वैदिक संस्कृति की विशेषताओं से ही भारत बनेगा आत्मनिर्भर

वैदिक संस्कृति की विशेषताओं से ही भारत बनेगा आत्मनिर्भर

डॉ. कमलाकान्त बहुगुणा, अध्यक्ष- वरेण्यम्

वेद का ज्ञान सदा से सम्पूर्ण मानवता के लिए समर्पित है। जाति, वर्ण, समाज, देश, पंथ, संप्रदाय आदि की दीवारों को गिराकर धरती पर मनुष्य मात्र की संवेदना का प्रतिनिधित्व करता है वेद का आलोक
महाभारत वेद के आलोक की सत्ता का सम्यक्तया संज्ञानोपरान्त ही उद्घोषणा के लिए उद्यत हुआ है। पूर्ण निष्ठा के साथ महर्षि वेदव्यास की ध्वनि वैदिक गवेषणा के लिए विस्मयकारी प्रेरणा है। मनुष्य की सभी तरह की प्रवृत्तियों के संरक्षण के सूत्र पदे-पदे वेद में है विन्यस्त हैं।
यानीहागमशस्त्राणि याश्च काश्चित् प्रवृत्तय: पृथक्
तानि वेदं पुरस्कृत्य प्रवृत्तानि यथाक्रमम् ।।
महा0 अनु0 122/4
यद्यपि आधुनिक कालखंड में वामपंथ की पक्षपात पूर्ण बौद्धिकता के भ्रमित मायाजाल से ग्रसित मनु की समग्र चिंतन परम्परा को गर्हित करने की भरसक प्रयत्नस्वरूप निम्नकोटि के षड्यंत्र वाली मानसिकता से अनावश्यक विवादास्पद बनाया है।
वैददक गवेषणा में महर्षि मनु अत्यंत श्रद्धास्पद हैं। महर्षि मनु की दृष्टि में वेदों में भौतिक पदार्थों के नाम और कर्म तथा लौकिक व्यवस्थाओं की रचना का समग्र निदर्शन प्राप्त होता है।
सर्वेषां नामानि कर्माणि पृथक्-पृथक्
वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे।।
मनु0 1/21
आत्म-परमात्मा का वर्णन, परमानंद की प्राप्ति के उपायों की चर्चा, प्रकृति-पुरुष का विश्लेषण, द्रव्य-गुण की व्याख्या, प्रत्यक्ष-अनुमान आदि प्रमाणों का विस्तृत उल्लेख, यज्ञीय कर्मकांड की प्रक्रिया का चिंतन तथा न्याय-वैशेषिक आदि षड्दर्शनों की रचना के आधार वेद ही हैं। तभी इन दर्शनों को आस्तिकसंज्ञा दी है। वेदों की प्रमाणिकता को अस्वीकार करने वाले चार्वाक-जैन-बौद्ध आदि दर्शनों को मनु नेनास्तिको वेदनिन्दक:’ कहा है।
महर्षि मनु की मान्यता है कि राज्यव्यवस्था, दंडविधान और सेनासंचालन में सिद्धहस्त वेदों के विद्वान ही हो सकता है।
सैनापत्यं राज्यं दंडनेतृत्वमेव च।
सर्वलोकाधिपत्यं वेदशास्त्रविदर्हति ।।
मनु012/100
वेदों में राष्ट्रसंरक्षण के रहस्य की ऐसी सीख प्रदत्त है, जिसे जीवन में अपनाने से हमारा राष्ट्र सुरक्षित भी रहेगा और समुन्नति की ओर अग्रसर होगा।
अथर्ववेद में वर्णित है कि यदि राष्ट्र के नागरिक परिश्रमी, आलस्य और प्रमाद से रहित हैं तो वह राष्ट्र सुरक्षित भी है और उत्कर्ष के सभी सोपानों को संस्पर्श अवश्य ही करता है।
श्रमेण तपसा सृष्टा ब्रह्मणा वित्तर्ते श्रिता ...
अथर्ववेद 12/5/1
सुविदित ही है कि आलसी और निकम्मा व्यक्ति संसार में कुछ भी नहीं प्राप्त कर सकता है। यजुर्वेद में उल्लिखित है मनुष्य तू कर्म का निष्पादन करता हुआ सौ वर्षों तक जीवित रहने की अभिलाषा रख।
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समा:...
यजुर्वेद 40/2
श्रम के बिना विश्राम की परिकल्पना नितांत असंभव है। इसी कारण वैदिक ऋषि परिश्रमी व्यक्ति के मुख व्याजेन उद्घोषणा करता है कि मेरे दाहिने हाथ में पुरुषार्थ है और बाएं हाथ में सफलता की सर्वोच्चता।
कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहत:...
अथर्ववेद 7/50/8
सफलता के आस्वादन का मुख्य रहस्य कठोर परिश्रम ही है। राष्ट्र के नागरिक यदि परिश्रमी हैं तो उस राष्ट्र के उत्कर्ष को कोई चुनौती नहीं दे सकता है? आज भी विश्व में अनेक ऐसे राष्ट्र हैं जिन्होंने बहुत ही अल्प समय में प्रकर्ष उत्कर्ष की गाथा स्वर्णाक्षरों में लिखी है। उत्कर्ष के मूल में विवेकपूर्ण कठोर परिश्रम है। भले ही वहाँ के नागरिक यदि कदाचित् किसी विशेष सन्दर्भ में राष्ट्रीय नेतृत्व से असहमति रखते हों तो वे विरोधस्वरूप अपने हाथों में काली पट्टी धारण कर लेंगे, परन्तु वे अपने राष्ट्रीय कर्तव्यों से कदापि विमुख नहीं होते हैं। हड़ताल के नाम पर जर्मनी और जापान देशों के नागरिक अपने राष्ट्र की प्रगति रोकने में किसी भी कीमत पर सहभागी नहीं बनते हैं। वे राष्ट्रीय उन्नति में कभी भी स्वयं को बाधक नहीं बनाते हैं। श्रम और तप का अर्थ है श्रम में तपस्या की अनिवार्यता। महाभारत में तप का आख्यान कर्तव्यपालन से है। तप: स्वकर्मवत्र्तित्वम्। कर्म करते समय तप की भूमिका नींव में स्थापित पत्थर के सदृश है। आचार्य चाणक्य ने जीवन में तप की भूमिका को पहचानकर ही इंद्रियों को वश में रखने का नाम तप बताया है। तप: सारमिन्द्रियनिग्रह: चाणक्यनीति
आचार्य शंकर तर्क और शास्त्र की अभिज्ञता से सदा वंदनीय हैं। वे जितं हि जगत् केन? मनो दह येन.....
प्रश्नोत्तरी माध्यम से तप का माहात्म्य संदर्शित करते हैं। मन को नम किए बिना विश्व विजेता की संकल्पना उपहासास्पद होती है।
संसार की सार्वभौमिक सत्ता की स्वीकार्यता का अर्थ है अखिल विश्व के संचालक, जिसके अनुशासन में सम्पूर्ण जड़-चेतन अनुविद्ध है, उसके अनुशासन का उल्लंघन सर्वथा असंभव है -इस धारणा में प्रगाढ़ श्रद्धा ही अनौखी अनुभूति का कारण बनती है। ईश्वरीय सार्वभौमिक सत्ता की स्वीकार्यता आस्तिक हृदय की प्रथम पहचान है। इस सत्ता की स्वीकार्यता ही व्यक्ति को अशुभता से सदा दूर रखती है। कर्म फल अवश्य ही सम्प्राप्त होते हैं यह न्याय इस सत्ता का परम संज्ञान है। कोई भी जागरूक व्यक्ति कभी भी दु: की कामना नहीं करता है। अशुभ कर्मों के परिणामस्वरूप दु:खों के भोग को रोकने में कोई भी शक्ति सक्षम नहीं है। आस्तिक हृदय कर्म परिणाम को कभी विस्मृत नहीं करता है। इस अनौखी सीख की छाप सदा उसके अंतर्मन में रहती है। इसी अनौखी शिक्षा की स्पष्ट झलक छान्दोग्योपनिषद में मिलती है। आस्तिक मति सम्पन्न राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रतिनिधि महाराज अश्वपति की उद्घोषणा बलात् संवेदना पूर्ण सज्जनों को आज भी अनवरत आकर्षण करती है।
मे स्तेनो जनपदे कदर्यो मद्यप:
नानाहिताग्निर्नाना विद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुत:।।
राष्ट्र चेतना के संदेश वीरभोग्या वसुन्धरा को अनुप्राणित करने की सदा ही आवश्यकता रहती है। भूमि मां सदृश पुत्र की सभी इच्छाओं को सफल करने वाली है। वेद की ऋचा माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या: का उच्चारण इसी महत्ता को संकेतित करती है। इस राष्ट्र वैभव की सुरक्षा हेतु स्वयं की आहुति देने में कैसा भय? वयं राष्ट्रे जागृयाम: पुरोहिता: और वयं तुभ्यं बलिहृत: स्याम... भी इसी भावना की जागृति में परम उद्दीपन हैं।
वेदों की समाज के संदर्भ में मौलिकता अवश्य ही आदरणीय है। ज्ञान-विज्ञान के कारण ब्राह्मण, शक्ति और साहस की प्रचुरता से क्षत्रिय, व्यापार में अनुष्ठानकौशल से वैश्य, सेवा की परम भावना से शुद्र, उत्तम प्रबंधन से नारीशक्ति, निर्भिक और बलवान संतति, दुधारू और पुष्ट गौएँ, द्रुत गति धारक अश्व, पर्याप्त भार संवाहक वृषभ, अपरिमित हरीतिमा, रोगनाशक औषधि, पर्याप्त वर्षा, अतिवृष्टि और अनावृष्टि का सर्वथा अभाव तथा योग और क्षेम की उपलब्धि की कामना और प्रार्थना वेद की वैज्ञानिकता का व्यवस्थित चित्रण है। यजुर्वेद की यह मन्त्र साधना
ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतां...
योगक्षेमो :कल्पताम् ...
यजुर्वेद 22/22
यह सार्वकालिक और सार्वभौमिक कामना है। वेदों में उदात्त शिक्षा का संदर्शन, मानवीय वेदना और राष्ट्रीय चेतना के सूत्र पदे-पदे विद्यमान हैं। स्वामी दयानन्द सरस्वती का उद्घोष वेदों की ओर लौटो तथा वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वस्तुत: वेदों की सार्वभौमिकता के परिचय का निदर्शन है।
वेदों में सोम तत्त्व शान्ति का परम दूत के रूप वर्णित है। सोम के महत् सामथ्र्य में ही विश्व शान्ति की स्थापना सन्निहित है। वैश्विक शान्ति विश्ववरणीय है और यही वैदिक संस्कृति की सर्वोच्च प्राथमिकता भी।
अच्छन्नस्य ते देव सोम सुवीर्यस्य ...
सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा...
यजुर्वेद 7/14
शान्ति की प्रार्थना पदे-पदे वेदों में उल्लसित है। शान्ति पाठ और शान्तिकरण के मन्त्र शान्ति की वैश्विक प्रासंगिकता की अपरिहार्य देशना है। द्युलोक के सूर्य, चंद्र और नक्षत्र शान्ति के सन्देशवाहक हैं। अंतरिक्ष जो वायु और वर्षा का स्रोत भी है वह शान्ति का मंगल गायक है। विविध ऐश्वर्यों से प्लावित यह पृथ्वी शान्ति की अधिष्ठात्री है। नदी की शीतल धारा फूलों और फलों से संयुक्त वनस्पतियां भी शान्ति की ही स्वर लहरियां हैं। हरितिमा से समादृत पर्वतों के उत्तुंग शिखर और उत्ताल तरंगों से आपन्न समुद्र भी शान्तिगान के लयबद्ध और अनुशासित श्रोता हैं। शान्ति की स्थापना के लिए साधन भी शान्ति पूर्ण हों। परस्पर प्रेम, परस्पर सहयोग, परस्पर संवाद और परस्पर निर्भरता ही सही अर्थों में वसुधा को कुटुंब बना सकती है। आतंकवाद आज वैश्विक समस्या है। इस समस्या के समाधान में परम साधन और सामयिक आह्वान है वैदिक संस्कृति की शान्ति के बीजांकुरण की प्राकृतिक प्रक्रिया का अनुप्रयोग। तथापि कदाचित् कतिपय संगठन यदि आतंक की फसल पैदा करने में अति उत्साहित दिखे, तब सभी विकल्पों में शिष्ट और अन्यतम विकल्प शेष समर ही है।
उत्तिष्ठत संनह्यध्वमुदारा: केतुभि: सह।
सर्पा इतर जना रक्षांस्यमित्राननु धावत।।
अथर्ववेद 3/30/19
वीरपुत्रों का सुसज्जा के साथ आह्वान राष्ट्रध्वज के उन्नतभाव का प्रदर्शन, सर्प सदृश कुटिल विषधर प्रवृत्ति स्वभाव के साथ ही परत्व की मानसिकता से अतिरंजित आतंकी क्रियाओं के कारक असुरों पर प्रहार ही एकमात्र विकल्प शेष है।
असौ या सेना मरुत: परेषामस्मानैत्यभ्योजसा स्पर्धमाना।
तां विध्यत तमसापवृतेन यथैषामन्यो अन्यं जानात् ।।
अथर्ववेद 8/8/24
हे वीर पुरुषों! हमारी ओर बढऩे वाली आतंकवादी सेना की गति को निरुद्ध हेतु उसे तामस अस्त्र से भेदन कीजिए, ताकि इन्हें परस्पर सम्बन्ध विस्मरण हो सके और ये परस्पर संहार हेतु भी तत्पर हो जाएं। इमे जयन्तु परामी जायन्ताम्। अथर्ववेद 8/8/24
हमारे वीर विजयश्री का आलिंगन करें और आतातायियों का पराभव हो। वैदिक ऋषि द्वारा युद्ध की भयंकरता का वर्णन आधुनिक समय में उसकी शाश्वत चिन्तन की प्रासंगिकता को यथार्थ में परिभाषित करता है।
वृक्षे वृक्षे नियता मीमयद् गौस्ततो वय: प्रणतान् पूरुषाद:
अथेदं विश्वं भुवनं भयात इन्द्राय सुन्वद् ऋषये शिक्षत्।।
ऋग्वेद 10/27/22
आचार्य यास्क उक्त मन्त्र के व्याख्यान क्रम में वृक्ष का अर्थ धनुष, गौ का अर्थ प्रत्यञ्चा और वय: का अर्थ बाण करते हैं। भीषण संग्राम के दौरान उभय पक्ष की सेनाएं अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित हैं। प्रत्येक सैनिक के धनुष पर चढ़ी प्रत्यञ्चा के टंकार की भीष्म गर्जना के साथ नररक्तपिपासु बाण शत्रु दल का मर्दन कर रहे हैं। इस संहार लीला से समस्त भुवन संत्रस्त हो उठा है। इन्द्र विनाश के क्षणों को अवलोकन कर प्रभु से कातर स्वरों में प्रार्थना करने लगा। संहारकारक इस संग्राम का रोकना अति आवश्यक है। प्रभो! प्राणों के प्यासे मन में प्रेम की अविरल धारा प्रवाहित कीजिए। ऋषियों से भी अभ्यर्थना है कि आपकी देशना में युद्ध विराम की कामना हो।
युद्ध की अनिवार्यता को अस्वीकारते हुए वैदिक ऋषि की पुकार अवश्य ही ध्यातव्य है।
प्रमुञ्च धन्वनस्त्वमुभयोरात्न्र्योज्र्याम।
याश्च ते हस्त इषव: परा ता भगवो वप ।।
यजुर्वेद 16/9
हे राष्ट्रनायक! धनुष की दोनों कोटियों पर चढ़ी प्रत्यंचा विमुक्त कीजिए। युद्ध हेतु सन्नद्ध हाथों में रखे बाणों को पृथक् कर दीजिए। धनुष और बाण सभी तरह के अस्त्र-शस्त्रों के बोधक हैं। समर में जिस साधन से विनाशक तत्त्व को विमोचित किया जाए वह धनुष और संहारक तत्त्व बाण संज्ञक के रूप में लोक में प्रचलित है। मन्त्रार्थ का तात्पर्य सामरिक सज्जा के विराम की प्रासंगिकता को अवसर प्रदान करना।
मित्रत्व की संकल्पना में वैदिक संस्कृति की अनूठी सन्देशना है।
मित्रस्य चक्षुषा सवार्णि भूतानि समीक्षन्ताम्।
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वार्णि भूतानि समीक्षे।
                           मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे ।।     यजुवेद 36/18
मैत्री झलक से मुझे और मेरे प्रत्येक कलाप में अवलोकन की वांछा सभी मानवीय सत्ता से और उस सत्ता के प्रति मेरी चक्षुओं में भी मैत्री की ज्योति सदा अवलोकित रहे। यह भावना परिस्थितियों पर निर्भरता की अपेक्षा प्रेम की शाश्वत सत्ता के प्रति पूर्ण निष्ठा की गंभीर अभिव्यक्ति है।
प्रेम की उपासना में अलंकार की अभिव्यंजना के साथ जिस स्वाभाविक प्रवृत्ति के आश्रय से ग्रहण किया गया है वह वैदिक मनोविज्ञान के उत्कर्ष का भी परिचायक है।
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि :
अन्यो अन्यमभिहर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या।।
अथर्ववेद 3/30/2
हृदय की सदाशयता, मन की पवित्रता और द्वैष विद्वैष की सर्वथा अनुपस्थिति की अवधारणा में नवजात गोवत्स के प्रति गोमाता के व्यवहार का आदर्श संस्मरण भी अनौखी ऋषिप्रज्ञा का अनुपम उदाहरण है।
वैदिक संस्कृति की प्रयोगशाला का नाम यज्ञशाला है। ऋचाओं की अनुगूँज के साथ स्वाहाकार के क्रम में शाकल्य और घृत की आहुति गौण होते हुए भी पर्यावरण की शुद्धि में प्रधान हेतुकी है। प्रकृति में सर्वत्र यज्ञ विद्यमान है। रात्रि के बाद उषा, उषा के बाद सूर्योदय। भूमि द्वारा सूर्य की परिक्रमा, वर्षा, ऋतुचक्र, नवसंवत्सर आदि। वस्तुत: यह सब यज्ञ ही है।
छान्दोग्योपनिषद में मानवजीवन का यज्ञ नाम से संकेतन है। पुरुषो वाव यज्ञ: ... 3/16
प्रात:सवन, माध्यन्दिनसवन और सायंसवन - मानवीय संकल्पों का यज्ञीय अनुष्ठान के साथ तादात्म्य भाव है। महिदास ऐतरेय ऋषि इसी यज्ञीय साधना के अन्यतम अनुष्ठाता थे।
विशेष ध्यान के आकर्षण क्रम में वैदिक शब्द कोष निघण्टु में धन वाचक 28 शब्दों का संग्रह है। पाठान्तर दो शब्दों के जोडऩे पर 30 शब्द हो जाते हैं। निघण्टु में धन और लक्ष्मी पदों का संग्रह नहीं है, तथापि इन्हें सम्मिलित किये जाने पर 32 धन वाचक शब्दों से धन की महिमा का वेदों में बहुश: वर्णन है। वेदों में दरिद्रता और कंगाली को कोई स्थान नहीं है।
वयं स्याम पतयो रयीणाम्। ऋग्वेद 4/50/6
रयि शब्द का बहुवचन प्रयोग द्योतक है, बहुविध ऐश्वर्यों के स्वामी बनना। ऋग्वेद परिशिष्ट के लक्ष्मी सूक्त में वर्णित है प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीत्र्तिमृद्धिम् ददातु मे। मन्त्र संख्या 7
राष्ट्र में जन्म ग्रहण और उस राष्ट्र से यश और समृद्धि की अभिलाषा है। अन्न, वस्त्र, अलंकार, रजत, हिरण्य, पुत्र, कलत्र, रथ, गाय, अश्व, हाथी, सभी तरह के धन की आकांक्षा की गई है। परन्तु लक्ष्मी प्राप्ति में पापकर्म सर्वथा परिहेय है।
इन्द्र जिसे मघवा अर्थात् धनाधीश कहते हैं। उससे धन की प्रार्थना में उच्चरित मन्त्र-
भूरिदा भूरी देहि नो दभ्रं भूर्याभर। ऋग्वेद 4/32/20
हे इन्द्र! भूरिदाता आप भूरिश: ऐश्वर्य की प्राप्ति में सहायक हों। स्वल्प नहीं भूरी लक्ष्मी की इच्छा है। अलक्ष्मी को काणी, विकटा एवं सदा रूलाने वाली कहकर पर्वत से टकराकर चूर-चूर होने की इच्छा व्यक्त की गई है।
अरायिकाणे विकटे गिरि गच्छ सदान्वे।
ऋग्वेद 10/155/1
वेद की प्रेरणा है लक्ष्मीवान् होने के लिए। परन्तु भौतिक सम्पदा के अतिरिक्त महनीय सम्पदा अध्यात्म की प्राप्ति जीवन का परम उद्देश्य वांछनीय है।
ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदु:
यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति इत् तद्विदुस्त इमे समासते ।।
ऋग्वेद 1/164/39
ऋचाओं द्वारा उस परम अविनाशी सत्ता का स्तवन, जिसके अनुशासन में सभी देवगण रहते हैं। यदि उसे नहीं जान पाए तो फिर उसे ऋचा से क्या प्राप्त होगा। ऋचा की उपादेयता परम पद के दर्शन की अभिलाषा में समाधि को प्रमुखता देना है। समाधि के अन्वाख्यान में ऋग्वेदीय ऋषि चेतना की सीख अवश्य संज्ञेय है।
दक्षिणा विचिकिते सव्या प्राचीनमादित्या नोत पश्च।
पक्या चिद् वसवो धीर्या चिद् युष्मानीतो अभयं ज्योतिरश्याम्।।
ऋग्वेद 2/27/11
तो मुझे दक्षिण दिशा में ही कुछ दिख रहा है और ही बायीं दिशा में। पूर्व दिशा में भी कुछ नहीं दिख रहा और ही पश्चिम दिशा में। जान गया हूँ कि मुझ में अपरिपक्वता की अपार त्रुटियां हैं। बुद्धि मन्दता की भी भरमार है, फिर भी आपके मार्गदर्शन से निर्मित ज्योतिष्पथ मुझमें अभयता का संचार करता है। समाधि के क्रम में मन और बुद्धि के प्रयोग की व्यापकता का वर्णन यजुर्वेद में है।
युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चित:
वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्महि देवस्य सवितु: परिष्टुति: ।।
यजुर्वेद 5/14,11/4,37/2
विप्रश्रेष्ठ विद्वान् विप्रों के विप्र सवितादेव में हम अपना मन समाहित करते हैं और उसी में अपनी बुद्धि भी स्थिर करते हैं। यह सर्वव्यापी ईश्वर अकेले ही सब यज्ञों को स्वयं धारण किये हुए है। महान सर्वज्ञ विप्रकृष्टदिव्य स्रष्टा की यह महती महिमा है। इस मन्त्र में योग के मूूल सिद्धांत विद्यमान हैं।
भारतीय एवं पाश्चात्य ऐतिहासिक गवेषकों की स्पष्ट मान्यता है कि संसार की सबसे प्राचीन संस्कृति वैदिक संस्कृति है। वैदिक संस्कृति भारत की संस्कृति है। बड़े-बड़े झंझावातों ने इसे उखाडऩे की भरसक चेष्टा की। इसके सिद्धांतों को कई तरह से झकझोरा गया है। परंतु आश्चर्य है कि यह मिट सकी। विश्व के समस्त उत्थान और पतन की साक्षी है यह वैदिक संस्कृति। प्राचीन समय से ही वैदिक संस्कृति की उदात्त शिक्षाएं अखिल विश्व के मार्गदर्शक की भूमिका में प्रतिष्ठित रही है। इस प्रतिष्ठित भूमिका से आह्लादित महर्षि मनु की उद्घोषणा हमारी समस्त ऋषि चेतना के प्रति कृतज्ञतापूर्ण अविस्मरणीय अभिव्यक्ति है।
एतद्देशप्रसूतस्य। सकाशादग्रजन्मन:
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा:।।
मनु० 2/20

Advertisment

Latest News

शाश्वत प्रज्ञा शाश्वत प्रज्ञा
योग प्रज्ञा योग - योग जीवन का प्रयोजन, उपयोगिता, उपलब्धि, साधन-साधना-साध्य, सिद्धान्त, कत्र्तव्य, मंतव्य, गंतव्य, लक्ष्य, संकल्प, सिद्धि, कर्म धर्म,...
एजुकेशन फॉर लीडरशिप का शंखनाद
सुबह की चाय का आयुर्वेदिक, स्वास्थ्यवर्धक विकल्प  दिव्य हर्बल पेय
गीतानुशासन
नेत्र रोग
पारंपरिक विज्ञान संस्कृति पर आधारित हैं
नेत्र विकार EYE DISORDER
यूरोप की राजनैतिक दशायें तथा नेशन स्टेट का उदय
Eternal Truth emanating from the eternal wisdom of the most revered Yogarishi Swami Ji Maharaj
परम पूज्य योग-ऋषि श्रद्धेय स्वामी जी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य ...