स्वभाव, व्यवहार व आचरण में परिवर्तन से बनेगा सही इंसान
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स्वामी रामदेव
समाज राष्ट्र, विश्व निर्माण की दिशा में गतिशील हर तंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती है सही व नेक इंसान का होना। सही व नेक इंसान ही संसाधन व तंत्र का सही हित में संधान कर सकता है। पतंजलि योगपीठ के विश्व निर्माण का केन्द्रक है व्यक्ति। व्यक्ति निर्माण के मार्ग से ही ऋषियों का यह देश भारत पुन: जगतगुरू के पद पर प्रतिष्ठित होने में सक्षम बनेगा। इसी संकल्पना से मनुष्य के व्यवहार, स्वभाव व आचरण के परिष्करण के लिए इस लेख में ऋषियों द्वारा अपनाये गये सूत्रों को प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे हर मनुष्य अपने जीवन की सबसे बड़ी चुनौती या समस्या जटिल स्वभाव में परिवर्तन’ कर सके और जीवन की सबसे बड़ी सफलता या उपलब्धि 'अच्छा स्वभाव’ और 'अच्छा व्यक्तित्व’ प्राप्त कर सके।
प्रेम, करुणा, सेवा, वात्सल्य, निराभिमानिता, पुरुषार्थ, तप, पवित्रता, सात्विकता, ब्रह्मचर्य, शान्ति, अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, सेवा करना, संतोष रखना, गुस्सा न करना इत्यादि हमारे मूल स्वभाव के लक्षण हैं। एक वाक्य में कहें तो जिस स्थिति में हम चौबीस घण्टे सहज भाव से रह सकते हैं, वही हमारा स्वभाव है और जिससे कुछ ही समय के बाद हम विचलित होकर उससे निकलना चाहते हैं, छूटना चाहते हैं- वह स्वभाव आरोपित किया स्वभाव है, हमारा मूल स्वभाव नहीं है।
घर, परिवार, संगठन, समाज, राष्ट्र और पूरे विश्व में जो भी दु:ख, कष्ट, क्लेश, संघर्ष, टकराव, मनमुटाव, झगड़े, परेशानी व पीड़ायें हैं, उन सबका एक ही कारण है बुरा स्वभाव। अक्सर हम लोगों को यह कहते हुए सुनते हैं कि यह तो स्वभाव से ही लाचार है अथवा मैं अपना स्वभाव नहीं बदल सकता। मैं तो ऐसा ही हूँ, क्या करूं इत्यादि।
कहते हैं व्यक्ति माता-पिता, घर-परिवार, गुरु, धन, ऐश्वर्य सबकुछ छोड़ सकता है, किन्तु बुरे स्वभाव को छोड़ना महाकठिन है। देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उद्योगपति, धनवान या विद्वान् बन जाना हमारे लिए जरूर कठिन है, पर स्वभाव को बदलना संसार में सबसे कठिन है। खास बात यह कि-
प्रकृतिरेषा भूतानां, निवृत्तिस्तु महाफला।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रह किं करिष्यति।। (गीता.)
अर्थात् व्यक्ति जीवन भर शास्त्रों से, संतों, गुरुजनों से अच्छी-अच्छी बातें जानता व सुनता है, लेकिन बावजूद अपना स्वभाव उसे वहीं लाकर खड़ा कर देता है। सुनना और जानना निरर्थक हो जाता है।
बुरी आदतें मुख्य रूप से दो स्तर पर होती हैं।
वैयक्तिक दोष- जो हमें ज्यादा दु:ख देते हैं तथा दूसरों को थोड़ा कम दु:ख देते हैं, जैसे देर से उठना, आहार की अनियमितता, असंतोष, अशुचिता, नास्तिकता, अकर्मणयता, व्यायाम आदि न करना, दूसरों से सेवा लेना इत्यादि व्यक्तिगत दोष हैं।
सामाजिक दोष- वाणी और व्यवहार से हिंसा करना, चोरी, झूठ, अब्रह्मचर्य, कदाचार, दुराचार, कठोर बोलना, चुगली करना, तोड़फोड़ करना, गुटबाजी करना, दूसरों की खिल्ली उड़ाना, झगड़े करना या करवाना, दूसरों पर शक करना, ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, नफरत, परिवार, समाज या संगठन में फूट डालना आदि ये ऐसे दोष हैं जिनका हमें ज्ञान नहीं होता, पर ये अपने साथ-साथ परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व को भी कष्ट देने वाले होते हैं। इस प्रकार ये सामाजिक दोष हुए जिनसे मुक्त होना जरूरी है।
एक प्रश्न और है कि हमारी मूल प्रकृति के शुद्ध होते हुए भी हमारे स्वभाव में दोष क्यों आ जाता है?
इसका सीधा सा कारण है हमारे अंदर इन्द्रिय दोष या संस्कार दोष का होना। स्वभाव तो एक परिणाम है, एक कार्य है। इसके कारण दो प्रकार के हैं, ज्ञात अथवा दृश्य कारण- ज्ञान, निष्ठा और कर्म का परिणाम होता है स्वभाव अर्थात् जैसा ज्ञान-वैसी निष्ठा, जैसी निष्ठा-वैसी प्रवृत्ति, जैसी प्रवृत्ति-वैसा संस्कार और जैसे संस्कार-वैसा स्वभाव। ज्ञान जितना परिष्कृत होगा उतना ही स्वभाव बदलता जायेगा। अल्पज्ञान, मिथ्याज्ञान के कारण ही हमारी निष्ठायें डगमगाती हैं और बार-बार भूल करने से हमारे वैसे ही संस्कार और स्वभाव बन जाते हैं। इसलिए ज्ञान का अतिरेक, निष्ठा की पराकाष्ठा, कर्म अर्थात अत्यन्त पुरुषार्थ हमें बुरे स्वभाव से बचा सकते हैं। जैसे किसी शुभ कर्म में हम इतने तल्लीन हो जायें कि गलत सोचनेे के लिए समय ही न मिले। इसी प्रकार हमारा स्वभाव हमारे संकल्पों का ही परिणाम है। दृढ़ संकल्प से हम बुरे से बुरे स्वभाव को भी बदल सकते हैं। पर जब तक हम कारण को नहीं समझेंगे, तब तक निवारण नहीं होगा।
दूसरा अज्ञात अथवा अदृश्य कारण अनादिकाल से चले आ रहे जीवन प्रवाह की अनेक योनियों में से होकर हम मनुष्य योनि में आये हैं। उन सब योनियों के संस्कार भी सूक्ष्म रूप से हमारे चित्त में समाहित रहते हैं। बुरे स्वभाव को बदलने से पहले प्रश्न यह उठता है कि मैं अपने स्वभाव को क्यों बदलना चाहता हूँ। इसके अनेक उत्तर हो सकते हैं, जैसे गुरु ने कहा है, शास्त्रों में लिखा है, दूसरे लोग कहते हैं, समाज ऐसा मानता है इसलिए अथवा मैं खुद ही अपने बुरे स्वभाव से परेशान हूँ या हानि देख रहा हूँ इसलिए। इनमें से दूसरा कारण स्वभाव परिवर्तन के लिए अधिक कारगर है। यह अवस्था आते ही स्वभाव में बदलाव सुनिश्चित हो जाता है।
स्वभाव व संस्कारों को ऐसे बदलें:
मन:स्थिति तथा परिस्थिति के अनुसार स्वभाव परिवर्तन के कुछ तात्कालिक प्रचलित उपाय हैं और कुछ अंतिम या दीर्घकालिक उपाय हैं। तात्कालिक में जैसे गुस्सा आ रहा है, तो ठण्डा पानी पी लें। किसी को देखकर ईर्ष्या, द्वेष, घृणा उत्पन्न होती है तो ईश्वर का स्मरण कर लें इत्यादि, लेकिन सदा-सदा के लिए स्वभाव परिवर्तित करने हेतु कुछ उपाय इस प्रकार हैं-
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गुरु, शा, अपने अनुभव, प्रकृति व अन्त:करण की प्रेरणा से प्राप्त ज्ञान का आदर करें, अर्थात् इन सभी स्रोतों से प्राप्त ज्ञान के अनुसार ही जब हम जीवन जीयेंगे तो हमारे स्वभाव में दोष पैदा ही नहीं होगें। हम अपनी मूल प्रकृति से जुड़े रहेंगे। हम खुद भी शान्त रहेंगे और दूसरों को भी अशान्त नहीं करेंगे। गुरु के प्रति अखण्ड निष्ठा होने पर उनके द्वारा प्रदत्त मार्गदर्शन से अत्यंत दोषपूर्ण स्वभाव भी बदल जाता है।
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यह तथ्यपूर्ण है कि जब हम अपने दोष को हृदय से स्वीकार कर लेते हैं, तो उसका निवारण भी कर लेते हैं। महापुरुष एक बार दु:ख का दर्शन करके सदा-सदा के लिए उससे मुक्त हो जाते हैं जैसे महर्षि दयानन्द, महर्षि रमण, महात्मा बुद्ध इत्यादि। अपने दोषों की स्वीकारोक्ति के साथ कुछ क्रियायें भी हैं, जैसे-
ध्यान व प्रार्थना करें- नियमित ध्यानयोग व प्रभात संकल्प का अभ्यास करें। ध्यान व प्रार्थना यदि प्रामाणिकता के साथ सच्चे हृदय से निकलती हैं तो उसका उत्तर हमें अवश्य मिलेगा।
सत्संग के द्वारा- ऐसे तेजस्वी महापुरुष जिनका प्रभाव हमारे हृदय पर पड़ता है, उनके संग से भी स्वभाव परिवर्तित हो जाता है।
पूर्ण पुरुषार्थ- कर्माशय सूक्ष्म होने से कर्माशय को तो हम नहीं बदल सकते, परन्तु पूर्ण पुरुषार्थ से अपने प्रारब्ध को बदल सकते हैं, इसे समझें।
स्वाध्याय- जो आप्तपुरुष आज हमारे बीच में सशरीर नहीं हैं, उनके वचनों को बार-बार पढ़कर वैसा ही आचरण करने से भी स्वभाव परिवर्तित हो जाता है।
प्रायश्चित द्वारा: प्राय: निश्चय से, चित्त-तप करना अर्थात् निश्चय के साथ जो तप किया जाता है, वह प्रायश्चित है अर्थात् बिना किसी और को बताये उपवास आदि के द्वारा अपने आपको स्वयं दण्डित करने से भी मनुष्य भविष्य में वैसी भूल करने से बच जाते हैं।
यदि सामान्य भाषा में हम कहें तो व्यक्ति का स्वभाव ही है कि जिसमें वह सुख देखता है, उस कार्य में प्रवृत्त होता है और जहाँ हानि देखता है उससे बचना चाहता है। पर हो सकता है जिसमें वह सुख देख रहा है, उसमें सुख न हो जैसे- बीड़ी, सिगरेट, शराब आदि पीने वाला उसमें सुख देखता है, इसीलिए उसमें प्रवृत्त होता है लेकिन वास्तव में उसमें सुख नहीं है किन्तु जैसा भी अल्प ज्ञान, मिथ्या ज्ञान उसके पास है, उसके अनुसार वह अपने लाभ वाला कार्य मानकर ही करता है।
हम सचमुच अपने बुरे स्वभाव को बदल सकते हैं:
अपने स्वभाव में आज तक कुछ न कुछ परिवर्तन न किया हो संसार में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है। जब हम एक दोष को छोड़ सकते हैं, तो दूसरे दोषों को भी छोड़ सकते हैं। शान्तचित्त होकर ध्यानावस्था में अच्छे संस्कारों को उभारकर बुरे संस्कारों को क्षीण करना, यही स्वभाव परिवर्तन का अंतिम व सशक्त उपाय है। तो इसके लिए हम क्यों न अभी से तत्पर हो लें।
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01 Mar 2025 17:58:05
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