वनौषधियों में स्वास्थ्य

वक्ष, उदर, प्रजनन व त्वचा रोग निवारक आयुर्वेदिक घटक पीपल

वनौषधियों में स्वास्थ्य

   भारतीय शास्त्रों में वर्णित पीपल केवल वृक्ष नहीं, स्वास्थ्य, संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है। यह शुद्ध सात्विक, 24 प्रहर प्राणवायु छोड़ने वाला और विषैली कार्बन डाइआक्साईड सोखने में समर्थ वृक्ष है। इसकी छाया बहुत शीतल होती है। यह भारत के उपहिमालयी वनों, पश्चिम बंगाल एवं मध्य भारत में प्राप्त होता है। हाथी इसके पत्तों को बड़े चाव से खाते हैं, इसलिए इसे गजभक्ष्य कहते हैं। चरक संहिता के मूत्रसंग्रहणीय तथा कषायस्कन्ध व सुश्रुत संहिता के न्यग्रोधादि गण में इसका विशेष वर्णन मिलता है।
पीपल लगभग 10-20 मी. ऊँचा, शाखा-प्रशाखायुक्त, विशाल बहुवर्षायु, पर्णपाती वृक्ष है। इसकी शाखाएँ फैली हुई तथा काण्ड त्वक् धूसर वर्ण जबकि पुराने वृक्ष की छाल फटी, श्वेत धूसर व पत्र सरल, दीर्घवृंत युक्त, चर्मिल, चिकने, चमकीले, हरित वर्ण वाले तथा अग्र भाग पर नुकीले, हृदयाकार, 5-7 शिरायुक्त तथा 12-18 सेमी लम्बे एवं 7.5-12 सेमी चौड़े होते हैं। इनका ऊर्ध्व पृष्ठ चमकीला होता है व नवीन पत्र कोमल, चिकने तथा हल्के लाल रंग के होते हैं। इसके फल चिकने, गोलाकार, छोटे-छोटे, वृृंतरहित, कच्ची अवस्था में हरे, पक्वावस्था में कृष्ण अथवा बैंगनी वर्ण के होते हैं। इसकी मूल भूमि के अन्दर उपमूलों से युक्त दूर तक फैली रहती है। वट वृक्ष के समान ही इसके तने तथा मोटी-मोटी शाखाओं से जटायें निकलती हैं। इसके तने, शाखाओं या कोमल पत्तों को तोड़ने से एक प्रकार का चिपचिपा श्वेत आक्षीर निकलता है। पीपल पुष्पकाल अक्टूबर से दिसम्बर तथा फलकाल फरवरी से अप्रैल तक होता है।
रासायनिक संघटन
इसके पत्र में अराविनोस, मेन्नोस, ग्लूकोस, फेनोलिक ग्लूकोसाईड एस्टर, स्टेरॉयड स्टिग्मास्टेरॉल, वर्गेप्टाल मिथाईलोलिनोलेट,
लेनोस्टीरॉल, रेमोन्टोसाईड, β-सिटोस्टेरॉल तथा β-D-ग्लूकोपायरेनोसाईड पाया जाता है।
इसके काण्ड त्वक् में टैनिन, फाईटोस्टेरोलिन, बर्गाप्टेन तथा विटामिन-K पाया जाता है।
औषधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि
नेत्र रोग
  • आंख का दर्द-पीपल के पत्तों का दूध (आक्षीर) आंख में लगाने से आंख का दर्द मिट जाता है।
मुख रोग
  • दंतरोग- पीपल और वट वृक्ष की छाल दोनों को समान मात्रा में मिलाकर जल में पकाकर कुल्ला करने से दंत रोगों का शमन होता है।
  • मसूड़ों की सूजन- पीपल की ताजी टहनी से प्रतिदिन दातून करने से दांत मजबूत होते हैं तथा मसूड़ों की सूजन खत्म होती है एवं मुंह में आने वाली दुर्गंध भी नष्ट होती है।
  • हकलाहट- पीपल के आधी चम्मच पक्वफल चूर्ण में शहद मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से हकलाहट में लाभ मिलता है और वाणी में सुधार होता है।
वक्ष रोग
  • खांसी- 40 मिली पीपल छाल क्वाथ या 10 मिली स्वरस को दिन में तीन बार देने से कुक्कुर खांसी में लाभ होता है।
  • दमा- पीपल की छाल और पक्वफल चूर्ण को समभाग मिलाकर पीस लें, आधा चम्मच की मात्रा दिन में तीन बार सेवन करने से दमे में लाभ होता है।
  • पीपल के सूखे फलों को पीसकर 2-3 ग्राम की मात्रा में 14 दिन तक जल के साथ सुबह-शाम देने से श्वास तथा कास में लाभ होता है।
  • हिचकी- 50 से 100 ग्राम पीपल छाल के कोयलों से बुझे हुए पानी को पीने से हिचकी का शमन होता है।
उदर रोग
  • तृषा- पीपल की 50-100 ग्राम छाल के धुआं रहित कोयलों को पानी में बुुझाकर उस पानी को निथार कर पिलाने से वमन और तृष्णा में लाभ होता है।
  • अरुचि- पीपल के पके फलों के सेवन से कफ , पित्त, रक्त दोष, विष दोष, दाह, वमन तथा अरुचि का शमन होता है।
  • उदरशूल- उदरशूल मिटाने के लिए पीपल के ढाई पत्तों को पीसकर 50 ग्राम गुड़ में मिलाकर गोली बनाकर दिन में 3-4 बार खाना चाहिए।
  • बद्धकोष्ठ- पीपल के 5 से 10 फल को नियमित खाने से कोष्ठबद्धता का शमन होता है।
  • पीपल के पत्ते और कोमल कोपलों का क्वाथ बनाकर 40 मिली क्वाथ को पिलाने से विरेचन होता है।
  • रक्तातिसार- पीपल की कोमल टहनियां, धनिया के बीज तथा मिश्री तीनों को समभाग मिलाकर 3-4 ग्राम नियमित प्रात:-सायं सेवन करने से रक्तातिसार में लाभ होता है।
यकृत्प्लीहा रोग
  • पीलिया- पीपल के 3-4 नये पत्रों को मिश्री के साथ 250 मिली पानी में बारीक पीस व घोलकर छान लें। यह शर्बत रोगी को दिन में 2 बार पिलायें। 3 से 5 दिन तक यह प्रयोग करें। पीलिया रोग के लिए यह अनुभूत रामबाण औषधि है, पर अवस्थानुसार ही इन पत्तों का प्रयोग करें।
  • प्लीहा शोथ- पीपल की 10-20 ग्राम छाल को जलाकर उसकी राख में समान भाग कलमी शोरा मिलाकर इस चूर्ण को एक पके हुए केले पर छिड़ककर एक केला रोज खाने से प्लीहा शोथ का शमन होता है। इसकी छाल का 40 मिली काढ़ा पिलाने से पित्तज और नील प्रमेह में लाभ होता है।
वृक्कवस्ति रोग
  • मूत्र विकार-पीपल की छाल का क्वाथ या फाण्ट पिलाने से मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है।
प्रजनन संस्थान संबंधी रोग
  • उपदंश- पीपल की छाल को जलाकर भस्म बना लें, इस भस्म को उपदंश पर छिड़कने से लाभ होता है।
  • बांझपन-1 से 2 ग्राम शुष्क फल चूर्ण को कच्चे दूध के साथ मासिक धर्म के शुद्ध होने के पश्चात् 14 दिन तक देने से स्त्री का बांझपन मिटता है।
शाखा रोग
  • बिवाई- हाथ पांव फटने पर पीपल के पत्तों का रस या दूध (आक्षीर) लगायें।
त्वचा रोग
  • चर्मरोग- पीपल की कोमल कोपलें खाने से खुजली और त्वचा पर फैलने वाले चर्मरोग नष्ट हो जाते हैं। इसका 40 मिली काढ़ा बनाकर पीने से भी यही लाभ होता है।
  • खाज- खुजली-50 ग्राम पीपल के छाल की राख तथा आवश्यकतानुसार चूना व घी मिलाकर अच्छी प्रकार से खरल कर लेप करने से लाभ होता है।
  • पीपल की छाल का 40 मिली क्वाथ नियमित प्रात:-सायं पिलाने से कण्डु का शमन होता है।
  • फुंसी- पीपल की छाल को जल में घिसकर फोड़े-फुन्सियों पर लगाने से लाभ होता है।
  • अग्नि दग्ध- पीपल छाल चूर्ण को पीसकर उसमें घी मिलाकर दग्ध व्रण पर लगाने से लाभ होता है।
  • घाव- पीपल छाल के महीन चूर्ण को क्षत या घाव (चोट) पर लगाने से रक्तस्राव बंद होकर घाव शीघ्र भर जाता है।
  • सड़े हुए तथा न भरने वाले घावों पर पीपल की अंतर छाल को गुलाब जल में घिसकर लगाने से घाव जल्दी शुद्ध होकर भर जाते हैं। भगंदर और कंठमाला में भी इससे लाभ होता है।
  • जीर्ण घाव-पीपल की नरम कोपलों को जलाकर कपड़े से छानकर इसे पुराने बिगड़े हुए फोड़ों पर बुरकने से लाभ होता है।
  • स्नायुक-पीपल के पत्तों को गर्म करके बांधने से स्नायुक गल जाती है। इसके 21 कोमल पत्ते पीसकर, गुड़ के साथ गोलियां बनाकर 7 दिन सुबह-शाम खिलाने से क्षत जन्य वेदना का शमन होता है।
  • विस्फोटक-पीपल के कोमल पत्रों को गेहूं के गीले आटे में पीसकर मिलायें और इसे सूजन तथा विस्फोटक पर लगाने से लाभ होता है।
  • व्रण प्रच्छादनार्थ-व्रण पर औषधि का लेप लगाकर पीपल के कोमल पत्रों से आच्छादित करना लाभप्रद होता है।
  • वट, गूलर, पीपल, प्लक्ष तथा वेतस के त्वक् चूर्ण में पर्याप्त घृत मिलाकर लेप करने से व्रण शोथ का शमन होता है।
  • ताजे झड़े हुए पीपल पत्र के सूक्ष्म चूर्ण को व्रण पर छिड़कने से शीघ्र व्रण रोपण होता है।
  • दग्ध जन्य व्रण-पीपल के सूक्ष्म त्वक् चूर्ण को अग्निदग्धजन्य व्रण पर छिड़कने से शीघ्र व्रण रोपण होता है।
सर्वशरीर रोग
  • रक्त विकार-वातरक्त आदि रक्त विकारों में पीपल छाल के 40 मिली क्वाथ में 5 ग्राम मधु मिलाकर सुबह-शाम पिलाने से लाभ होता है।
  • रक्तपित्त-पीपलफल का चूर्ण और मिश्री को समभाग मिलाकर 1 चम्मच की मात्रा में दिन में तीन बार शीतल जल के साथ सेवन करने से कुछ ही दिनों में रक्तपित्त में लाभ होता है।
  • रक्त शोधनार्थ-1-2 ग्राम पीपल बीज चूर्ण को मधु के साथ सुबह-शाम चटाने से रक्त का शोधन होता है।
  • राजयक्ष्मा-पीपल मूल का मोदक (लड्डू) बनाकर सेवन करने से राजयक्ष्मा में लाभ होता है।
  • पीपल त्वक् चूर्ण को 2-3 दिन तक प्रतिदिन 2-3 बार प्रयोग करने से आंत्रिक ज्वर में लाभ होता है।रसायन वाजीकरण
  • आधा चम्मच फल चूर्ण को दिन में तीन बार दूध के साथ सेवन करते रहने से नपुसंकता दूर होती है तथा बल, वीर्य व पौरुष बढ़ता है।
  • समभाग पीपल फल, मूल, त्वक् तथा शुंठी को मिलाकर दूध सिद्ध करके मिश्री और मधु मिलाकर नियमित सुबह-शाम सेवन करने से पौरुष बढ़ता है।
  • वाजीकरण-पीपल के फल, मूल, त्वक् और शुंग (पत्रांकुर) के क्षीरपाक में शर्करा और मधु मिलाकर पीने से वाजीकरण गुणों की वृद्धि होती हैै।
विष चिकित्सा
  • सर्प दंश-सर्प दंश में जब तक चिकित्सक उपलब्ध हो, पीपल के पत्तों का रस 2-2 चम्मच की मात्रा में 3-4 बार पिलायें और मुंह में पत्ते चबाने के लिए देते रहें, विष का प्रभाव कम होगा।

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