आवश्यकता है देश में सघन स्वच्छता अभियान की
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कुमार प्रखर निर्माणी
लगता है हमने गंदगी को अपने जीवन का अंग बनाकर उसे आत्मसात कर रखा है। यही प्रकृति हमारी अनेक समस्याओं का कारण है। अस्वच्छता हमें बद्सूरत बनाती ही है, अपितु अनेक प्रकार की शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक रुग्णावस्था की कारक भी बनती है। गंदगी भरे वातावरण में निवास का दुष्प्रभाव हमारे सोच, संकल्प, जीवनशैली पर पड़ता है। अंतत: हम आत्मविश्वास को खोकर आत्महीनता तक के शिकार बन जाते हैं। विशेषज्ञों की मान्यता है कि 'स्वच्छ होने का आशय स्वयं अपने कपड़े, अपने घर-परिवार व अपनी वस्तुओं को साफ रख लेना ही नहीं है, अपितु अपने साथ-साथ दूसरों को भी इस धारा से जोड़ते चलना है, जिससे अपने आस-पास के वातावरण से लेकर इस राष्ट्र एवं विश्व में 'स्वच्छता का प्रकाश फैल सके। पतंजलि योगपीठ से जुड़े प्रत्येक कार्यकर्ता के संकल्प में स्वच्छता एक आंदोलनात्मक धारा के रूप में प्रकट होनी चाहिए, जो अपने से ही प्रारम्भ होती है।
हम अपने घर तक क्यों सिमटें?
अपना घर झाड़कर कूड़ा किसी दूसरे के दरवाजे, नाली व सड़क पर डालना आम प्रचलन में है। इससे अपना घर तो साफ हो गया पर नाली रूके, सड़न पैदा हो, कीटाणु बढ़ें, सड़क पर चलते यात्री फिसलकर गिरें, उन्हें क्या! अक्सर देखने में आता है कि कुछ लोग रेल-बस में सफर कर रहे होते हैं, मूँगफली खाई और छिलका वहीं फैला दिया, पान खाया तो पीक वहीं थूक दी। संतरे, केले खाए और छिलका बिखेर दिया। इस प्रकार हर जगह गंदगी व अस्वच्छता फैलाना अपना अधिकार समझते हैं। अनेक लोग तो चाट-पकौड़ी खाते और जूठा पत्ता, कागज आदि वहीं डाल देते हैं, वह हवा में उड़कर राहगीरों के ऊपर पड़ता है। सड़क गंदी हुई सो अलग। इसी प्रकार मोटर साइकिल, कार या स्कूटर खराब हुआ, रास्ते में ही मरम्मत की और मोबिल व कालिख वहीं छोड़कर शान से गाड़ी पर चलते बने, पीछे किसी यात्री का पैर फिसले व किसी के कपड़े नष्ट हों तो उन्हें क्या? लघु शंका, दीर्घ शंका लगी तो उसके लिए सुलभ शौचालय व उपयोगिता कक्ष तक न जाकर सड़क के आस-पास ही निबट लिया। यह सब विचारने पर लगता है कि आज हम अपने घर तक सिमट गये हैं, निहायत स्वार्थी से बन गये हैं। चौखट के बाहर चाहे कितनी भी गंदगी हो, कोई फर्क नहीं।
गाँवों में लोग अशिक्षा के कारण स्वच्छता की ओर विशेष ध्यान नहीं देते। परंतु शहरों में अस्वच्छता का कारण नागरिकों की लापरवाही और अपने नागरिक कर्त्तव्यों के प्रति उदासीनता की भावना ही है। शहरों में सफाई विभाग होते हुए भी गंदगी फैली दिखना यही लगता है कि शहरवासी गंदगी से घृणा तो कर सकते हैं, परंतु उसे दूर रखने में अपना हाथ नहीं बटाना चाहते। एक दृष्टि से इसे सामूहिकता का अभाव ही कह सकते हैं।

वैज्ञानिक तथ्य है कि स्वच्छता के अभाव में हमारा शरीर, मन, वातावरण दूषित हो जाता है। गंदी आदतों के कारण अपने शरीर में दाद-खाज एवं अन्य बीमारी हो जाना साधारण बात हैं। शरीर रुग्ण हो तो उसका प्रभाव मन पर भी पड़ता है। वातावरण अस्वच्छ हो, तो रोगाणु के फैलते देर नहीं लगती। परोक्ष हानियाँ तो प्रत्यक्ष हानियों से भी बढ़कर हैं। भारत की प्राचीन मान्यता और संस्कृति से आकर्षित होकर विदेशी लोग भारत आते हैं, परंतु यहाँ उन्हें अपनी अपेक्षा के अनुरूप स्वच्छता न मिलने से एक दूषित भावना लेकर स्वदेश लौटकर इसकी चर्चा करते हैं, इससे अन्य को निराशा होती है और देश को विदेशी मुद्रा की एक बड़ी रकम से वंचित रहना पड़ता है।
अस्वच्छ वातावरण में रहने से हमारी भी भावनाएँ अस्वच्छ होती हैं, धीरे-धीरे हम गंदगी के अभ्यस्त होते जाते हैं। यही कारण से भारत के गांवों व शहरों में व्याप्त अस्वच्छता हमारी आँखों को बिल्कुल नहीं खटकती। अस्वच्छता का निवारण कर स्वच्छता का वातावरण बनाने के लिए देश की सरकारें तरह-तरह के प्रयोग कर रही हैं। जरूरत है देश के नागरिक भी सफाई को भगवान की पूजा का अंग बनायें।
स्वच्छ भारत के लिए हम क्या करें:
लोगों के मन में अस्वच्छता के प्रति अरुचि जगायें तथा स्वयं स्वच्छता का शुभारम्भ करें, एक संगठित क्रम से स्वच्छता अभियान भी चलाया जा सकता है। इसके लिए गाँव व मोहल्ले के कुछ सेवा भावना वाले युवकों की टोली बना लें तथा एक-एक दिन अलग-अलग मोहल्लों में जाकर सार्वजनिक स्थानों की सफाई करें। इससे वहाँ के भावनाशील लोगों में भी जागृति आएगी। इसी प्रकार गांव के कुछ अनुभवी बुजुर्ग लोगों के स्वयं सेवक दल बनें, जो गांव की आवश्यकता पर विचार करें। धीरे-धीरे अन्य लोगों में भी स्वच्छता की आदत बन जाएगी और वे स्वयं स्वच्छता के लिए अभ्यस्त हो सकेंगे।
बच्चों में:
बच्चों में स्वच्छता की आदत शाला के प्राथमिक स्तर से ही डाली जा सकती है। उन्हें अपने शरीर, कक्षा, पाठशाला, बगीचा, घर आदि की स्वच्छता का अभ्यस्त बनाना चाहिए। इसी प्रकार शाला की बच्चों को कुछ टोलियाँ बनाकर स्वच्छता की स्वस्थ स्पर्धा कायम की जा सकती है। स्वच्छता के लिए कुछ अंक निर्धारित कर देने से भी वे अधिक आकर्षित हो सकते हैं।
अस्वच्छता की विज्ञान विधि:
अस्वच्छता को स्वच्छता में बदलने की वैज्ञानिक पद्धति भी विकसित कर सकें तो सफाई तो होगी ही, साथ ही कूड़े का सदुपयोग भी होता रहेगा। इसके लिए गाँव-मोहल्ले में इधर-उधर पड़े कूड़े को एकत्र कर सड़ाया जाए, तो अच्छी खाद बन सकती है। इस खाद के प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ेगी। कई देशों में ऐसे कारखाने हैं, जहाँ प्रतिदिन शहर का टनों कूड़ा आता है, खाद के रूप में परिणत कर दिया जाता है। परिणामत: इस तैयार खाद के प्रयोग से खेतों की पैदावार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।
सब रोग मुक्त होंगे:
संक्रामक रोगों में चेचक, मलेरिया, यक्ष्मा, डेगू जैसे रोग भी कितने ही ऐसे हैं जिनके मूल में अस्वच्छता या गंदगी रहती है।
वर्ष 1675 में अंतरराष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन अभियान के अंतर्गत अपने देश से भी मलेरिया खत्म कर दिया गया था। चेचक को लेकर कई अभियान चले, डेगू से लेकर चिकलगुनिया तक के मूल कारण गंदगी-जहाँ उसे फैलाने वाले मच्छर पैदा होते हैं, पर इस देश में गंदगी जहाँ की तहाँ ही रही।
डेगू, फाईलेरिया से लेकर अनेक रोग विशिष्ट जलवायु के गंदे स्थानों में रहने वाले मच्छरों के कारण होती है। आमतौर पर इन रोगों के कीटाणु गंदे और बंद तालाबों, सड़े कुओं और इकट्ठे हुए पानी के डबरों में पैदा होते हैं और संक्रमण पद्धति से जल्दी ही रोग फैला देते हैं।
गीली या गंदी जगह पर रहने तथा दूषित वायु के सेवन से होने वाले तपेदिक, अस्थमा जैसे रोग की माँ 'अस्वच्छता’ कही जा सकती है। सर्वेक्षण के अनुसार भारत में करोड़ों व्यक्ति आज भी ऐसे रोग के शिकार पाए जाते हैं। सबसे बड़ा कारण है गंदगी, जहाँ पैदा हुए रोगाणु श्वाँस के साथ शरीर में पहुँचते और फेफड़ों में इकट्ठे होते रहते हैं। ये रोगाणु फेफड़ों को धीरे-धीरे चाटते हैं और तपेदिक का रोगी कमजोर होता जाता है। इस देश में व्यक्तिगत या पारिवारिक जीवन में भी स्वच्छता से परहेज करने वाला वर्ग बहुत बड़ा है। नित्य प्रति मलमूत्र के विसर्जन में असावधानी और लापरवाही बरत कर हम न केवल रोगों को फैलाने में सहायक बनते हैं, वरन् अपने राष्ट्र की बहुमूल्य संपदा को भी क्षति पहुँचाते हैं।

नित्य 15 मिनट का प्रयोग:
देश के हर व्यक्ति मात्र 15 मिनट नित्य स्वच्छता के लिए देने का संकल्प करें तो बड़ा परिवर्तन आ सकता है। फिर भी पतंजलि योगपीठ के करोड़ों कार्यकर्ता स्वच्छ भारत-स्वस्थ भारत की दिशा में 15 मिनट के नित्य स्वच्छता अभियान में जुट चुके हैं। अन्य संगठन भी यह प्रयोग अपना सकें तो देश से अस्वच्छता गायब हो जायेगी। इस 15 मिनट के लिए हर किसी को अपना पद-प्रतिष्ठा भूलना पड़ेगा इस राष्ट्रीय अभियान के लिए। गाँवों में पाखाने की गंदगी न फैले इसका उपाय देश की सरकार घर-घर शौचालय योजना के तहत कर रही है पर एक आसान उपाय और भी है जिसे गांधी जी ने चेताया था कि शौच को जाते समय पानी के लोटे के साथ-साथ एक खुरपी भी ले जाई जाए। शौच के लिए जहाँ बैठा जाए पहले उस स्थान पर खुरपी से एक छोटा गड्ढा बना लिया जाए तथा उसमें शौच किया जाए। शौच के बाद खुरपी से मिट्टी डालकर वह गड्ढा बंद कर दिया जाए। बड़ा गड्ढा खोदकर भी इसे तैयार किया जा सकता है।
इसी तरह घर से निकलने वाले नित्य के कूड़े को इकट्ठा करने के लिए दो प्रकार के पात्र रखें एक में सड़ने-गलने वाले कूड़े को डालें तथा दूसरे में ऐसा कूड़ा जो गल नहींं सकता जैसे कांच के टुकड़े, लोहे, प्लास्टिक के टुकड़े आदि डालें। बाद में एक से खाद बना लें तथा दूसरे को यथा स्थान डालें।
अपने घर के गंदे पानी में साबुन आदि का प्रयोग कम करें तथा उस पानी का उपयोग अपनी घरेलू वागवानी के लिए करके स्वयं का स्वास्थ्य सुधार ही सकते हैं, वातावरण को गंदा होने से भी बचा सकते है।
इसी के साथ जहां-तहां थूकने और गंदगी फैलाने की प्रवृत्ति पर भी प्रतिबंध लगाना चाहिए। साथ ही सार्वजनिक स्थानों, घर से बाहर सड़कों पर घर का कूड़ा-करकट फेंकने की आदत दंडनीय अपराध बनाया जाय। यदि इस प्रकार के कुछ प्रयोग भी हम अपने रोजमर्रा के जीवन से जोड़ सके तो हमारा स्वास्थ्य सुधरेगा और हमारे घर, आस-पड़ोस एवं समाज के बीच से अस्वच्छता दूर होगी, भारत स्वच्छ, स्वस्थ एवं समुन्नत बनेगा।
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