वनौषधियों में स्वास्थ्य

शिरः, नासा, कंठ, एवं वक्ष रोग निवारक आयुर्वेदिक घटक मुलेठी

वनौषधियों में स्वास्थ्य

आयुर्वेद मनीषी आचार्य बालकृष्ण जी महाराज 

मुलेठी एक चिर-परिचित औषधि है। भारतवर्ष में इसका उत्पादन कम ही होता है। यह अधिकांश रूप से विदेशों से आयातित की जाती है। चरक संहिता के कण्ठ्य, जीवनीय, संधानीय, वण्र्य, कण्डूघ्न, मूत्रविरजनीय, शोणितस्थापन, छर्दिनिग्रहण, स्नेहोपग, वमनोपग, आस्थापनोपग तथा सुश्रुत संहिता के काकोल्यादि, सारिवादि, अंजनादि गणों में इसका उल्लेख प्राप्त होता है। वैदिक शकल में यष्टिमधु का प्रयोग दुर्भाग्यनाशक एवं गर्भबृंहणार्थ के रूप में मिलता है। जांगमविष में भी इसका प्रयोग मिलता है। चरकसंहिता में रसायनार्थ यष्टिमधु का प्रयोग विशेष रूप से वर्णित है। सुश्रुतसंहिता में यष्टिमधु फल का प्रयोग विरेचनार्थ मिलता है।

mulethi

मुलेठी का कठोर, लगभग सीधा, 0.5-1 मी. तक ऊँचा, बहुवर्षायु शाकीय पौधा अथवा क्षुप होता है। इसका काण्ड स्पष्ट रेखित, शाखित तथा अल्प रोमश होता है। इसके पत्र संयुक्त, एकांतर, छोटे, 4-7 युग्मों में, अण्डाकार तथा दोनों पृष्ठों पर गहरे हरित वर्ण के होते हैं। इसके पुष्प नीलाभ-बैंगनी वर्ण के, 1 सेमी लम्बे होते हैं। इसकी फली छोटी, 2-3 सेमी लम्बी, रेखित, चपटी या फूली हुई तथा भूरे वर्ण की होती है तथा बीज 3 मिमी चौड़े, संख्या में 2-5, वृक्काकार अथवा गोलाकार, चिकने, गहरे भूरे वर्ण के होते हैं। इसकी मूल 1-2 सेमी व्यास की, बेलनाकार, चिकनी, रक्त अथवा नारंगी-भूरे वर्ण की, अन्त: भाग में हल्के पीत वर्ण की होती है। इसके मूल तथा भौमिक काण्ड को सूखाकर छाल सहित अथवा छाल निकालकर बाजार में मुलेठी के नाम से बेचा जाता है। इसकी छाल निकालने पर यह हल्के पीले रंग की तथा रेशेदार होती है। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल अगस्त से फरवरी तक होता है।

आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव

  • मुलेठी वात-पित्तशामक है। इसका बाह्यलेप वण्र्य, कंडुघ्न, चर्मरोग नाशक, केश्य तथा शोथहर है। आंतरिक प्रयोग में यह वातानुलोमन, मृदुरेचन, शोणित स्थापन, मूत्रल, मूत्र विरजनीय, कफ नि:सारक, कंठ्य, चक्षुष्य, शुक्रवर्धक, जीवनीय, रसायन, बलकारक तथा ज्वरघ्न है।
  • इसकी मूल मधुर, शीतल, पित्तरोधी, रक्तशोधक, केशवर्धक, स्तम्भक, बलकारक, मूत्रल, प्रशामक, अल्प विरेचक, वाजीकर, कफनि:सारक, आर्तवजनन, विषघ्न, परिवर्तक तथा मेधावर्धक होती है।
  • इसका अपक्व सार चूहों में डाइक्लोपफेनेक प्रेरित यकृत् क्षय के प्रति यकृत्रक्षात्मक प्रभाव प्रदर्शित करता है।
  • इसके मूल का ऐथेनॉल सार अल्पआक्सीय चूहों (Hypoxic rats) में मस्तिष्क रक्षी (Cerebroprotective) प्रभाव प्रदर्शित करता है।
  • इसका जलीय एल्कोहॉलिक सार विशेष कवकनाशक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।
  • इसके मूल का जलीय सार चूहों में ष्टङ्र्घं प्रेरित आक्षेपों के प्रति आक्षेपनाशक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।

औषधीय प्रयोग, मात्रा एवं विधि

शिरो रोग
  1. शिरोवेदना- मुलेठी का चूर्ण एक भाग, इसका चौथाई भाग कलिहारी का चूर्ण तथा थोड़ा सा सरसों का तेल मिलाकर नासिका में नसवार की तरह सूंघने से किसी भी प्रकार की शिरोवेदना में लाभ होता है।
  2. केश्य- मुलेठी के क्वाथ से बाल धोने से बाल बढ़ते हैं।
  3. मुलेठी एवं तिल को भैंस के दूध में पीसकर सिर पर लेप करने से बालों का झडऩा बन्द हो जाता है।
  4. अर्धावभेदक- मुलेठी चूर्ण में मधु मिलाकर अवपीड़ नस्य देने से (अर्धावभेदक) आधाशीशी में अत्यन्त लाभ होता है।
  5. शिर: शूल-एक ग्राम मुलेठी चूर्ण में 65 मिग्रा वत्सनाभ चूर्ण मिलाकर अच्छी प्रकार मर्दन करके 2-4 मिग्रा की मात्रा में नस्य लेने से सभी प्रकार के शिर:शूल का शमन हो जाता है। (चिकित्सक की देख-रेख में यह प्रयोग करें)
  6. पालित्य - 50 ग्राम मुलेठी कल्क तथा 750 मिली आँवला स्वरस से 750 मिली तिल तैल का यथाविधि तैल पाक करके नियमित रूप से 1-2 बूंद नाक में डालने से असमय बाल सफेद नहीं होते तथा बाल झड़ते नहीं हैं।

नेत्र रोग

  1. मुलेठी के क्वाथ से नेत्रों को धोने से नेत्रों के रोग दूर होते हैं। मुलेठी की मूल चूर्ण में बराबर मात्रा में सौंफ का चूर्ण मिलाकर एक चम्मच प्रात: सायं खाने से आँखों की जलन मिटती है तथा नेत्र ज्योति बढ़ती है।
  2. नेत्राभिष्यन्द - मुलेठी को पानी में पीसकर, उसमें रुई का फाहा भिगोकर नेत्रों पर बांधने से नेत्रों की लालिमा मिटती है।
  3. तिमिर- मुलेठी एवं आँवले को पीस कर जल में मिलाकर अथवा उनके क्वाथ से स्नान, चक्षुप्रक्षालन (आँखों को धोने) एवं परिषेक करने से पित्त का शमन होकर तिमिर नामक नेत्र रोग में लाभ होता है।
  4. मुलेठी के सार में मधु मिलाकर अंजन करने से नेत्र रोगों का शमन होता है।
  5. मुलेठी क्वाथ से नेत्रों को धोने से वत्र्मगत तथा अन्य रोगों का शमन होता है।
कर्ण रोग
  1. पित्तज कर्णरोग-मुलेठी और द्राक्षा से पकाए हुये दूध को कान में डालने से पित्तविकारजन्य कर्ण रोग में लाभ होता है।
  2. नासा रोग
  3. 3-3 ग्राम मुलेठी तथा शुण्ठी में छ: छोटी इलायची तथा 25 ग्राम मिश्री मिलाकर, क्वाथ बनाकर 1-2 बूंद नाक में डालने से नासा रोगों का शमन होता है।
मुख रोग
  1. मुंह के छाले-मुलेठी मूल के टुकड़े में शहद लगाकर चूसते रहने सेे लाभ होता है।
  2. केवल मुलेठी सेभी लाभ होता है।
कण्ठ रोग:
  1. स्वरभेद-मुलेठी को चूसने से स्वर भंग में लाभ होता है।
  2. पित्तजन्य स्वरभंग-5 ग्राम मुलेठी से पकाए हुए दुग्ध में 1 ग्राम घृत डाल कर सेवन करने से पित्तज स्वरभंग में लाभ होता है।
  3. कण्ठरोग-इलायची एवं मुलेठी चूर्ण का प्रतिसारण करने से कण्ठरोगों में शीघ्र लाभ होता है।
वक्ष रोग
  1. कास-मुलेठी को चूसने से खांसी में लाभ होता है।
  2. शुष्क कास-सूखी खांसी में कफ  पैदा करने के लिये इसकी 1 चम्मच मात्र को मधु के साथ दिन में 3 बार चटाना चाहिये। इसका 20-25 मिली क्वाथ प्रात: सायं पीने से श्वास नलिका साफ हो जाती है।
  3. हिचकी-मुलेठी को चूसने से हिचकी दूर होती है।
  4. मुलेठी के सूक्ष्म चूर्ण में मधु मिलाकर नस्य लेने से हिक्का का वेग शान्त होता है।
  5. श्वास नलिका के विकार-मुलेठी का क्वाथ बनाकर 10-15 मिली मात्रा में पिलाने से श्वास नली के विकारों का शमन होता है।
हृदय रोग
  1. समभाग, मुलेठी (3-5 ग्राम) तथा कुटकी चूर्ण को मिलाकर 15-20 ग्राम मिश्री युक्त जल के साथ प्रतिदिन नियमित रूप से सेवन करने से हृद्रोगों में लाभ होता है।
  2.  पित्तज हृद्रोग में दोषों के निवारण हेतु गम्भारी, मुलेठी, मधु, शर्करा तथा कूठ के चूर्ण से वमन कराना चाहिए तथा मुलेठी से पकाए हुए तैल में मधु मिलाकर बस्ति देना चाहिए।
उदर रोग:
  1. तृषा-मुलेठी को चूसनेे से तृष्णा का शमन होता है।
  2. उदरान्त्रगत व्रण-मुलेठी की मूल चूर्ण को एक चम्मच की मात्रा में एक कप दूध के साथ दिन में 3 बार सेवन करते रहने से उदरान्त्र व्रणों का रोपण होता है। (मिर्च मसालों से परहेज रखें।)
  3. उदरशूल-एक चम्मच मुलेठी मूल चूर्ण में शहद मिलाकर दिन में 3 बार सेवन करने से पेट और आंतों की ऐंठन व क्षोभ से उत्पन्न वेदना का शमन होता है।
  4. उदराध्मान-2-5 ग्राम मुलेठी चूर्ण को जल और मिश्री के साथ सेवन करने से लाभ होता है।
गुदा रोग
  1. तृष्णा-मुलेठी का क्वाथ (10-20 मिली) पीने से क्षयज तृष्णा में लाभ होता है।
  2. रक्तज छर्दि-समभाग मुलेठी और रक्त चन्दन चूर्ण (1-2 ग्राम) को दूध से पीसकर, 50 मिली दूध में मिलाकर थोड़ा थोड़ा कर पिलाने से वमन में रक्त का आना बन्द होने लगता है।
  3. उदरशूल-मुलेठी का क्वाथ बनाकर 10-15 मिली मात्रा में पीने से उदरशूल मिटता है।
 यकृत्प्लीहा रोग
  1. कामला-एक चम्मच मुलेठी चूर्ण को मधु के साथ मिलाकर या इसका क्वाथ पीने से पाण्डु रोग में लाभ होता है।
  2. 10-20 मिली मुलेठी क्वाथ या 1-2 ग्राम चूर्ण में मधु मिलाकर सेवन करने से पाण्डु रोग (खून की कमी) में लाभ होता है।
वृक्कवस्ति रोग
  1. मूत्रदाह-एक चम्मच मुलेठी चूर्ण को एक कप दूध के साथ सेवन करने से मूत्रदाह में लाभ होता है।
  2. मूत्रघात-समभाग मुलेठी, दारुहल्दी तथा एर्वारुबीज के चूर्ण (3-5 ग्राम) को दिन में 3-4 बार चावल के धोवन के साथ पीने से मूत्रघात में लाभ होता है।
  3. समभाग मुलेठी और कुंकुम के चूर्ण (1-2 ग्राम) में 10 ग्राम गुड़ मिलाकर, रात भर 100 मिली जल में डालकर प्रात:काल छानकर शीतल करके पीने से समस्त प्रकार के मूत्ररोगों में लाभ होता है।
  4. मूत्रकृच्छ्र-इक्षुरस (100 मिली) तथा दूध (100 मिली) में मिश्री (10 ग्राम), द्राक्षा (5 ग्राम) तथा मुलेठी (1 ग्राम) का चूर्ण मिलाकर पीने से मूत्रवेगावरोध जन्य उदावर्त, मूत्रकृच्छ्र तथा मूत्राश्मरी में लाभ होता है।
प्रजननसंस्थान रोग
  1. दूध की अल्पता-2 चम्मच मुलेठी चूर्ण और 3 चम्मच शतावर चूर्ण को एक कप दूध में उबालें, जब दूध आधा रह जाये तो आग पर से उतार लें। इसमें से आधा सुबह और आधा शाम को एक कप दूध के साथ सेवन करने से स्तन्य (दूध) की वृद्धि होती है।
  2. 100 मिली दूध में 2-4 ग्राम मुलेठी तथा 5-10 ग्राम मिश्री मिलाकर धात्री को प्रतिदिन प्रात: सायं पिलाने से स्तन्य की वृद्धि होती है।
  3. गर्भशोष-गर्भस्थ शिशु सूखता जा रहा हो तो ऐसी अवस्था में गंभारीफल, मुलेठी एवं मिश्री को समभाग मिलाकर 15-20 ग्राम मात्रा में लेकर प्रात: सायं दूध में उबालकर गर्भवती महिला को नियमित पिलाना चाहिये।
  4. रक्तप्रदर-1-2 ग्राम मुलेठी चूर्ण में 5-10 ग्राम मिश्री मिलाकर चावल के धोवन (तण्डुलोदक) के साथ पीसकर पीने से रक्तप्रदर में शीघ्र लाभ होता है।
अस्थिसंधि रोग
  • वातरक्त-मुलेठी तथा गंभारी से सिद्ध किये हुये तेल की मालिश करने से वातरक्त में लाभ होता है।
 त्वचा रोग
  1. व्रण वेदना-शस्त्रजन्य व्रण के कारण उत्पन्न हुई तीव्र वेदना में मुलेठी चूर्ण को घी में मिलाकर थोड़ा गर्म करके लगाने से वेदना शीघ्र शान्त होती है।
  2. फोड़ों पर मुलेठी का लेप लगाने से वे जल्दी पककर फूट जाते हैं।
  3. व्रण-तिल कल्क, हल्दी, दारुहल्दी, निशोथ, मुलेठी और नीम के पत्तों के कल्क में थोड़ा घी मिलाकर व्रण पर लेप करने से घाव का शोधन होता है।
  4. मुलेठी और तिल को पीसकर उसमें घृत मिलाकर घाव पर लेप करने से घाव भर जाता है।
  5. उदर्द-प्रतिदिन 2-3 ग्राम मुलेठी चूर्ण में समभाग मिश्री, गुड़ तथा आँवला चूर्ण मिलाकर सेवन करने से उदर्द का शमन होता है।
सर्वशरीर रोग
  1. रक्तपित्त जन्य वमन- मुलेठी, नागरमोथा, इन्द्रजौ तथा मैनफल को समान मात्रा में लेकर चूर्ण करें। 1 चम्मच चूर्ण को 3-5 ग्राम मधु के साथ मिलाकर दिन में 3 से 4 बार सेवन करने से रक्तपित्तजन्य छर्दि में लाभ होता है।
  2. 2-5 ग्राम मुलेठी चूर्ण में मधु मिलाकर या समभाग चंदन, मुलेठी एवं लोध्र चूर्ण (2-4 ग्राम) में मधु मिलाकर तण्डुलोदक के अनुपान के साथ सेवन करने से रक्तपित्त रोग का शमन होता है।
  3. 3-5 ग्राम मुलेठी चूर्ण का नियमित प्रात: सायं प्रयोग करने से रक्तपित्त में लाभ होता है।
  4. रक्तवमन-मुलेठी तथा चन्दन को अच्छी तरह दूध में पीस कर 1-2 चम्मच की मात्रा में पिलाने से रक्त वमन (उलटी में रक्त कास) में लाभ होता है।
  5. एक चम्मच मुलेठी मूल चूर्ण को शहद के साथ सुबह-शाम लेने से रक्त वमन में लाभ होता है।
  6. दौर्बल्य-एक चम्मच मुलेठी चूर्ण में आधा चम्मच शहद और एक चम्मच घी मिलाकर एक कप दूध के साथ सुबह शाम रोजाना 5-6 हफ्ते तक सेवन करने से बल बढ़ता है तथा दौर्बल्यता का शमन होता है।
  7. दाह-लाल चन्दन के साथ मुलेठी को घिसकर लगाने से दाह का शमन होता है।
मानस रोग
  1. अपस्मार-मुलेठी के 1 चम्मच महीन चूर्ण को घी में मिलाकर दिन में 3 बार सेवन करने से अपस्मार में लाभ होता है।
  2. 5 ग्राम मुलेठी को पेठे (कूष्माण्ड) के रस में महीन पीसकर 3 दिन तक खाने से अपस्मार में लाभ होता है।
  3. आमलकादि घृत-100 ग्राम मुलेठी कल्क तथा 12 किलो आँवला को 750 ग्राम घृत के साथ पकाकर प्रतिदिन 5-10 ग्राम मात्रा में सेवन करने से पित्तज अपस्मार में शीघ्र लाभ होता है।
रसायन वाजीकरण
  • रसायन-प्रतिदिन 2-4 ग्राम मुलेठी चूर्ण का प्रयोग प्रात: काल गाय के दूध के साथ करने से मेधा की विशेष वृद्धि होती है। इससे आयुवृद्धि, रोगनाश, बल, अग्नि, स्वर, वर्ण आदि गुणों की वृद्धि होती है।
  • वाजीकरणार्थ-2-4 ग्राम मुलेठी चूर्ण में घी तथा मधु मिलाकर सेवन करके अनुपान में दूध पीने से व्यक्ति सदा वृष्य गुणों से युक्त रहता है।
अन्य प्रयोग
  1. वर्ण्य - मुलेठी को पानी में पीसकर लेप करने से शरीर की रंगत निखरती है।
  2. भल्लातकजन्य शोथ-समभाग मुलेठी तथा तिल को दूध से पीसकर कल्क बना कर, उसमें मक्खन मिला कर भल्लातक जन्य शोथ पर लेप करने से सूजन का शमन होता है।
  3. शरीर की दौर्गन्ध्य-मुलेठी को पीसकर लगाने से पसीने से होने वाली शरीर दौर्गन्ध्य का शमन होता है। 

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