भारत की गौरवशाली गुरु परम्परा
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महामहोपाध्याय डॉ. महावीर,
प्रति-कुलपति, पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार
महर्षि मनु का एक प्रसिद्ध श्लोक है -
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशाद् अग्रजन्मन:।
स्वं-स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा:।
अर्थात् भारत देशोत्पन्न गुरुओं के चरणों में बैठकर संपूर्ण वसुधा के मानव अपने-अपने चरित्र की शिक्षा प्राप्त करते थे। हमारा इतिहास संकेत करता है कि भारत विश्वगुरु रहा है। इसीलिए अनेक देशों के नागरिक आज भी प्रात:काल उठकर भारत की ओर मस्तक झुकाकर अपने गुरुओं के देश भारत को नमन करते हैं। बौद्ध, जैन और हिन्दू धर्म के माध्यम से अहिंसा, सत्य, करुणा, प्रेम, दया, विश्वबन्धुत्व और समर्पण का सन्देश भारत से ही अन्य देशों में गया है।
वेदों से लेकर आज तक के भारतीय साहित्य में परमात्मा के पश्चात् सबसे बड़ा स्थान गुरु अथवा आचार्य को ही दिया गया है। शतपथ ब्राह्मणकार ने कहा -
मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् पुरुषो वेद।
शतपथ 14/06/10/02
आचार्य शब्द की व्याख्या करते हुए महर्षि यास्क अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ निरूक्त में लिखते हैं-
आचार्य: आचारं ग्राहयति, आचिनोति
अर्थात्, आचिनोति बुद्धिम् इति वा। अर्थात् आचार्य वह है जो शिष्य को सदाचार ग्रहण करावे, जो पदार्थों का संचय करे तथा जो शिष्य की बुद्धि का संचय करें। शिक्षा के मुख्यत: तीन उद्देश्य हैं (1) विद्यार्थी को सदाचारी बनाना (2) विद्यार्थी के मन में पदार्थों के बोध का संचय करना, तथा (3) उसकी बुद्धि को विकसित करना।
मनुस्मृति में आचार्य का लक्षण इस प्रकार प्रतिपादित किया गया है ‘उपनीय तु य: शिष्यं वेदमध्यापयेद् द्विज:’। सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्यं प्रचक्षते।।
अर्थात् अपने प्रिय शिष्य का उपनयन संस्कार करके जो कल्प एवं रहस्यपूर्वक वेदाध्यापन कराता है उसे आचार्य कहते हैं। आचार्य से मिलता-जुलता शब्द है उपाध्याय। उपाध्याय की व्याख्या मनु ने इस प्रकार की है -
एकदेशं तु वेदस्य वेदाङ्गान्यपि वा पुन:।
योऽध्यापयति वृत्यर्थमुपाध्याय: स उच्यते।। मनुस्मृति. 2/116
अर्थात् वेद, वेदाङ्गों का कोई एक भाग जीविकोपार्जन हेतु कुछ धन (मानदेय) लेकर जो पढ़ाता है उसे उपाध्याय कहा जाता है। इसी प्रकरण में गुरु शब्द की विवेचना करते हुए कहा गया है -
निषेकादीनि कर्माणि य: करोति यथाविधि।
सम्भावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरूच्यते।। मनुस्मृति 2/116
जो विधिपूर्वक समस्त संस्कार कराकर विद्या प्रदान करने के साथ-साथ अपने शिष्य के भोजन की भी व्यवस्था करता है, वह गुरुपद से सम्माननीय है।
यह गुरु, विद्या का सागर, चरित्र का सुमेरू और शिष्य कल्याण के लिये पृथिवी के समान सब कुछ सहन करने वाला माना गया है। महात्मा विदुर ने ऐसे ज्ञानवान गुरु का चित्रण इन शब्दों में किया है
आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता।
यमर्था नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते।।
निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते।
अनास्तिक: श्रद्धधान एतत्पण्डित लक्षणम्।।
उद्योग पर्व विदुर प्रजागर 33-1,2
अर्थात् जो आत्मज्ञानी हो जो कभी आलस न करे, सुख-दु:ख, हानि-लाभ, मान-अपमान, निन्दा-स्तुति, हर्ष-शोक कभी न करे, धर्म में ही सदा स्थिर रहे, जिसको सांसारिक भोग्य-पदार्थ अपनी ओर आकृष्ट न कर सकें। सदा धर्मयुक्त कर्मों का सेवन, अधर्मयुक्त कार्यों का परित्याग तथा ईश्वर, वेद, सत्याचार की निन्दा न करने हारा, ईश्वर आदि में अत्यन्त श्रद्धालु हो, वही विद्वान् गुरु है। ऐसे महान् गुरु की महिमा वर्णित करते हुए कहा गया -
गुरुब्र्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर:।
गुरु: साक्षाद् परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:।।
अर्थात् गुरु, ब्रह्म, विष्णु एवं महेश्वर का प्रतिरूप है वह गुरु ही साक्षाद् ब्रह्म है, ऐसी गुरु सत्ता को हमारा कोटि-कोटि प्रणाम है।
ईश्वर का गुरु होना, महर्षि पतंजलि के निम्न सूत्र से भी सिद्ध होता है - ‘स एष पूर्वेषामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात्’समाधिपाद 26, गुरु शब्द का यह अर्थ भी रमणीय है - ‘गु: अज्ञानं तद्रौति अपाकरोति इति। अर्थात् शिष्य के अन्त:करण में व्याप्त अज्ञान अन्धकार को दूर करने वाला ही सद्गुरु है।
हमारा यह सुदृढ़ विश्वास है और मनु आदि ऋषियों ने भी इसकी उद्घोषणा की है -
‘अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्।
दुदोह यज्ञसिद्धयर्थम् ऋग्यजु: साम लक्षणम्।।’’
अग्नि, वायु, आदित्य और अङ्गिरा नामक ऋषियों के पावन अन्त:करणों में परम पिता परमेश्वर ने वेदों का ज्ञान प्रकाशित किया था। तब से गुरु-शिष्य परंपरा से यह वेद ज्ञान गंगा प्रथम गुरु परमात्मा से प्रवाहित होती हुई आज हमें प्राप्त हो रही है। जिन ऋषियों ने यह वैदिक ज्ञान गंगा, श्रुति परम्परा से हम तक पहुँचाई वे प्रात: स्मरणीय ऋषिगण हमारे महान् गुरु हैं, अतएव वन्दनीय हैं।
ऐसे ये गुरु हर प्रकार से शिष्यों का कल्याण करते हैं। वे बाहर से वज्र के समान कठोर प्रतीत होते हुए अपने शिष्यों के प्रति अन्त:करण से पुष्प के समान कोमल होते हैं। महर्षि पतंजलि ने गुरुओं के इस स्वरूप का वर्णन इन शब्दों में किया है -
सामृतै: पाणिभिघ्र्नन्ति गुरवो न विषोक्षितै:।
लालनाश्रायिणों दोषास्त्ताडनाश्रयिणो गुणा:।।
व्या. महाभाष्य 8/1/8
जो गुरुजन अपने शिष्यों की ताडऩा करते हैं, वे मानो अपने शिष्यों को हाथ से अमृत पिला रहे हैं। और जो झूठा लाड़-प्यार करते हैं वे अपने शिष्यों को विषपान कराकर उनका जीवन नष्ट-भ्रष्ट करते हैं।
गुरु की महिमा अपरम्पार है। वह विद्यामधु का पान कराकर शिष्य के जीवन का निर्माण करता है। विद्या की महिमा कौन नहीं जानता- ‘विद्ययाऽमृतमश्नुते’, ‘विद्या ददाति विनयम्’, ‘विद्याधनं सर्वधनप्रदानम्’आदि अमृत वचनों से विद्या का सर्वश्रेष्ठ होना निर्विवाद है। ‘विद्याविहीन: पशु:’ विद्या रहित मानव का जीवन पशुतुल्य है।
युग प्रवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में- विद्याविभूषित जनों की महिमा इस प्रकार वर्णित की है -
विद्याविलासमनसो धृतशीलशिक्षा:,
सत्यव्रता रहितमानमलापहारा:।
संसार दु:खदलनेन सुभूषिता ये,
धन्या:नरा विहित कर्म परोपकारा:।।
जिन पुरुषों का मन विद्या विलास में मग्न रहता है, जिन्होंने सदाचार की शिक्षा को धारण किया हुआ है, सत्यव्रती और अभिमान आदि के मलों में रहित, संसार के दु:खों को दूर करने से ही जिनका जीवन शोभायमान है। ऐसे परोपकार कर्मों में संलग्न मानवों का जीवन धन्य है।
ऐसे विद्वान् आचार्य वेदारम्भ संस्कार के द्वारा शिष्य को मानों अपने गर्भ में धारण कर लेते थे, जैसे माता शिशु को गर्भ में धारण कर नौ माह तक गर्भ में ही उसका पालन पोषण करती है। वेद माता कहती है -
आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणंकृणुते गर्भमन्त:।
तं रात्रीस्तिस्र उदरे बिभर्ति तं जातं द्रष्टुमभिसंयन्ति देवा:।।
-अथर्व 11-5-3
गुरु-शिष्य के आत्मीय सम्बन्धों के आधार पर ही शिक्षा संस्थान गुरुकुल कहे जाते थे। गुरु चरणों में बैठकर नाना विद्याओं में निष्णात हो जाने पर समावर्तन संस्कार अर्थात् दीक्षान्त समारोह आयोजित किया जाता था। इस ऐतिहासिक, सांस्कृतिक समारोह में आचार्य अपने अन्तेवासी स्नातक को जो उपदेश दिया करते थे वे आज भी स्वर्णाक्षरों में अंकित करने योग्य एवं राष्ट्र की समस्त समस्याओं का समाधान करने में सक्षम हैं। आचार्य उपदेश करते थे-
सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमद:। आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सी:। सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यैन प्रमदितव्यम्। स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्। देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्। मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथि देवो भव। यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि। यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि। नो इतराणि।।
- तैत्तिराीयोपनिषद् 1/11
तुम सदा सत्य बोलना, धर्माचरण करना, स्वाध्याय में कभी आलस्य न करना। आचार्य के लिए प्रिय धन देकर, विवाह करके सन्तानोत्पत्ति करना। प्रमाद से सत्य को कभी न छोडऩा। धर्म के प्रति प्रमाद न करना। प्रमाद से आरोग्य और चतुराई को मत छोडऩा। ऐश्वर्य प्राप्ति में आलस्य न करना। प्रमादवश स्वाध्याय और प्रवचन का परित्याग न करना। देवों और माता-पिता आदि के कार्यों में कभी आलस्य न करना। माता, पिता, आचार्य और अतिथि को देवतुल्य जानकर मनसा, वाचा, कर्मणा इनकी सेवा और सम्मान करना। जो हम गुरुओं के सत्यभाषणादि उत्तम धर्म कर्म हैं, उन्हीं का तुम अनुसरण करना निन्दनीय कर्मों का अनुसरण कभी न करना।
अपने पूज्य गुरु से विद्या, संस्कार, स्नेह और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए अनन्य श्रद्धा सर्वोत्तम साधन है।
श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्। मनु जी कहते हैं-
यथा खनन् खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति।
तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रुषुरधिगच्छति।।
जैसे मानव कुदाल से खोदते-खोदते कुआं बनाकर उसका जल प्राप्त करता है, वैसे ही शिष्य भी शुश्रुषा से गुरु से विद्या प्राप्त करता है। यहां शुश्रुषा शब्द द्वयर्थक है। एक है श्रोतुमिच्छा अर्थात् अपने आचार्य के प्रत्येक वचन को श्रद्धापूर्वक श्रवण करना, और दूसरा है‘सेवा’की भावना। जो शिष्य अपने गुरुओं की शुद्ध अन्त:करण से सेवा करते हैं, वे पूर्णकाम हो जाते हैं।
ऐसे महान गुरुओं की महिमा का वर्णन करते हुए महर्षि चरक ने किसी प्राचीन आचार्य के श्लोक उद्धृत किये हैं-
विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मा शेवधिष्टेऽहमस्मि।
असूयकायानृजवेऽयताय न मा ब्रूया वीर्यवती तथा स्याम्।।
य आतृणत्यवितथेन कर्णावदु:खं कुर्वन्नमृतं संप्रयच्छन्।
तं मन्येत पितरं मातरं च तस्मै न द्रुह्येत् कतमच्चनाह।।
अध्यापिता ये गुरुं नाद्रियन्ते विप्रा वाचा मनसा कर्मणा वा।
यथैव ते न गुरोर्भोजनीयास्तथैव तान्न भुनक्ति श्रुतं तत्।।
यमेव विद्या: शुचिमप्रमत्तं मेधाविनं ब्रह्मचर्योपपन्नम्।
यस्ते न द्रुह्येत् कलमच्चनाह तस्मै मा ब्रूया निधिपाय ब्रह्मन्।।
विद्या ब्राह्मण के पास आकर बोली- हे ब्राह्मण। तूं मेरी रक्षा कर, मैं तेरे सुख का खजाना हूँ। तू असूयक, कुटिल तथा अजितेन्द्रिय विद्यार्थी को मेरा उपदेश न करना, तब मैं तेरे लिए वीर्यशालिनी होऊंगी।
जो गुरु सत्य-वेद ज्ञान के द्वारा बन्द कानों को खोल देता है, जिनके खुलने से दु:ख के स्थान पर अपार सुख की प्राप्ति होती है और मोक्ष प्राप्ति का ज्ञान उपलब्ध होता है, उस गुरु को शिष्य पिता और माता समझे और किसी भी अवस्था में उससे द्रोह न करे।
जो शिष्य पढ़ लिखकर विद्वान् होकर मन, वचन तथा कर्म से अपने गुरु का आदर नहीं करते, जैसे वे गुरु के कृपा-पात्र नहीं बनते, उसी प्रकार वह शिक्षा भी उन शिष्यों की रक्षा नहीं करती।
अत: हे ब्राह्मण! जैसे तू शुद्धान्त:करण, व्रतों के पालने में अप्रमादी, मेधा संपन्न, तथा ब्रह्मचर्य से युक्त समझे, और जो तुझसे कभी भी द्रोह न करे, उस सुख-निधि के रक्षक शिष्य को मेरा उपदेश करना।
शिष्य की पात्रता, श्रद्धा, समर्पण, सेवाभाव देखकर योग्य गुरु जो ज्ञान और स्नेहाशीष देते थे, वह सफल होता था और शिष्य के जीवन को धवल-कीर्ति से अलंकृत कर देता था।
मनु ने ठीक ही कहा है-
गुरोर्यत्र परीवादो निन्दा वापि प्रवर्तते।
कर्णौ तत्र पिधातव्यौ, गन्तव्यं वा ततोऽन्यत:।।
जहां गुरु की निन्दा हो रही हो और शिष्य उसका प्रतीकार न कर सके तो वहां कान बन्द कर लेने चाहिए अथवा वहां से अन्यत्र चले जाना चाहिए। किसी हिन्दी कवि ने ठीक ही लिखा है-
कर्ता करि न कर सके, गुरु करे सब होय,
तीन लोक नौ खण्ड में, गुरु से बड़ा न कोय।
धरती सब कागद करू, कलम करू वनराय,
स्याही सब समन्दर करू, तो भी महिमा लिखी न जाय।
भारतीय चिन्तन धारा में आचार्य अथवा गुरु शब्द को सर्वाधिक गौरव प्राप्त है। यहां गुरु-शिष्य की महनीय परम्परा रही है।
ऋषि विश्वामित्र और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, महर्षि सन्दीपनी और योगेश्वर श्रीकृष्ण, महर्षि वाल्मीकि और लव-कुश, महामति चाणक्य और चन्द्रगुप्त, समर्थ रामदास और छत्रपति शिवाजी महाराज, द्रोणाचार्य और अर्जुन, एकलव्य, स्वामी रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द। गुरु शिष्य परम्परा की इस मुक्तावली में दो उदाहरण यहां उद्धृत करना चाहूँगा । कविकुलगुरु कालिदास ने अपने अमर महाकाव्य रघुंवश में आचार्य वरतन्तु और-कौत्स का अत्यन्त भावप्रवण वर्णन किया है।
शिष्य कौत्स, समग्र विद्यायें प्राप्त करने पर गुरु से विदाई के क्षणों में दक्षिणा लेने का आग्रह करता है। आचार्य उसकी विद्याध्ययन काल में की हुई सेवा को ही अधिमान देते हुए दक्षिणा की बात को नकार देते हैं। किन्तु शिष्य के बार-बार आग्रह करने पर क्रुद्ध होकर वे कहते हैं-
निर्बन्ध संजातरुषार्थकाश्र्यमचिन्तयित्वा गुरुणाहमुक्त:।
वित्तस्य विद्यापरिसंख्यया में कोटीश्चतस्रो दश चाहरेति।।
रघुवंश 5/21
मैंने तुम्हें चौदह विद्याएं पढ़ाई हैं, इसलिये मुझे चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राएं लाकर दो। गुरु के आदेश पर कौत्स, राजा-रघु के द्वार पर याचक बन कर जाता है। महाराज रघु विश्वजीत यज्ञ में अपनी समग्र संपत्ति दान कर चुके थे। वे कुबेर पर ओक्रमण की तैयारी करते हैं, कुबेर भयभीत होकर धनवर्षा करते हैं, और इस प्रकार शिष्य कौत्स चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राएं अपने गुरु को दक्षिणा रूप में समर्पित कर देते हैं। धनुर्धर एकलव्य ने गुरु दक्षिणा में अपना अगूंठा काटकर गुरु द्रोणाचार्य को समर्पित कर दिया था।
गुरु धौम्य का प्रिय शिष्य आरूणि खेत की रक्षार्थ जल को रोकने के लिए अपने प्राणों की चिन्ता किये बिना स्वयं खेत की दरार में रातभर लेटा रहा। इसी प्रकार गुरु विरजानन्द से विदा होते समय स्वामी दयानन्द गुरु दक्षिणा के रूप में मुठ्ठीभर लौंग लेकर पहुंचे, तब ब्रह्मर्षि कहते हैं-
दयानन्द। मैंने मुठ्ठीभर लौंग के लिये तुम्हें आर्षज्ञान प्रदान नहीं किया था। देखो! सर्वत्र अज्ञान-अन्धकार व्याप्त है। परतन्त्रता और पाखण्ड के भार से मानवता कराह रही है, तुम वेद ज्ञान से इस अन्धकार को दूर करो। तब एक क्षण न लगाते हुए महर्षि दयानन्द अपना संपूर्ण जीवन गुरु दक्षिणा में समर्पित कर देते हैं-
समर्पित श्री गुरवे स्वजीवनम्।
नियोज्यमेनं विनियोजयेद् यथा।।
गुरु चरणों में जीवन समर्पित कर देव-दयानन्द, समाधि के लिए हिमालय आदि पर न जाकर राष्ट्रसेवा, वेदप्रचार, सत्यज्ञान से मानवता की सेवा में अपना सर्वस्व स्वाहा कर देते हैं। विष के प्याले पीकर, अमृतपान कराते हैं।
ऐसी महान् थी भारत देश की गौरवशाली गुरु-शिष्य परम्परा। आज देश पुन: उस गरिमामयी श्रेष्ठ परम्परा की प्रतीक्षा कर रहा है। आचार्यों की गौरवशाली परम्परा को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम।
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