यदि साधी न गयी अपनी उम्र
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डॉ. नागेन्द्र कुमार नीरज
योगग्राम, पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार
बुढापा अभिशाप नहीं है। उम्र बढ़ने के साथ शरीर में अनेक परिवर्तन होने लगते हैं। शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने से अनेक बीमारियाँ घर करने लग जाती हैं। कमजोरी, सहनशीलता की कमी, चिड़चिड़ापन, संवेदनशीलता, भ्रम, चलते-चलते गिर जाना, चलने में कठिनाई, जोड़ों तथा हड्डियों में दर्द आदि अनेक रोग लक्षणों से अक्सर वरिष्ठ नागरिक जूझते रहते हैं। इस आयु के लोगों में सुख, शान्ति, प्रसन्नता, सक्रियता एवं उत्साह भी कम होने लगता है। यह स्थिति तब आती है, यदि मनुष्य अपनी प्रत्येक आयु के विज्ञान को नजरंदाज करता है और समुचित पोषण से वंचित रहता है। विशेषज्ञों ने आयु के सात प्रकार बताये हैं- 1. वास्तविक उम्र, 2. जैविक उम्र, 3. मानसिक उम्र, 4. नैतिक उम्र, 5. आध्यात्मिक उम्र, 6. भावनात्मक उम्र, 7. सामाजिक उम्र। प्रस्तुत लेख इसके प्रयोग व विश्लेषण पर आधारित है।
जैविक उम्र (Biological Age) शरीर के अंग प्रत्यंग दिल, दिमाग, फेफड़ा, हडिड्यों, खून रक्त वाहिनियाँ स्नायु तथा पाचन संस्थान की कार्य क्षमता पर निर्भर करती है, वह शरीर की सक्रियता एवं देह की भाषा परिभाषा से झलकती है।
साइकोलॉजिकल अर्थात् मानसिक उम्र दिमाग तथा मन के विकास पर निर्भर करती है। बहुत से ऐसे लोग जिनकी उम्र अधिक होती है किन्तु व्यवहार बच्चों की तरह होता है। उनमें धैर्य, बुद्धिमता, निपुणता, साहस एवं पराक्रम का अभाव होता है। निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती है। ऐसे लोगों की साइकोलॉजिकल उम्र कम होती है। जबकि जिनकी साइकोलॉजिकल उम्र ज्यादा होती है वे ऊर्जा से लबालब होते हैं। पराक्रमी, साहसी एवं बुद्धिमान होते हैं। निर्णय लेने की क्षमता गजब की होती हैं। ऐसे लोग ही असंभव को संभव बनाने की क्षमता रखतेे हैं। साइकोलॉजिकल एज हमारे कार्य करने की शैली, बातचीत, व्यवहार, आचार-विचार एवं सोच के माध्यम से झलकती है।
भावनात्मक उम्र (Emotional Age): भावनाओं को हम कितनी जल्दी नियंत्रित कर पाते हैं। अनियंत्रित भावनाएं तथा शीघ्रता से भावनाओं के वशीभूत हो जाने से वास्तविक तथा जैविक उम्र भी प्रभावित होती है। हमारा जीवन नैतिक मूल्य प्रेम, करूणा, सेवा, त्याग, सहयोग, समन्वय, क्षमता, शील, सौजन्यता, सहृदयता आदि के प्रति जिस अवस्था में समर्पित होता है। उन्हीं स्तर के दिव्य नैतिक गुणों से हमारा जीवन समृद्ध होता है, यही नैतिक उम्र कहलाती है। 25 साल का नवयुवक भी नैतिक उम्र में समृद्ध हो सकता है। जबकि 75 साल का व्यक्ति भी नैतिक उम्र की दृष्टि से दीन-हीन हो सकता है। आध्यात्मिक उम्र (Spritual Age) भी शरीर के उम्र का मोहताज नहीं होती है। स्वामी रामतीर्थ, विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द, शंकराचार्य, बुद्ध आदि कम उम्र में ही आध्यात्म के क्षितिज पर पहुँचे हुए लोग थे। वास्तविक उम्र इन सम्बद्ध पुरुषों की बहुत ही कम थी, परन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से इन्होंने खूब जिया। इसी प्रकार सामाजिक उम्र होती है। सामाजिक एवं पर्यावरणीय परिवेश के साथ आप किस प्रकार सामंजस्य किस उम्र में बैठा पाते हैं, इसी पर सामाजिक उम्र निर्भर करती है। बहुत से ऐसे लोग हुए है जो बहुत ही कम उम्र में समाज के साथ समरसता पैदा कर उसका नेतृत्व किया है। नई दिशा प्रदान की है। वीर भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, केनेडी आदि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
विश्लेषक मानते हैं कि दो व्यक्तियों की क्रोनोलॉजिकल (वास्तविक) उम्र एक समान हो सकती है किन्तु बायोलॉजिकल, इमोशनल, स्प्रिचुअल, एथिकल तथा सोशल उम्र एक समान नहीं होती। क्रोनोलॉजिकल को छोड़कर अन्य उम्र निर्भर करती है आपके आहार, विहार, पर्यावरण, विचार, चिन्तन, पालन-पोषण, योगासन, प्राणायाम, तथा ध्यान पर। जबकि सभी प्रकार की उम्र का सारा दारोमदार दिमाग की सक्रियता पर निर्भर करता है। दिमाग से हम जितना काम लेेंगे वह उतना ही सक्रिय रहेगा और हम हर प्रकार की उम्र की दृष्टि से दीर्घायु होंगे। 75 साल के बूढ़े 25 साल के जवान की तरह जोश व जवानी से भरपूर काम करने के जनून तथा मंजिल को प्राप्त करने के जज्बे से भरे हो सकते हैं, वहीं 25 साल के नवजवान की बायोलॉजिकल उम्र 75 साल के बूढ़े की तरह हताश, उदास, निराश, अनेक काल्पनिक रोगों से ग्रस्त एवं संत्रस्त हो सकती है।
मनुष्य की आयु जीवन शैली पर निर्भर करती है। खान-पान, रहन-सहन, चिन्तन-मनन, आहार-विहार, विचार एवं व्यवहार एवं बीमारी की स्थितियों पर क्रोनोलॉजिकल एवं बायोलॉजिकल आयु निर्भर करती है।
इन दिनों विकसित देशों के औसत उम्र में 5 से 16 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है तथा 2025 तक 25 प्रतिशत तक होने की सम्भावना है। भविष्य में किशोरों की अपेक्षा बूढ़ों की संख्या ज्यादा होगी। विकसित देशों में पुरुषों की औसत उम्र 80 साल तथा औरतों की औसत उम्र 86 है। 75 से 80 साल अधिक औसत आयु क्रमश: हांगकांग, ऑस्ट्रेलिया, कनाड़ा, अमेरिका, इंग्लैण्ड तथा सर्वाधिक जापान की है। बांग्लादेश, नाइजेरिया, पाकिस्तान, इजिप्त, इण्डिया, लंका एवं चीन के लोगों की भी औसत आयु बढ़ी है, किन्तु विकसित देशों से काफी कम है।
जब उम्र बढ़ने लगे:
ऐसे विरले एवं भाग्यशाली ही होते है जिनका बुढ़ापा बिना बीमारी के आनन्द एवं आरोग्यप्रद होता है। उम्र बढ़ने के साथ शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक परिवर्तन प्रारम्भ हो जाता है। जिसके चलते बुजुर्ग लोग अपने आपको असमर्थ एवं असहाय समझने लगते हैं। उम्र बढ़ने के साथ शरीर क्रिया विज्ञान की दृष्टि से अनेक फिजियोलॉजिकल परिवर्तन होते हैं।
मस्तिष्क एवं स्नायु सम्बन्धी परिवर्तन:
45 साल के बाद प्रतिदिन एक हजार स्नायु कोशिकाएं निष्क्रिय होकर नष्ट होने लगती हैं। कई क्रेनियल नर्व्स डिजेनरेट होने लगते हैं। न्यूरोलन लॉस के कारण आर्गेनिक कन्फ्यूजन बढ़ जाता है। ज्ञानेन्द्रिय सम्बन्धी संवेदनाओं में कमी आने (Degenration of Cranial Nerves) से देखने सुनने, स्वाद सुगन्ध, स्पर्श सम्बन्धी संवेदनाओं में कमी आने लगती है। जैसे कॉकलियर डिजनरेशन से प्रेसबायोक्युसिस (बुढ़ापे का हाइटोन बहरापन) होता है। आँखों की लेन्स में लचीलापन कम हो जाता है। वे कठोर हो जाती है। फलत: बुढ़ापे के समीप दृष्टि दोष (Presbyopia) लेन्स का ओपेसीफिकेशन होने से मोतियाबिन्द हो जाता है।
रीढ़ की ग्रेमैटर से निर्मित हार्नसेल्स (Dorsal Ventral Anterior Horn Cell) नष्ट होने लगते हैं मांसपेशियां कमजोर होने लगती है। उन पर नियंत्रण नहीं रहता। मांसपेशियों का हास एवं क्षय प्रारम्भ हो जाता है। डार्सल कॉलम के नष्ट होने से शरीर का अंगविन्यास एवं अवस्था (पोस्चर एवं पोजिशन) लड़खड़ाने लगती है। अनुकम्पी संवेदना कम होने लगती है। शरीर पर नियंत्रण खत्म होने लगता है। चलने-फिरने से गिरने की संभावना बढ़ जाती है।
उम्र बढ़ने के साथ दिमाग में खून की आपूर्ति कम होने लगती है। रक्त वाहिनियों के एन्डोथेलियल फंक्शन तथा रक्त रसायनों में परिवर्तन होने से दिमागी रक्त अस्त-व्यस्त हो जाता है। तब ब्रेनहेमरेज, थ्राम्बोसिस तथा स्ट्रोक होने की संभावना बढ़ जाती है।
सामान्य व्यक्ति के दिमाग में खास प्रकार के पांच लाख रंगीन नाइग्रा कोशिकाएं होती हैं, जो डोपामिन का स्राव करती हैं। उम्र बढ़ने के साथ कुछ खास लोगों या कोल गैस पॉदजनिंग के कारण ये कोशिकाएं तेजी से नष्ट होती हैं। जिससे पार्किन्सन रोग होता है।
कुछ लोगों के दिमाग में एमीलॉइड बीटा एमीलॉइड पॉलीपेप्टाइड के चकत्ते ज्यादा बनने से एलजीमर्स तथा डिमेन्शिया (बुढ़ापे का पागलपन) रोग पनपने लगता है। बुढ़ापे में वंशानुगत दिमागी बीमारी हनटिंग्टन्स कोरिया भी जोड़ पकड़ता है।
बुढ़ापे में उच्च रक्तचाप, मधुमेह तथा मोटापा इत्यादि अनेक बीमारियाँ मुसीबतों के जन्मदाता बन जाते हैं। बौद्धिक प्रदर्शन लड़खड़ाने लगता है। उठने बैठने तथा चलने की क्षमता एवं सक्रियता कम होने लगती है। शरीर का अंग विन्यास तथा गाईट बेढंगा होने लगता है। अचानक ब्लैक आउट, सुस्ती, शरीर में गर्मी की कमी हाइपोथर्मिया आदि के लक्षण दिखते हैं।
बुढ़ापे में रोगों का आक्रमण तो होता है, परन्तु उसे संयमित दिनचर्या, आहारचर्या तथा योग-प्राणायाम व आयुर्वेदिक अनुपान के द्वारा रोका भी जा सकता है। तो क्यों न हम ऋषि प्रणीत प्रयोग करें और सदैव निरोग बने रहें।
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