वैश्विक अहिंसा की दिशा में बढ़ता पतंजलि योगपीठ का आंदोलन

वैश्विक अहिंसा की दिशा में बढ़ता पतंजलि योगपीठ का आंदोलन

डॉ. विजय कुमार मिश्र

   अहिंसात्मक व्यक्ति अर्थात् पूर्ण पवित्र पुरुषार्थी देवत्व से ओतप्रोत मनुष्य जिसमें राष्ट्रवाद व वैश्विक उत्थान दोनों साथ-साथ प्रवाहित होते हैं। अहिंसा चेतनात्मक शक्ति है, जो जनमानस के अंत:करण में प्रवाहित होती है, जिसमें युगबोध के परमाणु सतत नव ऊर्जा निर्मित करते रहते हैं। यही जब अवरुद्ध हो जाती है तो जन-जन के मनों में जड़ता, अकर्मण्यता जन्म लेती है, परिणामत: लोकमानस आत्महीनता, किंकर्तव्यविमूढ़ता का शिकार होता है जो एक प्रकार की हिंसा ही है। ऐसा समाज, राष्ट्र व ऐसा वैश्विक जगत प्रगतिशीलता से वंचित होने लगता है। मनुष्य-मनुष्य के बीच दूरी बढ़ती है, मानव मन में स्वबोध के तत्व निष्क्रिय हो उठते हैं। अहमजन्य टकराव बढ़ते हैं और समाज संचालन के हर तंत्र दिग्भ्रमित हो लड़खड़ा उठते हैं, अंतत: प्रत्यक्ष हिंसा पनपती है।
Non-Violence, Non Resistance अर्थात् अहिंसा एवं अप्रतिकार का भारतीय जीवनशैली में वैदिक काल से ही महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इस राष्ट्र का हर नागरिक अहिंसक होने के कारण ही भारत विश्व स्तर पर सिरमौर था। पर अहिंसा का आशय कायरता नहीं है, अपितु भारतीय वैदिक कालीन सभ्यता की दृष्टि से अहिंसा मनुष्य की वीरता एवं भद्रता का समन्वय है। औचित्य के लिए जीवन को बलिदान करने का भाव है। अहिंसा के अनंत आयामी ज्ञान को प्राप्त करने के लिए सुदूर देशों से व्यक्ति यहां आते रहे। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन काल में इस शब्द को गांधी जी ने युगीन गरिमा देकर राष्ट्र को युगीन चेतना से जोड़ा, देश स्वतंत्र हुआ, लेकि न बाद के कर्णधारों ने अहिंसा शब्द की सीधे उपेक्षा तो नहीं की, परन्तु अपने चिंतन-चरित्र एवं व्यवहार के माध्यम से जैसे इसे रौंद सा डाला। अहिंसा के तथाकथित नुमाइंदे भी इस शब्द को युगीन भारत के परिपे्रक्ष्य में सही ढंग से न रख पायें। परिणामत: देश की नई पीढ़ी 'अहिंसाजैसी शक्तिधारा से लाभान्वित होना दूर, परिचित भी न हो पायी, अपितु उसे इस शब्द से ही चिढ़ होने लगी।
यद्यपि संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2 अक्टूबर को विश्व अहिंसा दिवस से नवाज कर इसे जीवित बनाये रखने का प्रयास किया। पर विडम्बना ही है कि एक तरफ वैश्विक जगत में दशकों से विश्व अहिंसा दिवस मनाया जाता रहा, वहीं दूसरी ओर विश्व के कई सारे देश पीड़ा से सराबोर होते रहे। इसके पीछे कारण किसी बड़े दबंग देश द्वारा न्याय के नाम पर वैश्विक जगत पर अपनी दादागिरी कायम करना रहा हो, अथवा अपनी उद्धत महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति हेतु खड़े हुए कई हिंसक संगठनों द्वारा अपनी राष्ट्रीय सीमा व सीमा के परे अपनी आततायी गतिविधियों का संचालन हो, हिंसा का एक व्यापक तांडव विश्वभर में इन दिनों देखने को मिल रहा है। वर्तमान में कई देशों में हिंसा की धारा में नहाते अपनों द्वारा अपने ही देश की नर-नारियों, बच्चों, युवाओं को मौत के घाट उतारते आतंकवादी हरकतों से अहिंसा की आवश्यकता अधिक प्रबल हो उठी है और विश्व का आम मानस चीख-चीखकर कहने लगा है कि अब हिंसा के इस प्रत्यक्ष रूप का प्रतिकार होना ही चाहिए।
अहिंसा की नयी समझ जरूरी:
पर इसके लिए हमें और गहरे उतरने की आवश्यकता है और भारतीय ऋषियों ने जिस अहिंसा के सहारे विश्व में जगतगुरू की धाक अर्जित की थी उसे समझना होगा और विश्व धरा पर उसे बोना होगा, वस्तुत: भारतीय चेतना में अहिंसा का आशय केवल शरीर व मन से दूसरे को आघात न पहुँचाने तक ही सीमित नहीं था, अपितु अहिंसा हमारी जीवनशैली, जीवन की रीति-नीति एवं दिशाधारा थी, वह भी इतनी सशक्त कि औचित्यपूर्ण राष्ट्रहित, मानवहित, न्याय व लोकहित में अपनी 'हड्डियांअर्पित करने को भी जीवन का सौभाग्य और श्रेष्ठतम अहिंसा माना गया। शिवि और दधीचि सहित अनेक ऋषि इसके उदाहरण हैं। अर्थात् 'लोक उत्थान, लोकहित, राष्ट्र निर्माण, विश्वहित के प्रत्येक पहलू को युगोन्मुख बनाने के लिए अपने को तिल-तिल गला देने में अहिंसा की साधना निहित है।महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, राम, कृष्ण सहित अनेक संत-महर्षि के माध्यम से वह परम्परा चली आ रही है।
गांधी जी के अनुसार अहिंसा और सत्य का मार्ग तलवार की धार के समान तीक्ष्ण है। इसका हमारे दैनिक भोजन से भी अधिक महत्व है। सही ढंग से लिया जाए तो भोजन देह की रक्षा करता है, उसी प्रकार सही ढंग से अमल में लाई जाए तो अहिंसा आत्मा की रक्षा करती है। अहिंसा के मार्ग का पहला कदम यह है कि हम अपने दैनिक जीवन में परस्पर सच्चाई, विनम्रता, सहिष्णुता और प्रेममय दयालुता व साहस का व्यवहार करें। उन्होंने कहा अहिंसा का अनुगमन उस समय करना आवश्यक है जब तुम्हारे चारों ओर हिंसा का नंगा नाच हो रहा हो। अहिंसक व्यक्ति के साथ अहिंसा का व्यवहार करना कोई बड़ी बात नहीं है। वस्तुत: यह कहना कठिन है कि इस व्यवहार को अहिंसा कहा भी जा सकता है या नहीं। लेकिन अहिंसा जब हिंसा के मुकाबले खड़ी होती है, तब दोनों का फर्क पता चलता है। विशेषज्ञों ने इसे अंदर बैठे ईश्वरत्व की शक्ति कहा है। सत्य की स्थापना के लिए अहिंसा एक कारगर अस्त्र है। आज राष्ट्र व विश्व के हर मानव, हर तंत्र को नये सिरे से सत्यानुसंधान की आवश्यकता है, जो अङ्क्षहसा द्वारा ही संभव है। साथ ही 'अहिंसाके भी नवीन अनुसंधान की जरूरत है।
पतजंलि योगपीठ के प्रयोग:
पतंजलि योगपीठ का आंदोलन इसी परिप्रेक्ष्य में वैश्विक सत्यानुसंधान की दिशा में प्रयत्नशील है। दूसरे शब्दों में एक दृष्टि से 'अहिंसा की विश्वव्यापी प्रतिष्ठा की दिशा में ही इसके कदम बढ़ रहे हैं। योग, आयुर्वेद के सहारे विश्व स्तर पर संपूर्ण मानव के अंत:करण में सुसुप्त देवत्व, ईश्वरत्व को जगाकर अहिंसा का ही बीजारोपण हो रहा है।
किसी समाज विश्लेषक ने कहा है- समय के साथ समाज की चैतन्यता परिवर्तित हो जाती है, परिणाम स्वरूप उसकी आवश्यकतायें बदलती हैं। ऐसे में उसकी उस परिवर्तनकारी  बुनियाद को सही आयाम देने के लिए 'मौलिक परिभाषाओंको युगीन सूत्रों, युगीन भाषाओं के सहारे परिवर्तित करनी पड़ती हैं। पतंजलि योगपीठ द्वारा इस संदर्भ में प्रयुक्त ऋषि अनुसंधित 'योग, आयुर्वेद, स्वदेशी ऐसे सर्वव्यापी एवं मानव हितकारी अस्त्र हैं जिसके सहारे पूर्ण अहिंसा के साधकों का उदय होगा और वे एक से एक जुड़कर पूर्ण अहिंसक विश्व का निर्माण करेंगे। दूसरे शब्दों में इसे मानव में देवत्व का उदय एवं धरती पर स्वर्ग के अवतरण की दिशा में क्रांतिकारी पुरुषार्थ कह सकते हैं।
ऐसे मानव का उदय होगा जो अभ्युदय व नि:श्रेयस से युक्त हो। योगाभ्यास के सहारे उसका नि:श्रेयस इतना व्यापक हो चुका होगा कि उसे हर मनुष्य में अपनी ही आत्मा विकास करते दिखेगी; दूसरे का धन मिट्टी के समान लगेगा तथा दूसरे की स्त्री में माता समान अनुभूति होगी। भारतीय वाङ्गमय में इसे महानतम अहिंसात्मक अवधारणा मानी गई है।
आशय यह कि इन तीनों स्थितियों के विपरीत आचरण करना हिंसा है। किसी ने कहा है अहिंसा जब जीवन में स्थान पाती है, तो परोपकारिता स्वत: अंत: में जन्म लेती है, इससे नीचे सेवा, सहयोग, परोपकार व्यर्थ के शब्द ही साबित होते हैं।
योगाभ्यास से जब व्यक्ति का अंतकरण व्यापक होगा एवं आयुर्वेद से वह प्रकृतिस्थ बनेगा तो ये सूत्रोन्मुख सद्वृत्तियां गहराई में स्थित होंगी। तब व्यक्तिगत जीवन से लेकर सामाजिक व्यवहार, राष्ट्रीय वृत्तियों के संदर्भ में एवं वैश्विक चेतना के स्तर पर अपनाई जाने वाली छोटी-छोटी अनौचित्यपूर्ण प्रक्रियाओं में उसे हिंसा के तत्व स्पष्ट होने लगते हैं और वह उसे दूर करने की दिशा में उठ खड़ा होता है। ऐसा व्यक्ति सामाजिक जीवन में भी त्याग, बलिदान प्रस्तुत करने का प्रयास करेगा।
संग्रहवृत्ति भी एक प्रकार की हिंसा:
हमारी संग्रह वृत्ति से दूसरे के हक का अधिग्रहण होता है। परिणामत: समाज में अभाव जन्म लेता है। कहावत भी है एक जगह का टीला संकेत करता है कि कहीं इतना ही गहरा गड्ढा भी है। वस्तुत: मानव की जरूरतें सीमित हैं, पेट भरने के लिए कुछ मुट्ठी अनाज, तन ढकने के लिए कुछ मीटर कपड़ा व एक छोटी सी छत बस इतने से ही हर मनुष्य का गुजारा चल जाता है। दूसरी ओर परमात्मा द्वारा प्रदत्त संसाधन इतने पर्याप्त हैं कि विश्व के हर व्यक्ति का कार्य सहूलियत से चल सकता है, लेकिन कौन जानता था कि मनुष्य प्रकृतिगत संसाधनों का अंधाधुंध संग्रह मात्र अपने स्वार्थ पूत व विलास वैभव के लिए इस कदर करने लगेगा कि अपने दूसरे भाईयों के लिए कहीं जगह नहीं छूटेगी। अन्य लोग तनाव ग्रस्त और दुखी होते रहेंगे। आज इस नई प्रकार की हिंसा से हर मानव को निकालना होगा और हर मन में मिल-बांटकर खाने का दर्शन स्थापित करना होगा।
अर्थोन्मादी दृष्टि भी हिंसा:
सभ्यता के विकास के साथ-साथ मानव मन में अर्थोन्मादी दृष्टि घर करती जा रही है। हर कोई अर्जित बौद्धिक शक्ति के सहारे इसी दिशा में भाग रहा है और गर्वीले स्वर में अपने अर्जित संसाधनों पर अधिकार जताता है।
वास्तव में परम्परागत प्रचलन की दृष्टि से यह न्याय संगत व तार्किक भी है। सरकार एवं संविधान भी उसे तवज्जो देते हैं। शिक्षा-प्रतिभा के सहारे हमने बौद्धिक कुशलता अर्जित की और अब यदि उसी के सहारे सही रास्ते से लाखों रुपये एकत्र कर रहा हूँ तो गलत भी नहीं है। बौद्धिक कुशलता के सहारे कुछ भी अर्जित किया भी जा सकता है, लेकिन न्याय की दृष्टि से वह वैसे ही है, मान लिजिए सात रोटियां सात लोगों के लिए पर्याप्त है। इस प्रकार एक रोटी एक व्यक्ति के बांट में आई, पर किसी ने बौद्धिक कुशलता के बल पर तिकड़मी नीति बनाकर सात में से चार रोटियां अपने पक्ष में कर लीं। इस प्रकार एक व्यक्ति के हक में चार रोटी, अन्य छ: के बीच तीन। ऐसे में अन्य तीन व्यक्ति तो बिना रोटी के ही रहेंगे। इस दृष्टि से किसी के हक को मारना, उसे अभाव ग्रस्त छोड़ देना भी तो एक प्रकार की हिंसा ही है, जो आज पूर्ण प्रचलन में है। भविष्य में यह नीति चलेगी ही, कहा नहीं जा सकता। पतंजलि योगपीठ का योग, आयुर्वेद व स्वदेशी अभियान में सर्वहित का सूत्र विद्यमान है।
नारी जाति पर कुदृष्टि भी हिंसा:
नारी एक चैतन्य शक्ति है, निर्मात्री है। उसकी अपनी चैतन्यतात्मक गरिमा है। वह गरिमा तभी अक्षुण्य है जब उसे समुचित सम्मान मिले। चूंकि वह निर्मात्री है, अत: उससे कोई नया सृजन तभी संभव बन सकता है, जब उसे उसकी गरिमानुसार स्वतंत्रता मिले। निर्णय में, संकल्प साधने में, पुरुषार्थ की धारा तय करने में आदि। यह तभी संभव हो सकता है, जब मानव मात्र नारी के प्रति कुचेष्ठाओं से मुक्त हो तथा नारी स्वयं भी अपनी नारीत्व के सम्मान को गरिमामय दिशा में नियोजित करने हेतु सचेत हो।
भविष्य को न्याय के शासन की जरूरत:
आज संपूर्ण विश्व में कानून का शासन है, लोग उस पर भरोसा करते हैं, लेकिन फिर भी सारा विश्व भेदभाव से भरा है। यह भी एक प्रकार की जघन्य हिंसा है। वास्तव में पूर्ण अङ्क्षहसा की स्थापना के लिए हमें न्याय के शासन की जरूरत है। इस संदर्भ में परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज का कथन सर्वोत्कृष्ट है कि कानून का शासन नहीं, अपितु न्यायपूर्ण शासन, न्यायकारी राज्य की आवश्यकता है। जो कानून भेदभाव से भरे हैं, उन्हें बदला जाना चाहिए और अन्यायकारी कानून समाप्त किये जाए, यही वक्त की मांग है। क्योंकि आज न्यायालय फै सला सुनाते हैं न कि न्याय करते हैं, इसीलिए फैसले से समाज निर्माण नहीं होता। समाज का मूल तत्व न्याय में छिपा है। ऋषियों-महापुरुषों ने इसीलिए सदैव न्यायकारी व्यवस्था पर जोर दिया है। इस संदर्भ में श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी महाराज कहते हैं कि न्याय दृष्टि एक प्रकार की श्रेष्ठतम अहिंसा है, जिसके बल पर वर्तमान का उत्थान एवं भविष्य का निर्माण संभव बनता है। इसी क्रम में स्वास्थ्य के प्रति न्याय, अपने स्वाद के प्रति न्याय का शासन तो स्वयं अपने हाथ है। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन एवं सभ्य समाज का मार्ग भी तभी प्रशस्त होगा। तब लड़का-लड़की में समानता, कुरीतियों से मुक्ति, शरीर, मन व भावनाओं का समुचित उपयोग, ज्ञानार्जन, शोषण विहीन समाज, आतताई आतंकवाद से मुक्ति की दिशा में व्यक्ति साहस के साथ जुटेगा और भारत का उत्थान होगा ही। वास्तव में तभी विश्व निर्माण का मार्ग तैयार होगा और तभी अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस की सार्थकता सिद्ध होगी, पतंजलि योगपीठ उसी अभियान में अपने लाखों कार्यकर्ताओं सहित संलग्र है। आइये मिलकर हाथ बंटायें।
 

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