया। माना गया है कि ब्रह्माण्ड में सौ अरब गैलेक्सीयां अस्तित्व में है और अब तक ब्रह्मांड के जितने भाग का पता चला है, उसमें लगभग 19 अरब गैलेक्सीयां ही है, जो बड़ी मात्रा में तारे, गैस और खगोलीय धूल को समेटे हुए हैं। ब्रह्मांड के विस्फोट सिद्धांत (बिग बैंग थ्योरी ऑफ  यूनीवर्स) के अनुसार सभी गैलेक्सीयां एक दूसरे से बड़ी तेजी से दूर हटती जा रही हैं। प्रत्येक गैलेक्सियाँ अरबों तारों को समेटे हुए है। गुरुत्वाकर्षण तारों को एक साथ बाँध कर रखता है और इसी तरह अनेक गैलेक्सी एक साथ मिलकर तारा गुच्छ में रहती है।
हमारे सौरमण्डल के सूर्य या किसी अन्य तारे के चारों ओर परिक्रमा करने वाले खगोल पिण्डों को ग्रह कहते हैं। अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ के अनुसार हमारे सौर मंडल में आठ ग्रह हैं - बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, युरेनस और नेप्चून। इनके अतिरिक्त तीन छोटे ग्रह और हैं- सीरीस, प्लूटो और एरीस। प्राचीन खगोलशास्त्रियों ने तारों और ग्रहों के बीच में अन्तर इस तरह किया- रात में आकाश में चमकने वाले अधिकतर पिण्ड हमेशा पूरब की दिशा से उठते हैं, एक निश्चित गति प्राप्त करते हैं और पश्चिम की दिशा में अस्त होते हैं। इन पिण्डों का आपस में एक दूसरे के सापेक्ष भी कोई परिवर्तन नहीं होता है। इन पिण्डों को तारा कहा गया। पर कुछ ऐसे भी पिण्ड हैं जो बाकी पिण्डों के सापेक्ष में कभी आगे जाते थे और कभी पीछे - यानी कि वे घुमक्कड़ थे। Planet एक लैटिन का शब्द है, जिसका अर्थ होता है  इधर-उधर घूमने वाला। इसलिये इन पिण्डों का नाम Planet और हिन्दी में ग्रह रख दिया गया। शनि के परे के ग्रह दूरबीन के बिना नहीं दिखाई देते हैं, इसलिए प्राचीन वैज्ञानिकों को केवल पाँच ग्रहों का ज्ञान था, पृथ्वी को उस समय ग्रह नहीं माना जाता था। ज्योतिष के अनुसार ग्रह की परिभाषा अलग है। भारतीय ज्योतिष और पौराणिक कथाओं में नौ ग्रह गिने जाते हैं, सूर्य, चन्द्रमा, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, राहु और केतु।
आकाशगंगा, मिल्की वे, क्षीरमार्ग या मन्दाकिनी हमारी गैलेक्सी को कहते हैं, जिसमें पृथ्वी और हमारा सौर मण्डल स्थित है। आकाशगंगा आकृति में एक सर्पिल (स्पाइरल) गैलेक्सी है, जिसका एक बड़ा केंद्र है और उस से निकलती हुई कई वक्र भुजाएँ। हमारा सौर मण्डल इसकी शिकारी-हन्स भुजा (ओरायन-सिग्नस भुजा) पर स्थित है। आकाशगंगा में 100 अरब से 400 अरब के बीच तारे हैं और अनुमान लगाया जाता है कि लगभग 50 अरब ग्रह होंगे, जिनमें से 50 करोड़ अपने तारों से जीवन-योग्य तापमान रखने की दूरी पर हैं। सन् 2011 में की गयी एक सर्वेक्षण में यह संभावना पायी गई कि आकाशगंगा में तारों की संख्या से दुगने ग्रह हो सकते हैं। हमारा सौर मण्डल आकाशगंगा के बाहरी इलाके में स्थित है और आकाशगंगा के केंद्र की परिक्रमा कर रहा है। इसे एक पूरी परिक्रमा करने में लगभग 22.5 से 25 करोड़ वर्ष लग जाते हैं।
पारसैक (चिन्ह pc) लम्बाई की खगोलीय इकाई है। यह 30 ट्रिलियन किलोमीटर के लगभग होती है। पारसैक का प्रयोग खगोलशास्त्र में होता है। इसकी लम्बाई त्रिकोणमितीय दिग्भेद पर आधारित है, जो कि सितारों के बीच दूरी नापने का प्राचीन तरीका है। इसका नाम दिग्भेद के अंग्रेजी नाम पैरेलैक्स या ''par''allax  और ''second of arc यानि आर्क सैकिण्ड से बना है। एक पारसैक पर्थिवी से किसी खगोलीय पिण्ड की दूरी होती है, जब वह पिण्ड एक आर्क सैकिण्ड के दिग्भेद कोण पर होता है। पारसैक की वास्तविक लम्बाई लगभग 30.86 पीटामीटर, 3.262 प्रकाश-वर्ष के बराबर होती है

समय मापन

समय मापने की प्राचीन (किन्तु मेधापूर्ण) तरीका: ‘‘रेतघड़ी'' समय (Time) एक भौतिक राशि है। जब समय बीतता है, तब घटनाएँ घटित होती हैं तथा चल बिंदु स्थानांतरित होते हैं। इसलिए दो लगातार घटनाओं के होने अथवा किसी गतिशील बिंदु के एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक जाने के अंतराल (प्रतीक्षानुभूति) को समय कहते हैं। समय नापने के यंत्र को घड़ी अथवा घटी यंत्र कहते हैं। इस प्रकार समय वह भौतिक तत्व है जिसे घटी यंत्र से नापा जाता है। सापेक्षवाद के अनुसार समय दिग्देश (स्पेस) के सापेक्ष है। अत: समय को नापने के लिए सुलभ घटी यंत्र पृथ्वी ही है, जो अपने अक्ष तथा कक्ष में घूमकर समय का बोध कराती है, किंतु पृथ्वी की गति दृश्य नहीं है। पृथ्वी की गति के सापेक्ष सूर्य की दो प्रकार की गतियाँ दृश्य होती हैं, एक तो पूर्व से पश्चिम की तरफ  पृथ्वी की परिक्रमा तथा दूसरी पूर्व बिंदु से उत्तर की ओर और उत्तर से दक्षिण की ओर जाकर, कक्षा का भ्रमण। अतएव व्यावहारिक दृष्टि से सूर्य से ही काल का ज्ञान प्राप्त करते हैं।
प्रकाश वर्ष (चिन्ह: ly) लम्बाई की मापन इकाई है। यह लगभग 950 खरब (9.5 ट्रिलियन) किलोमीटर के अन्दर होती है। अन्तर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ के अनुसार, प्रकाश वर्ष वह दूरी है, जो प्रकाश द्वारा निर्वात में, एक वर्ष में पूरी की जाती है। यह लम्बाई मापने की एक इकाई है जिसे मुख्यत: लम्बी दूरियों यथा दो नक्षत्रों (या तारों) बीच की दूरी या इसी प्रकार की अन्य खगोलीय दूरियों को मापने में प्रयोग किया जाता है। सूर्य से पृथ्वी की औसत दूरी लगभग 14,96,00,000 किलोमीटर या 9,29,60,000 मील है तथा सूर्य से पृथ्वी पर प्रकाश को आने में 8.3 मिनट का समय लगता है। इसी प्रकाशीय ऊर्जा से प्रकाश-संश्लेषण नामक एक महत्वपूर्ण जैव-रासायनिक अभिक्रिया होती है, जो पृथ्वी पर जीवन का आधार है। यह पृथ्वी के जलवायु और मौसम को प्रभावित करता है। सूर्य की सतह का निर्माण हाइड्रोजन, हिलियम, लोहा, निकेल, ऑक्सीजन, सिलिकन, सल्फर, मैग्निसियम, कार्बन, नियोन, कैल्सियम, क्रोमियम तत्वों से हुआ हैं। इनमें से हाइड्रोजन सूर्य के सतह की मात्रा का 74% तथा हिलियम 24% है।

शून्य से अनंत बनाने वाला- अग्नि, प्रकाश, ऊर्जा और पदार्थ, तथा ब्रह्म

वर्तमान वैज्ञानिक साहित्य तो 500 वर्ष भी पूर्ण नहीं किया है, जब की वेद में कहा है:
हिरण्यगर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत्
इस श्लोक से हिरण्यगर्भ ईश्वर का अर्थ लगाया जाता है -वो गर्भ अथवा स्थान जहाँ हर कोई वास करता हो। वेदान्त और दर्शन ग्रंथों में हिरण्यगर्भ शब्द कई बार आया है। अनेक भारतीय परम्पराओं में इस शब्द का अर्थ अलग प्रकार से लगाया जाता है। अग्नि का स्वरुप हिरण्य है, अर्थात् स्वर्णिम है और अग्नि प्रज्वलित होने पर लगभग अंडाकार रूप - प्रारंभ में जलते स्थिति से मध्य में थोड़ा फूलकर, अंत में ऊपर शिखा सी बनाती हुई। आज भी आदिवासी लोग लकड़ी के घर्षण से अथवा चकमक पत्थर के घर्षण से आग पैदा करते हैं, हवाई जहाज के लैंडिंग के समय टायर और एयरस्ट्रिप के सतह के घर्षण से ताप (अर्थात अग्नि) के कारण धुआँ निकलते दिखाई देता है, परन्तु किसने अग्नि दिया। अग्नि दिखने पर अग्नि देने वाला नहीं दिखाई देता। अथवा पदार्थ-पदार्थ के घर्षण से आग पैदा होते तो देखे हैं और आदिकाल से जानते और मानते आये हैं, इस को जीवन के अभिन्न अंग भी मानते हैं, परन्तु वास्तव में यह क्या है, कहाँ से कैसे आता है नहीं जानते, क्योंकि यह सजीव-निर्जीव सभी में समाया हुआ है। इसी अग्नि से हर प्राणी में भूख पैदा होकर, भूख मिटाने के लिए प्रदत्त पदार्थ को पचाता है, जिसको जठराग्नि कहते हैं, जो हमारे शरीर में होकर भी नहीं दिखाई देता, जैसे स्त्री में मातृशक्ति के कारण दूध होते हुए भी प्रसूति होने पर ही शिशु के जन्म से प्रकृतिजन्य स्वरक्षण के ऊर्जा और भावना आने के प्रारम्भिक समय तक ही निकलता है और फिर लुप्त हो जाता है। इस से पदार्थ बनते भी है और नष्ट भी होते हैं, इसीलिए सनातनी इसको पूजते हैं, विशेषत: यज्ञ के रूप में हविष्य समर्पण कर। यज्ञ पूर्ण प्रज्वलित हो, हविष्य के जलने से प्रदीप्त अग्नि का स्वरुप सुवर्ण रंग के अंडे के स्थिर होने जैसे दिखता है और बिना भेदभाव के सभी समर्पित पदार्थों को ग्रहण करता है, कुछ उच्च तापमान पर पहुँचने पर संसार के सबसे कठोर पदार्थ हीरे को भी पिघलाकर और, उससे भी उच्च तापमान में वाष्पीकरण कर देता है, फिर वाष्पीकृत पदार्थ को सौम्य होकर पूर्ण शांति में तरल और ठोस में परिवर्तित करता है, परन्तु ये सब दिखाता है, स्वयं नहीं दिखता। अत: पूर्वजों ने इसी अग्निपुंज के आकार के अंदर के शक्ति जो अज्ञात, अदृश्य, अमाप्य, अवर्णनीय, सर्वव्याप्त होते हुए भी अनुपस्थित लगने वाला शक्ति जिसमे पुरुष-स्त्री तत्व दोनों समाहित है, कोहिरण्यगर्भ' नामित किया। 
सामान्यत: हिरण्यगर्भ शब्द का प्रयोग जीवात्मा के लिए हुआ है जिसे ब्रह्म और ब्रह्मा भी कहा गया है। ब्रह्म और ब्रह्मा जी एक ही ब्रह्म के दो अलग अलग तत्त्व हैं। ब्रह्म अव्यक्त अवस्था के लिए प्रयुक्त होता है और ब्रह्माजी ब्रह्म की तैजस अवस्था है। ब्रह्म का तैजस स्वरूप ब्रह्मा जी हैं। हिरण्यगर्भ शब्द का अर्थ है प्रतीकात्मक सोने के अंडे के भीतर रहने वाला, सोने का अंडा क्या है और सोने के अंडे के भीतर रहने वाला कौन है? पूर्ण शुद्ध शांतावस्था में सर्व-सृजन करने वाला और अति उद्दिग्न हो चरम ताप में सर्व-विनाश करने वाला, सर्वव्याप्त लुप्त परन्तु विशेष परिस्थिति अनुसार प्रकट होने वाला शक्ति ही "हिरण्य" है। उसके अंदर अभिमान करने वाला चैतन्य ज्ञान ही उसका गर्भ है जिसे हिरण्यगर्भ कहते हैं। स्वर्ण आभा को पूर्ण शुद्ध ज्ञान का प्रतीक माना गया है जो शान्ति और आनन्द देता है जैसे प्रात: कालीन सूर्य की अरुणिमा, इसके साथ ही अरुणिमा सूर्य के उदित होने (जन्म) का संकेत है।
ब्रह्म की 4 अवस्थाएँ हैं प्रथम अवस्था अव्यक्त है, जिसे कहा नहीं जा सकता, बताया नहीं जा सकता, दूसरी प्राज्ञ है जिसे पूर्ण विशुद्ध ज्ञान की शांतावस्था कहा जाता है। इसे हिरण्य कह सकते हैं। क्षीर सागर में नाग शय्या पर लेटे श्री हरि विष्णु इसी का चित्रण है। मनुष्य की सुषुप्ति इसका प्रतिरूप है। शैवों ने इसे ही शिव कहा है। तीसरी अवस्था तैजस है जो हिरण्य में जन्म लेता है इसे हिरण्यगर्भ कहा है। यहाँ ब्रह्म ईश्वर कहलाता है। इसे ही ब्रह्मा जी कहा है। मनुष्य की स्वप्नावस्था इसका प्रतिरूप है। यही मनुष्य में जीवात्मा है। यह जगत के आरम्भ में जन्म लेता है और जगत के अन्त के साथ लुप्त हो जाता है। ब्रह्म की चौथी अवस्था वैश्वानर है। मनुष्य की जाग्रत अवस्था इसका प्रतिरूप है। सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण विस्तार ब्रह्म का वैश्वानर स्वरूप है। इससे यह नहीं समझना चाहिए की ब्रह्म या ईश्वर चार प्रकार का होता है, यह एक ब्रह्म की चार अवस्थाएँ है। इसकी छाया मनुष्य की चार अवस्थाओं में मिलती है, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय (स्वरूप स्थिति) जिसे बताया नहीं जा सकता।
हिरण्यगर्भ: प्रकाश पुंज दीप्तिमान (प्रकाश) ऊर्जा छोड़ता है। भौतिकी में ऊर्जा वस्तुओं का एक गुण है, जो अन्य वस्तुओं को स्थानांतरित किया जा सकता है या विभिन्न रूपों में रूपांतरित किया जा सकता हैं। किसी भी कार्यकर्ता के कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा (Energy) कहते हैं। ऊँचाई से गिरते हुए जल में ऊर्जा है क्योंकि उससे एक पहिये को घुमाया जा सकता है जिससे बिजली पैदा की जा सकती है। ऊर्जा की सरल परिभाषा देना कठिन है। ऊर्जा वस्तु नहीं है। इसको हम देख नहीं सकते, यह कोई जगह नहीं घेरती, इसकी कोई छाया ही पड़ती है। संक्षेप में, अन्य वस्तुओं की भाँति यह द्रव्य नहीं है, यद्यपि बहुधा द्रव्य से इसका घनिष्ठ संबंध रहता है। फिर भी इसका अस्तित्व उतना ही वास्तविक है जितना किसी अन्य वस्तु का और इस कारण कि किसी पिंड समुदाय में, जिसके ऊपर किसी बाहरी बल का प्रभाव नहीं रहता, इसकी मात्रा में कमी बेशी नहीं होती।
रसायन विज्ञान और भौतिक विज्ञान में पदार्थ (Matter) उसे कहते हैं जो स्थान घेरता है जिसमे द्रव्यमान (Mass) होता है। पदार्थ और ऊर्जा दो अलग-अलग वस्तुएं हैं। विज्ञान के आरम्भिक विकास के दिनों में ऐसा माना जाता था कि पदार्थ तो उत्पन्न किया जा सकता है, नष्ट ही किया जा सकता है, अर्थात् पदार्थ अविनाशी है। इसे पदार्थ की अविनाशिता का नियम कहा जाता था। किन्तु अब यह स्थापित हो गया है कि पदार्थ और ऊर्जा का परस्पर परिवर्तन सम्भव है। वह पदार्थ और ऊर्जा एक ही चीज है - जब तक कि पदार्थ प्रकाश वर्ग की गति से यात्रा करता है। यूरेनियम या प्लूटोनियम की थोड़ी सी मात्रा, बड़े बड़े परमाणु विस्फोट कर प्रलय ला सकती है, दर्शाता है कि पदार्थ की छोटी मात्रा में भी कितनी ऊर्जा है। आइंस्टीन के समीकरण E=mc² ने परमाणु ऊर्जा और परमाणु चिकित्सा से लेकर सूर्य की आंतरिक कार्यप्रणाली को समझने तक, कई तकनीकी प्रगति के द्वार खोल दिए। जब प्रकाश वर्ग के द्रव्यमान और गति को गुणा किया जाता है, तो वे ऊर्जा के समान इकाई देते हैं - जूल। इस प्रकार, E=mc² विमीय रूप से सही है।

मूलकण

दुनिया में मौजूद सभी चीजों का निर्माण कणों से हुआ है। कणों ने मिलकर चीजों को बनाया। हमारे ब्रह्मांड में मौजूद सभी चीजें ऐटम से मिलकर बनी हैं। एक ऐटम इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन और प्रोटॉन नाम के तीन कणों से बना होता है। ये कण भी सबऐटॉमिक पार्टिकल से मिलकर बने होते हैं जिनको क्वार्क कहा जाता है। प्रोटॉन और न्यूट्रॉन जैसे कणों में द्रव्यमान यानी वजन होता है जबकि फोटॉन में नहीं होता है। हिग्स बोसोन सिद्धांत के मुताबिक, बिग बैंग के तुरंत बाद किसी भी कण में कोई वजन नहीं था। जब ब्रह्मांड ठंडा हुआ और तापमान एक निश्चित सीमा के नीचे गिरता चला गया तो शक्ति की एक फील्ड ( हिग्स फील्ड) पूरे ब्रह्मांड में बनती चली गई। उस फील्ड के अंदर बल था, उन फील्ड्स के बीच कुछ कण थे, और जब कोई कण हिग्स फील्ड के प्रभाव में आया तो हिग्स बोसोन के माध्यम से उसमें वजन गया। जो कण सबसे ज्यादा प्रभाव में आता है, उसमें सबसे ज्यादा वजन होता है और जो प्रभाव में नहीं आता है, उसमें वजन नहीं होता है। निर्जीव और जीव की रचना में भार या द्रव्यमान का खास महत्व है। भार या द्रव्यमान वह चीज है जिसको किसी चीज के अंदर रखा जा सकता है। अगर कोई चीज खाली रहेगी तो उसके परमाणु अंदर में घूमते रहेंगे और आपस में जुड़ेंगे नहीं। जब परमाणु आपस में जुड़ेंगे नहीं तो कोई चीज बनेगी नहीं। जब भार आता है तो कण एक-दूसरे से जुड़ता है जिससे चीजें बनती हैं। ऐसा मानना है कि इन कणों के आपस में जुडऩे से ही चांद, तारे, आकाशगंगा और हमारे ब्रह्मांड की अन्य चीजों के साथ साथ पदार्थ, जीव-वनस्पति, इत्यादि का निर्माण हुआ है। अगर कण आपस में नहीं मिलते तो इन चीजों का अस्तित्व नहीं होता और कणों को आपस में मिलाने के लिए भार जरूरी है।
भौतिकी में मूल कण (Elementary particle) वे कण हैं, जिनकी कोई उपसंरचना ज्ञात नहीं है। यह किन कणों से मिलकर बना है, अज्ञात है। मूलकण ब्रह्माण्ड की आधारभूत संरचना है, समस्त ब्रह्माण्ड इन्ही मूलभूत कणों से मिलकर बना है। कण भौतिकी के मानक मॉडल (standard model) के अनुसार क्वार्क, लेप्टॉन और गेज बोसॉन मूलकण है।
क्वार्क (ˈkwɔrk/ or /ˈkwɑrk/Quark) एक प्राथमिक कण है तथा यह पदार्थ का मूल घटक है। क्वार्क एकजुट होकर सम्मिश्र कण हेड्रॉन बनाते है, परमाणु नाभिक के मुख्य अवयव प्रोटॉन न्यूट्रॉन इनमें से सर्वाधिक स्थिर हैं। नैसर्गिक घटना रंग बंधन के कारण, क्वार्क ना कभी सीधे प्रेक्षित हुआ ही एकांत में पाया गया। केवल हेड्रॉनों (अंग्रेजी: hadron) के भीतर पाये जा सकते है, जैसे कि बेरिऑनों (उदाहरणार्थ: प्रोटान और न्यूट्रान) और मेसॉनों के रूप में। कण भौतिकी में, हेड्रॉन एक मिश्रित कण है जो क्वार्कों से मिलकर बनता है। हेड्रॉन में क्वार्क तीव्र बलों द्वारा संयुक्त किये गये रहते हैं, जैसे अणु परस्पर विद्युत चुम्बकीय बलों के कारण आपस में जुड़े रहते हैं। वे सभी कण जो एक क्वार्क एक एन्टी-क्वार्क से मिलकर बनते हैं मेसॉन (Mason) कहलाते हैं। ब्रह्माण्ड में 140 से अधिक मेसॉन का अस्तित्व है। इनका सांख्यिकीय व्यवहार बोसॉन होता है। पॉयन pion (ud-), केऑन kaon (su-), रो rho (ud-), बी-शून्य B-zero (db-), इटा-सी eta-c (cc-) इनके उदाहरण है। आधुनिक काल में इनकी खोज भारतीय वैज्ञानिक डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा ने की थी। लेप्टॉन फर्मिऑन होते हैं जिनकी प्रचक्रण 1/2 होती है। गेज बोसॉन (Gauge boson) एक बोसॉनिक कण है जो प्रकृति के मूलभूत बलों के वाहक की भूमिका निभाता है अर्थात् यह एक प्रकार का बल वाहक कण (Force carrier particle) है।

पदार्थ कण और ऊर्जा कण

साधारणतया ब्रह्माण्ड मे दो तरह के कणों की कल्पना की गई है, एकपदार्थ कण (Matter particle) और दूसराऊर्जा कण(Energy particle) पदार्थ कण वे कण है, जिसका द्रव्यमान होता है, जो जगह घेरता है, जो पॉली के अपवर्जन सिद्धान्त का पालन करते है और यह फर्मिऑन कहलाते है। इसके विपरीत, ऊर्जा कण का द्रव्यमान नही होता है, स्वाभाविक रूप से यह जगह भी नहीं घेरता है, ना ही यह पॉली के अपवर्जन सिद्धान्त का पालन करने के लिए बाध्य है, यह बोसान कहलाते हैं। ब्रह्मांड में हर जो चीज अस्तित्व में है, हिग्स बोसोन उसे रूप और आकार देता है उसमें समूचे ब्रह्मांड को तबाह-बरबाद करने की क्षमता है, अत्यंत उच्च ऊर्जा स्तर पर हिग्स बोसोन अस्थिर हो सकता है। इससे प्रलय की शुरुआत हो सकती है। हिग्स क्षमता की विशिष्टता है कि यह 100 अरब गीगा इलेक्ट्रॉन वोल्ट पर अत्यंत स्थिर हो सकती है, इसका यह अर्थ हो सकता है कि वास्तविक वैक्यूम का एक बुलबुला प्रकाश की गति से फैलेगा जिससे ब्रह्मांड में ला सकता है और हम उसे आते हुए नहीं देखेंगे।  

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पदार्थ की अवस्थायें (States of matter) वह विशिष्ट रूप हैं, जो कोई पदार्थ धारण या ग्रहण कर सकता है। ऐतिहासिक संदर्भ मे, इन अवस्थाओं का अंतर पदार्थ के समग्र गुणों के आधार पर किया जाता था। शरीर के निर्माण को भी पंचतत्व - आकाश, अग्नि, पृथ्वी, जल, वायु - को माना गया जब की पदार्थ के निर्माण संघटक अणु को परमाणु और परमाणु को भी इलेक्ट्रान, न्यूट्रॉन और प्रोटॉन के समामिलन कहते हुए स्पष्ट स्वीकार किया गया है कि इलेक्ट्रान-न्यूट्रॉन-प्रोटॉन से भी परे इनके अलग अलग संघटक नहीं हैं निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता और सबसे महत्वपूर्ण बात यह की प्रत्येक जीवित अजीवित वस्तु  के प्रत्येक कोशिकाओं के अंदर ठोस-तरल- गैस, को प्रत्येक सेल में कैसे बांध कर रखा गया है और किसने- कौन सी शक्ति ने बांधकर रखा है ?
इसी सेअजीवात् जीवोत्पत्तिप्रतिपादित होता है। उस अज्ञात शक्ति को परमात्मा के नाम देते हुए, हमारे पूर्वजों ने कृतज्ञता हेतु अपने संतति को निरंतर स्मरण योग्य ऋग्वेद (दशम्मण्डल 121) में निम्न दश हिरण्य गर्भ सूक्त - पहले नौ में प्रत्येक के अंत मेंकस्मै देवाय हविषा विधेम कहते हुए और दशवें में प्रजापति ब्रह्म को समर्पित करते हुए वर्णित किये:
1. हिरण्यगर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत्।। दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां........
  सृष्टि के आदि में था हिरण्यगर्भ ही केवल जो सभी प्राणियों का प्रकट अधीश्वर था। वही धारण करता था पृथिवी और अंतरिक्ष,
2. आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवा:।। यस्य छायामृतम् यस्य मृत्यु:.....
  आत्मा और देह का प्रदायक है वही जिसके अनुशासन में प्राणी और देवता सभी रहते हैं मृत्यु और अमरता जिसकी छाया प्रतिबिम्ब हैं,
3. : प्राणतो निमिषतो महित्वै इद्राजा जगतो बभूव।। : ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पद:......
  प्राणवान् और पलकधारियों का महिमा से अपनी एक ही है राजा जो संपूर्ण धरती का स्वामी है जो द्विपद और चतुष्पद जीवों का,
4. यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहु:।। यस्येमा: प्रदिशो यस्य बाहू..........
  हिमाच्छन्न पर्वत ये महिमा बताते हैं जिसकी, नदियों सहित सागर भी जिसकी यश-श्लाघा है, जिसकी भुजाओं जैसी हैं दिशायें शोभित,
5. येन द्यौरुग्रा पृथिवी दृढ़ा येन स्व: स्तभितं येन नाक:।। यो अंतरिक्षे रजसो विमान:.....
  गतिमान अंतरिक्ष, जिसमें धरती संधारित है आदित्य और देवलोक का जिसने है किया स्तम्भन, अंतरिक्ष में जल की जो संरचना करता है,
6. यं क्रन्दसी अवसा तस्तभाने अभ्यैक्षेतां मनसा रेजमाने।। यत्राधि सूर उदतो विभाति.....
  सबकी संरक्षा में खड़े आलोकित द्यावा पृथिवी अंत:करण में हैं निहारा करते जिसको, जिससे उदित होकर सूरज सुशोभित है,
7. आपो यद् बृहतीर्विश्वमायन् गर्भं दधाना जनयन्तीरग्निम्।। ततो देवानाम् समवर्ततासुरेक:......
  अग्नि के उद्घाटक और कारण हिरण्यगर्भ के भी एक वह देव, तब प्राणरूप से जिसने की रचना जल में जब सारा संसार ही निमग्न था
8. यश्चिदापो महिना पर्यपश्यद् दक्षं दधाना जनयन्तीर्यज्ञम्।। यो देवेष्वधि देव: एक आसीत......
  महा जलराशि को जिसने निज महिमा से, लखा यज्ञ की रचनाकारी प्रजापति की संधारक जो देवताओं के मध्य जो अद्वितीय देव है
9. मा नो हिंसीज्जनिता: : पृथिव्या यो वा दिव सत्यधर्मा जजाना यश्चापश्चन्द्र्रा बृहतीर्जजान.. कस्मै देवाय हविषा विधेम।
  पीडि़त करें हमें धरती का है निर्माता जो सत्यधर्मा वह जो अंतरिक्ष की रचना करता पैदा की है जिसने विस्तृत सुख सलिल- राशि आओ, उस देवता की हम उपासना हवि से करें।" के साथ अंतिम दशवाँ श्लोक
10. प्रजापते त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव। यत् कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्।।
  हे प्रजापति! तुम्हारे सिवा किसी और ने जन्म ली हुई इन सभी चीजों को शामिल नहीं किया है। जब हम आपको अर्पण करते हैं, तो हम जो चाहते हैं, उसे अपना होने दें। हम धन के स्वामी होंगे।
शान्ति: शान्ति: शान्ति:

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