श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज की शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...
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स्वामी रामदेव
ध्यान व समाधि का व्यवहारिक स्वरुप
ध्यान के तीन चरण
ध्यान व समाधि का सहज व्यवहारिक स्वरुप
1. प्रथम चरण- पूर्ण रूप से सहज होकर शरीर के एक-एक अंग-प्रत्यंग को शिथिल शरीर एवं इन्द्रिय रूप साधनों से अपने मन को हटाकर प्राणों के साथ प्रणव का अर्थ- भावना पूर्वक जप करें।
2. द्वितीय चरण- ध्यान के दूसरे चरण में ह्दय चक, आज्ञा चक या किसी अन्य स्थान विशेष पर नियन्त्रित या एकाग्र करके भाव समाधि, सहज समाधि या भगवान् की अनन्त महिमा, अनन्त गुण, कर्म, स्वभाव व सामर्थ्य को विचार पूर्वक स्वीकार करते हुए सविचार समाधि या ध्यान का अभ्यास करते हुए भगवान् की स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना में पूर्ण रूप से लीन हो जाना यह ध्यान का दूसरा चरण है। भगवान् ही समस्त ज्ञान, संवेदना, सामर्थ्य, ऐश्वर्य, सुख, शान्ति एवं आनन्द का मूल स्रोत या मूल आधार है, यही पूर्ण व शाश्वत सत्य है। इस भाव, विचार या संकल्प के साथ भाव समाधि, विचार समाधि या संकल्प समाधि के साधक या योगी समाहित होकर ब्रह्म को सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सर्वस्व, सर्वकर्ता, सर्वनियन्ता एवं संहर्त्ता स्वीकार करके भगवान की शरणागति में पूर्णतः प्रतिष्ठित हो जाता है। भगवान् की स्तुति से भगवान् में अनन्य प्रीति, प्रार्थना, से पूर्णतः निरभिमानिता तथा भगवान् की उपासना से प्रभु के साथ एकत्व के भाव में साधक अवस्थित हो जाता है। भगवान् के साथ एकात्मता के दो स्वरुप हैं, एक स्वाध्याय तथा दूसरा योग।
स्वाध्यायात् योगम्-आसीत योगात्-स्वाध्यायमामनेत्।
स्वाध्याय योग-सम्पत्या परमात्मा प्रकाशते।। 1/28 (योग दर्शन व्यास भाष्य)
शुद्ध ज्ञान, शुद्ध अतःकरण व शुद्ध आचरण से युक्त योगी जब भगवान् की पूर्ण श्रद्धा, भक्ति व सामर्थ्य के साथ आराधना करता है, भगवान् की जैसे मोक्ष शास्त्रों में स्तुति की गई है, वैसे ही आत्मवेत्ता ऋषियों की तरह स्तुति करता हुआ साधक भगवान् के ध्यान में तल्लीन हो जाता है- यह स्वाध्याय रूप योग का साधन है। इस स्वाध्याय रूप ध्यान योग से साधक योग अर्थात् पूर्णतः चित्तवृत्ति निरोध की स्थिति में शनैः-शनैः स्वाभाविक रूप् से प्रतिष्ठित हो जाता है अर्थात् ध्यानावस्थित चित्त या मन से चित्त व मन के भी पार आत्म स्वरूप या परमात्मा के स्वरूप में कुछ समय तक प्रतिष्ठित रहता है और आत्मा व परमात्मा के अनन्त ज्ञान, अनन्त सुख, शान्ति व असीम आनन्द, ऐश्वर्य में मग्न हो जाता है यह योग की स्थिति है। इस स्वाध्याय व योग रूपी ध्यान व समाधि के अभ्यास से साधक को परमात्मा का पूर्ण प्रकाश या अनुभूति होती है। यही भगवान की प्राप्ति आत्म साक्षात्कार या ब्रह्म साक्षात्कार है।
(शेष अगले अंक में........)

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01 Mar 2025 17:58:05
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