यज्ञ महिमा

यज्ञ महिमा

स्वामी यज्ञदेव, वैदिक गुरुकुलम्

यज्ञ की यह शुद्ध हवा,
सब रोगों की है दवा।
जो तुम चाहते हो रोगों से छुटकारा,
तो लो नियमित यज्ञ का सहारा।।
यज्ञ अनंत है, देव पूजा संगतिकरण और दान, देवपूजा यानी देवता का पूजन होना। संगतिकरण यानी मिलना-जुलना और जुड़ाव बनाना, और दान यह तीन कार्य इसमें विशेष रूप से संपन्न होते हैं। यदि देखा जाए तो आदिकाल में यज्ञ का सर्वाधिक प्रचार-प्रसार था। राजा महाराजा के महलों, नगरवासियों से लेकर अरण्यवासी ऋषि-मुनिायों की कुटियों तक सब जगह हमें यज्ञ का प्रचलन देखने को मिलता है। यदि प्राचीन ग्रंथों की बात करें तो कई प्रकार के यज्ञों का वर्णन मिलता है।
हमारे ऐतिहासिक ग्रंथ रामायण, महाभारत में भी यज्ञ का  वर्णन मिलता है। जिनको हम भगवान् श्री राम कहते हैं, उनका तो जन्म ही पुत्रेष्टि यज्ञ से हुआ। ऋषि श्रंग के पोरोहित्य में पुत्रेष्टि यज्ञ किया गया और उससे भगवान् श्रीराम की प्राप्ति हुई, कितना बड़ा हमारे लिए उदाहरण है ये पुत्रेष्टि यज्ञ का। इसी प्रकार अश्वमेध यज्ञ से लेकर कई प्रकार के यज्ञों का वर्णन हमारे प्राचीन ग्रंथों में  मिलता है। और कई प्रकार के  यज्ञ विशेष रूप से किये जाते थे। उसमे अलग अलग जैसे पाक यज्ञ, हविर यज्ञ एवं सोमयज्ञ  होते हैं। जैसे औपासन, वैश्वदेव्, पारवान, अष्टका, मासिक, श्राद्ध, श्रावणा, और शुल्गव- ये सारे पाक यज्ञ कहलाते हैं। हविर यज्ञ में अग्निहोत्र, दर्श पूर्णमास, आग्रायन, चातुरमास, नीरूढ पशुबन्ध, श्रोत्रामणी और पितृयज्ञ।
इसी प्रकार सोमयज्ञ में अग्नि स्टोम, अति अग्नि स्टोम, उकथय, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्यम। ये कुल मिलाकर 21 प्रकार के यज्ञ होते हैं, और इस 21 प्रकार के  यज्ञ की नित्य, नैमित्तिक और काम्य- तीन भाग में वर्गीकृत किया गया है। नित्य यानि जिसे प्रतिदिन हमें करना होता है, जैसे- देवयज्ञ, जिसे दैनिक अग्रिहोत्र कहते हैं, दूसरा ब्रह्म यज्ञ, बलिवैश्यदेव यज्ञ, अतिथि यज्ञ- इनको पंच महायज्ञ कहा जाता है। पंचमहायज्ञों की यह पावनी परंपरा होती है। इन पंच महायज्ञों को यदि प्रतिदिन हम अपने जीवन में अपनाते हैं तो सारा जीवन सुव्यवस्थित रूप से आगे बढ़ता है और सुख की ओर अग्रसर होता है। इसी प्रकार नैमित्तिक यज्ञ जो किसी निमित्त विशेष पर किया जाता है, जैसे जन्मोत्सव आदि किसी निमित्त से किया जाए। इसी प्रकार महामारी से छुटकारा पाने हेतु हम भैषज्ञ यज्ञ करते हैं। इसी प्रकार अलग-अलग निमित्त विशेष से जो यज्ञ किए जाते हैं, जैसे- संस्कार गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि पर्यंत 16 प्रकार के संस्कार होते हैं, उन 16 संस्कारों में जो यज्ञ किये जाते हैं, यह सारे के सारे नैमित्तिक यज्ञ होते हैं अर्थात् किसी निमित्त के लिए किए जाते हैं।
इसी प्रकार काम्य यज्ञ- ये एक कामना विशेष से, एक उद्देश्य से, एक संकल्प विशेष से किए जाते हैं, जैसे-पुत्र की कामना के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ किया जाता है। उत्तम पशु पालन और कृषि के लिए गोमेध यज्ञ किया जाता है। इसी प्रकार अलग-अलग प्रकार के यज्ञ जैसे- चिकित्सा, स्वास्थ्य, संवर्धन के लिए हम आरोग्य यज्ञ करते हैं। श्री की कामना के लिए श्री यज्ञ होता है। कुल मिलाकर 21 प्रकार के मुख्य यज्ञ होते हैं।
इसको यदि हम श्रीमद्भगवद्गीता की दृष्टि से देखें तो सात्त्विक, राजसिक और तामसिक यज्ञ कहे जाते हैं।
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो इज्यते।
यष्टव्यमेवेति मन: समाधाय सात्त्विक:।।
अर्थात् जो शास्त्र विधि से नियत किया हुआ, यज्ञ करना ही कर्त्तव्य है। इस प्रकार मन को समाधान करके, फल चाहने वाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक है। इसी प्रकार से-
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्।
अर्थात् केवल दम्भाचरण के लिए अथवा फल को भी दृष्टि में रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञ को राजसिक यज्ञ कहा जाता है।
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।।
शास्त्रविधि से हीन, अन्नदान से रहित, बिना मन्त्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किए जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं।
इसी प्रकार से यज्ञ के भी अलग-अलग वर्गीकरण हैं। जिस उद्देश्य से हम यज्ञ करते हैं, उसके फल भी उसी प्रकार से प्राप्त होते हैं। हमारी जो प्राचीन मनीषा, ज्ञान-विज्ञान है, यह अपने आप में अथाह है, ज्ञान का भंडार है। प्राचीनकाल में भी भारत यदि विश्वगुरु रहा तो उसी ज्ञान के आधार पर आज भी सारे विश्व के गुरु के रूप में, मार्गदर्शक के रूप में यदि प्रतिष्ठित हो रहा है तो वह भी हमारी प्राचीन विद्या यज्ञ, योग और आयुर्वेद के आधार पर ही है।
ऐतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहूतयो ह्याददायन्।
तन्नयन्त्येता: सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवास:
-मु.. 1,2,5
अर्थात् सात लपटों वाली यज्ञ अग्रि की शिखाओं में जो यजमान ठीक समय पर आहूति देता हुआ यज्ञ कर्म को पूर्ण करता है, उसको ये आहूतियाँ सूर्य किरणों में पहुँचकर संचित कर्मरूप होकर वहाँ पहुँचा देती है जहाँ जगत के आधार परमात्मा को साक्षात् जाना जाता है।
यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते।
एवं सर्वाणि भूतान्यग्रिहोत्रमुपासत।। छा.. 5,24,25
इस लोक में जैसे भूखे बच्चे माता से सुखादि की याचना करते हैं, ऐसे ही सारे प्राणी अग्रिहोत्र यज्ञ की उपासना करते हैं।
येन सदनुष्ठानेन सम्पूर्णविश्वं कल्याणं भवेदाध्यात्मिका -
धिदैविकाधिभौतिकतापत्रायोन्मूलनं सुकरं स्यात् तत् यज्ञपदाभिधेयम्।
जिस सद्अनुष्ठान से सम्पूर्ण विश्व का कल्याण तथा अध्यात्मिक-आधिदैविक-आधिभौतिक तीनों तापों का उन्नमूलन सरल हो जाए, उसे यज्ञ कहते हैं।
दु:खों से छुटकारा पाने के लिए ये सारे दु:खों से निवृत्ति करने वाला यज्ञ ही श्रेष्ठ साधन है। इसलिए यज्ञ की परिभाषा में दो महत्वपूर्ण और विशेष लाभ बतलाए गए हैं। एक व्यष्टि और दूसरा समष्टि।
विशेष करके मीमांसा शास्त्रों में बताया गया है कि जिस सद्-अनुष्ठान से सम्पूर्ण विश्व का कल्याण होता हो, आध्यात्मिक आदि दैविक और आदि भौतिक कल्याण होता हो, हमारे जीवन में जितने भी प्रकार के दु: हों, यह यज्ञ उनकी मुक्ति के लिए किया जाता है।

यज्ञ-चिकित्सा अनुभव

मेरा नाम हीरा बहन पटेल है, मेरी आयु 65 वर्ष है तथा मैं थाने, मुंबई से हूँ। वर्ष 2009 से 2016 तक मूझे 4 बार हार्ट अटॅक चुका है। मुंबई के बड़े डॉक्टरों को दिखा चुके थे पर किसी ने भी कोई स्थायी समाधान नहीं दिया। मेरी एन्जियोग्राफी रिपोर्ट नॉर्मल थी। कोई ब्लोकेज नहीं थे। हृदय फैल गया था और पंपिंग क्षमता अत्यंत कम हो गई थी। एक वाल्व भी खराब हो गई थी। चौथी बार थाने शहर के प्रसिद्ध अस्पताल ज्यूपिटर के वरिष्ठ डॉक्टरों ने मुझे बताया कि मेरा हृदय बहुत कमजोर और रक्तचाप 50/60 होने के कारण सिर्फ 15 से 20 दिन का ही जीवन शेष है। ऐसी स्थिति में मेरे परिवार के लोगों ने मुझे विवश होकर ऑक्सीजन मशीन के सहारे घर पर ही रखा। घर पर ही मेरी यज्ञ चिकित्सा, अर्जुन क्वाथ एवं हृदयामृत वटी को हवन सामग्री मे मिलाकर प्रारंभ कर दी। मैं निरंतर 24 घंटे ऑक्सीजन के सहयोग से ही सांस ले रही थी, इसलिए जब यज्ञ हो जाता उसके बाद कुछ मिनट के लिए मुझे सामान्य सांस लेने के लिए प्रेरित करते थे। प्रारंभ में 5 से 6 मिनट ही ऐसा कर पा रही थी पर धीरे-धीरे बिना ऑक्सीजन के रहने की मेरी सामर्थ्य बढ़ता गया। 2 महीने में तो मैं अधिकांश समय उसके धूँए में अनुलोम-विलोम, भस्त्रिका आदि प्राणायाम करने लगी। आज मैं जो 2016 जनवरी में ही 15 दिन की मेहमान थी वह 2021 के वर्ष में अपने परिवार के साथ अत्यंत आनंदित जीवन को व्यतित कर रही हूँ। मैं अब पूरी तरह ठीक हो चुकी हूँ। यज्ञ ही सारे रोगों की दवा है, यह मेरा विश्वास दृढ़ हुवा और आज मे पूरी तरह ठीक हूँ। अब मैं रोज प्राणायाम और यज्ञ करती हूँ। धन्यवाद स्वामीजी का और यज्ञ चिकित्सा संबधित सारी सामग्री उपलब्ध करवाने के लिए पतंजलि योगपीठ परिवार का।
धन्यवाद!
द्रव्य यज्ञ, योग यज्ञ एवं ज्ञान यज्ञ का त्रिवेणी संगम यज्ञ महोत्सव
अपने गांव या शहर मेंयज्ञ महोत्सवके आयोजन हेतु सम्पर्क करें- मो.- 9068565306
-मेल- yajyavijyaanam@patanjaliyogpeeth.org.in

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