संस्कृति एवं शिक्षा
बच्चों की शिक्षा सर्वाधिक महान सेवा है!
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आज के युग तथा आज की परिस्थितियों में वैश्विक सफलता के लिए बच्चों को टोटल क्वालिटी पर्सन (टी.क्यू.पी.) बनाने से पहले स्कूल को जीवन की तीन भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक शिक्षायें देने वाला प्रकाश केन्द्र बनाना चाहिए। इसी बल पर बालक टोटल क्वालिटी पर्सन बनता है, तत्पश्चात टोटल क्वालिटी मैनेजर बनकर विश्व में बदलाव लाता है। इसके विपरीत उद्देश्यहीन, दिशाविहीन शिक्षा बालक को जीवन से जुड़े दिव्यतम ज्ञान से दूर कर देती है। उद्देश्यहीन शिक्षा बालक को विचारहीन, अबुद्धिमान, नास्तिक, टोटल डिफेक्टिव पर्सन, टोटल डिफेक्टिव मैनेजर तथा जीवन में असफल बनाती हैं। वैसे मनुष्य को प्रतिपल सजग होने की बात हमारे संतों ने सदैव की है। तुलसीदास जी कहते हैं- ''बड़े भाग्य मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सदग्रंथनि गावा।।‘’ अर्थात बड़े भाग्य से, अनके जन्मों के पुण्य से यह मनुष्य शरीर मिला है, तो इसे बचपन से ही श्रेष्ठ शिक्षण व संस्कार देकर भाग्यशाली बनाना भी आवश्यक है।
मानव जन्म व्यर्थ में नहीं खोने के पीछे
परमात्मा की ओर से कृष्ण, बुद्ध, ईशु, मोहम्मद, नानक सहित हमारे ऋषियों के माध्यम से प्राप्त शिक्षाओं न्याय, समता, करुणा, भाईचारा, त्याग व हृदय की एकता को जानना और पूजा करने का मतलब है ईश्वर की इन्हीं शिक्षाओं पर चलना। चूंकि बच्चों के मन-मस्तिष्क पर अपने शिक्षकों द्वारा दी गई नैतिक शिक्षाओं का अत्यधिक गहरा प्रभाव पड़ता है। शिक्षक बच्चों को इतना पवित्र, महान तथा चरित्रवान बना सकते हैं कि ये बच्चे आगे चलकर सारे समाज, राष्ट्र व विश्व को एक नई दिशा देने की क्षमता से युक्त हो सकें। मनुष्य गुण रूपी मूल्यवान रत्नों से भरी खान के समान होते हैं। केवल शिक्षा ही उसके अंदर छिपे गुण रूपी खजाने को उजागर कर सकती है और मानव जाति को उनसे लाभ उठाने के योग्य बना सकती है। चूंकि मनुष्य का ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना होने के कारण उस पर सारी सृष्टि को सुन्दर बनाने का दायित्व जो है।
स्कूल में छिपा कल का भविष्य
स्कूल चार दीवारों वाला एक ऐसा भवन है जिसमें कल का भविष्य छिपा है। आने वाले समय में विश्व में एकता एवं शांति स्थापित होगी या अशांति, यह आज स्कूलों में बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा पर निर्भर करता है। एक शिल्पकार एवं कुम्हार की भाँति शिक्षकों का यह प्रथम दायित्व एवं कर्त्तव्य है कि वह बच्चों को आध्यात्मिक गुणों से इस प्रकार संवारे और सजायें कि उनके द्वारा शिक्षित किये गये बच्चे 'विश्व का प्रकाश’ बनकर सारे विश्व को आध्यात्मिक प्रकाश से प्रकाशित कर सकें। महर्षि अरविंद ने शिक्षकों के सम्बन्ध में कहा है कि ''शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से सींचकर उनमें शक्ति निर्मित करते हैं।‘’
सर्वाधिक महान सेवा
सर्वशक्तिमान को मनुष्य की ओर से अर्पित की जाने वाली समस्त सम्भव सेवाओं में से सर्वाधिक महान सेवा है- (अ) बच्चों की शिक्षा, (ब) उनके चरित्र का निर्माण तथा (स) उनके हृदय में श्रेष्ठता के प्रति प्रेम उत्पन्न करना। मानना है कि बच्चों के मन-मस्तिष्क पर अपने शिक्षकों द्वारा दी गई नैतिक शिक्षाओं का अत्यधिक गहरा प्रभाव पड़ता है। टीचर्स बच्चों को इतना पवित्र, महान तथा चरित्रवान बना सकते हैं कि ये बच्चे आगे चलकर सारे समाज, राष्ट्र व विश्व को एक नई दिशा देने की क्षमता से युक्त हो सकें। हर बालक में अच्छे भविष्य की आश है। यदि एक भी बच्चा पूर्ण गुणात्मक व्यक्ति (टोटल क्वालिटी पर्सन-टी.क्यू.पी.) बन जाये तो वह विश्व में बदलाव लाकर एकताबद्धता ला सकता है।
एक सुन्दर सी प्रार्थना है कि 'हे मेरे परमात्मा मैं साक्षी देता हूँ कि तूने मुझे इसलिए उत्पन्न किया है कि मैं तुझे जाँनू तथा तेरी पूजा करूँ।’ परमात्मा को जानने का मतलब है परमात्मा की ओर से कृष्ण, बुद्ध, ईशु, मोहम्मद, नानक के माध्यम से धरती पर अवतरित हुई शिक्षाओं न्याय, समता, करुणा, भाईचारा, त्याग व हृदय की एकता को जानना और पूजा करने का मतलब है ईश्वर की इन्हीं शिक्षाओं पर चलना। हमारे प्रतिदिन के प्रत्येक कार्य-व्यवसाय परमात्मा की सुन्दर प्रार्थना बने, साथ ही शिक्षा में इसे जोड़ा जाए। साथ ही धरती पर आध्यात्मिक समाज की स्थापना के लिए तीन ऐसे क्षेत्रों की आवश्यकता है, जो अभी तक अविकसित हैं। ये तीन क्षेत्र हैं (अ) शिक्षा (ब) धर्म और (स) कानून-व्यवस्था और न्याय।
शिक्षा
आज के युग तथा आज की परिस्थितियों में विश्व में सफल होने के लिए बच्चों को टोटल क्वालिटी पर्सन (टी.क्यू.पी.) बनाने के लिए स्कूल को जीवन की तीन वास्तविकताओं भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक शिक्षायें देने वाला प्रकाश केन्द्र बनना चाहिए। टोटल क्वालिटी पर्सन ही टोटल क्वालिटी मैनेजर बनकर विश्व में बदलाव ला सकता है। पर उद्देश्यहीन तथा दिशाविहीन शिक्षा बालक को ज्ञान से दूर कर देती है। उद्देश्यहीन शिक्षा एक बालक को विचारहीन, अबुद्धिमान, नास्तिक, टोटल डिफेक्टिव पर्सन, टोटल डिफेक्टिव मैनेजर तथा जीवन में असफल बनायेगी।
शिक्षा एक सतत् और रचनात्मक प्रक्रिया है। मानव प्रकृति में निहित क्षमताओं को विकसित करना और समाज की समृद्धि एवं प्रगति हेतु उनकी अभिव्यक्ति का संयोजन करना ही उसका लक्ष्य है। बच्चों को आध्यात्मिक, सामाजिक तथा भौतिक ज्ञान से सुसज्जित करके ही यह सम्भव होता है। सच्ची शिक्षा विश्लेषणात्मक योग्यताओं, आत्मविश्वास, संकल्पशक्ति और लक्ष्यपरक शक्तियों के विकास की क्षमताएं प्रदान करती हैं। साथ ही वह ऐसी दृष्टि प्रदान करती है जो व्यक्ति को समुदाय के सर्वोत्तम हितों का संरक्षक तथा सामाजिक परिवर्तन का आत्मप्रेरित माध्यम बनने की योग्यता प्रदान करती है।
धर्म व न्याय व्यवस्था
धर्म का आशय जीवन मूल्यों से है। धर्म का बुनियादी उद्देश्य मानव जाति की एकता, मानवीय प्रेम तथा भाईचारे को विकसित करना है। अत: बच्चों में ऋषियों से प्रेरित ज्ञान के साथ आधुनिक विज्ञान का संयोजन आवश्यक है। बच्चों को बचपन से ही अपने माता-पिता के द्वारा बनाये नियमों तथा स्कूल में प्रिन्सिपल एवं स्कूल के टीचर्स द्वारा बनाये गये नियमों (या कानूनों) का पालन करना इसलिए सीखना पड़ता है, ताकि बड़े होकर जब वे समाज में प्रवेश करें, तब वे समाज के नियमों एवं कानूनों की और न्याय का पालन कर सकें।
नेल्सन मण्डेला ने कहा है कि 'शिक्षा सबसे अधिक शक्तिशाली हथियार है जिसके उपयोग से विश्व में बदलाव लाया जा सकता है।‘ जबकि महान विचारक विक्टर ह्ूगो कहते हैं कि पूरे संसार की समस्त सैन्यशक्ति और बमों की शक्ति से भी अधिक शक्तिशाली होते हैं मनुष्य के 'विचार’। बच्चों में श्रेष्ठ विचारों का पोषण तीन प्रयोगशालाओं द्वारा होना चाहिए-
अ) घर के वातावरण
ब) स्कूल के वातावरण तथा
स) समाज के वातावरण में
इन तीनों को भी शिक्षाप्रद बनाना होगा। स्कूल ही समाज के प्रकाश या अन्धकार का केन्द्र है: बालक ईश्वर की सर्वोच्च कृति है। प्रत्येक बालक पवित्र, दयालु और ईश्वरीय प्रकाश से प्रकाशित हृदय लेकर इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। 'घर’ उसका प्रथम क्लास रूम है, 'स्कूल’ उसका दूसरा क्लास रूम होता है तथा समाज उसका तीसरा क्लास रूम इस प्रकार कोई भी बालक अपने सम्पूर्ण जीवन की परीक्षाओं के लिए 'घर’, 'स्कूल’ तथा 'समाज’ रूपी तीनों क्लास रूमों से शिक्षा ग्रहण करता है। इन तीनों स्कूलों में आपस में सहयोग अति आवश्यक है। ये तीनों मिलकर बालक के चरित्र का सशक्त निर्माण करते हैं। इसलिए विश्व में दिव्य सभ्यता स्थापित करने के लिए इन तीनों क्लास रूमों को दिव्य व श्रेष्ठ बनाने का प्रयत्न भी करना चाहिए। पतंजलि का शैक्षिक अभियान इसी दिशा में पुरुषार्थरत है।
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01 Mar 2025 17:58:05
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