सिबकथोर्न एक दुर्लभ औषधीय पादप

सिबकथोर्न एक दुर्लभ औषधीय पादप

आचार्य बालकृष्ण

   सिबकथोर्न (साइबेरियन पाइन एप्पल) को लेह में लेहबेरी कहते हैं। इसे ब्रह्मफल भी कहा जाता है। हार्टिकल्चर के क्षेत्र में यह पौध स्वास्थ्य, रोजगार के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। लेह, लद्दाख, कश्मीर के ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्र में उभरता हुआ यह पौधा भारत में 1992 से महत्व में आया।
परंपरागत चाइनीज दवाओं में इसका ८वीं सदी से औषधीय प्रयोग होता आया है। स्वास्थ्य संवर्धनात्मक पेय के लिए पहचाने जाने वाले इस पौध को चीनी औषधि निर्माता रक्त संचरण, हृदय रोग, पाचन तंत्र, त्वचा संबंधी विकारों में प्रयोग करते थे। चाइनीज ओलम्पिक खिलाड़ियों को भी इस पेय को दिया जाता था, जिससे उनकी शारीरिक क्षमता, कार्य संपादन शक्ति व सहनशीलता में वृद्धि हो सके। मंगोलिया, तिब्बत, रूस, पाकिस्तान, अफगानिस्तान की लोक कथाओं में इसका विशिष्ट वर्णन सिद्ध करता है कि सिबकथोर्न अर्थात् ब्रह्मफल प्राचीनकाल से ही जन-जन के लिए महत्वपूर्ण था। १२वीं सदी में ग्रीक देश में घोड़ों को मजबूत व ऊर्जावान बनाने के प्रयोग में यह फल लाया जाता था। इसीलिए इसे 'हिप्पोफैकहा गया।
चंगेजखान द्वारा संगठित आर्मी, कठोर अनुशासन व लेहबेरी इन तीन आधारों पर अपने साम्राज्य का चीन से योरोप तक विस्तार किया गया, इस विस्तार में लेहबेरी का प्रमुख स्थान था, जिससे उनके सैनिक मजबूत बने रहते थे। सोवियत अंतरिक्ष यात्री व खगोलशास्त्री सिबकथोर्न (ब्रह्मफल) अर्थात् लेहबेरी को विटामिन का विशेष स्रोत मानते थे तथा विकिरण के दुष्प्रभाव से बचने की बड़ी चिकित्सकीय औषधीय पदार्थ रूप में इसका प्रयोग करते थे। अंतरिक्ष उड़ानों में ऑक्सीजन की पूर्ति में भी वे इसे प्रयुक्त करते थे अर्थात् यह उनका पूर्ण आहार था।
आयुर्वेद के समान तिब्बत की 'आम्ची सिस्टमएक चिकित्सा प्रणाली है। उसमें यह पौधा 'अमल वेदनाम से जाना जाता है। 'सिरमानइसका स्थानीय नाम है। यद्यपि भारत में यह १९९२ में प्रयोग में आया, पर अब भारत में इसके व्यापक प्रयोग पर विचार चल रहा है। इसके गूदे व बीज के तेल पर वैज्ञानिक रिसर्चें हो चुकी हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि सैनिकों को मजबूत बनाने तथा लेहवासियों के पोषण में इसकी बड़ी भूमिका हो सकती है।
सिबकथोर्न की यह झाड़ी हिमालय की ठंडी मरुभूमि पर आदिकाल से ही उपलब्ध थी। लेह-लद्दाख में 11500 हेक्टेयर में यह पौध फैला मिलता है। २४००० फीट पर तैनात हमारे आर्मी सैनिकों का 6 से 9 माह तक के लिए सामान्य जनता से संपर्क कट जाता है। इस दौरान इस पौध का उपयोग उनके लिए बेहतर पौष्टिक आहार तैयार करने में किया जा सकता है।
डी.आर.डी.ओ.
भारत का रक्षा अनुसंधान संगठन जो ठंडे रेगिस्तान की ऊँचाईयों पर अनुसंधान कार्य करता था, बाद में फील्ड रिसर्च 'डिफेन्स इंस्टीट्यूट ऑफ हाई एल्टीट्यूट रिसर्च (DIHAR) रूप में इसे कार्य करने की मान्यता मिली। यहीं अपने पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के मार्गदर्शन में स्थानीय कृषि को विकसित करने की प्रौद्योगिकी का विकास हुआ। साथ ही स्थानीय किसानों के बेहतर उत्पाद एवं पोषण की दिशा में इस संगठन ने अनेक प्रोद्योगिकियों का प्रयोग किया। हिमालयी झाड़ियों, उनके कांटों एवं फलों आदि के परिष्करण की दिशा में प्रयोग करके उन किसानों में जागरूकता पैदा की। 'सिबकथार्नकी विशिष्टता भी उन्हीं प्रयोगों के दौरान सामने आई। आज सिद्ध हो चुका है कि लेह-लद्दाख की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने, वहां के लोगों को भारी मात्रा में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में इस अनुवांशिक संसाधन सिबकथार्न की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
इसके पत्तियों की संरचना भी महत्वपूर्ण है, जिसमें अनेक पौष्टिक तत्व पाये जाते हैं। एफ.आर.एल. (डी.आर.डी.ओ.), दा सिबकथोर्न 2006 शोध के अनुसार इसमें Moisture (नमी) 52 - 69, Total Ash (टोटल एश) 1.76, Crude Protein (क्रूड प्रोटीन) 2.2 - 2.4, Crude Fibre (क्रूड फाइबर) 4.6 - 4.85, Ether Extract (इथर एक्सट्रैक्ट) 6.6-6.94, Total Carbohydrate (टोटल कार्बोहाइड्रेट) 32-37, एवं Calcuium (कैल्शियम) 69 mg/ 100 gm मात्रा में पाया जाता है
इसी क्रम में फलों को लेकर एफ.आर.एल. (डी.आर.डी.ओ.), दा सिबकथोर्न 2006 की रिसर्च से प्राप्त तथ्यों के अनुसार स्वास्थ्य संतुलन संबंधी उपयोगिता के तहत इसमें Total soluble solids (oB) 14.3, Acidity % (as Malic acid) 2.54, pH of Juice 2.15, Total Sugar % 1.03, Reducing Sugar % 0.96, Non Reducing Sugar % 0.07, Moisture % 74.58, Ash % 1.8,  Crude Protein % 2.64, Crude Fiber % 3.54, Total Carbohydrates % 20.56, β-Caro पाये जाते हैं। जो स्वास्थ्य के लिए भरपूर आहार है।
अन्य उपयोगी संसाधन:
यह पौध पहाड़ी बंजर भूमि के वनीकरण के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है। इसकी लकड़ी वाणिज्य के लिए अति उपयोगी मानी गयी है। अब इसकी गुणवत्ता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक संरचनात्मक संयंत्र की दिशा में कदम बढ़ेंगे। यद्यपि पौध लगने के 8 साल बाद सिबकथार्न से वाणिज्यिक उत्पादन शुरू हो जाता है। इसकी उपज प्रति हेक्टेयर 10-15 टन है। जबकि 8 साल बाद इससे प्रतिवर्ष 200-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पत्ते प्राप्त किये जा सकते हैं। इसके बीज ब्राउन कलर, कठोर कवक से युक्त 4.5 द्वद्व के होते हैं। जबकि फल ओरेंज एलोकलर का होता है, इसमें बीज, गूदा व कवर होता है। जबकि फल में विटामिन सी, , फैटी एसिड, ओमेगा-3, 5, 6, 7, एवं ओमेगा-9 पाये जाते हैं।
स्वास्थ्यवर्धक प्रयोग:
यह एंटी कैंसर (एक्टी कारसियोजनिक) है। एमिनो माडोलेटा है। एंटी एन्फ्लामेशन है। रेडियोडर्मीटाइटिस, नान रेडियोडर्मिटाइटिस एवं शारीरिक अल्सर (गैस्टिक व ड्यूडेनल अल्सर), अम्ल-पित्त आदि रोगों में यह काम करता है। यह बुढ़ापा (Anti Ageing) कम करता है, क्योंकि यह बुढ़ापा लाने वाले तत्व फ्री रेडिकल निर्माण को कम करता है। इसके अन्य प्रभाव भी हैं, जैसे-
रक्त परिसंचरण तंत्र पर प्रभाव:
कार्नरी हर्ट डिजीज, हृदय क्षमता को बढ़ाता है, ब्लड के फैट लेवल को कम करने के साथ ब्लड वैशल (नलिकाओं) को पोषण प्रदान करने में सहायक है। इसमें असंतृप्त फैटी एसिड पाया जाता है जो कालेस्ट्रॉल को कम करता है, ब्लड प्रेशर को नियमित करता है तथा अरिद्मीय (ARRYTHEMIA) को रोकता है।
कैंसर कारक तत्व का प्रतिरोधक:
कैंसररोध में प्रभावी स्रोत सिद्ध होता है। यह कैंसर सेल्स को रोकता है एवं कैंसर कारक तत्व का प्रतिरोधक है। शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। एण्टीबॉडी को बढ़ाकर शरीर के कैंसर प्रतिरोधी क्षमता में वृद्धि करता है। साथ में ऑपरेशन, कीमो थैरेपी एवं रेडियेशन के प्रभावों को कम कर जीवन स्तर में वृद्धि करता है।
यह एंटी एजिंग है, बुढ़ापा को रोकने में सहायक है। आयुवृद्धि संबंधी कोशिकाओं को नियंत्रित करता है जिससे व्यक्ति में बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। यह लीवर सिरोसिस प्रतिरोधी है अर्थात् यह शरीर एन्जाइम, पित्त अम्ल को सामान्य करता है।
अंतत: कह सकते हैं कि लेह-लद्दाख के लिए ही नहीं, अपितु संपूर्ण मानव एवं प्राणिजगत के लिए यह पौध 'सिबकथार्नब्रह्मफल अर्थात् लेह बेरी ऐसी संजीवनी बनकर उभर रही है जो स्वास्थ्य संवर्धक, उपचारात्मक, रोकथाम (डिजिज प्रिवेंशन), दीर्घायुष्य (एंटी एजिंग) में काम करता ही है। देश के युवा वर्ग के लिए रोजगार कारक भी है। पतंजलि आयुर्वेद एवं डीआरडीओ के बीच इसकी हस्तांतरित टेक्रोलॉजी से न केवल सैन्य शक्ति को मजबूती मिलेगी, साथ ही देश का  आर्थिक तंत्र भी मजबूत होगा। लेहवासियों के आर्थिक निर्माण एवं समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होगा।

Related Posts

Advertisment

Latest News